Sunday, November 30, 2008

काश, एक हथगोला मीडिया कवरेज कर रहे “गिद्धों” पर भी आ गिरता…

Media Coverage Mumbai Terror Attack

मुम्बई में जो दर्दनाक घटनायें हुईं उसका मूर्खतापूर्ण और लज्जाजनक “लाइव” कवरेज भारत के इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दिखाया। जरा कुछ बानगियाँ देखिये इन गिद्धों के कवरेज की…

1) एक व्यक्ति के हाथ पर गोली लगी है, खून बह रहा है, माँस गिर रहा है, लेकिन उसकी मदद करने की बजाय एक गिद्ध पत्रकार उसके हाथ की फ़ोटो खींचने को उतावला हो रहा है और उसके पीछे भाग रहा है…

2) सुबह के सात बजे – ताज होटल के भीतर हमारे जाँबाज सिपाही आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं, दो दिन से भूखे-प्यासे और नींद को पीछे ढकेलते हुए… और ताज के बाहर कैमरे के पिछवाड़े में लेटे हुए गिद्ध आराम से कॉफ़ी-सैण्डविच का आनन्द उठा रहे हैं मानो क्रिकेट मैच का प्रसारण करने आये हों…

3) वीटी स्टेशन पर आम आदमियों को मारा जा चुका है, लेकिन गिद्ध टिके हुए हैं ओबेरॉय होटल के बाहर कि कब कोई विदेशी निकले और कब वे उसका मोबाईल नम्बर माँगें…

4) एक और पत्रकार(?) मनोरंजन भारती एक ही वाक्य की रट लगाये हुए हैं “ताज हमारे “देस” की “सान” (शान) है… और इस “सान” का सम्मान हमें बचाये रखना है…सेना का अफ़सर कह रहा है कि अब कोई आतंकवादी नहीं बचा, लेकिन ये “खोजी” बड़बड़ाये जा रहे हैं कि नहीं एक आतंकवादी अन्दर बचा है…

5) “आपको कैसा लग रहा है…” जैसा घटिया और नीच सवाल तो न जाने कितनी बार और किस-किस परिस्थिति में पूछा जा चुका है इसका कोई हिसाब ही नहीं है, आरुषि हत्याकाण्ड में भी कुछ पत्रकार ये सवाल पूछ चुके हैं…

6) अमेरिका में हुए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद किसी चैनल ने लाशों, रोते-बिलखते महिलाओं-बच्चों की तस्वीरें नहीं दिखाईं, लेकिन यहाँ तो होड़ लगी थी कि कौन कितनी लाशें दिखाता है, कितना बिखरा हुआ खून दिखाता है… इन गिद्धों पर सिर्फ़ लानत भेजना तो बहुत कम है, इनका कुछ और इलाज किया जाना आवश्यक है।

7) जीटीवी द्वारा 28 तारीख की रात को बड़े-बड़े अक्षरों में “कैप्शन” दिखाया गया “हम समझते हैं अपनी जिम्मेदारी…”, “सुरक्षा की खातिर लाइव प्रसारण रोका जा रहा है…” और यह अकल उन्हें तब आई, जब सेना ने अक्षरशः उन्हें “लात” मारकर ताज होटल से भगा दिया था, वरना यह “सुरक्षा हित” पहले दो दिन तक उन्हें नहीं दिखा था… “टीआरपी के भूखे एक और गिद्ध” ने आतंकवादियों के इंटरव्यू भी प्रसारित कर दिये, ठीक वैसे ही जैसे सुबह तीन बजे अमिताभ के मन्दिर जाने की खबर को वह “ब्रेकिंग न्यूज” बताता है…

क्या-क्या और कितना गिनाया जाये, ये लोग गिरे हुए और संवेदनाहीन तो पहले से ही थे, देशद्रोही भी हैं यह भी देख लिया। कई बार लगता है प्रिंट मीडिया इनसे लाख दर्जे से बेहतर है, भले ही वह भी ब्लैकमेलर है, राजनैतिक आका के चरण चूमता है, विज्ञापन पाने के लिये तरह-तरह के हथकण्डे अपनाता है, लेकिन कम से कम “सबसे तेज” बनने और पैसा कमाने के चक्कर में इतना नीचे तो नहीं गिरता… किसी चैनल ने सीएसटी स्टेशन पर मारे गये लोगों की सहायता के लिये हेल्पलाईन नहीं शुरु की, किसी चैनल ने रक्तदान की अपील नहीं की, किसी भी चैनल ने “इस खबर” को छोड़कर तीन दिन तक समूचे भारत की कोई खबर नहीं दिखाई मानो भारत भर में सिर्फ़ यही एक काम चल रहा हो…

मजे की बात तो ये कि कवरेज कर कौन रहा था, एक पूरे वाक्य में छः बार “ऐं ऐं ऐं ऐं” बोलने वाले पंकज पचौरी यानी इस्लामिक चैनल NDTV के महान पत्रकार। विनोद दुआ नाम के पद्म पुरस्कार से सम्मानित(?) एक पत्रकार, जिन्हें उपस्थित भीड़ द्वारा वन्देमातरम और भारत माता की जय बोलना रास नहीं आया और वे स्टूडियो में बैठे मेजर जनरल से खामखा “धर्म का कोई मजहब नहीं होता…” जैसी बकवास लगातार करते रहे… अमिताभ स्टाइल में हाथ रगड़ते हुए और अपने आप को “एस पी सिंह” समझते हुए पुण्यप्रसून वाजपेयी… यानी कुल मिलाकर एक से बढ़कर एक महान लोग…

सो आइये हम सब मिलकर न्यूज चैनलों का बहिष्कार करें। लोग यह तय करें कि दिन भर में सिर्फ़ पाँच या दस मिनट से ज्यादा न्यूज चैनल नहीं देखेंगे, इन गिद्धों की टीआरपी गिराओ, इन्हें विज्ञापनों का सूखा झेलने दो, इन्हें सार्वजनिक रूप से देश की जनता से माफ़ी माँगने दो कि “हाँ हमसे बहुत बड़ी गलती हुई है और इस प्रकार की राष्ट्रीय आपदा के समय आगे से हम सावधानीपूर्वक रिपोर्टिंग करेंगे… और पढ़े-लिखे पत्रकारों को नौकरी पर रखेंगे…”।

नोट - एक बात के लिये आप मुझे माफ़ करें कि बार-बार मैंने “गिद्ध” शब्द का उपयोग किया, जबकि गिद्ध तो मरे हुए जानवरों की गंदगी साफ़ करता है, लेकिन टीआरपी के भूखे गिद्ध तो……

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46 comments:

COMMON MAN said...

jaisa unke aaka bolte hain vaisa karte hain yeh channel,tajjub is baat ka hai ki ek bhi sanatani aadmi ke paas itna paisa nahi ki ek achcha news channel chala sake

पंगेबाज said...

मेरे भाई सुअरो को गिद्ध मत कहो . ये तो सफ़ाई करते है पर ये कमीन केवल गंदगी मे लौट लगाकर उसे और ज्यादा गंदा कर दुनिया को दिखाते है .

सौरभ कुदेशिया said...

Lanat hai in TV channels par!

खरी-खरी said...

बिल्कुल सही ये मनोरंजन साहब ठीक से बोल नही पाते है। फायर ब्रिगेड को फायर बिगरेड कहते रहे। पता नही किस कारण से ये अभी तक टिके है।


दीपक चौरसिया को देखा आपने। आराम से लेट कर कह रहा था " आतंकवादी कमाँडो को छका-छका कर परेशान कर रहे है" ये महाश्य कही पाकिस्तान के लिये रिपोर्टिंग तो नही कर रहे थे????

mahashakti said...

आप तो कई बार मेरी थीम पर लिख देते है, मै रह जाता हँ। :)

आज वास्‍तविकता यही है कि आतंकवादी से ज्‍यादा खतरनाक मीडिया है।

Major said...

उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद् सुरेश जी , किंतु मैं इस चीज़ से अपरिचित हूँ के वर्ड वेरिफिकेशन कैसे हटाया जाय . आपके मार्गदर्शन का आकांक्षी ...

आपकी लेखनी वास्तव मैं बहुत उत्तेजक और प्रभावी है

Major said...

मीडिया के साथ साथ हम भी कम दोषी नही है. हम ही मीडिया को बढावा देते है. सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है की इसके लिए कोई ठोस कदम भी नही उठाया जाता.

कार्तिकेय said...

बिल्कुल सही कहा सुरेश जी. इंडिया टीवी ने तो इस बार सारी हदें ही पार कर दीं. ये वाही चैनल है जो सबसे अलहदा होने का दावा करता था.

नरीमन हॉउस की कार्रवाई में अपने एक ठलुए को कमांडो के पीछे बिठा कर फोटो खिंचा दी, और पूरे दिन कैप्शन दिखाते रहे--"मौत के साए में रिपोर्टिंग" जैसे बाकी सरे कमांडो ननिहाल में बैठे हों.

प्रभात गोपाल झा said...

ek ek shabd sahi aur satik likha. aapki lekhan shandar hai
badhai

sareetha said...

बहुत खूब । आपकी पोस्ट ने निशब्द कर दिया ।गनीमत ये रही कि इन लोगों ने आतंकी हमले के सीधे प्रसारण के अधिकार किसी को नहीं बेचे । गनीमत ही समझिए , जो आपको यह सुनने नहीं मिला .. "हमले के इस भाग के प्रायोजक हैं फ़्लां - फ़्लां ।" हमला इतना यकायक हुआ ,वरना राष्ट्रीय शर्म की इस वारदात के हर एक घंटॆ के प्रसारण के प्रायोजक भी ढूंढ लाते ये गिद्ध.....।

varun jaiswal said...

गिद्धों से माफ़ी मागिये |
उनकी तुलना इन नीचों से मत करें जनाब |

Cyril Gupta said...

इस कवरेज की वजह से भी यकीनन बहुत जानें गईं है इस बार, आपके अफसोस में मैं भी शामिल हूं.

Anil Pusadkar said...

इसे कहते है सीधी बात.अच्छी लात लगाई है.

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" said...

जय हो गुरु देव
लेकिन स्टार + वाला गिद्ध बाद में कसम खाता रहा की भैया हमको मालूम था फ़िर भी हमने सही नहीं दिखाया नहीं तो नुकसान होता , घंटों बेचारा आत्म मुग्ध होकर अपने सेठ [चैनल] के एथिक्स मेहनती संवाददाओं..? की देह में बसी आत्मा की शान्ति के लिए तारीफ़ करता रहा . मुझे लगा गोया खाई छोडो दादा इनकी जिंदगी मुहल्ले के शेरू की मानिंद है चलिए इनकी आत्मा की शान्ति के लिए "दीपक" जगाएं

अनुनाद सिंह said...

दोष इन पत्रकारों का नही है। आज के ये 'पत्रकार' कल अपनी कक्षाओं में सबसे पीछे बैठते थे। ये इसलिये 'पत्रकार' बने क्योंकि इनकी अयोग्यता के चलते इन्हें कोई दूसरा काम नसीब नहीं हुआ। इसलिये इनसे अधिक की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इनकी तुलना उन महान पत्रकारों से करना हास्यास्पद होगा जो भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारत को नसीब हुए थे।

इन्हें पता ही नहीं कि कब किस तरह की भाषा का प्रयोग होना चाहिये। जैसे - 'भारतीय सेना का मेजर मारा गया' । ऐसे लगता है जैसे मेजर को मारना एक पवित्र राष्ट्रीय उद्देश्य था।

इन्हें किसी भी चीज की गहराई में जाने के लिये आवश्यक दिमाग विधाता ने दिया नहीं है। बस ये हर बासी चीज को चौबीसो घण्टे 'ब्रेकिंग ब्यूज' कहकर चिल्लाते रहते हैं।

पतिनुमा प्राणी said...

भाई सा'ब, क्यों गिद्धों को शर्मिंदा कर रहे हैं।

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी आप ने सही कहा,
धन्यवाद

cmpershad said...

हद तो यह है कि हर चैनेल सब से पहले, सब से तेज़ की होड में लगा रहता है और दर्शक को याद भि दिलाता है कि इससे पहले उसने यह नहीं देखा होगा- वह है सब से तेज़--[सनसनी फैलाने मे

सागर नाहर said...

दुख:द तो यह है कि हम फिर भी इन चैनलों पर समाचार देखने का मौका नहीं चूकते।
और हाँ, कल से देख रहा हूँ नेताओं की किन्नरों से, पत्रकारों की गिद्धों और सूअरों से तुलना की जा रही है। यह बहुत गलत बात है किन्नरों, सूअरों और गिद्धों के अपमान के लिए चिट्ठाकारों को उनसे क्षमा मांगनी चाहिये।
दोष सेना का भी है, उन्होने इन पत्रकारों को वहाँ खड़ा ही क्यों रहने दिया? शायद अगर वह हेलिकॉप्टर से उतरते कमांडो की हरकतों का सीधा प्रसारण ना दिखाते तो एक कमांडो शहीद होने से बचाया जा सकता था।

Arvind Mishra said...

हाँ आपने कुछ विचार के मुद्दे उठाये हैं ! भारतीय दृश्य मीडिया फिर चुकी है -मगर वे भी अपने प्रोफेसन में लगे थे -ख़बरों का दबाव भी कुछ ऐसा था की आचार संहिता के पालन का अवसर उन्हें नही मिल सका होगा -समय तेजी से भाग रहा था और मीडिया इन बातों के बावजूद भी समय से होड़ में पीछे छूट रही थी -फिर भी मीडिया को उसके श्रमऔर साहस के लिए दो शब्द
शाबाशी के भी मिलने चाहिए ! कुछ एंकर सचमुच इस युद्ध जैसी रिपोर्टिंग पर लगातार ६० घंटे मुस्तैदी से जुटे रहे -टाईम्स के अर्नव का श्रम तो भूले नही भूलता .कुछ चैनेल तो आगे बढ़कर विश्व जनमत को भारत के पक्ष में करते दिखे जहाँ सरकार पंगु सी दिख रही थी !
यहाँ भी वोट करना चाहें ! http://mishraarvind.blogspot.com/2008/11/blog-post_29.html

Vidhu said...

इन्हें विज्ञापनो का सूखा झेलने दो,...सत्यमेव जयते ,..बधाई

Lalan said...

isme inka koi dosh nahee, inhe kabhi bataya hin nahee gaya ki media kya hai? iska role kya hai? breaking-news kise kahte hain !!! Yahan logon ne channelo ki dukaan khol rakhee hai....or aapko to pata hin hai Dhandhe ke liya kya karna padta hai.....

Regards
Om

विनीत उत्पल said...

siddhant bhakarna aur updesh dena aasan nah sureshjee, hakeekat aur real me antar hota hai. aap jaise log kabhee bhee future ka nahee soch sakte. kya aap ke pas aise koi plan hai jis se media ko giddh nahee kaha jaye. yad rakhiye angulee uthana aasan hai uska samna karna khathin.

प्रवीण कुमार शर्मा said...
This comment has been removed by the author.
प्रवीण कुमार शर्मा said...

NDTV india, NDTV24X7, CNN-IBN, IBN 7, India TV ke prasaran pure duniya me Internet ke dwara muft me uplabdh hai. AAJ TAK ko Internet pe subscription se dekha ja sakta hai. Isake alawa bhut saari gair kanuni sites hai jisape indian news chanel dekhe ja sakte hai internet par. Yeh chanells aaj jo deshbhakti kaa raag alap rahe hai aur rajnitigyo ko gaali de rahe hai wo yeh nahee janate ki saari commondo karyawaahi ka seedha prasaran inhone duniya me pahuchaya hai live aur koi bhi satelite phone ke dwara atankwaadiyo ko nirdesh deta rah sakta hai. Kya ye rashtra ke saath dhokha nahee hai, kyaa inchanalo ke upar atankwaadi harkat karane ke liye mukadma nahee kiya ja sakta hai?.

राहुल सि‍द्धार्थ said...

अच्छी खबर ली आपने इन गिद्धों की.धन्यवाद..

Udan Tashtari said...

कम ही कहता हूँ मगर आज आप से शत प्रतिशत सहमत!!

अफसोसजनक रोल!!

नीरज गोस्वामी said...

बहुत सच्ची बात कही है आपने...हम लोग कितने संवेदन हीन हो गए हैं...अपने भले के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं...क्यूँ न सब मिल कर इन चेनल का बहिष्कार करें?
नीरज

sanjeet said...

निर्दोष लोगों की हत्याओं को कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। मुंबई की घटना को लेकर व्यवस्था पर सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन अगर इस सवाल को विज्ञापनबाज नजरिए से धार्मिक हिंसा में यकीन रखने वाले ही उठाने लगें तो हमें सतर्क हो जाना चाहिए। क्योंकि यह फिर से हमें ऐसी ही हिंसा के आस पास लाकर पटकने की साजिश है।
पिछले दिनों मुंबई में जो कुछ भी घटा उसने आम हिंदुस्तानियों को भले ही झकझोर दिया हो लेकिन धार्मिक आतंकवाद के खास चेहरे ने राहत की सांस ली है। हमारे लिए अब यह चेहरा अजनबी नहीं है। सूचना से जुड़े सबसे सशक्त माध्यम भी उसके काले चेहरे को बेहतर राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुट गए हैं। लेकिन हमें मुंबई और मालेगांव दोनों की हकीकत को समझते हुए 'बेहतर विकल्प' की इस हकीकत को बेनकाब करना होगा।samkaleen janmat

dinesh said...

अरे गज़ब
कल तक विनीत उत्पल जामिया मिल्लिया इस्लामिया की घटना को लेकर और बाटला शूट आउट के दर्द को लेकर कुछ सवाल पत्रकारों से करते आ रहे थे और पत्रकारों के Embeded Journalist बता रहे थे आज इन्हें क्या हो गया है भाई?

जब लोगों के व्यक्तिगत हित और सोच देशहित से बड़ी हो जाती है तो एसा ही होता है़

जाने दीजिये विनीत उत्पल भाई, आपतो आईबीएन सेवन के आशुतोष और संजीव पालीवाल को समय से आगे बताने पर ही लेख लिखते रहिये, आप काहे अपना दिमाग घिसते हैं इस सब में

shama said...

Kya khoob kaha..mere manki baat chhen lee...
Mere blogpe maine apnee aart aawaaz uthayee hai," Meree Aawaz Suno" is sheershak tehat...zaroor padhen..abhi, abhi Hemant karkareki patneeko milke aayee hun...is shaheedonko pichhale 2 dashkonse adhik jaana hai..behad nek uchh darjeke afsar the, jinhen hamne hamare bewaqoof grihmantralayki wajahse kho diya hai..

Sanjeet Tripathi said...

अरे ई अऊर कौन संजीत आकर टिप्पणी कर गए भैया।
खैर!
आपने छठें नंबर पर जो बात कही है उससे सौ फीसदी सहमत हूं।

Atul CHATURVEDI said...

bahut sarthak,bebak vichar hain ,sadhuvad !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

...सो आइये हम सब मिलकर न्यूज चैनलों का बहिष्कार करें। लोग यह तय करें कि दिन भर में सिर्फ़ पाँच या दस मिनट से ज्यादा न्यूज चैनल नहीं देखेंगे,

सुरेश जी,
मैने तो यह प्रस्ताव बहुत पहले अंगीकार कर लिया था, लेकिन आपकी ही तरह मुम्बई की इस घटना पर कुछ देरतक इन्हें झेलने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। अब इनके प्रति मेरी अरुचि और बढ़ गयी है।

पंगेबाज said...

अरे भैया एक चैनल वाला तो जो शबाना आजमी के घरवाले एक साथ चर्चा मे लीन था , ये लोग भारत माता की जय गणपती बप्पा मोर्या और वंदेमातरम के नारे कयो लगा रहे है इन पर रोक लगनी चाहिये ये सांप्रदायिक माहौल बन रहे है पर चर्चा करने का इच्छुक था

Bhuwan said...

सुरेश जी आपकी बात से मै भी सहमत हूँ की कई बार समाचार दिखने की जल्दबाजी में रिपोर्टर्स असंवेदनशील और गैर जिम्मेदाराना हरकत कर बैठते है... लेकिन पुरी तरह नही... आपने शायद वो कवरेज नही देखी जिसमे पुलिस की गाड़ी से आतंकी गोलियां चला रहे और एक रिपोर्टर हाथों में माइक पकड़े एक घायल आदमी को खींच कर गाड़ी के पीछे ले जा रहा था... ये भी गौर करने वाली बात है की इतनी भारी गोला बारी और तमाम खतरों के बावजूद ये रिपोर्टर्स अपनी जान की बाज़ी लगा कर रिपोर्टिंग करते रहे.. आप लोगों को शायद याद नहीं की जम्मू में आतंकी हमले के दौरान रिपोर्टिंग करते समय एक रिपोर्टर को गोली लगी थी.. इसी तरह कारगिल की लड़ाई के दौरान भारी गोलाबारी के बीच भी रिपोर्टिंग की गयी . कई ऐसे स्टिंग ऑपरेशंस किए गए जो देश और आम लोगों के लिए थे. इस बार भी जब आतंकी ढेर कर दिए गए है और मामले पर राजनीति शुरू हो गयी है तो राजनेताओं समेत सुरक्षा में हुई तमाम चूकों की जानकारी जनता के सामने मीडिया ही लाती है. शिवराज पाटिल, आर आर पाटिल क इस्तीफे में भी मीडिया का दबाव साफ़ देखा जा सकता है. अब देशमुख भी पड़ छोड़ने वाले हैं.. मै दावे के साथ कह सकता हूँ की मीडिया को गाली दे रहे लोग इस वक्त भी टीवी न्यूज़ चैनलों पर नज़रें टिकाएं होंगे..

कुश said...

इन सभी न्यूज़ चैनल को मेरी भावभीनी श्रद्दांजलि

डॉ .अनुराग said...

एक घटना का उल्लेख मै भी कर देता हूँ जब दत साहब आख़िर में सिर्फ़ ब्रीफिंग करने आये,तमाम पत्रकार स्कूली बच्चो की तरह टूट पड़े ....दूसरा इतनी बड़ी आतंक वादी घटना के बाद सेना ओर फोरेंसिक टीम को काफ़ी कुछ काम घटनास्थल पर बाकी होते है पर मीडिया ताज का कोवेरेज करना चाह रहा था ,मै मानता हूँ पूरे देश को उत्सुकता है ...पर कही ना कही कुछ जिम्मेदारी ओर जल्दबाजी से बचना होगा ....आपकी भाषा में तल्खी जरूर है पर कड़वा सच है

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत सही बात कही है आपने.

बुंदेला said...

लगातार 60 घंटे तक टीवी से चिपके रहे लोग अब मिलकर जिस तरह से टीवी चैनलों और जान पर खेलने वाले पत्रकारों को गालियां दे रहे हैं उसमें स्वस्थ्य आलोचना कम और टीवी चैनल में नौकरी ना मिल पाने की कुंठा ज़्यादा झलक रही है। टीवी पत्रकार भी हमारे और आपके जैसे इंसान हैं, अगर उन्होने कोई गलती की है तो उनको समझाने का हक बनता है हमारा। रही बात देखने और बोलने में अच्छे लोगों को नौकरी मिलने की बात तो आप ही लोग कह रहे हैं कि फलाना शान को सान बोलता है, फलाना देश को देस बोलता है। मेरी नेक राय है आलोचना करें बुराई नहीं। टीवी चैनलों को विज्ञपनों का सूखा झेलने दो, जैसी बददुआ से आपको क्या मिलेगा, चैनलों में छंटनी होगी, लोग बेरोजगार होंगे जिनमें से कई आपके रिश्तेदार हो सकते हैं दोस्त हो सकते हैं। आइये कसम लें कि हम चैनलों को इतना मजबूर कर देंगे कि वो सही भूमिका निभायें।

धीरज राय said...

dhanya bad jo aap mere blog par aaye....aapka lekhan vakai kabile tarif hai lekin jara dono taraf sonchne ki jarurat hai.....

Bharat Kalyan said...

Wah Wah Kya Snghya dee hain aapne Gidh.... Vakya Media ke karname Gidhon jaise hi hain.......

Sachin said...

कमाल है सुरेश जी, आपने खुद तो मीडिया वालों को गालियाँ दीं और साथ में ऊपर वाले ४२ लोगों से भी मीडिया को गालियाँ पड़वाईं। वैसे सब लोग एक जैसे नहीं होते, सारी अंगुलियाँ भी एक समान नहीं होतीं। हाँ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस देश में फिलहाल भ्रष्ट है लेकिन वो नया है ना, मात्र १० साल पुराना। जबकि प्रिंट गंभीर है क्योंकि वो २०० साल पुराना है। खैर, मीडिया की वजह से ही पूरे देश को इस घटना के बारे में पता चल पाया और वो जागरुक भी हुए....ये सही है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले कई बार संयम खो देते हैं लेकिन वो गिद्ध नहीं हैं भाई....।

umashankar said...

Dhanyawaad Suresh Bhai...! aapke blog bhartiyata jagran yagya ki aahutiyan hai. isme kai log jod raha hu, aapke blogs ko padhne waale sabhi dosto se bhi yahi nivedan hai ki in blogs ke madhyam se jan jagran ke pawan krutya ko sampadit karen.
Umesh Sharma

DEEPAK BABA said...

भाई साहेब, क्या बताएँ इन लोगों के बारे में, एक तरफ़ फायरिंग हो रही थी और NDTV का एक रिपोर्टर रिपोर्टिंग के दोरान हंस रहा था हँसते हँसते रिपोर्टिंग कर रहा था ... खून जल गया. एसा बेकार कैमरामेने की सामने वाला गलती कर रहा है तो तू तो कम से कम कैमरा हटा ले.

बुंदेला said...

दीपक बाबा की बात पर यकीन तो नहीं होता, क्योंकि पूरे ऑपरेशन के दौरान किसी चैनल ने ढंग से रिपोर्टिंग की तो वो था NDTV India. दीपक बाबा कही India TV की बात तो नहीं कर रहे।