क्या कोई मुस्लिम कभी “सेकुलर” हो सकता है? – एक विश्लेषण
How a Muslim Could be a Secular?
जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी कहते हैं कि कुरान के अनुसार विश्व दो भागों में बँटा हुआ है, एक वह जो अल्लाह की तरफ़ हैं और दूसरा वे जो शैतान की तरफ़ हैं। देशो की सीमाओं को देखने का इस्लामिक नज़रिया कहता है कि विश्व में कुल मिलाकर सिर्फ़ दो खेमे हैं, पहला दार-उल-इस्लाम (यानी मुस्लिमों द्वारा शासित) और दार-उल-हर्ब (यानी “नास्तिकों” द्वारा शासित)। उनकी निगाह में नास्तिक का अर्थ है जो अल्लाह को नहीं मानता, क्योंकि विश्व के किसी भी धर्म के भगवानों को वे मान्यता ही नहीं देते हैं।
इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म ही नहीं है, असल में इस्लाम एक पूजापद्धति तो है ही, लेकिन उससे भी बढ़कर यह एक समूची “व्यवस्था” के रूप में मौजूद रहता है। इस्लाम की कई शाखायें जैसे धार्मिक, न्यायिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सैनिक होती हैं। इन सभी शाखाओं में सबसे ऊपर, सबसे प्रमुख और सभी के लिये बन्धनकारी होती है धार्मिक शाखा, जिसकी सलाह या निर्देश (बल्कि आदेश) सभी धर्मावलम्बियों को मानना बाध्यकारी होता है। किसी भी देश, प्रदेश या क्षेत्र के “इस्लामीकरण” करने की एक प्रक्रिया है। जब भी किसी देश में मुस्लिम जनसंख्या एक विशेष अनुपात से ज्यादा हो जाती है तब वहाँ इस्लामिक आंदोलन शुरु होते हैं। शुरुआत में उस देश विशेष की राजनैतिक व्यवस्था सहिष्णु और बहु-सांस्कृतिकवादी बनकर मुसलमानों को अपना धर्म मानने, प्रचार करने की इजाजत दे देती है, उसके बाद इस्लाम की “अन्य शाखायें” उस व्यवस्था में अपनी टाँग अड़ाने लगती हैं। इसे समझने के लिये हम कई देशों का उदाहरण देखेंगे, आईये देखते हैं कि यह सारा “खेल” कैसे होता है –
जब तक मुस्लिमों की जनसंख्या किसी देश/प्रदेश/क्षेत्र में लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे -
अमेरिका – मुस्लिम 0.6%
ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5%
कनाडा – मुस्लिम 1.9%
चीन – मुस्लिम 1.8%
इटली – मुस्लिम 1.5%
नॉर्वे – मुस्लिम 1.8%
जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि –
डेनमार्क – मुस्लिम 2%
जर्मनी – मुस्लिम 3.7%
ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7%
स्पेन – मुस्लिम 4%
थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6%
मुस्लिम जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना “प्रभाव” जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिये वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि “हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है (अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं –
फ़्रांस – मुस्लिम 8%
फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6%
स्वीडन – मुस्लिम 5.5%
स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3%
नीडरलैण्ड – मुस्लिम 5.8%
त्रिनिदाद और टोबैगो – मुस्लिम 6%
इस बिन्दु पर आकर “मुस्लिम” सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये (क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले)। जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/प्रदेश/राज्य/क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है, जैसे कि –
गुयाना – मुस्लिम 10%
भारत – मुस्लिम 15%
इसराइल – मुस्लिम 16%
केन्या – मुस्लिम 11%
रूस – मुस्लिम 15% (चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%)
जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न “सैनिक शाखायें” जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे-
इथियोपिया – मुस्लिम 32.8%
जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे –
बोस्निया – मुस्लिम 40%
चाड – मुस्लिम 54.2%
लेबनान – मुस्लिम 59%
जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का “जातीय सफ़ाया” शुरु किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे –
अल्बानिया – मुस्लिम 70%
मलेशिया – मुस्लिम 62%
कतर – मुस्लिम 78%
सूडान – मुस्लिम 75%
जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/शासन प्रायोजित जातीय सफ़ाई की जाती है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/हथियार अपनाकर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे –
बांग्लादेश – मुस्लिम 83%
मिस्त्र – मुस्लिम 90%
गाज़ा पट्टी – मुस्लिम 98%
ईरान – मुस्लिम 98%
ईराक – मुस्लिम 97%
जोर्डन – मुस्लिम 93%
मोरक्को – मुस्लिम 98%
पाकिस्तान – मुस्लिम 97%
सीरिया – मुस्लिम 90%
संयुक्त अरब अमीरात – मुस्लिम 96%
बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं और सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है और उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे –
अफ़गानिस्तान – मुस्लिम 100%
सऊदी अरब – मुस्लिम 100%
सोमालिया – मुस्लिम 100%
यमन – मुस्लिम 100%
दुर्भाग्य से 100% मुस्लिम जनसंख्या होने के बावजूद भी उन देशों में तथाकथित “शांति” नहीं हो पाती। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जिन देशों में मुस्लिम जनसंख्या 8 से 10 प्रतिशत हो चुकी होती है, उन देशों में यह तबका अपने खास “मोहल्लो” में रहना शुरु कर देता है, एक “ग्रुप” बनाकर विशेष कालोनियाँ या क्षेत्र बना लिये जाते हैं, उन क्षेत्रों में अघोषित रूप से “शरीयत कानून” लागू कर दिये जाते हैं। उस देश की पुलिस या कानून-व्यवस्था उन क्षेत्रों में काम नहीं कर पाती, यहाँ तक कि देश का न्यायालयीन कानून और सामान्य सरकारी स्कूल भी उन खास इलाकों में नहीं चल पाते (ऐसा भारत के कई जिलों के कई क्षेत्रों में खुलेआम देखा जा सकता है, कई प्रशासनिक अधिकारी भी दबी जुबान से इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन “सेकुलर-देशद्रोहियों” के कारण कोई कुछ नहीं बोलता)।
आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22-24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)… भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा 40 से 50% तक पहुँच चुका है… अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी यह कोई भी (“सेकुलरों” को छोड़कर) आसानी से सोच-समझ सकता है…
(सभी सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक “स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट तथा लियोन यूरिस – “द हज”, से साभार)
यदि इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देखें, तो कोई मुस्लिम सही अर्थों में सेकुलर हो ही नहीं सकता, क्योंकि वे “एकेश्वरवादी” हैं, उनके लिये अल्लाह ही सबसे बड़ी और एकमात्र सच्चाई है और पैगम्बर मोहम्मद के सन्देश पत्थर की लकीर। वे दूसरे धर्मों के देवताओं का अस्तित्व ही नहीं मानते, बल्कि दूसरे मूर्तिपूजकों को वे काफ़िर मानते हैं, ऐसे में भला वे सेकुलर कैसे हो सकते हैं। जब कोई हिन्दू, अपने धर्म या देवी-देवताओं पर सवाल उठाता है तो हिन्दू उस पर बहस करेंगे, उस व्यक्ति की आलोचना करेंगे, उसकी बातों को कम से कम एक बार सुनेंगे और उसके बावजूद उस व्यक्ति का कोई बाल भी बाँका नहीं होगा, जबकि मुस्लिम व्यक्ति अपने ही धर्म के खिलाफ़ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, और सलमान रुश्दी या तसलीमा नसरीन जैसे कुछ लोग यदि समाज में व्याप्त किसी बुराई पर बोलने की कोशिश भी करते हैं तो उनके खिलाफ़ फ़तवे जारी हो जाते हैं, उन्हें जान से मारने की धमकियाँ मिलती हैं, उन्हें अपने ही देश से भागना पड़ता है। हिन्दुओं और मुस्लिमों में यही मुख्य अन्तर है, यानी सहिष्णुता और असहिष्णुता का। हिन्दुओं को दूसरे धर्मों और उनकी पूजा पद्धतियों से कभी कोई आपत्ति नहीं होती, जबकि इस्लाम में दूसरे धर्मों को समान रूप से इज्जत देना तो दूर, उनके लिये कोई जगह छोड़ना भी लगभग गुनाह मान लिया जाता हो, तब ऐसे में भला कैसे कोई मुस्लिम “सेकुलर” हो सकता है? विद्वानों से मैं पूछना चाहता हूँ कि “सेकुलर” की उनकी परिभाषा क्या है? और उस परिभाषा के खाँचे में मुस्लिम धर्मावलम्बी कैसे सेकुलर कहला सकते हैं? इसका दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि कोई व्यक्ति या तो “सेकुलर” हो सकता है या फ़िर “सच्चा मुसलमान”, दोनों एक साथ नहीं हो सकता। और जो आँकड़े तथा विभिन्न देशों की परिस्थियाँ ऊपर दी गई हैं, उससे एक सवाल और भी खड़ा होता है कि आखिर मुस्लिम बहुल देशों में लोकतन्त्र क्यों नहीं पनपता? हालांकि इसका जवाब भी इसी लेख में छुपा हुआ है, लेकिन उस विषय पर बाद में कभी विस्तार से बात करेंगे…
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35 comments:
धार्मित कट्टरता से बचना होगा - चाहे वह मुस्लिम हो या हिंदू. भारत में इस्लाम सैकडों बरसों से है, और हिंदू-मुस्लिम आजादी की लडाई में साथ-साथ लडे थे. तब नहीं होते थे दंगे. सन सैंतालीस में "आजादी" मिलते ही सब कुछ अचानक ही बदल गया. बस वही बँटवारा था जिससे पूरा दृश्य ही बदल गया.
मित्र, लेख के लिए तथ्य जुटाने और लिखने के लिए बधाई।
पर, इस लंबी बात और लेख का सार सिर्फ यही है कि सारा झगड़ा धर्म का है। धर्मनेरपेक्षता का लबादा हमने बस अपने ऊपर ओढ़ लिया ताकि हमारा धर्म और धार्मिक-अहंकार बचा रहे।
अनीलजी इतिहास दुबारा पढ़े ऐसी कामना है. मुगल काल तक नहीं जाता, अगर सब सही था तो बटवारा क्यों हुआ? किसने देश को तोड़ा? क्यों तोड़ा?
सुरेशजी आपके लेख से असहमत कब हुआ हूँ?
आँखें चोंधियाने वाला लेख... लेकिन जिन्हे पढ़ना चाहिए क्या वो पढ़ेंगे...
बँटवारा सिर्फ़ हिन्दुस्तान का हुआ था.. पर सुरेश जी का लेख पूरे विश्व की बात करता है.. अर्थार्त धर्मनिरपेक्षता वाली बात इतनी मजबूत नही दिखाई देती.. परिणाम समूचे विश्व में दिख रहे है... जबकि वहा भारत जैसी स्थिति नही है..
यानी हिंदू मुस्लिम और आज़ादी की लड़ाई वाली बात भी उतनी मजबूत नही रहती..
लेख यदि गौर से पढ़ा जाए तो बहुत सी बातो का जवाब देता है..
सुरेश जी आपने सटीक विश्लेषण दिया है |
धर्मनिरपेक्षता के लिए इस्लाम में कोई जगह है ही नहीं, यह शुब कार्य हमें करना होगा (यानि इस्लाम को धर्मनिरपेक्ष बनाने की पहल) | इसके लिए विश्व की राजनीती को व्यापक रूप से बदल देना पड़ेगा |
सही बात है
एक मुस्लिम लेखक है असलम शेख जिसने एक किताब लिखा है इस्लाम एण्ड टेररिज्म हमें इस किताब को पढ़ना चाहिये इस्लाम क्या है समझ में आ जायेगा।
और धर्मनिरपेक्षता का लवादा ओढें हुये हिन्दुस्तानीयों को तो जरुर पढ़ना चाहिये जो हमारी बातों से कभी सहमत नही होतें है कम से कम एक मुस्लिम लिखक से शायद हो जायेंगे।
आपने सटीक विश्लेषण किया है | लेख के लिए तथ्य जुटाने और लिखने के लिए बधाई।
प्रशंशा के लिए शब्द नही मेरे पास......इतना प्रभावशाली,यथार्थपरक सार्थक आलेख है कि इसमे केवल प्रश्न और समस्याएं ही नही सबके उत्तर और समाधान भी निहित है. इस लाजवाब आलेख के लिए आपका साधुवाद.
पर मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि सभी धर्मावलम्बी सहिष्णु अहिंसक बने और ईश्वर आल्लाह भगवान् इत्यादि सभी नामो को उस एक परमात्मा का ही पर्यायवाची समझें.
बहुत सटीक तथा तार्किक विश्लेषण, यही प्रार्थना करता हूं कि यह हमारे आम आदमी तक पहुंचे.
बहुत रोचक जानकारियाँ हैं । धर्मनिर्पेक्षता का संसार के कम ही धर्मों में कोई स्थान है । कई धर्मों, विचार धाराओं में सबकुछ सफेद या काला होता है, सलेटी के लिए या फिर तर्क के लिए कोई स्थान नहीं होता । आमतौर पर यह मानकर चला जाता है कि सबकुछ पहले से तय कर दिया गया है और उसपर ही चलते रहो । सोचना मनुष्य का काम नहीं है केवल भेड़ की तरह पीछे चलना उसका काम है । समस्या किसी धर्म में कम या अधिक हो सकती है परन्तु है अवश्य । सो सोचने की बात यह है कि सोचने की क्षमता रखने वाले मनुष्य को धर्म की आवश्यकता है या नहीं । और यदि है तो क्या वह उसमें फेरबदल कर अपने नाप का बना सकता है या फिर एक नाप ही सबके लिए होगा चाहे उस नाप में आप समाओ या नहीं, चाहे दम ही घुट जाए ?
घुघूती बासूती
bandhu, secular hone ke lie apne ghise-pite sanskaron se ladna padta hai; fir chahe voh hindu ho ya muslim ya aur koi dharmavalambi. pehle svayam se prashn kijiye ki aap secular hone ki soch bhi sakte hain ya naheen. agar prayas karenge to dimag ka kafi tanaav door ho jayega. man men ghar kiye baithee bekaar kee vaimanashyata door ho jayegi aur aapki sehat achchhi rahegi. kaha bhi gaya hai ki beemar mastishk tamam buraiyon ki jad hai. vah sakaratmak naheen soch sakega. har kadam par vidhvansh karega. aur akhir men svatah nasht ho jaega. aap svasth rahenge to hindustan svasth rahega.
apka shubhchintak
बहुत अच्छा विश्लेसन मिला.इसे पढ़कर हमारे सेकुलरवादी भाइयो की आखे खुल जानी चाहिए.अगर अब भी नही सुधरोगे तो पछताओगे .( फिर पछताए होत क्या जब चिडिया चुग गई खेत )
A very well researched ,but incomplete article . U have forgot to mention Indonesia -the largest muslim country today which was a Hindu and Budhhist nation not long back! Pls. do some research on this country as well so that the real threat Of India becoming another Indonesia is exposed.fEW hINDUS KNOW THAT THEIR BIGGEST TEMPLE IS IN COMBODIA WHERE NO WORSHIP IS DONE TODAY. NEPAL IS ALREADY ON THE SAME PATH !!
विश्लेषण परक आलेख -कहीं कोई अतिरंजना या दुराव छिपाव नही -जस का तस् आपने लिख दिया है ! दरसल यह एक ऐसी ह्कीकत है जिससे मुंह नही मोडा जा सकता -"सर्वं इस्लाममयम जगत"की ओर हम बढ़ रहे हैं ! यह कोई बौद्धिकता आग्रह लिए धर्म होता तो इसे अपनाने में कोई उज्र नही था -मगर यह तो घोर दकियानूसी और अति प्राचीन बर्बर मान्यताओं वाला रेलिजन है -घोर अवैज्ञानिक भी ! कभी कभी सोचता हूँ की कितना अच्छा हुआ की मैं हिन्दू हुआ नहीं तो जोर जबरदस्ती अल्लाह मियाँ में मुझे विशवास करना पड़ता -मेरी वैयक्तिक फ्रीडम का गला घुट जाता -आज मैं नास्तिक हूँ तो इसका श्रेय हिन्दू जीवन पद्धति को है कि मैं भगवान् तक को चुनने या ना चुनने में स्वतंत्र हूँ ! काश दुनिया में कोई तथाकथित धर्म /मजहब न होता और लोग इस मुद्दे पर अपनी सोच बनाने के लिए स्वतंत्र होते !
मैं एक ऐसी ही दुनिया की तमन्ना रखता हूँ !
मान गए सुरेश जी... बहुत अच्छा लिखा है आपने. जो हिन्दुस्तान की समस्याओं के लिए जो मन में आता है कह देते हैं... उन्हें ये आंकड़े देखने चाहिए.
सेकुलर सेकुलर सेकुलर दुनिया मे सिर्फ मुर्ख हिन्दू ही अपने को सेकुलर कहलवाने के लिए प्रयासरत रहते है | मुस्लिम हो या इसाई कोई अपने को सेकुलर कहलवाना पसंद नहीं करता होगा ऐसा मेरा मानना है
लेख के लिए तथ्य जुटाने और लिखने के लिए बधाई।!!!!
सटीक विश्लेषण!!!!!!
एक ऐसी ह्कीकत है जिससे मुंह नही मोडा जा सकता!!!!
आपका लेख वाकई प्रभावशाली है . मेरा भी मानना है कि इस्लाम में कहीं न कहीं समस्या तो है . इसके धर्मग्रंथों को जितना भी कोई पाक बताए पर मुझे कमी वहीं लगती है . जिससे इस धर्म के लोगों का स्वभाव उग्र होता है .
हम में शायद ही कोई ( तथाकथित सेकुलरों को छोड़कर ) जो आपसे सहमत नही हो। बेहतरीन विश्लेषण ! आपके लेख पढ़कर कई फंडे क्लीअर हो जाते हैं। बहोत धन्यवाद !
maaf kijiyega sir, aapka ye post churaye le jaa raha hun.. kuchh logon ko mail karne..
aur han, aapka taala mujhe nahi rok paaya.. :)
vaise agar aapko aapatti ho to bata den.. aage se nahi churaunga.. :)
vaise is post ke liye jabardast ke alaava aur koi shabd nahi soojha raha hai..
एक-एक शब्द गंभीरतापूर्वक पढ़ा. आपका विश्लेषण सही है. आपने ठीक ही कहा है कि मुसलमान कभी सेक्युलर नहीं हो सकता.
आदरणीय सुरेश जी,
विगत कुछ समय से आपको नियमित पढ़ रहा हूँ और मेरा मानना है कि ये अब तक की कुछ सबसे प्रभावशाली पोस्टों से एक है.
आपका यह कथन पूर्णतया सत्य है, कि जैसे-जैसे मुस्लिम जनसँख्या बढती है, वैसे-वैसे मांगें और उनका स्वरूप भी.
परन्तु यह भी सत्य है कि बहुसंख्यक मुस्लिम वर्ग द्वारा इन मांगों का समर्थन करने के पीछे उनकी रजामंदी से ज्यादा कुफर का खौफ होता है जो मुफ्ती-मौलानाओं के हर जायज-नाजायज कदम के समर्थन में आगे आता है.
अगर तारिख देखें तो हर मुस्लिम आन्दोलन ऊँचे तबके से आया है, अपेक्षाकृत आम जनता के नेतृत्व में. यहाँ तक कि भारत विभाजन की मांग भी मुस्लिम लीग के उन नेताओं की तरफ़ से आई थी जो लखनऊ, बिहार या भोपाल के बाशिंदे थे, न की सीमावर्ती राज्यों के. एनडबल्यूऍफ़पी में तो राष्ट्रवादी मुस्लिम का वर्चस्व था. आम मुस्लिम जनता को बेवकूफ बनाकर ये मौलाना हर हद तक ठग चुके है. यही वजह है कि भूखी नंगी जो जनता कभी अपने हक की आजमाइश के लिए सड़कों पर नहीं आती, एक कार्टूनिस्ट के ख़िलाफ़ मरने मारने पर उतारू हो जाती है. निस्संदेह इसके पीछे जनता की मूर्खता और धर्म का सर्वोपरि होना है.
एक सार्थक और सामयिक चर्चा के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें.
बहुत बढ़िया जानकारी सुरेश जी। इस जगह पर विजयशंकर चतुर्वेदी को देखकर दुख हुआ। ये मोहल्ले में ही ठीक हैं। यहाँ इनकी जरूरत नहीं थी। जो लोग धर्म को नहीं समझ सकते वो किसी मुसलमान को किस तरह समझेंगे। खैर, सबकुछ बिल्कुल सटीक लिखा है। ऐसी जानकारियाँ विदेशी लेखक जुटा रहे हैं क्योंकि उन्हें खतरे का अहसास है (शायद इसलिए वो लोग बच भी जाएँगे, हमारा तो निबटना तय सा लग रहा है)। हमारे यहाँ तो एमजे अकबर सरीखे मक्कार ही पढ़े जाते हैं जिनके मन में कुछ और होता है और कलम से निकलता कुछ और है।
आप ने जिन आस्तीन के साँपों की ओर इशारा किया यानि तथाकथित सेक्यूलर बुद्धिजीवियों की ओर उन्ही में से एक सज्जन(?) विजय शंकर चतुर्वेदी यहाँ अवतरित हुए हैं। इनका प्रश्न इतना घटिया है कि जवाब के लायक नहीं है। इन्हें तो हर उस चीज से नफ़रत है जो इनके लिजलिजे वामपन्थ की देशद्रोही प्रवृत्ति को नंगा करने वाली हो। इन्हें यह कभी पता नहीं चलेगा कि भारत में सेक्यूलरिज्म की बात जो ये कर पा रहे हैं वह केवल हिन्दू धर्म के कारण ही सम्भव हो पा रहा है। किसी मुस्लिम देश में जाकर जरा ये “मोहल्ला” चला लें तो जानूँ।
इनके जो सगे सम्बन्धी पाकिस्तान चले गये उनसे ही बात करके देखें कि वहाँ कितना मजा है? उनके मुस्लिम भाई ही उन्हें लतिया रहे हैं।
भारत के मुस्लिम जितनी स्वतन्त्रता का लाभ उठा रहे हैं उतना किसी मुस्लिम देश में भी मयस्सर नहीं होता। लेकिन खुराफ़ात तो इनके खून में समायी है।
जिस मुस्लिम कौम में मौका हाथ लगते ही अपने बाप का सिर कलम करके या जेल में डालकर उसकी सम्पत्ति और राजगद्दी हथिया लेने का रिवाज रहा हो उनसे आप दूसरी क्या उम्मीद करते हैं।
बेहद सटीक और स्पष्ट आलेख की बधाई।
पूरी तरह से सहमत हूँ आपके विश्लेषण से। यही सच्ची तस्वीर है। टिप्पणियाँ भी इसकी तस्दीक करती हैं। ...कुछ आस्तीन के साँप तो यहाँ भी आने ही थे।:)
ये आँकडे पहले भी देखे हैँ
और आपकी बात १००% सही है
-लावण्या
सत्य और तथ्यों पर आधारित विश्लेषण।डा०मुशीरुल हक जे०एन०यू० में प्रोफेसर और बाद में अलीगढ़ वि०विद्यालय के उपकुलपति रहे हैं उनकी लिखी पुस्तक ‘धर्म निरपेक्ष भारत में इस्लाम’ इस संदर्भ में काफी अधिकृत जानकारी देती है।इस सन्दर्भ में डा० शैलेश जैदी के ब्लाग ‘युग विमर्श’ में इस्लाम के सही रास्ते से भटकाव के कारण बड़ी ईमानदारी से बयाँ किये गये हैं।इस सब के बावजूद कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते या काफी बड़ी तादाद उन मुसलमानों की है जो शांति और भाईचारे के साथ रहना चाहते है यह सच अपनीं जगह कायम है कि दुनिया में कहीं भी यदि अशांति या युद्ध चल रहे हैं तो कारण मुसलमान ही हैं।
"कोई भी सच्चा मुसलमान कभी भी सेक्युलर नही हो सकता, न ही मानवतावादी और न ही सह-अस्तित्ववादी !" - यह एक बहुत ही खतरनाक एवं कटु सत्य है।
मौहल्ला ,एक इंडियन.दिनेशराज जी द्विवेदी,आदि नहीं दिखाई देते....और फिरदौस जी का तो शायद कहीं अता पता ही नहीं....तार्किक बातों से बचना ही शायद इन लोगों का शगल है..खैर शानदार के अलावा कुछनहीं कहा जा सकता इस पोस्ट के बारे मैं...मुसलमानों को राष्ट्रीय धारा मैं लाना है तो टर्की मॉडल चाहिये ..हिंदुस्तानी नहीं
तथ्यों के साथ आपने बिल्कुल सही जानकारी और विश्लेषण दिया है. ये सेकुलर होने की बातें भी बस अलगाववादी राजनीति का हिस्सा हैं. आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ. आपके ब्लॉग का लिंक अपने मित्रों को मेल कर रही हूँ. ऐसी बातें लोगों तक पहुंचे बहुत जरूरी है.
सबसे पहले ऐसे विषय को चुनने के लिए आपकी हिम्मत की सराहना जिस पर अमूमन हम लोग बात करने से कतराते है ..ना तो मै इस लेख को ऐसा लेख कहूँगा जिसे भावावेश में लिखा है ओर ना ही इसे तथ्यों का पिछलग्गू कहकर खारिज किया जा सकता .....ये सच है की राजनेता हो या मीडिया या कुछ बुद्धिजीवी सब के सब अपनी अपनी वजहों से धर्म का बेजा इस्तेमाल कर रहे है ......ये वाकई बड़े दुःख ओर शर्म की बात है की अब हमारे देश में ऐसे हालात हो गए है जहाँ सामाजिक सरोकार ओर कई दूसरे जरूरी मुद्दे अपाहिज हो गए है ओर समृधि ओर ग्लोबलाई जेशन की ओर बढ़ता भारत अनजाने ओर ना चाहते हुए भी अनिच्छा से इस गैर जरूरी बहस ओर सो कॉल्ड जिहाद की लडाई में फंस गया है .....सच पूछु तो मुझे भी कई बार लगता है की क्यों हसन जमाल / असद जैदी /जावेद अख्तर /एम् जे अकबर /मुशर्रफ़ आलम जौकी की केंद्रीय चिंता कश्मीर के पंडित नही रहे ????? क्यों हम धार्मिक मुद्दों पर एक अजीब सी खामोशी अपने दोस्तों में भी इख्तियार कर लेते है ? यहाँ तक की ग़लत संदर्भो को ग्लोरिफाई करने वाले लोग जब इस बहस को एक स्वस्थ रूप देने के लिए सामने नही आते तो मुझे दुःख होता है.......आपके तर्क ओर तथ्य दोनों को सही मानते हुए भी मै केवल इस पोस्ट के शीर्षक से सहमति नही रखता .......क्यूंकि कुछ लोग है जो मुझमे अभी भी उम्मीद रखे हुए है हैदराबाद में इकठ्ठा हुए उलेमा ....ऐ.टी एस के पूर्व चीफ खान .....एन.एस जी के मुस्लिम कमांडो ....आमिर खान की बेलाग टिप्पणी ......कश्मीर का वो चरवाहा जिसने १९४८ में पाकिस्तानी सेना को ग़लत रास्ते पर अपनी मोटरसाइकिल से मोडा ताकि भारतीय सेना को वहां पहुचने का समय मिल सका ...... नसीर का ये कहना की राज ठाकरे में हिम्मत हो तो मुझे निकालकर दिखाए ....मेरे कई दोस्त.....इसलिए मै फ़िर मानता हूँ की सामजिक परिपेक्ष जटिल है ओर इस देश में हमें ऐसे लोगो को निराश नही करना चाहिए ....जो इससे इतर सोचते है......
डॉ. अनुराग ने बातें अच्छी कही हैं लेकिन मैं उनसे इसलिए इत्तेफाक नहीं रखता क्योंकि उन्होंने जिस आमिर खान, शाहरुख खान या नसीरुद्दीन शाह का उदाहरण दिया है उन सबकी बीवीयाँ हिन्दू हैं और वे इस देश में रहते हुए यहाँ की जनता से इज्जत और प्यार पा रहे हैं। उन्हें रोटी भी यहीं से मयस्सर है। शोहरत, दाम और वो सबकुछ जो आपको या हमको नसीब नहीं। अगर ये ऐसा नहीं बोलेंगे तो कहाँ जाएँगे..?? डॉ. अनुराग ने अपने कमेन्ट के ऊपरी हॉफ में जिन लोगों का नाम लिया मसलन हसन जमाल / असद जैदी /जावेद अख्तर /एम् जे अकबर /मुशर्रफ़ आलम जौकी आदि, तो इन्हीं लोगों को इस देश में सबसे ज्यादा सेक्युलर माना जाता है जबकि इनमें से भी ज्यादातर लोगों की बीवीयाँ जरूर हिन्दू हैं लेकिन ये लोग घनघोर सांप्रदायिक और कट्टर हैं। अगर ये भारत में नहीं रह रहे होते तो हम सोच भी नहीं सकते हैं कि ये कितनी आग उगलते.....आमिर खान टीवी पर जिस तरह से आतंकवाद के खिलाफ अटक-अटक कर बोलता है उसकी ये छवि उस छवि से बहुत दूर है जब वो नरेन्द्र मोदी के खिलाफ नर्मदा आंदोलन में उतरकर बोल रहा था। साफ लफ्जों में सीधा बोलकर इन लोगों से पार नहीं पाया जा सकता भाई। हमने पूरे १००० साल इंतजार किया है इनके सुधरने का....अब और नहीं..।
"काश दुनिया में कोई तथाकथित धर्म /मजहब न होता और लोग इस मुद्दे पर अपनी सोच बनाने के लिए स्वतंत्र होते !"
अरविन्द जी के साथ पूर्ण सहमति.
साथ ही यह सच है कि हिन्दू धर्म ही एक ऐसा धर्म है जिसमें नास्तिक आदमी भी समाजच्युत/धर्मच्युत नहीं होता...
इसलिये शुक्र है कि मेरे पास चुनने की आजादी है कि मैं परमेश्वर को मानूं या न मानूं. हो सकता है कि इससे परमेश्वर को शिकायत हो, लेकिन कम से कम मेरे साथियों, परिवार, व आसपास के दूसरे हिन्दुओं को नहीं.
भाई विजयशंकर चतुर्वेदी,
पहले तो ध्यान नही दिया लेकिन टिप्पणियों पर सरसरी निगाह डालने पर आपका नाम हर जगह दिखा...फिर पढ़ा आपको. सही कहा आपने मोहबत करनी चहिये इनसे,आख़िर हमारे भाई हे...अगल-बगल मे ही रहते है...आमिर,शाहरुख़,सलमान..इनकी हमारी लड़किया दीवानी है ...मोहबत करती है...हम भी देखते है और देखते रहेंगे...यह सेकुलर है या नही है यह थोड़ा टेढा सवाल हो जाएगा.
यह निरंतर प्रक्रिया है..रोज्मरा कि जहा हम सेकुलर है और शायद वोह भी.लेकिन सवाल उस नाजुक समय मे उठता है जब यह सेकुलरिस्म दाव पर लगता है...कोई भी घटना ... घटित,चित्रित या निर्देशित..चाहे बटवारा ...चाहे बाबरी मस्जिद..चाहे बीच-बीच के दंगे,चाहे मुंबई,दिल्ली,जयपुर,साबरमती...यह सेकुलरिस्म उनके लिए गायब सा हो जाता है...मेरे लिए भी....सआदत हसन मंटो लिखते है अपनी एक कहानी मे कि ज़ब मेरे हिंदू दोस्त के रिश्तेदार मारे गए दंगे मे तो मैंने पूछा अपने जिगरी से ... कि मै एक मुसलमान हु..तुझे कैसा लगता है मुझे देख कर या मुझसे मिल कर..दोस्त ने जवाब दिया कि बहुत मुमकिन है की मै तुम्हे कत्ल कर दू...जनाब चतुर्वेदी साहब जब मेरा पिता,माँ,भाई-बहिन ट्रेन मे,बाजार मे,काफ़ी शॉप मे काफ़ी पीते वक्त,होटल के कमरे मे सोते वक्त,"उनसे लड़ते हुऐ" ...मरता है..बैमौत ...और जब तुम्हारी,अरुंधती रोय ,विनोद दुआ,अचुथानंदन,और भाई अंतुले की बातें सुनता हु तो मंटो की ऊपर वाली पंक्तिया याद आ जाती है ...
जब मौत "बार-बार" मेरे घर आती है "अगल-बगल" के घर से या "उनकी" गोली से तो सेकुलरिस्म गाली बन जाता है...भगवन ना करे कि आपको कभी उस हालत मे से गुजरना पड़े कि ज़ब आप अपने मुसलमान दोस्त से बोले कि बहुत मुमकिन है...
आपको हो सकता है मै एक "बीमार मानसिकता" और मुस्लिम विरोधी लगु ..मगर यह तेरी बात और यह मेरी बात...और रही बात आगे कि तो या तो मै किसी जगह "उनके" हाथो मारा जाऊंगा या फिर मै उस बीमारी को मात दे दूंगा..जिसे तुम,मै और सारे जानते है...लेकिन इलाज से घबराते है...
तुम्हारा "अगल-बगल" वाला हिंदू
Nice date collection Suresh ji. Our media is trying to be secular. In fact we all are trying to be so called secular. It can be an eye opener but please allow me to ask you a question. Why have you written this article? This seems to be really a big problem(if 100% correct). You must have also thought about the solution. Please make me aware of that solution.
Pls visit my blog.
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