Saturday, November 22, 2008

हिन्दू नाराज हैं या शर्म से पानी-पानी हैं या नपुंसक हैं?

Hindu Terrorism Congress and Secularism

श्रीनगर में एक मुस्लिम महिला संगठन है जिसका नाम है “दुख्तरान-ए-मिल्लत”, जो मुस्लिम महिलाओं को इस्लामिक परम्पराओं और ड्रेस कोड को सख्ती से लागू करवाने के लिये कुख्यात है चाहे इस “पवित्र कार्य”(?) के लिये हिंसा का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। उनका दावा है कि यह मुस्लिम महिलाओं के भले के लिये है, दुख्तरान-ए-मिल्लत की स्वयंभू अध्यक्षा हैं आसिया अन्दराबी, जिसे कई बार देशद्रोही गतिविधियों, जेहादी गुटों द्वारा भारी मात्रा में पैसा प्राप्त करने, और आतंकवादी संगठनों की मदद के लिये कई बार जेल हुई। अमेरिका की खुफ़िया एजेंसियों की एक रिपोर्ट के अनुसार दुख्तरान-ए-मिल्लत 1995 में बीबीसी के दफ़्तर में हुए पार्सल बम विस्फ़ोट के लिये भी दोषी पाई गई है। आसिया अन्दराबी को पोटा के तहत गिरफ़्तार किया जा चुका है और उसे हवाला के जरिये भारी मात्रा में पैसा प्राप्त होता रहा है। मैडम अन्दराबी भारत के खिलाफ़ जब-तब जहर उगलती रहती हैं। इतनी भूमिका बाँधने का असली मकसद सेकुलरों, कांग्रेसियों, नकली हिन्दुओं, नपुंसक हिन्दुओं, तटस्थ हिन्दुओं को सिर्फ़ यह बताना है कि इस “महान महिला” का एक बार भी नार्को टेस्ट नहीं किया गया। कभी भी जीटीवी या NDTV ने इसके बारे में कोई खबर नहीं दी। इसके विपरीत कई महिला संगठनों ने इसका इंटरव्यू लिया और कहा गया कि यह “इस्लामी महिलाओं का क्रांतिकारी रूप”(?) है।

कश्मीर में भारत के झण्डे जलाते और उग्र प्रदर्शन करते युवक भारत के सेकुलरों के लिये “भ्रमित युवा” हैं जिन्हें समझने(?) की जरुरत है, जबकि अमरनाथ भूमि के लिये जम्मू में प्रदर्शन करते युवक “उग्र, हिंसक और भाजपा के गुण्डे” हैं, ये है इनका असली चेहरा… जैसे ही एक साध्वी सिर्फ़ शंका के आधार पर पकड़ाई, मानो सारे चैनलों और अखबारों को काम मिल गया, जाँच एजेंसियाँ और ATS अचानक प्रभावशाली हो गये, तुरन्त नारको टेस्ट का आदेश दिया गया, कोई सबूत न मिला तो “मकोका” लगा दिया गया ताकि आसानी से छुटकारा न हो सके और न्यायालय को गच्चा दिया जा सके, साध्वी को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा, लेकिन महान सेकुलर लोकतन्त्र का एक भी महिला संगठन उसके पक्ष में आवाज उठाने आगे नहीं आया। भले ही कोई साध्वी को निर्दोष बताने के पक्ष में सामने न आता, लेकिन एक “महिला” के सम्मान बचाने, उसे अपने दैनिक धार्मिक कार्य सम्पन्न करवाने, और सतत एक महिला कांस्टेबल साथ रखने जैसी मामूली माँगें तक उठाने की जहमत किसी ने नहीं उठाई। जबकि यही महिला संगठन और गिरिजा व्यास के नेतृत्व में महिला आयोग, देश के किसी भी कोने में किसी अल्पसंख्यक महिला पर हो रहे अत्याचार पर जरा-जरा सी बात पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं। नारको टेस्ट के दौरान साध्वी पूरा सहयोग देती हैं, लेकिन फ़िर भी ATS चार-चार बार नारको टेस्ट करवाती है, ये सब क्या है? मजे की बात तो यह है कि यही महिला आयोग राखी सावन्त जैसी “आईटम गर्ल” के पक्ष में तुरन्त आवाज उठाता रहा है, जबकि वह अपनी पब्लिसिटी के लिये वह सारी “हरकतें” कर रही थी।



मानवाधिकार आयोग नाम का “बिजूका” तो चुपचाप बैठा ही है, मार्क्सवादियों के मुँह में भी दही जम गया है, वाचाल अमर सिंह भी अज्ञातवास में चले गये हैं, जबकि यही लोग अफ़जल की फ़ाँसी बचाने के लिये जी-जान एक किये हुए हैं, भले ही सुप्रीम कोर्ट ने उसे दोषी करार दिया है। प्रज्ञा का असली दोष यह है कि वह “भगवा” वस्त्र पहनती है, जो कि कांग्रेस और वामपंथियों को बिलकुल नहीं सुहाता है। सरकार की “सुरक्षा” लिस्ट में वह इसलिये नहीं आती क्योंकि “540 विशिष्ट” (सांसद) लोगों जिनमें से दो तिहाई पर हत्या, बलात्कार, लूट, डकैती, धोखाधड़ी के मामले चल रहे हैं, इनकी “सुरक्षा और सम्मान” बरकरार रखना ज्यादा जरूरी है।

सबसे पहले ATS की RDX वाली “थ्योरी” पिटी, फ़िर हैदराबाद पुलिस ने यह कहकर केस की हवा निकाल दी कि मालेगाँव और हैदराबाद की मक्का मस्जिद विस्फ़ोट में आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। जिस मोटरसाइकल के आधार पर यह केस खड़ा किया जा रहा है वह प्रज्ञा ने कई साल पहले ही बेच दी थी। आपको याद होगा जब शंकराचार्य को गिरफ़्तार किया गया था तब भी मीडिया और पुलिस ने उन पर रेप, मर्डर, धोखाधड़ी और औरतखोरी के आरोप लगाये थे, कहाँ गये वे आरोप, क्या हुआ उस केस का आज तक किसी को पता नहीं, लेकिन हिन्दू गुरुओं की छवि बिगाड़ने का काम तो सतत जारी है ही… कांची के बाद कंधमाल में भी “हिन्दू आतंकवाद” की कहानियाँ गढ़ी गईं, एक बुजुर्ग स्वामी की हत्या को सिरे से भुलाकर मीडिया सिर्फ़ नन के बलात्कार को ही प्रचारित करता रहा और “बटला हाऊस की गैंग” इससे बहुत खुश हुई होगी। बहुसंख्यकों की भावनाओं का अपमान करने वाले देश और उसके नेताओं का चरित्र इससे उजागर होता है, और वह भी सिर्फ़ अपने चुनावी फ़ायदे के लिये। कुल मिलाकर इनका एक ही काम रह गया है, “भगवा ब्रिगेड” को बदनाम करो, हिन्दुओं को “आतंकवादी” चित्रित करो, चिल्ला-चिल्ला कर भारत की संस्कृति और संस्कारों को पिछड़ा, दकियानूसी और बर्बर बताओ, कारण सिर्फ़ एक ही है कि “हिन्दू” सहिष्णु(?) है, और देखना यही है कि आखिर कब तक यह सहिष्णु बना रहता है।

बांग्लादेश से घुसपैठ जारी है, रामसेतु को तोड़ने के लिये नित नये हलफ़नामे सुप्रीम कोर्ट में दिये जा रहे हैं, बटला हाउस के आरोपियों को एक विश्वविद्यालय खुलेआम मदद दे रहा है, लेकिन जीटीवी और NDTV को एक नया फ़ैशन सूझा है “हिन्दू आतंकवाद”। जयपुर या मुम्बई के विस्फ़ोटों के बाद किसी मौलवी को पकड़ा गया या किसी मुस्लिम धर्मगुरु को हिरासत में लिया गया? किसी चैनल ने “हरा आतंकवाद” नाम से कोई सीरीज चलाई? “उनका” कहना होता है कि “धर्म को आतंकवाद” से नहीं जोड़ना चाहिये, उन्हीं लालुओं और मुलायमों के लिये सिमी निर्दोष है जिसके “मोनो” में ही AK47 राइफ़ल दर्शाई गई है। लेकिन जब प्रज्ञा कहती हैं कि पुलिस उन्हें बुरी तरह पीट रही है और टॉर्चर कर रही है तब किसी के मुँह से बोल नहीं फ़ूटता। जब पप्पू यादव, शहाबुद्दीन और तेलगी जैसे लोगों तक को जेल में “सभी सुविधायें” उपलब्ध हैं, तो क्या प्रज्ञा उनसे भी बुरी है? क्या प्रज्ञा ने आसिया अन्दराबी की तरह मासूम महिलाओं पर एसिड फ़ेंका है? या प्रज्ञा ने देश के कोई राज चुराकर पाकिस्तान को बेचे हैं? ये सब तब हो रहा है जबकि एक “महिला”(?) ही इस देश की सर्वेसर्वा है।



अब देखते हैं कि क्यों हिन्दू “हिजड़े” कहलाते हैं –

1) 3 लाख से अधिक हिन्दू कश्मीर से “धर्म” के नाम पर भगा दिये जाते हैं, लेकिन एक भी हिन्दू उठकर यह नहीं कहता कि बस बहुत हो चुका, मैं सारे “शैतानों” को सबक सिखाने का प्रण लेता हूँ।
2) कश्मीर घाटी में 500 से अधिक मंदिर सरेआम तोड़े जाते हैं, कोई कश्मीरी हिन्दू “हिन्दू आतंकवाद” नहीं दिखाता।
3) डोडा और पुलवामा छोटे-छोटे बच्चों तक को चाकुओं से रेता जाता है, लेकिन एक भी हिन्दू संगठन उनके विरोध में आगे नहीं आता। एक संगठन ने “मानव बम” बनाने की पहल की थी, एक भी हिन्दू युवक आगे नहीं आया।

राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत के तीन महान स्वप्न हैं – राम, शिव और कृष्ण। मुस्लिम आक्रांताओं ने तो हजारों मन्दिर तोड़े ही, आज की स्थिति में भी राम जन्मभूमि में रामलला अस्थाई टेंट में धूप-पानी में खड़े हैं, जरा गूगल पर जाईये और देखिये किस तरह काशी में विश्वनाथ मन्दिर चारों तरफ़ से मस्जिद से घिर चुका है, पुराने विश्वनाथ मन्दिर के खंभों को बड़ी सफ़ाई खुलेआम यह दर्शाते हुए घेरा गया है कि देखो ऐ हिन्दुओं, यह पहले तुम्हारा मन्दिर था, अब यह मस्जिद बनने जा रही है। कोई हिन्दू संगठन “आतंकवादी” बना? नहीं। जो काम गजनी, गोरी और अब्दाली भी न कर पाये, मुस्लिम वोटों के लिये यह सरकार कर चुकी है। कांग्रेस, सेकुलर और वामपंथी एक खतरनाक खेल खेल रहे हैं, और उन्हें अन्दाजा नहीं है कि वे भारत का क्या नुकसान करने जा रहे हैं। देखना यह है कि आखिर कब हिन्दुओं के सब्र का बाँध टूटता है, लेकिन एक बात तो तय है कि “सुनामी” चेतावनी देकर नहीं आती, वह अचानक किसी एक “झटके” से आती है और सब कुछ बहा ले जाती है…

(सन्दर्भ – मा. तरुण विजय का इंडिया टाइम्स पर अंग्रेजी में छपा यह लेख)


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31 comments:

Anil Pusadkar said...

shishupal sau galtiyan karne ke pahle nahi mara tha.pap ka ghada bina bhare nahi futata.samay aayega to sabr ka bandh tutega hi nahi sab kuch baha kar le jayega.

संजय बेंगाणी said...

देश का टूटना सबसे आघातजनक घटना रही होगी, तब भी सब्र का बाँध नहीं टूटा तो अब कैसी उम्मीद?

Gyan Dutt Pandey said...

अब क्या कहेँ? हिन्दू न नाराज हैँ न शर्म से पानीपानी!

कुश said...

aapka e-mail id nahi mil raha.. kripya mail kariye..

Indian said...

Sureshji, dhanyawaad itni badhiya post ke liye, Hindu bhai na to naraaz hain na sharm se paani paani na napunsak wo nirash hai apne hi desh mein iss bartaaw ke liye pata nahi aur kya kya dekhna likha hai hum hinduon ke bhaagya main, par kyon karein hum bhaagya ka intzaar kyon na mile hue mauke ka istemaal karke ukhaad fenkein inn jaichandon ko.....

सुमो said...

दयानन्द पांडे का व्हीडियों टीवी पर मैंने सुना था, उसमें कहा था कि काश्मीरी वस्तुओं का बहिष्कार करो. मैं अब काश्मीरी वस्तुयें नहीं खरीदता.

अब जो भी चैनल देशद्रोही प्रचार में शामिल होगा मैं उस चैनल पर विज्ञापित वस्तुयें नहीं खरीदूंगा और उस विज्ञापन कर्ता को भी लिखूंगा कि वो इस चैनल पर विज्ञापन न दे

हिन्दू नाराज भी हैं,और शर्म से पानी पानी भी लेकिन क्या करें?

बुलेट नहीं लेकिन बैलट से तो जरूर मारेंगे ही

lata said...

क्या करें कुछ रास्ता भी सुझाइये.
आपने जो लिखा वो सब हमे सच लगता है,
मतलब हम भी वही सोचते और महसूस कर रहे हैं
आपने हमारी ही भावनाओ को शब्द रूप दे दिया है,
पर सबकुछ जानने के बावजूद समझ नही आता की क्या करें ,
इस हालत से बहुत निराशा हो गई है.

ummed Singh Baid "saadahak " said...

और कुछ ना कर पाओ तो, प्रभु से माँगो बन्धु!
दुशःट रावणी तन्त्र से, बचाओ दीन-बन्धु !
बचाना दीन-बन्धु, हमें अपने ही देश में.
मिला है दोयम दर्जा, कैसा हाल देश में !
कह साधक कविराय,आर्त-वाणी सुन करके.
आयेंगे प्रभु,पुनः रौद्र-रूप धर कर के.

भवेश झा said...

dhnyabad, aap jo feel karte hai vo 100% sach hai. par jara dhyan dijiye kya likhne matra se kuchh hoga, ye india hai yahan kuchh karna padega, sath aaiye. jo bhi sangthan hindu birodhi hai use nasht karna hmara main agenda hona chahiye, chahe hinsha se hi ho to koe baat nai,. or jo bhi sangthan chahe abhinav bharat ho hindu ki raksha ke liye yahan hai unhe majboot kijiye.

aap mujhe mere paersonal mail id par mujhse es subject par or bicharon ka aadan pradan kar sakte hai.

bhaweshjha@yahoo.com

भवेश झा said...

dhnyabad, aap jo feel karte hai vo 100% sach hai. par jara dhyan dijiye kya likhne matra se kuchh hoga, ye india hai yahan kuchh karna padega, sath aaiye. jo bhi sangthan hindu birodhi hai use nasht karna hmara main agenda hona chahiye, chahe hinsha se hi ho to koe baat nai,. or jo bhi sangthan chahe abhinav bharat ho hindu ki raksha ke liye yahan hai unhe majboot kijiye.

aap mujhe mere paersonal mail id par mujhse es subject par or bicharon ka aadan pradan kar sakte hai.

bhaweshjha@yahoo.com

COMMON MAN said...

दरअसल हिन्दू के अन्दर स्वाभिमान नाम की चीज रह ही नहीं गयी है, वह व्यापारी बन गया है, हर चीज में फायदा देखने वाला व्यापारी और व्यापारी बनने के बाद पुंसत्व को दबाना ही श्रेयस्कर होता है. एक चीज और आप के लेख से हिजडे भी बुरा मान जायेंगे. हिन्दुओं के लिये कोई और ही शब्द प्रयोग करना चाहिये. यह देश ही जयचन्दों का है, गद्दारी हमारी रग-रग में समायी है, खून दिखने में लाल है, लेकिन उसकी तासीर सफेद हो गयी है, अगर ऐसा न होता तो जयचन्द भारत में पैदा क्यों होता, यूरोप-अमेरिका में न होता.

sareetha said...

पत्रकारिता से जुडे होने के कारण अक्सर ही कई तरह के लोगों से बातचीत होती रहती है । इस मुद्दे पर अव्वल तो बात ही नहीं करना चाहते । ज़्यादा खोदने पर लोगों की जो राय जान को मिली ,उसने मेरा सिर शर्म से झुका दिया । लोग बेहोश से हो चुके हैं । आधी बात ,आधे सच के आधार पर फ़ैसले लेते हैं । विवेकहीनता के मारे इन लोगों को जगाना नामुमकिन सा लगता है । जो कौम दूसरे की कही -सुनी बातों में तर्क बुद्धि का इस्तेमाल करना ही भूल चुके हो उनसे देश हित तो छोडिये उनके अपने अस्तित्व को भी नहीं सम्हाला जाएगा । इन नीम बेहोशों को देखकर मुझे लगने लगा है कि या तो मेरा खून बेवजह ही उबलने लगता है या वाकई ये लोग चलती फ़िरती लाशें हैं ।

आलोक सिंह "साहिल" said...

aapne to jhakjhor kar rakh diya.
ALOK SINGH "SAHIL"

चन्दन चौहान said...

हिन्दु को शायद अकबर और औरंजेब का शासन काल कैसा था दिखने लगा होगा अभी जौसा माहौल है वैसा ही था। लेकिन जब सर से पाने उपर निकले गा तो फिर समझेगें ये देश के सभी दलाल

चन्दन चौहान said...

http://tarun-vijay.blogspot.com/

तरुण विजय जी के ब्लाग का Url

Satyajeetprakash said...

ईसाई मिशनरियों के पैसे पर पलने वाली मीडिया और अपने ही मां-बाप पर शर्म करने वाले धर्म-निरपेक्षियों को आप क्या कहेंगे.

cmpershad said...

जब हिंदुस्तान कहने से भी हम डरते हैं तो हिंदु कैसे हो गए? हाँ, आप जो अन्य उपनाम दिए हैं उसे सार्थक करने की यहां का बहुल समाज सार्थक करने का प्रयास अवश्य करता रहा है। कहां तक सफल हुए, ये तो हमारे विदेशी मानसिकता वाले गुलाम नेता बताएं।

Akshaya-mann said...

आपके इस article ने कुछ नहीं तो हिन्दू समुदाय को झ्क्झोर के रख दिया ये ऐसे फेलु हैं जिसपर कोई ध्यान नहीं देता क्योंकि शायद वो साम्प्रदायिक मुद्दों को लेकर हिंसा करने वाली भावनाए हम जुटा नहीं पाते बोलना उचित है परन्तु एक आवाज को कोई भी दबा सकता है........
तो कैसे कोई क्या करे कोई ऊँगली तो सब उठाते हैं लेकिन ये ऊँगली मुठ्ठी बन साथ नहीं होती को इनको सबक सिखा सके...........और क्या बोलूं ....लिखते रहिये नमस्ते
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है आने के लिए
आप
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आभार...अक्षय-मन

ab inconvenienti said...

ऊपर सरिता नाम से आए कमेन्ट से असहमत हुआ ही नहीं जा सकता. रियालिटी शोज़, बिग बॉस, रोडीज़, लिव-इन, होमोसेक्स, सेक्स एड्जुकेशन की बहस में डूबी जनता और खासकर नई पीढी से सच जानने की उम्मीद करना बेकार है. यह विसुअल्स का युग है, लोग पढ़ना लिखना जानते हुए भी अनपढ़ हैं, सब जिंदा लाशों की तरह खाने को गन्दगी बनाने से ज़्यादा कुछ नहीं कर रहे. इनसे उम्मीद करेंगे की ये नेताओं का झूठ आसानी से पकड़ लेंगे, कुछ ज़्यादा ही उम्मीद है. पहली बात तो भारत के अस्सी प्रतिशत लोगों को देश/प्रदेश के प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं मालूम. और जो कुछ जानते समझते भी हैं, उनकी समझ हिंग्लिश पेपरों, टीवी न्यूज़ से आगे जा ही नहीं पाती. सच जानने के लिए कुछ भी पढने की तकलीफ उठाने वालों की अनुपात जनसंख्या में कितना होगा? और कितने होश में होंगे, देश और अपने आसपास घाट रही घटनाओं से सजग? पढ़ा लिखा वर्ग ही आज जागरूकता के नाम पर शून्य है. अपने आसपास के कुछ कॉलेज स्टूडेंट्स से आज कल की राजनैतिक घटनाओं के बारे में बिल्कुल सामान्य से प्रश्न कर के देख लीजिये, अपने आप स्थिति सामने आ जायेगी.

Tarun said...

सुरेश, आपने दिल निकाल के रख दिया, एक-एक बात में दम है। मीडिया ने तो इन रिपोर्टरों को गले गले तक ऐसी घुट्टी पिलायी है कि वो ब्लोगिंग भी करेंगे तो वो ही भाषा बोलते हैं। हिन्दूओं को तो जातियों में ऐसा बाँट दिया है कि उनका एक होना उतना ही असंभव है जितना मीडिया का सुधरना।

Suresh Chandra Gupta said...

आपने बहुत सही लिखा है. जो टिप्पणी आई हैं यही आक्रोश दिखाती हैं. सरिता जी की टिप्पणी से मैं पूरी तरह सहमत हूँ.

mahashakti said...

na hindu kamjor hai na asahay balki vah swam ke rajniti pash me fasa hua shikar hai.

Param said...

I am an Hindu too but I still believe in secular India. The point expressed are worth exploring but still I don't like authors use of words. Writers have a great responsibility to the society,they should as you are doing bring issues to the front for introspection and discussion rather than pass judgements and incite violence. You seem to be a learned man but try to be responsible what you write. The reason Hindus have survived for centuries and will survive is because of their remarkable tolerance. Dont try too go in the way of other religions and destroy yourself .

rashtravadi said...

aapka sadhuvad, hum hindu secularta ki aad mai apni napunsakta ko chipaye baithe hai. humara bhagyavadi najariyahi hamari asli dushman hai. aur waise bhi ek bat jagjahir haiki bahusankhyako mai in bato ko lakar ekjutta sayad hi rahti hai.

मा पलायनम ! said...

1) 3 लाख से अधिक हिन्दू कश्मीर से “धर्म” के नाम पर भगा दिये जाते हैं, लेकिन एक भी हिन्दू उठकर यह नहीं कहता कि बस बहुत हो चुका, मैं सारे “शैतानों” को सबक सिखाने का प्रण लेता हूँ।
2) कश्मीर घाटी में 500 से अधिक मंदिर सरेआम तोड़े जाते हैं, कोई कश्मीरी हिन्दू “हिन्दू आतंकवाद” नहीं दिखाता।
3) डोडा और पुलवामा छोटे-छोटे बच्चों तक को चाकुओं से रेता जाता है, लेकिन एक भी हिन्दू संगठन उनके विरोध में आगे नहीं आता। एक संगठन ने “मानव बम” बनाने की पहल की थी, एक भी हिन्दू युवक आगे नहीं आया।...............लाख टके की बात है .लेकिन क्या करें हमारे हिंदू भाई एक तो जातियों और अपनी -अपनी उप जातियों के उठान में फिलहाल सभी ब्यस्त हैं तथा दूसरे पूरे हिंदू समाज ने शान्ति ,भाईचारा ,विस्वबंधुत्व ,सर्वेभवन्तु सुखिनः का जिम्मा जो अनादि काल से अपने ऊपर जो ले रक्खा है .

दहाड़ said...

जब तक हम हिन्दु होकर वोट नहीं डालते तब तक ऐसे ही चलेगा.बिजली पानी सडक तो कोइ भी सरकार दे सकती है अगर सरकारी पैसा सही तरीके उपयोग किया जाये तो.जो रहेंगे तटस्थ भविश्य पूछेगा उनसे हिसाब.कुछ करना ही चाह्ते हो सब्से पहले अपने बच्चो को मिशनरी स्कूलों से निकालो.तुम्हारी जेब का पैसा तुम्हे ही पन्गु बनाने मे उपयोग हो रहा है.

mayank said...

जिन लोगों ने हिन्दुओं को जाग्रत करने का बीड़ा उठाया था उनको तो ATS ने congress के इशारे पर नार्को टेस्ट कर कर के और जबरन मकोका लगा कर कोर्ट-कचहरी के चक्कर में फंसा दिया. अब किसी और को आगे आना पड़ेगा हिन्दुओं को गीता पढ़ाने के लिए.

varun jaiswal said...

सुरेश जी देश की शोचनीय दशा से रु-बरु कराता प्रेरणा देने वाला यह लेख बहुत कुछ सोचने पर भी मजबूर कर देता
है | मैने भी इस दिशा मे एक प्रयास किया है कभी वक़्त मिले तो तो आलोचनात्मक समीक्षा से मार्गदर्शन करें | अभी नया हूँ अतः
पनपने का अवसर दे |

Renu Sharma said...

suresh ji , bahut khoob likha hai
bharteey janta isi tarah jaag sakti hai , kaamyavi jaroor milegi .

Kumar said...

all r fine

panchayatnama said...

एक बात तो पक्की है सुरेश जी, कि आपको गुस्सा बहुत आता है.. वाकई में... आपने तो अपनी इस पोस्ट के जरिये.. पूरा जेहाद ही कर डाला है.

आपने जो पोस्ट तरुण विजय जी कि पढ़ाई है - वो जनाब अगर मुझे सही से याद है तो - एक जमाने में पाञ्चजन्य (आर.एस.एस. का मुखपत्र ) के संपादक हुआ करते थे. अब भाई .. उनकी बातें कुछ भी ग़लत नहीं है, बस यही है, कि वो सिर्फ़ एक ही नजरिये से देखेंगे.

मेरा मतलब ये है, कि देखिये गलती निकालने बैठिएगा.तो कोई हल नहीं निकलेगा.. बस ठंडे दिमाग से आप एक प्रोफेशनल पत्रकार के माफिक.. सभी का पक्ष ले के सोचिये.. और मैं तो कहूँगा कि आप जनाब.. बड़ी बड़ी चीज़ों को भी ध्यान में रख के सोचें.. मेरा मतलब है.. कि अगर जैसे एक विस्फोट, दंगा.. हिंसा होती है, तो ये कौन हैं इसके पीछे.. नहीं मालूम.. भाई वो हिंदू या मुस्लिम नहीं है.. वो असामाजिक तत्व हैं.. जो कि राजनेताओं के इशारे पे नाचते हैं..

अरे भाई.. ये सब सिनेमा में दिखाता तो है.. है कि नहीं.. फिर भी आप इतना इमोशनल हो गए हैं..