आतंकवाद की नर्सरी और पनाहगाह बन गये हैं केरल और मध्यप्रदेश का मालवा
Kerala and Malwa becoming Nursery of Terrorism in India
हाल ही में जम्मू कश्मीर में दो आतंकवादी मुठभेड़ में मारे गये। सुरक्षा बलों द्वारा उनकी तलाशी लेने पर उनकी जेबों से केरल के मतदाता परिचय पत्र पाये गये। जो आतंकवादी मारे गये उनके नाम हैं मुहम्मद फ़याज़ (थय्यिल जिला कन्नूर) और अब्दुल रहीम (चेट्टिपदी, जिला मलप्पुरम)। यह आम जनता के लिये चौंकाने वाली खबर हो सकती है, कि केरल के युवक कश्मीर में आतंकवादी बनकर क्या कर रहे थे? और क्या केरल भी अब जेहाद की नर्सरी बनता जा रहा है? लेकिन सच यही है कि पहले भी इस प्रकार की खबरें आती रही हैं कि केरल के अन्दरूनी इलाकों में आतंकवादी अपने पैर पसार चुके हैं। केरल की नेशनल डेवलेपमेण्ट फ़्रण्ट (NDF) जो कि केरल का एक मुस्लिम संगठन है बड़ी तेजी से “नई भरती” कर रहा है, और इस संगठन के “सिमी” और “इंडियन मुजाहिदीन” से गहरे सम्पर्क रहे हैं। यह वही NDF है जिस पर ISI के साथ रिश्ते होने के आरोप सतत लगते रहते हैं और पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार यह संगठन केरल के “मराड नरसंहार” में भी शामिल रहा। इस प्रकार की खबरें भी हैं कि इंडियन मुजाहिदीन के मुख्य लीडर सुबैन कुरैशी ने केरल का सघन दौरा किया था। इस मामले में सबसे अधिक शर्मनाक पहलू यह है कि केरल में कांग्रेस हो या वामपंथी दोनों पार्टियाँ मुसलमानों को रिझाने के नाम पर NDF की लल्लोचप्पो करती फ़िरती हैं। सत्ताधारी वामपंथी नेता तो ISS के नेता अब्दुल नासिर मदनी के साथ कई जगहों पर एक ही मंच पर भाषण देते देखे गये और कांग्रेस हमेशा से NDF के नेताओं की संदिग्ध गतिविधियों पर परदा डालती रही है।
केरल को हमेशा ही धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के ताने-बाने वाला राज्य माना जाता रहा है, लेकिन पिछले एक दशक में स्थितियाँ बहुत तेजी से बदली हैं। केरल का तटीय मलाबार इलाका जो पहले प्राकृतिक सौन्दर्य के लिये जाना जाता था, अब स्मगलिंग के जरिये हथियार और ड्रग सप्लाई का केन्द्र बनता जा रहा है। पर्यटन की आड़ लेकर इस क्षेत्र में कई संदिग्ध गतिविधियाँ जारी हैं। आईबी की एक आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार जब 1993 में मौलवी अबुल हसन चेक्कानूर का अपहरण और हत्या हुई, उस वक्त यह माहौल बनाया गया कि सुरक्षा बल और जाँच एजेंसियाँ जानबूझकर इस हत्या की गुत्थी नहीं सुलझा रहे हैं। दुष्प्रचार के जरिये “सिमी” और “इस्लामिक सेवक संघ” प्रदेश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को चोट पहुँचाने की कोशिशें तेज करते रहे और धीरे-धीरे वे इसमें कामयाब भी होने लगे। केरल में बढ़ता शिक्षा स्तर और फ़िर भी बेरोजगारी ने इन परिस्थितियों को पनपने का भरपूर मौका दिया। खाड़ी में काम करने जाने वाले अन्य मुसलमानों की बेहतर होती आर्थिक स्थिति और उन्हीं के बीच में पाकिस्तानी तत्व आग भड़काने में लगे रहे और हताश मुस्लिम युवा धीरे-धीरे इन तत्वों की ओर खिंचा चला गया। सिमी ने अपना पुनर्घनत्वीकरण शुरु कर दिया, और यदि आईबी की मानें तो अलुवा के पास बिनानीपुरम, एर्नाकुलम जिला, मलप्पुरम और कोजीकोड जिलों में सिमी बेहद मजबूत स्थिति में है। केरल में आतंकवादी उपस्थिति की सबसे पहली झलक कोयम्बटूर बम धमाकों के दौरान पता चल गई थी, जब जाँच के दौरान तमिलनाडु स्थित अल-उम्मा के अब्दुल नासिर मदनी (इस्लामिक सेवक संघ का संस्थापक) के साथ जीवंत सम्पर्क पाये गये थे। आईएसआई के लिये केरल एक पसन्दीदा जगह बन चुका है। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि अब आईएसआई इस बात को समझ चुका है कि कश्मीर में और भारत के अन्य राज्यों में स्थानीय युवाओं को भरती करना अधिक फ़ायदेमन्द है और इसीलिये “इंडियन मुजाहिदीन” नाम भी दिया गया है, ताकि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हल्ला मचे तो कहा जा सके कि यह तो भारत के अन्दरूनी गुटों का ही काम है हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है। केरल पर अधिकाधिक शक इससे भी हुआ है कि इंडियन मुजाहिदीन के खासमखास अब्दुल पेदिकल शिबली और याह्या कामाकुट्टी जो इन्दौर से हाल में गिरफ़्तार हुए, केरल से ही हैं और ये लोग सिमी के सदस्यों को “तकनीकी” प्रशिक्षण देते थे। एक और व्यक्ति अब्दुल जलील भी गिरफ़्तार किया गया है जो केरल के कन्नूर का रहने वाला है और उससे बरामद डायरियों से उसके कश्मीरी आतंकवादियों से सम्बन्ध स्थापित होते हैं। लेकिन कश्मीर में केरल के युवाओं का मारा जाना एक बेहद गम्भीर मसला है और असम विस्फ़ोटों के बाद यह दर्शाता है कि भारत की सुरक्षा इतनी तार-तार हो चुकी है कि देश के किसी भी कोने से आतंकवादी अपना काम कर सकते हैं। 
इसी प्रकार देश का मध्य क्षेत्र है मध्यप्रदेश और जिसका पश्चिमी इलाका है मालवा, जिसमें रतलाम, मन्दसौर, इन्दौर, उज्जैन और देवास आदि इलाके आते हैं। यह क्षेत्र भी पिछले एक दशक के दौरान सिमी का मजबूत गढ़ बन चुका है। उद्योग-धंधों के न पनपने और इन्दौर के “मिनी मुम्बई” बनने की चाहत ने अपराधियों, भू-माफ़ियाओं और नेताओं का एक ऐसा गठजोड़ तैयार कर दिया है जो सिर्फ़ अपने फ़ायदे की सोचता है, इस इलाके (मालवा) की खास बात है कि इन्दौर को छोड़कर बाकी का समूचा इलाका बेहद शांत है, लोग धर्मप्रिय हैं, खामखा किसी के पचड़े में नहीं पड़ते। लेकिन इस इलाके में बदलाव आना शुरु हुआ बाबरी मस्जिद ध्वंस और उसके बाद हुए दंगों के बाद से। कई लोगों को सोहराबुद्दीन की याद होगी, हाल ही में कई सेकुलरों और मानवाधिकारवादियों ने इसके गुजरात पुलिस द्वारा किये गये एनकाउंटर पर काफ़ी शोरगुल मचाया था। सोहराबुद्दीन भी मालवा के इलाके की ही पैदाइश है, उन्हेल नामक कस्बे में इसके खेत के कुंए से एके-56 रायफ़लें बरामद की गई थीं, और कई बम विस्फ़ोटों में भी यह शामिल रहा ऐसा पुलिस और एजेंसियों का कहना है (लेकिन “सेकुलर” लोग इसे संत मानते हैं जैसे कि अफ़ज़ल गुरु को)। ताजा मामला इन्दौर से ही सिमी के प्रमुख व्यक्ति सफ़दर नागौरी और उसके साथियों की गिरफ़्तारी का रहा। उल्लेखनीय है कि सफ़दर नागौरी भी हमारे उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय का पीएच. डी. का छात्र रहा और उसने कश्मीर विषय पर केन्द्रित थीसिस “बर्फ़ की आग कैसे बुझेगी” जमा की है, जिसमें कुछ राष्ट्रविरोधी टिप्पणियाँ पाई गईं, और इस विषय पर इंडिया टुडे में काफ़ी कुछ प्रकाशित हो चुका है। सफ़दर नागौरी सिमी का सबसे प्रमुख व्यक्ति है, और कई राज्यों में इस संगठन को फ़ैलाने में इसका बड़ा हाथ रहा है, इसके साथ ही शिबली भी इसी के साथ पकड़ा गया था (जैसा कि पहले बताया)। हाल ही में उज्जैन पुलिस ने गुजरात एटीएस के साथ एक संयुक्त ऑपरेशन में उज्जैन में कापड़िया उर्फ़ मूसा को पकड़ा जो कि अहमदाबाद धमाकों का प्रमुख आरोपी है और अब तक फ़रार था। सिमी के अन्य पदाधिकारियों का आना-जाना इन जिलों में लगा रहता है, यहाँ वे आसानी से छिप जाते हैं उन्हें “स्थानीय समर्थन” भी हासिल हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि केरल और मालवा के शांत इलाकों को आतंकवादी अपनी शरणस्थली बना चुके हैं और जब वे यहाँ आराम फ़रमाने या फ़रारी काटने आते हैं तो साथ-साथ यहाँ के असंतुष्ट युवकों को बरगलाकर अपने साथ मिलाने में भी कामयाब हो जाते हैं।
देश इस समय सबसे गम्भीर खतरे की चपेट में है, और इस खतरे को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं कांग्रेस और कथित “सेकुलर” लोग जो तीन श्रेणियों में हैं, पहला जिन्हें यह आसन्न खतरा उनकी “जिद” के कारण दिखाई नहीं दे रहा… दूसरा यदि दिखाई दे भी रहा है तो वे उसे खतरा मानना नहीं चाहते… और तीसरा या तो वे लोग भी जाने-अनजाने इस खतरे का हिस्सा बन चुके हैं। जब इन तत्वों से मुकाबले के लिये हिन्दूवादी संगठन आगे आते हैं (साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का भी उज्जैन से गहरा सम्बन्ध रहा है) तो जिस प्रकार कन्नूर और मलप्पुरम में संघ कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई, या कंधमाल में एक वयोवृद्ध स्वामीजी की हत्या हुई या फ़िर कश्मीर से जिस प्रकार हिन्दुओं का जातीय सफ़ाया किया गया, ऐसा कुछ होता है, जिसका दोष भी षडयंत्रपूर्वक ये सेकुलर उन्हीं के माथे पर ढोल देते हैं। इसीलिये विभिन्न फ़ोरमों पर यह लगातार दोहराया जाता है कि इस देश का सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस और “सो-कॉल्ड” सेकुलर लोग कर रहे हैं। कहा गया है न कि सोते हुए को जगाना आसान है लेकिन जो सोने का नाटक कर रहा हो उसे आप कैसे जगायेंगे? जब हमारे बीच में ही “जयचन्द” मौजूद हैं तो दूसरों को दोष क्या देना, पहले तो इनसे निपटना होगा।
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