Wednesday, November 26, 2008

मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा कुछ गीत… (भाग-1)

Film Mother India, Mehboob, Nargis and Sunil Dutt

हिन्दी फ़िल्मों ने हमें हजारों मधुर गीत दिये हैं जिन्हें सुन-सुनकर हम बड़े हुए, इन्होंने हमारी भावनाओं पर राज किया है। हर मौके, माहौल और त्यौहार के लिये हमारी फ़िल्मों में गीत उपलब्ध हैं। इधर पिछले कुछ वर्षों में देखने में आया है कि हमारी फ़िल्मों से “गाँव” नाम की अवधारणा गायब होती जा रही है। गाँव की “थीम” या “स्टोरी” पर आधारित फ़िल्में मल्टीप्लेक्स के कारण कम होते-होते लगभग लुप्त ही हो गई है। फ़िल्म निर्माता और निर्देशक भी फ़िल्म की लागत तत्काल वसूलने और भरपूर मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में फ़िल्मों में गाँवों को पूरी तरह से नकारते जा रहे हैं। फ़िल्मों में गाँवों को दर्शाया भी जाता है तो बेहद “डिजाइनर” तरीके से और कई बार भौण्डे तरीके से भी। इस बात पर लम्बी बहस की जा सकती है कि फ़िल्मों का असर समाज पर पड़ता है या समाज का असर फ़िल्मों पर, क्योंकि एक तरफ़ जहाँ वास्तविकता में भी अब आज के गाँव वे पुराने जमाने के गाँव नहीं रहे, जहाँ लोग निश्छल भाव रखते थे, भोले-भाले और सीधे-सादे होते थे। “पंचायती राज की एक प्रमुख देन” के रूप में अब आधुनिक जमाने के गाँव और गाँव के लोग विद्वेष, झगड़े, राजनीति और जातिवाद से पूरी तरह से ग्रसित हो चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ़ कुछ “आधुनिक” कहे जाने वाले फ़िल्मकारों की मानसिकता के कारण ऐसी फ़िल्में बन रही हैं जिनमें भारत या भारत का समाज कहीं दिखाई नहीं देता। कोई बता सकता है कि “धूल का फ़ूल” के समय अथवा “दाग” फ़िल्म के समय तक भी “बिनब्याही माँ” की अवधारणा समाज में कितनी आ पाई थी? लेकिन उस वक्त उसे फ़िल्मों में दिखाकर समाज में एक “ट्रेण्ड” बनाया गया, ठीक वही मानसिकता आज “दोस्ताना” नाम की फ़िल्म में भी दिखाई देती है, कोई बता सकता है कि भारत जैसे समाज में “समलैंगिकता” अभी किस स्तर पर है? लेकिन “आधुनिकता”(?) के नाम पर यह अत्याचार भी सरेआम किया जा रहा है। जबकि असल में समलैंगिकता या तो एक “मानसिक बीमारी” है या फ़िर “नपुंसकता का ही एक रूप”। बहरहाल विषयान्तर न हो इसलिये “सिनेमा का असर समाज पर या समाज का असर फ़िल्मों पर” वाली बहस फ़िर कभी…
लेख का बाकी हिस्सा पढ़ने और इस गीत को सुनने/देखने के लिये इस लिंक पर क्लिक करें…

5 comments:

COMMON MAN said...

sir, link nahi khul raha hai.

दीपक भारतदीप said...

थोडा अध्ययना करें तो पायेंगे फ़िल्मों पर समाज का कोई प्रभाव नहिं है बलिक फ़िल्मों का ही बुरा प्रभाव समाज पर पडता है। आप कभी फ़िल्मों के विषयों को देखें तो पायेंगे इस देश की मानसिक्ता को विक्रुत करने का वैसा ही प्रयास हो रहा है जैसा कि लार्ड मैकाले की शिक्शा पद्धति से हुआ है।
दीपक भारतदीप

बी एस पाबला said...

गीतों के बाद आईये हम सब मिलकर विलाप करें

lata said...

mere shabd kho gae hain.
B.S.PABLA ji ke shabd hi aaj ki paristhiti me sahi hain.

smart said...

aap ne sahi kaha sir INDIA T.V.wale to pakke maa....hai.