Wednesday, November 19, 2008

अखबार का असली मजा लेना हो तो “बिटवीन द लाईन्स” पढ़ना सीखिये…

Newspapers, Published News Between the Lines

लगभग सभी पढ़े-लिखे लोग अखबार तो पढ़ते ही हैं, उसमें काफ़ी खबरें छपी होती हैं, क्या आप सभी खबरों को सीधे-सीधे जैसी लिखी हैं वैसा ही पढ़ लेते हैं? ठहरिये, असल में जो छपा होता है वह वैसा होता नहीं है, हमें छपी हुई पंक्तियों के बीच में “न छपा हुआ” अर्थ पढ़ना आना चाहिये तभी आपको अखबार पढ़ने में बहुत मजा आयेगा, इस कला को “study between the lines” भी कहा जाता है, कैसे!!! एक छोटा सा उदाहरण देखिये… समाचार : अमेरिका ने कहा है कि आर्थिक मंदी के इस दौर में भारत उसका हमेशा की तरह मजबूत साथी बना रहेगा। अब आप समझेंगे कि यह भारत-अमेरिका के बढ़ते सम्बन्धों और मित्रता की मिसाल दी जा रही है, लेकिन “बिटवीन द लाइन्स” इसका मतलब यह होता है कि “जिस प्रकार पिछले 10-15 साल से हम भारत को बेवकूफ़ बना कर अपना माल उसे चेप रहे हैं, आगे भी भारत हमारी इसी प्रकार मदद करता रहेगा…”। देखा न आपने, लिखा क्या होता है और मतलब क्या निकलता है, इस “बिटवीन द लाईन्स” पढ़ने की कला को कोई “अर्थ का अनर्थ” कहता है, कोई इसे “बाल की खाल निकालना” कहता है, कोई इसे “तिल का ताड़ बनाना” कहता है, तो कोई इसे “शातिर दिमाग का फ़ितूर” कहता है, लेकिन हम जानते हैं कि जो लोग बिटवीन द लाइन्स पढ़ लेते हैं, वह बहुत “चतुर-सुजान” होते हैं (ऐसा माना जाता है)।

आजकल कई प्रदेशों में चुनाव का मौसम चल रहा है, हजारों प्रत्याशी अपनी-अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। रोज सुबह का अखबार खोलते ही कईयों का दिमाग खराब हो जाता है, सुबह-सुबह चाय का स्वाद बिगड़ जाता है। पन्ने के पन्ने भरे हुए हैं प्रत्याशियों के जीवन परिचय से। एक तस्वीर में एक “भेड़िया” मुस्करा रहा है, दूसरी तस्वीर में एक “कौआ” आपको सच्चाई का वचन दे रहा है, अखबार के एक तरफ़ “साँप और नाग” एकता प्रदर्शित कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ एक “लकड़बग्घा” विकास का वादा कर रहा है… लेकिन इस माहौल में भी आप “बिटवीन द लाइन्स” पढ़कर अपनी सुबह को आनन्दमयी और कॉमेडी से भरपूर बना सकते हैं। कुछ उदाहरण…



उदाहरण – 1) इन्होंने छात्र जीवन से ही राजनीति में कदम रख लिया था और छात्रसंघ के चुनावों में पार्टी का परचम लहराया था (बिटवीन द लाइन्स – ये नम्बर एक के गुण्डे हैं और कॉलेज में इन्होंने कम से कम चार प्रोफ़ेसरों को तमाचे रसीद किये हैं, तीन हड़तालें करवाईं, दो बसें जलाईं, छात्र संघ का चुनाव जीता है मतलब कम से कम सौ गुण्डे इनके हाथ के नीचे काम करते हैं)

उदाहरण – 2) फ़लाँ महानुभाव अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए जनता की सेवा करने हेतु राजनीति में उतरे हैं (बिटवीन द लाइन्स – ये एक निकम्मे किस्म के युवा हैं जो अपने बाप की वजह से टिकट पा गये हैं, जैसा लम्पट इनका बाप था वैसे ही इनके भी नक्शे-कदम हैं)

उदाहरण – 3) ये महान नेता सहकारिता के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम है, गाँव-गाँव में फ़ैली विभिन्न सहकारिता संस्थाओं के माध्यम से इन्होंने गरीब किसानों की सेवा का प्रकल्प सफ़लतापूर्वक सिद्ध किया है (बिटवीन द लाइन्स – ये साहब सहकारी बैंकों के बहुत बड़े वाले “डिफ़ॉल्टर” हैं, एकाध-दो बैंक ये अपने अकेले के दम पर ही ले डूबे हैं, बाकी की सहकारी संस्थायें भी इनके गुर्गे लोन ले-लेकर अगले चुनाव तक डुबो देंगे)।

उदाहरण – 4) वयोवृद्ध नेताजी पिछले चालीस साल से जनता के सुख-दुख में साथ रहे हैं, राजनैतिक जीवन के कई उतार-चढ़ाव देखने के बावजूद आज भी इनका सेवा का जोश बरकरार है। (बिटवीन द लाइन्स – उतार-चढ़ाव यानी कि दो तीन बार जनता इन्हें बेइज्जती से सरेआम हरा चुकी है, फ़िर भी बुढ़ापे में इनसे सत्ता का मोह नहीं छूट रहा, सो कब्र में पैर लटके होने के बावजूद फ़िर से चुनाव में खड़े हो गये हैं)…

ये तो खैर चुनावी मौसम की खबरें हैं यूं साधारण दिनों में भी आप अखबार में बिटवीन द लाइन्स पढ़ सकते हैं, जैसे – “भारत ने पाकिस्तान के साथ आपसी सम्बन्ध बढ़ाने के लिये एक प्रतिनिधिमण्डल भेजने का फ़ैसला किया है” (बिटवीन द लाइन्स – हम जानते हैं कि यह कुत्ते की पूँछ है सीधी नहीं होगी लेकिन फ़िर भी प्रतिनिधिमण्डल भेज रहे हैं…)। समाचार - “ओलम्पिक में भारत पहले पदक के काफ़ी करीब…” (बिटवीन द लाइन्स – साठ साल में गिने-चुने पदक मिले हैं, फ़िर भी शर्म नहीं आ रही, क्रिकेट देखे जा रहे हैं…), आदि-आदि।

तो भाईयों आपकी मदद और गाइडेंस के लिये यहाँ मैंने कुछेक उदाहरण पेश कर दिये हैं कि “बिटवीन द लाइन्स” कैसे पढ़ा जाता है, बाकी का अभ्यास तो आप कर ही लेंगे। जब आप इस कला में काफ़ी निपुण हो जायेंगे तो आप ब्लॉग में मिल रही टिप्पणियों में से भी “बिटवीन द लाइन्स” पढ़ लेंगे, तब आप “मठाधीश ब्लॉगर” कहलायेंगे और अन्य ब्लॉगर आपके आतंक से खौफ़ खायेंगे और टिप्पणी-दर-टिप्पणी करके आपकी तारीफ़ों के पुल बाँध देंगे (सबसे ज्यादा पाठक इसी वाक्य में “बिटवीन द लाइन्स” पढ़ने की कोशिश करेंगे)। वैसे भी यह कला “अनुभव” से आती है, जैसे-जैसे आप अखबार को ध्यान से पढ़ेंगे और उसमें “बिटवीन द लाइन्स” पढ़ने की कोशिश करेंगे, आपको अखबार नाम की “चीज़” बहुत मजेदार लगने लगेगी। यदि आप चाहते हैं कि रोज-ब-रोज सुबह खुलकर हँसा जाये जिससे फ़ेफ़ड़ों की वर्जिश हो जाये तो इस “कला” की प्रैक्टिस कीजिये और अखबार पठन को एक आनन्ददायी अनुभव बनाईये, क्योंकि आजकल अखबार हों या टीवी चैनल, ये सिर्फ़ “दुकानदारी” बनकर रह गये हैं, इन्हें समाज पर पड़ने वाले प्रभाव से कोई लेना-देना नहीं होता… तो अखबार पढ़कर टेंशन लेने का नईं… खामखा दीमाक का पाव-भाजी क्यों बनाने का, मजा लेने का…

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18 comments:

Shastri said...

कथन के बीच छुपा अकथन कई बार सबसे बडा कथन होता है! मार्गदर्शन के लिये आभार!

सस्नेह -- शास्त्री

संजय बेंगाणी said...

भाऊ बिटविन द लाइन कहाँ कहाँ खोजें? यहाँ तो साफ पता चलता है कि सम्पादकीय तक बिक चुका है! हर खबर स्पोंसर्ड नजर आती है. अखबार इस पार्टी या उस पार्टी के हाथो बिक गया साफ लगता है.

मगर आपने ने सही नुस्खा दिया है, हर खबर को हज़म कर जाने की हाजमोला है यह.

Pradeep said...

ब्लॉग पर आने का आपका धन्यवाद

COMMON MAN said...

महोदय, पोस्ट पढकर मजा आ गया, अब मैं भी आपकी सलाह मानकर बिटवीन द लाइन्स बनने और बनाने की कोशिश कर देखता हूं

विनय said...

बहुत बढ़िया अनवेषण

lata said...

बहुत ग़लत बात है ! अब तो आप दूसरों के दिमाग़ के अंदर भी झाँकने लगे हैं :)

Gyan Dutt Pandey said...

१. ब्लॉग की टेम्प्लेट झकाझक है।
२. यह पोस्ट और भी रोचक है!

जी.के. अवधिया said...

पढ़ने का एक नया और रोचक तरीका "बिट्वीन द लाइन्स" बताने के लिये धन्यवाद!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बडी चतुरता से
सबके नकाब उतार लिये
आपने सुरेश जी !
शुक्रिया इस के लिये :)
- लावण्या

ताऊ रामपुरिया said...

बड़ी महत्त्व पूर्ण बात बताई आपने ! आगे से यह चश्मा लगाके देखते हैं ! आप कह रहे हैं तो इसमे अवश्य कुछ ख़ास बात है ! आजमाने के बाद बताते हैं आपको ! शुभकामनाएं !

अनूप शुक्ल said...

ब्लाग का नया टेम्पलेट शानदार है। बिटवीन द लाइन्स कुछ नहीं है इसमें।

Suresh Chandra Gupta said...

आप सही कहते हैं. कुलदीप नायर ने तो एक किताब ही लिखी थी इस नाम से, 'बिटवीन दी लाइंस'. यह किताब भारत-चीन के युद्ध के बाद लिखी गई थी और इस में ऐसा बहुत कुछ था जो सरकार ने नहीं कहा था पर वास्तविकता के काफ़ी करीब था. युद्ध के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने भी कहा था - we are searching for scapegoats but the real goats have escaped.

कविता वाचक्नवी said...

अच्छा हाईलाईटर का प्रयोग है।

Anil Pusadkar said...

भाऊ जीने-खाने दोगे की नही अख़बार वालो को। आणद आ गया अब नये तरीके से अखबार पढ कर दिमाग खराब होने से बचाना पडेगा।शानदार और जानदार पोस्ट,बधाई।

आदर्श राठौर said...

बहुत बढ़िया पोस्ट
बधाई हो।

indianrj said...

Bahut Khoob likha hai hamesha ki tarah

नितिन व्यास said...

संजय भाई ने सब कह ही दिया!

टेम्प्लेट बढिया लगा।

''ANYONAASTI '' said...

बड़ी देर तक इन लाईनों की "बिटवीन दा लाइन " ढूंढी पुराने कवि-सम्मेलनों ,मुशायरों में हास्य रचनाओं में अखबारों की हेड-लाईने सुनाई जातीं थीं नोश फरमाईये हाज़िर है ' मियामी में मिस-वर्ड का चुनाव शुरू : ...मंत्री श्री ...........विदेश रवाना 'आदि आदि . वैसे आज कल ज्यादा तर खबरें अपने गर्भ में 'बिटवीन दी लाइन ' छिपे होती हैं आप क अगले लेख में तो बहुत सी ऐसी खबर हैं ;एक समाचार " साध्वी का चार बार नार्को-टेस्ट " बिटवीन दी लाइन पढ़ें 'ऐ टी एस के पास कोई सबूतनाही या नार्को-टेस्ट अब तेरा सहारा ' मकोका लगाने की तैयारी ' रोज़ -रोज़ की खिट-खिट छूटेगी ,ना कोर्ट पेशी ना बार बार रेमंड की मांग ,हमी पुलिस हमी कोर्ट : न अपील न दलील इतमिनान से ठोकेंगे कील ,इतने इतने लंबे समय में सुबूत गढ़ लेंगे ,'वगैरह वगैरह | मै अखबार दो बार पढ़ता ही हूँ दो बार एक बार [पहली ] अख़बार की तरह दूसरी बार 'बिटवीन दी लाइन'अपने तरीके से फुर्सत से ] बतकही पर आगमन का धन्यवाद , \ मै वर्ड माडरेशन नही लगाता