Thursday, December 4, 2008

स्वार्थ, अनैतिकता और भ्रष्टाचार से सना हुआ देश आतंकवाद से कैसे लड़ेगा?

Attack on Corruption as well as on Pakistan

मुम्बई की घटना के बाद नौसेना प्रमुख ने माना है कि देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में गम्भीर खामियाँ हैं और इन्हें सुधारने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी माना कि जिस शंकास्पद ट्रॉलर को नौसेना ने जाँच हेतु रोका था उसके पास सारे कागजात एकदम सही पाये गये थे। देखने में यह घटना बेहद मामूली सी लग सकती है, लेकिन असल में यह हमारे समूचे “सिस्टम” के सड़ जाने की ओर इशारा करती है। कुछ वर्षों पहले एक मित्र के साथ मुझे भी एक बार मुम्बई के डॉकयार्ड में जाने का सौभाग्य(?) मिला था (डॉकयार्ड में हमारा काम उस स्थान पर था, जहाँ से आयात-निर्यात के माल का कस्टम क्लियरेंस किया जाता है)। मेरा मित्र एक छोटा सा निर्यातक है जो खाड़ी देशों को गारमेंट का निर्यात करता है और उधर से अपनी ही एक अन्य फ़र्म के लिये खजूर और अन्य छोटी-मोटी वस्तुऐं आयात भी करता है। वहाँ (डॉकयार्ड) का माहौल देखकर मेरे जैसा किसी भी सामान्य आदमी की बुद्धि चकरा सकती है। सैकड़ों की संख्या में पैकिंग किये हुए कार्टन्स, बैग, बोरे, कण्टेनर, पीपे, खोखे आदि चारों ओर बिखरे पड़े हुए थे। कस्टम क्लियर करने वाले अधिकारी और कर्मचारी अपनी ड्यूटी इस प्रकार कर रहे थे, मानो वह सामने वाले व्यक्ति पर अहसान कर रहे हों। चारों तरफ़ एक अलसाया हुआ उदासी भरा माहौल था, जैसा कि अमूमन एक सरकारी विभाग में होता है। जबकि वह विभाग कोई मामूली और आम नगर निगम जैसा विभाग नहीं था, वह सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण एक संवेदनशील विभाग है। मेरा मित्र जो कि इन “सरकारी बाबुओं” की नस-नस से वाकिफ़ हो चुका है, उसी ने बताया कि जितनी जल्दी और जितनी ज्यादा “भेंटपूजा” इन कर्मचारियों की होगी उतनी ही जल्दी उसका “माल” यहाँ से “क्लियर” होगा। मैंने देखा और पाया कि उस डॉकयार्ड में आने वाले लगभग सभी लोग, व्यापारी, कर्मचारी, कुली, लाइसेंसशुदा हम्माल आदि आराम से कहीं भी आ-जा रहे थे, किसी भी “माल” को चेक करने की कोई “परम्परा” शायद वहाँ थी ही नहीं, बस जिस व्यापारी/एजेण्ट/दलाल आदि ने जो कागज दिखाया वही माल मान लिया जाता था, भले ही कागज पर लिखा हो कि कण्टेनर में कपड़ा है और अन्दर अफ़ीम भरी हो, कोई देखने-सुनने वाला नहीं। पूरे स्टाफ़ का हिस्सा ऊपर से नीचे तक बँटा हुआ था (और कहीं ईमानदारी हो या नहीं हो भ्रष्टाचार पूरी ईमानदारी से किया जाता है, चपरासी से लेकर ठेठ अफ़सर और मंत्री तक)। कोई भी सहज बुद्धि वाला व्यक्ति सोच सकता है कि भला आतंकवादियों को इतनी मगजमारी करके समुद्र के रास्ते से हथियार लाने की क्या जरूरत है? जबकि वह जब चाहे एक कण्टेनर भरकर हथियार आराम से भारत भिजवा सकता है। एक अंग्रेजी चैनल ने एक “स्टिंग ऑपरेशन” के तहत हमले के दो दिन बाद ही एक बड़ा सा खाली खोखा (जिसे उन्होंने यह माना कि उसमें RDX भरा है) आराम से स्थानीय लोगों के साथ मिलकर ठीक उसी जगह उतार दिया, जिस जगह पर दाऊद इब्राहीम ने कुछ साल पहले अपने हथियार उतारे थे। इस स्टिंग ऑपरेशन में उस चैनल को कुल 10-15 हजार का खर्च आया। अब खुद ही सोचिये कि जब हमले के दो दिन बाद सुरक्षा की ये हालत है तो आगे क्या होगा? या पहले क्या हुआ होगा।



असल समस्या यह है कि अब भारत के लोग “भोगवादी” प्रवृत्ति के हो चुके हैं। खुली अर्थव्यवस्था और पैसे की चकाचौंध ने आँखों पर जो चर्बी चढ़ाई है उसके कारण “देश”, “राष्ट्र”, “नैतिकता”, “अनुशासन” आदि कुछ नहीं दिखाई देता। और भ्रष्टाचार की यह चर्बी सिर्फ़ सरकारी बाबुओं, अफ़सरों, नेताओं और मंत्रियों की आँखों पर ही नहीं है, अब तो यह बीमारी रिसते-रिसते बहुत नीचे स्तर तक, आम आदमी तक पहुँच चुकी है। आज मुम्बई में हुए हमले के विरोध में मोमबत्तियाँ जलाई जा रही हैं, मानव-श्रृंखला बनाई जा रही है, एकता यात्रा निकाली जा रही है, हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है… क्या वाकई इससे कोई फ़र्क पड़ेगा? मुझे तो नहीं लगता। देश पर हुआ हमला और उसकी प्रतिक्रिया कुछ-कुछ ऐसी है, जैसे कैंसर और लकवे से ग्रस्त एक आदमी की बीवी को छेड़ दिया गया हो और वह मरने-मारने की बातें करने लग पड़ा हो।

ट्रैफ़िक सिग्नल को सरेआम तोड़ते लोग, पकड़े जाने पर पचास-सौ रुपये देकर छूट जाने की मानसिकता लिये हुए लोग आतंकवाद से नहीं लड़ सकते। राशनकार्ड, गैस कनेक्शन, ड्रायविंग लायसेंस जैसे रोजमर्रा के काम करवाने के लिये सरकारी विभागों में नियम तोड़ते-तोड़ते, रिश्वत देते-देते भारत का नागरिक इतना घिस चुका है कि उसमें आतंकवाद से लड़ने की धार ही नहीं बची है, और हाल-फ़िलहाल ये जो कुछ माहौल दिखाई दे रहा है वह मात्र “पेशाब का झाग” भर है, बहुत जल्दी ही नीचे बैठ जायेगा। जिस तरह श्मशान में व्यक्ति “मैं अपनी आँखें दान कर दूँगा…”, “इस दुनिया में क्या रखा है भाई…”, “मोहमाया से दूर रहने में ही भलाई है…” जैसे विचार लेकर खड़ा होता है, और बाहर निकलते ही वापस अपनी दुनिया में रम जाता है, ठीक वैसा ही कुछ हरेक आतंकवादी हमले के बाद भारत में होता आया है। लेकिन जिस देश के लोग भ्रष्टाचार पर नहीं उबलते, किसी मासूम लड़की के बलात्कार और हत्या के बाद भी कोई आंदोलन नहीं करते, बल्कि खुद ही इस जुगाड़ में लगे रहते हैं कि किस तरह से प्रत्येक “सिचुएशन” में मेरा फ़ायदा हो जाये, वह भला आतंकवाद से कैसे लड़ेगा? क्या रक्षा मंत्रालय के किसी अधिकारी को सियाचिन में सैनिकों के जूते खरीदने में भ्रष्टाचार करने के लिये आज तक कोई सजा हुई है? क्या शहीदों को मिलने वाले पेट्रोल पंपों पर कुंडली मारे बैठे नेताओं से आज तक किसी ने जवाबतलब किया है? सेना के ताबूत, राशन, बुलेटप्रूफ़ जैकेटों और यहाँ तक कि सेना के कैंटीन में मिलने वाली सस्ती शराब की अफ़रातफ़री के मामले में आज तक किसी IAS अधिकारी पर कोई मुकदमा चलाया गया है? नहीं ना… फ़िर आप कैसे उम्मीद करते हैं कि रातोंरात देश में कोई क्रान्ति आ जायेगी और देश अचानक अनुशासन की राह पर चल पड़ेगा? आतंकवाद के खिलाफ़ युद्ध लड़ना तो बहुत बाद की बात है, क्या हम लोग रेल्वे स्टेशन या सिनेमा हॉल की टिकट लाइन में ही दस मिनट सीधे खड़े रह सकते हैं? इसलिये जब नौसेना कहती है कि शंकास्पद जहाज के पास कागज पूरे थे तब स्वाभाविक है कि सही और पूरे कागज होना ही है, भारत में लाखों कारें ऐसी हैं जिनके पास “व्यावसायिक LPG से” चलाने के कागज पूरे हैं, लेकिन अमीर लोग उसे चलाते हैं “घरेलू गैस” से, कितनों के ही नौनिहाल अभी 12-14 साल के ही हैं लेकिन सरेआम उन्हें बाइक थमा दी गई है और उनके पास लायसेंस भी है। जब बांग्लादेश से आने के 2 साल के भीतर ही राशनकार्ड बनवाया जा सकता है, नेपाल का एक भगोड़ा हत्यारा कांग्रेस का सांसद बन सकता है, तो “भारत में बने वैध कागज” की क्या और कैसी कीमत है इसके बारे में अलग से क्या बताऊँ। भारत के लोग हमेशा तात्कालिक उपाय के बारे में सोचते हैं, “परमानेंट इलाज” के बारे में नहीं, जैसे कि पहले लाखों कारों का उत्पादन कर लेना, फ़िर बाद में सड़कें बनवाना। युद्ध लड़ना एक तात्कालिक उपाय है, जबकि देशवासियों में नैतिकता, अनुशासन, और ईमानदारी पैदा करना, अन्दरूनी भ्रष्टाचार से लड़ना एक “परमानेंट इलाज” है। मोमबत्ती जलाने वाले और “इनफ़ इज़ इनफ़” का नारा लगाने वालों के नेतृत्व को ध्यान से देखिये, बिजली चोरी करने वाला उद्योगपति, मरीज के साथ जानवर से भी बदतर व्यवहार करने वाला डॉक्टर, बेशर्मी से आगे-आगे दिखने वाला राजनेता, बच्चों के दोपहर भोजन में कमीशन खाने वाला IAS अफ़सर, सभी दिखाई देंगे… आम आदमी तो युद्ध की विभीषिका और खर्च को झेल भी लेगा, लेकिन युद्ध के बाद मोमबत्ती जलाने और रैलियाँ निकालने वाले यही नेता और उद्योगपति उसका खून चूसने में सबसे आगे होंगे… मन में संकल्प लो कि “इन घटिया लोगों से भी निपटेंगे” और युद्ध में कूद पड़ो।



कुछ पाठकों को यह लेख “नकारात्मक” लग सकता है, जबकि मेरा व्यक्तिगत मत है कि पाकिस्तान के साथ युद्ध होना ही चाहिये, भले ही सीधे तौर पर नहीं, लेकिन छापामार शैली में जोरदार कमाण्डो/मिसाइल कार्रवाई तो बहुत ही जरूरी है। जिस तरह से कुछ वर्षों के अन्तराल से झाड़ू लेकर भूत उतारा जाता है वैसे ही हर दस-बारह साल के अन्तराल से पाकिस्तान जैसे देश की धुलाई होती रहनी चाहिये, लेकिन मेरे व्यक्तिगत मत से क्या होता है। अभी तो युद्ध की बात भी ठीक से शुरु नहीं हो पाई है कि देश में समझाइश (यानी विरोध) के स्वर उठने लगे हैं, तमाम बुद्धिजीवी(?) कहने लग पड़े हैं कि “युद्ध कोई इलाज नहीं है…”, “भारत को शांति से काम लेना चाहिये…”, “युद्ध से कुछ हासिल नहीं होगा…”, “शेयर मार्केट 4000 तक पहुँच जायेगा…”, “महंगाई बेतहाशा बढ़ जायेगी…”… आदि-आदि। कहने का तात्पर्य यह है कि अभी तो लड़ाई की मानसिक तैयारी शुरु ही हो रही है कि “भीतरघाती” अपना राग अलापने लगे हैं, ऐसी खण्डित मानसिकता लेकर आतंकवाद से लड़ेंगे??? हम कोई अमेरिका की तरह रोज-रोज युद्ध नहीं लड़ते, युद्ध लड़ना है तो एक स्वर में “हाँ” होनी चाहिये, लेकिन “लड़ाई” हमारे खून में, हमारे संस्कारों में ही नहीं है… और जब देश में आस्तीन के साँप “सेकुलर” और “गाँ……(धी)वादी” लोग मौजूद हैं, “आर या पार” वाला युद्ध तो मुश्किल ही लगता है…

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31 comments:

कुश said...

बिल्कुल ठीक कहा आपने... भारत के लोग अब भोग वादी प्रवर्ति के हो गये है.. ज़रूरत है एक बदलाव की..

संजय बेंगाणी said...

नियम तोड़ते-तोड़ते, रिश्वत देते-देते भारत का नागरिक इतना घिस चुका है कि उसमें आतंकवाद से लड़ने की धार ही नहीं बची है.


युद्ध हथियारों से ही नहीं लड़ा जाता, इच्छाशक्ति हो तो युं ही पाकिस्तान के घुटने टिकवाए जा सकते है. जितना दोषी पाकिस्तान है उससे ज्यादा तो हम है. पहली जरूरत घर को ठीक करने की है, वरना सेना को भेज कर उसे मरवाएंगे और हार हाथ लगेगी.

देखना यह है की हमारी प्राथमिकता क्या है, हमला या आतंकवाद से मुक्ति. पाकिस्तान पर आक्रमण आतंकियों को मजबूत करेगा.

फिलहाल पाकिस्तान दबाव में है, इसे जारी रखा जाना चाहिए.

ashwatthama said...

शत-प्रतिशत सहमत!

हम भारतीयों में हर उबाल बहुत हे वक्ती और अस्थिर तरीके का होता है. बस 10-15 दिन बीत जाने दीजिये और हम बस वही एक आने वाली जगह पर वापिस आ जायेंगे.

लगता है सही वजह हम में सच्ची संवेदनशीलता की कमी है. आप माने या ना माने अभी संवेदनशीलता का जो वक्ती उबाल हम देख़ रहे हैं वह किसी आई पी एल 20 - 20 टूर्नामेंट की क्षणिक दीवानगी जैसा ही कुछ है.

Shastri said...

प्रिय सुरेश, तुम्हारा हर लेख "उत्तम" श्रेणी का होता है, लेकिन यह लेख "अतिउत्तम" श्रेणी का है. कारण यह कि इसमे विश्लेषण करके असली समस्या बताई गई है.

निम्न पेराग्राफ "ट्रैफ़िक सिग्नल को सरेआम तोड़ते लोग, पकड़े जाने पर पचास-सौ रुपये देकर छूट जाने की मानसिकता लिये हुए लोग आतंकवाद से नहीं लड़ सकते। राशनकार्ड, गैस कनेक्शन, ड्रायविंग लायसेंस जैसे रोजमर्रा के काम करवाने के लिये सरकारी विभागों में नियम तोड़ते-तोड़ते, रिश्वत देते-देते भारत का नागरिक इतना घिस चुका है कि उसमें आतंकवाद से लड़ने की धार ही नहीं बची है, और हाल-फ़िलहाल ये जो कुछ माहौल दिखाई दे रहा है वह मात्र “पेशाब का झाग” भर है, बहुत जल्दी ही नीचे बैठ जायेगा।"

हर भारतीय को पढना चाहिये. जो लोग चिल्ला रहे हैं उन में से अधिकतर को ये बातें नहीं मालूम है.

जब तक देश में एक नैतिक नवजागरण नहीं आयगा तब तक मूल समस्या वहीं रहेगी अत: हम सब को इस जागृति को पैदा करने के लिये हाथ मिला कर कार्य करना होगा.

लिखते रहो -- कलम की धार दिन प्रति दिन बढ रही है.

सस्नेह -- शास्त्री

Suresh Chandra Gupta said...

वर्तमान परिस्थिति के सकारात्मक विश्लेषण के लिए मेरी वधाई स्वीकार करें.

मोमबत्ती जलाना और “इनफ़ इज़ इनफ़” का नारा लगाना दूसरों को यह एहसास कराना है कि उनसे कहीं पर चूक हुई है, लेकिन इस में हम यह भूल जाते हैं कि चूक हम से भी हुई है. अपनी इस चूक के लिए हम कब मोमबत्ती जलाएंगे और “इनफ़ इज़ इनफ़” का नारा लगायेंगे?

ab inconvenienti said...

नहीं साहब, भारत में कमी है तो सिर्फ़ एक करिश्माई नेतृत्व की, सेना में भी हम भ्रष्ट हिन्दुस्तानियों के बीच से ही जवान जाते है, पर उनका अनुशासन बेहतरीन है. हमें लीड करने वाला चाहिए हमारे पास सब है, आबादी, चालाक दिमाग, शिक्षित युवा, टेक्नोलोजी, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना, और जो भी कमजोरियां हैं उन्हें सशक्त नेतृत्व हमारी सबसे प्रबल विशेषताओं में बदल सकता है.

गुजरात का उदहारण सामने है, वह भी भारत का ही एक हिस्सा है. यह है शक्तिशाली और मजबूत रीढ़ वाले नेतृत्व की ताकत. बस सवा अरब में से सवा सौ लोग ही मोदी जैसे आ जायें तो भारत का ढीलापोला चरित्र बदल जाएगा. निगेटिव होने की या निराश होने की ज़रूरत नहीं है, बस कुछ ईमानदार और जनता की नब्ज़ पहचानने वाले कुछ लोगों की ज़रूरत है. गुजरात में जनता प्रोपेगेंडा मीडिया के बावजूद ऐसे इन्सान को पसंद कर सकती है, तो पूरा भारत कर सकता है.

माहौल और कुंठा उफान पर है, हो सकता है निकट भविष्य में ही कुछ सकारात्मक देखने मिले.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

सच सच और सिर्फ सच लिखने के लिए धन्यबाद

sareetha said...

मजबूर बहुत करता है ये दिल तो ज़ुबां को ,अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं कहते ..। कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते ....।

sareetha said...

मजबूर बहुत करता है ये दिल तो ज़ुबां को ,अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं कहते ..। कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते ....।

sareetha said...

मजबूर बहुत करता है ये दिल तो ज़ुबां को ,अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं कहते ..। कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते ....।

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

बात सटीक और विचारणीय है . आभार

satyendra... said...

जुलाई, 2006 में मुंबई में सात जगहों पर लोकल टे्रनों में बम धमाके हुए थे। उस हमले में भी उतने ही लोग मारे गए थे, जितने पिछले हफ्ते की आतंकी घटनाओं में मारे गए। लेकिन उन धमाकों को उस स्तर पर कवरेज नहीं मिला, जितना कि पिछले हफ्ते की आतंकवादी हमले को मिला था।
यह देखकर भी काफी दुख होता है कि आज मीडिया कवरेज का फैसला उन लोगों के विवेक पर होता है, जो उसके कंटेट के बारे में फैसला करते हैं। इसलिए जन परिवहन प्रणाली पर निशाना साधा जाता है क्योंकि इससे कारों के मालिकों पर बुरा असर पड़ता है। इसीलिए तो लक्जरी होटलों पर हुआ हमला, किसी रेलवे स्टेशनों पर हुए हमले से ज्यादा अहम हो जाता है। सबसे दिक्कत वाली बात यह है कि आज मीडिया और उसे चलाने वाले, दोनों उच्च वर्ग का हिस्सा बन चुके हैं।

COMMON MAN said...

मैं आपको इस धारदार विश्लेषण के लिये बधाई देता हूं, लेकिन एक बार फिर से दोहराऊंगा कि इस सब के मूल में वह अशिक्षा और गरीबी है, जिसने इस देश के अधिकांश लोगों को इस काबिल ही नहीं छोडा कि वे अपने पेट भरने से आगे कुछ और सोच पायें और इसके पीछे भी सोची समझी रणनीति थी, जो सफल हुई.

lata said...

aapse 100% sahmati.

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

शत-प्रतिशत सहमत!!!!!
कमी है तो सिर्फ़ एक करिश्माई नेतृत्व की!!!!!
धारदार विश्लेषण!!!!

Satyajeetprakash said...

कई बातें मसलन, कैंसरग्रस्त अपाहिज को अपनी छोड़ देती है और वह कहता है कि हम ये कर लेंगे, वो कर देंगे.
श्मशान घाट पर कोई कहे कि हम अपनी आंख दान करते हैं
जहां लोग राशन कार्ड आदि के लिए घुस खाते हों
जहां नेता चंद वोटों के लिए आतंकवादियों का समर्थन करता हो.
जहां वोट के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को मेहमान बताया जाता हो.
वह आतंकवाद से कदापि नहीं लड़ सकता
और दुर्भाग्य से भाग्य की यही स्थिति है.

Indian said...

बात तो आपकी बिल्कुल सही है सुरेशजी, और मैं बुद्धीजीवी भी नही हूँ पर, आपसे सहमत नही हूँ कि युद्ध इसका इलाज है, जैसा आपने कहा है कि ये नेता सेना को युद्ध में झोंक कर उसे मरवाएंगे, वही मैं भी कहना चाहता हूँ, कूटनीतिक प्रयास ज़्यादा असरकारी होंगे, पकिस्तान वैसे ही मरणासन्न है वो अपनी मौत ख़ुद ही मरनेवाला है। युद्ध से बेहतर तो यही होगा कि पकिस्तान को उसी के हथियार से मारा जाए। आतंकवादी ही उसी देश को चैन से नही रहने देंगे, बस हमें अपना घर मजबूत करना है ( जो भ्रष्टाचार के चलते मुश्किल लगता है ) ताकि कोई परिंदा भी पर नही मार सके।

परमजीत बाली said...

बिल्कुल सच्ची व सही बातें लिखी हैं।

Anil Pusadkar said...

आपकी सच लिखने की ताक़त और हिम्मत की दाद देना ही पड़ेगा। लिख तो हम भी सकते है मगर इतना बड़ा और इतना कडुवा सच लिखना अपने बस की बात नही है।ये बात सच है की हम हर चीज़ के आदी हो चुके है और लात खाने के भी ।लड़ना हमारे बस का नही है ।जिस दिन हम सब कुछ भूल कर देश के बारे मे सोचना शुरू करेंगे तब शायद सुरत बदलेगी।

नितिन व्यास said...

"देश पर हुआ हमला और उसकी प्रतिक्रिया कुछ-कुछ ऐसी है, जैसे कैंसर और लकवे से ग्रस्त एक आदमी की बीवी को छेड़ दिया गया हो और वह मरने-मारने की बातें करने लग पड़ा हो।"
पंक्तियां अच्छी लगी! लेख अच्छा लगा!
कुछ ऐसा ही सुहेल सेठ ने अंग्रेजी में यहां कहा

अभिनव said...

खरी खरी बात की आपने. अच्छा लगा पढ़कर.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

शाबाश !
ये पहला कदम हुआ
परिस्थिति को
खुली आँखोँ से देखना --

Pramod Singh said...

बंधुवर, युद्ध इलाज नहीं है. दिल्‍ली में सांपनाथ की जगह नागनाथ की स्‍थापना से अलग ऐसा युद्ध और कुछ नहीं करेगा. अशिक्षित, बेरोज़गार नौजवानों को आत्‍मघाती दस्‍ते बनाने से रोक सकेगा? डॉकयार्ड से लेकर डिब्रूगढ़ तक के आपके जर्जर राष्‍ट्रीय डिसकनेक्‍ट को तोड़ सकेगा? अंतर की इतनी गहरी बीमारियों को आप एक अदद युद्ध के भारी इंजेक्‍शन से खत्‍म कर लेने का सपना बुन रहे हैं?

PD said...

हमारी सेना दूध से धुली हुई नहीं है.. मेरी मुलाकात एक सेना के अधिकारी से ट्रेन में हुई थी, उनका यह मानना था कि सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार सेना में है मगर वो कोर्ट मार्शल की आड़ में छुप जाता है और बाहर नहीं आता है..
आखिर वो भी हमारे बीच से ही उठ कर जाते हैं तो कैसे हम ये मान लें कि उनमें एक भारतीय होने का पूरा गुण ना हो?

पंगेबाज said...

आखिर यूही हम २००० साल तक गुलाम नही बने रहे ना ? कही पर भी हम हमलावरो की तरह नही गये बस अपने देश मे ही मार काट मचाते रहे अपने भाई को कमजोर करने के लिये बाहर से आये लोगो का साथ देते रहे इर्ष्या से भरा मन और कुछ कर बी कैसे सकता है. जिसने भी धर्म बदला डर से या पैसे लेकर वो अपने को उपर उठाने के लिये अपनी जडो को काट डालना चाहता है . हम मे से कितने ही अभी भी इसी परिपाटी पर चल रहे है ये आज के जयचंद है महेश भट्ट सच्चर नाम का खच्चर राम विलास मुलायम लालू , चैनलो पुण्य प्रसून जैसे पत्रकार जिन्हे वंदेमातरम और भारत माता की जय के नारे सांप्रादायिक लगते है के नाम धारी एन जी ओ से पैसे पाने वाले ये तत्व जिन्हे कभी मानवधिकार , कभी सेकुलरता के नाम पर अनर्गल हिंदुओ को दुख देने वाली बातो के समर्थन मे खडे देखा जा सकता है . जिन्हे कुछ बातो के लिये सिर्फ़ इस लिये खडा देखा जा सकता है न्याय के नाम की बात करते कि वोह देश द्रोहियो का साथ देकर मानवाधिकार के नाम पर विदेशो से पैसा बना सके जयचंदो की नई पीढी के अलावा क्या है ?

रौशन said...

आपके विचारों से शत प्रतिशत सहमत
हर एक व्यक्ति को ख़ुद में झांकना होगा दूसरों पर ऊँगली उठाने से पहले और देश तभी सुधर सकता है जब लोग सही हों

therajniti said...

आपकी लेखनी गजब की है. काफी शानदार. पड़ने में मज़ा आ जाता है.

दिलीप गर्ग said...

माननीय बहुत अच्छा लिखा है, युद्ध हर अन्तर राष्ट्रीय समस्या का हल नहीं है परन्तु जब इस तरह से दुश्मन अघोषित और छद्म युद्ध लड़े तो निश्चित ही हमें भी मुह तोड़ जवाब देना चाहिए.

mahashakti said...

मै रेडियों सुन रहा था, एक श्रोता का कहना था कि आतं‍वादियों ने एक अच्‍छा काम यह किया कि ताज और ओबराय को चुना क्‍योकि इसमें जाने वाले ज्‍यादातर काले धन वाले होते है। पहली बार कमजोर जनता नही मरी। खैर यह शब्‍द एक गरीब तबके के व्‍यक्ति के थे किन्‍तु सच्‍चाई दीख रही थी। मै उस व्‍यक्ति का सर्मथन नही कर रहा किन्‍तु इनता जरूर कह सकता हूँ आज बडे वर्ग की उदासिना और विलासिता देश को नर्क बना रही है।

भुवनेश शर्मा said...

गुरू एकदम सही नब्‍ज पकड़ी आपने...दो-तीन दिन से मेरे भी दिमाग में यही बात चल रही है.

जो कौम व्‍यवस्‍था का सम्‍मान नहीं कर सकती, जिसे व्‍यवस्‍था को तोड़ने में ही असली चैन मिलता है वह कैसे एक व्‍यवस्‍था के तहत अपनी सुरक्षा करने में सक्षम हो सकती है.

बहुत ही शानदार लेख.....इसे सभी राष्‍ट्रीय अखबारों के संपादकीय पृष्‍ठ पर स्‍थान मिलना चाहिए हालांकि इसे पढ़ने के बाद भी हम सुधरने वाले नहीं

पाकिस्‍तान पर हमले के संबंध में संजय भैया से सहमति....जब हमारी सीमाएं सुरक्षित और हम मुस्‍तैद होंगे तो पाकिस्‍तान पर हमला करने की जरूरत ही नहीं होगी...हमारी खुद की कमजोरियां ही उसे इस छद्म युद्ध में कामयाबी दे रही हैं, कड़े बयान देने तक में हमारे नेताओं की पैंट गीली होने लगती है...हां कम से कम पाक अधिकृत कश्‍मीर पर हमला करना एक जरूरी विकल्‍प और समय की मांग है

dr.bhoopendra singh said...

well said sir, this nonsense has crossed the limits.We are suffering of our own ,Pakistan only initiates,thats all.Where corruption has become a practice in everyday life, it is very difficult to deliver.I am not in favour of war because Pak has nuclear arms and it may ignite disaster.
Our first and foremost priority must be to raise nation spirit.Without it again we will have to lament again and again for this or that attack.
dr.bhoopendra