Friday, November 14, 2008

“चुनाव आयोग” का डण्डा - इसे कहते हैं कानून का राज

Election Commission of India, General Elections and Instructions

चार प्रमुख राज्यों में चुनाव की घोषणा के साथ ही लगभग एक-डेढ़ माह के लिये चुनाव आयोग की “सत्ता” शुरु हुए कुछ दिन बीत चुके हैं। उल्लेखनीय है कि चुनाव के समय चुनाव आयोग ही उच्चतम प्रशासनिक संस्था होता है एवं चुनाव आयोग का आदेश अन्तिम व सर्वमान्य होता है। इस “कानून की शक्ति” और इस शक्ति केन्द्र का सबसे पहला और प्रभावशाली उपयोग किया था कालजयी नौकरशाह टी एन शेषन ने। कालजयी इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि उनके मुख्य चुनाव आयुक्त का पद सम्भालने से पहले “केन्द्रीय चुनाव आयोग” सत्ताधारी दलों के आँगन में बँधी हुई बकरी के अलावा और कुछ भी नहीं था, जो सिर्फ़ मिमिया सकती थी या फ़िर खामखा हवा में सींग चला सकती थी, जिसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला था। लेकिन जब टी एन शेषन ने यह शक्तिशाली कुर्सी संभाली तभी से स्थितियाँ बदलना शुरु हो गईं। एक नौकरशाह अपनी शक्ति का उपयोग करके कैसे धूर्त, बेईमान और जोड़तोड़ में माहिर नेताओं और राजनैतिक पार्टियों की नकेल कस सकता है शेषन इसका अनुपम उदाहरण बन गये हैं। जाते-जाते उन्होंने आने वाले चुनाव आयुक्तों के लिये एक नज़ीर पेश कर दी, एक परम्परा सी स्थापित कर दी। अब जो भी मुख्य चुनाव आयुक्त बनता है, राजनैतिक दल उससे सहमकर ही रहते हैं, ऐसा जलवा कायम किया जा चुका है।

इस बार के विधानसभा चुनावों के लिये चुनाव आयोग ने बहुत ही कठोर दिशानिर्देश जारी किये हैं। हालांकि दिशानिर्देश तो हमेशा जारी किये जाते हैं, लेकिन “शेषन युग” के बाद अब आयोग इन पर ईमानदारी से अमल भी करवाने लगा है। वैसे तो पहले ही शासकीय कर्मचारियों पर चुनाव आयोग का डण्डा तना हुआ है, लेकिन हाल ही में मध्यप्रदेश के पर्यटन मंत्री तुकोजीराव पवार और एक पूर्व सांसद उम्मीदवार फ़ूलचन्द वर्मा को एक रिटर्निंग ऑफ़िसर से बदतमीजी करने के आरोप में प्रकरण दर्ज कर जेल भेजा गया है तबसे सभी कर्मचारी और उम्मीदवार आतंकित हो गये हैं। मैंने पहले भी कहा था कि इतने उच्च स्तर के काम को देखते हुए क्यों न चुनाव आयोग को ही दिल्ली की सरकार चलाने का जिम्मा सौंप दिया जाये। भले ही यह बात मजाक में कही हो, लेकिन जिला कलेक्टरों, पुलिस अधिकारियों और अन्य शासकीय कर्मचारियों के काम करने के तौर तरीके देखकर महसूस होता है कि “इसे कहते हैं कानून का राज”। साधारण कर्मचारी हो या उच्च अधिकारी, रात के 12-12 बजे तक लगातार काम में जुटे हैं, कोई मतदाता सूची टटोल रहा है, कोई ईवीएम मशीनों का रिकॉर्ड दुरुस्त कर रहा है, कोई मतदान केन्द्रों के बारे में पूरी जानकारी तैयार कर रहा है। चुनाव आयोग ने सभी को एक समय-सीमा तय कर दी है, और उसी के भीतर उसे अपना काम करना है। सभी के सिर पर नोटिस, कारण बताओ पत्र, निलम्बन, बर्खास्तगी की तलवार लटक रही है… उम्मीदवार भी फ़ूंक-फ़ूंक कर कदम रख रहे हैं, सभी ने एक-दो वकीलों (आचार संहिता का अक्षरशः पालन करने) और चार्टर्ड अकाउंटेंट को (दैनिक हिसाब-किताब “ईमानदारी” से दर्शाने के लिये) नियुक्त कर रखा है, मकान मालिकों से विनम्रता से पूछ-पूछकर दीवारों पर लिख रहे हैं, ध्यान रखा जा रहा है कि प्रचार गाड़ी पर कितने स्पीकर लगेंगे, बिजली के खम्भों पर झंडे टांगने में सतर्कता बरत रहे हैं, इस दौरान किससे मिलना है किससे नहीं मिलना है इसका ध्यान रखा जा रहा है… रिरिया रहे हैं, मिमिया रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं… क्या खूब माहौल है, क्या देश में यह माहौल 24 घंटे, सातों दिन, बारहों महीने नहीं रह सकता? क्या यह जरूरी है कि “डण्डे” के डर से ही शासकीय कर्मचारी काम करें? बीते 60 सालों में कार्य-संस्कृति पैदा करने की आवश्यकता क्यों नहीं महसूस की गई? सत्ता में सर्वाधिक समय रहने के कारण “मुफ़्तखोरी” की इस आदत को बढ़ावा देने के लिये सबसे ज्यादा जिम्मेदारी कांग्रेस की होना चाहिये या नहीं? हर आठ-दस साल में नया वेतन आयोग चाहिये होता है, साल के 365 दिनों में से 100 से अधिक छुट्टियाँ, जमाने भर के भत्ते, भ्रष्टाचार के अलावा यूनियनबाजी, राजनीति और चापलूसी की संस्कृति का विकास किया गया है। हालांकि मक्कार कर्मचारी बचने के रास्ते ढूँढ ही लेते हैं, चुनाव ड्यूटी से बचने के लिये फ़र्जी स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र, नकली शादी-ब्याह की पत्रिकायें तक पेश की जाती हैं, इतने बड़े “सिस्टम” में कुछ न कुछ गलत काम और गलत लोग आ ही जाते है, लेकिन फ़िर भी चुनाव आयोग के एक आदेश मात्र से बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है, इसलिये शेषन कालजयी हैं, और अब जब यह “परम्परा” ही बन चुकी है तो कोई भी चुनाव आयुक्त बने वह इस प्रथा को आगे ही बढ़ायेगा, जनता और प्रेस का दबाव उसे सत्ताधारी दल की खुलेआम चमचागिरी करने से बचाकर रखेगा।



भारत के चुनाव आयोग ने एक और महान और उल्लेखनीय काम किया है पर्यावरण संरक्षण का। इस मुद्दे पर अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को पर्यावरण से सम्बन्धित पुरस्कार किसी व्यक्ति विशेष को देने की बजाय भारत के चुनाव आयोग को देना चाहिये। सबसे पहले सन् 2004 के आम चुनावों में आयोग ने “पेपरलेस” चुनाव का प्रयोग किया जो कि सफ़ल भी रहा। लगभग प्रत्येक राज्य मे हरेक मतदान केन्द्र पर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (EVM) से मतदान करवाकर चुनाव आयोग ने देश का सैकड़ों टन कागज बचाया, जाहिर है कि कागज बचाया मतलब लाखों पेड़ कटने से बचे। इन आगामी विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग ने एक नई और अनुकरणीय पहल की है, वह है “प्लास्टिक पर बैन”। कोई भी प्रत्याशी या पार्टी प्लास्टिक के बिल्ले, बैनर, झंडियाँ, पोस्टर, स्टीकर आदि नहीं बनवा सकेगा। आयोग ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए सभी कलेक्टरों को आदेश दिया है और सार्वजनिक सूचना दी है कि जो भी प्रकाशक या स्क्रीन प्रिंटिंग वाले प्लास्टिक की सामग्री छापेंगे उन्हें तुरन्त काली सूची में डाल दिया जायेगा और उन पर कार्रवाई की जायेगी (यानी सीधे जड़ पर प्रहार)। चुनाव आयोग का यह कदम पर्यावरणीय दृष्टिकोण से क्रांतिकारी कहा जा सकता है। सभी जानते हैं कि प्लास्टिक पर्यावरण को भयानक नुकसान पहुँचाता है और चुनाव निपटने के बाद यदि भारी मात्रा में चुनाव प्रचार सामग्री सड़कों पर बिखरी रहती, नालियों में चोक होती, जलाई जाने पर जहरीला धुआँ छोड़ती। प्रत्याशियों से यह उम्मीद करना कि चुनाव के बाद वे खुद अपनी प्रचार सामग्री हटायेंगे, बेकार ही है। ऐसे में चुनाव आयोग ने यह कदम उठाकर बेहतरीन काम किया है।

मूल समस्या है भारतीयों के चरित्र की, हम इतने अनुशासनहीन और अकर्मण्य हैं कि जब तक कोई मजबूत डण्डा हमारे सिर पर न तना हो हम काम नहीं करना चाहते, हम अनुशासन में नहीं रहना चाहते (चाहे लाल बत्ती पार करने का मामला हो, या गलत पार्किंग का), हम नैतिकता का पालन नहीं करना चाहते (बड़े बंगलों में अतिक्रमण हो या बिजली की चोरी हो)… “निजीकरण” हर समस्या का हल नहीं है, जब तक सरकारी मशीनरी वास्तविक तौर पर काम करने की मुद्रा में न आये, भारत को तेजी से आगे बढ़ना मुश्किल होगा, इसीलिये जब चुनाव आयोग की एक फ़टकार पर बड़े-बड़े अधिकारी अटेंशन की मुद्रा में आ जाते हैं तब बार-बार यही सवाल मन में उठता है कि आखिर दुनिया भर को “कर्म” की शिक्षा देने वाले “गीता” के इस देश में डण्डे की जरूरत ही क्यों पड़ना चाहिये?

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14 comments:

संजय बेंगाणी said...

बिना डण्डा खाए हम काम कर ही नहीं सकते. खास कर जब नौकरी पक्की हो.

PN Subramanian said...

हम सब लत खोर बन गये हैं. सुंदर विश्लेषण. आभार.
http://mallar.wordpress.com

Suresh Chandra Gupta said...

आप लोगों ने सच ही कहा है, पर दिल्ली में तो चुनाव आयोग 'पप्पू' बन गया. ऐसे घटिया फोटो आई डी कार्ड बनाए हैं कि अगर घटिया कार्ड बनाने का कोई मुकाबला होता तो स्वर्ण पदक पाता यह चुनावी पप्पू.

lata said...

मै एक कोरियन कंपनी मे काम करती हूँ, मेरा एक एक्स-डाइरेक्टर जो की कोरियन था,वो अक्सर
पूछता था की इंडियन पोलीस के हाथ मे डंडा क्यो रहता है?
क्या इंडियन पब्लिक भेड़-बकरियाँ हैं?
फिर उसका जवाब खुद ही देता था की , करीब ३०० सालों की अँग्रेज़ों की गुलामी ने
इंडियन्स के दिमाग़ को कुन्द कर दिया है, वो अब स्वसफूर्त नही रह गए हैं, उन्हे
दूसरों की ऑर्डर मानने की आदत पड़ गई है और जबतक सिर पर तलवार ना लटके
वो कुछ करना ही नही चाहते.
है तो शर्म की बात पर मेरा भी मन बेशक शर्मिंदगी से पर उस बात को स्वीकार करता था.
सच बोलूं तो अपने आस- पास आप इतने सारे ऐसे लोग देखते होंगे जो लगता है जैसे बेहोश हों,
वो क्या कर रहे हैं, किस तरह से कर रहे हैं , क्या उसका फ़ायदा -नुकसान हो रहा है , कुछ होश नही.
मेरे ऑफीस मे ही कुछ लोग मैने ऐसे देखे हैं जो बस टाइम पास के लिए आते हैं, काम करना ,
अपने होने की सार्थकता जताना उनकी कोई ज़िम्मेदारी नही, बस कुछ नही हो रहा तो बॉस के पास,
किसी ने कोई सपोर्ट नही किया तो बॉस के पास, कहने को बड़े हो गए हैं पर बच्चों से बेहद,
खुद अपनी तारीफ करना, इधर की उधर करना और बातें तो बेशक दिनभर करा ली जाएँ,कोई पीछे नही
रहना चाहता. शायद मै भी वही कर रही हूँ :)

sareetha said...

पोस्ट के कमोबेश सभी पहलुओं पर तो बात हो गई मैं भी लता जी से सहमत हूं । अब बात चुनाव आयोग के डंडे से खौफ़ज़दा होने की ,तो क्यों ना प्रजातंत्र के ढकोसले को खत्म करने की कवायद कर कोई ऎसा सिस्टम लाया जाए ,जहां मंत्री -संतरी का कोई कालम ही ना हो । सरकारी मशीनरी उस अथारिटी के प्रति जवाबदेह हो । इससे भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगी और चुनाव तथा नेताओं पर खर्च होने वाला अरबों रुपया भी बचेगा ।

ab inconvenienti said...

प्रजातंत्र भारत पर थोथे आदर्शवाद के तहत थोप दिया गया है, वरना हम भारतीय इसके लिए अभी भी तैयार नहीं हैं, हमारी सोच और तौर तरीके अभी भी सामंतवादी हैं. पश्चिमी व्यवस्था में हम यूरोपियन जितने आगे भले न बढ़ पायें हों, पर विकृत अवश्य हो गए. न माया मिली न राम. कोढ़ पे खाज यानि वोटतंत्र के साथ गुलाम भेड़बकरी वाली मानसिकता.

sanjay patel said...

सुरेश भाई;
चुनाव आयोग नाम की संस्था के परिदृष्य पर आने से आम आदमी के मन में आस्था जगी है कि कम से एक संस्था तो है जिसके सामने नेताओं की नहीं चलती. मेरा शहर पहली बार विधानसभा चुनावों में फ़्लैक्स बैनरों से मुक्त नज़र आ रहा है.इन्दौर का ह्र्दयस्थल चुनावी सभाओं से मुक्त है. मेरे मित्र मण्डल में विगत दिनों चर्चा था काश !राजनीतिज्ञों पर आचार संहिता पूरे पाँच साल क्यों नही लादी जाती. साधुवाद इस विषय पर इतनी विस्तृत सामग्री जारी करने के लिये.

ई-गुरु राजीव said...

टी.एन. ताऊ का लट्ठ याद आ रहा है. स्वामी भी बुरे नहीं.

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

लेख तो सार्थक और तथ्यपरक है ही हमेसा की तरह ..टिप्पणिया भी अच्छी है..आपके लेख को पढ़कर बिहार के के. जे. राव जी की याद हो आई ..अगर नौकरशाही सुधर जाए ..तो वैसे भी भ्रष्टाचार पर लगाम लगनी तय है.और यह लतखोरिता इस लिए भी आई है क्योंकि ..हमारी यह सोंच है कोऊ नृप होय हमें का हानी

Bhushan Sharma said...

Sureshji,
Aapka comment apne blog par dekhkar bahut sukhad anubhav hua. Aap jaise guni lekhak ka comment apne blog par dekhna ek aashirwad ki tarah laga, lakh lakh dhanyawad. mujhe laga jaise maine kuchh saarthak baat kahi ho. Vichaar bahot hain mann mein kintu utne dhaardar nahi jaise aap likhte hain. Aapka aashirwad raha to zaroor meri kalam ki dhhar bhi paini hogi ye mera vishwas hai. Viase mera sambandh bhi Ujjain se raha hai, aur shiksha maine Ujjain se hi grahan ki hai. Bahot dhanyawaad.

भुवनेश शर्मा said...

वाकई इस बार लगता है चुनाव आयोग पहले से भी ज्‍यादा सख्‍त है...अभी घंटाभर पहले ही मेरे ठीक बगल में रहने वाले पड़ौसी जो बसपा से उम्‍मीदवार हैं और जिन्‍होंने सड़क पर ही टेंट लगाकर कार्यालय बना रखा था, उसे हटवाया गया है...साथ ही जितना शोरगुल पहले दिखाई देता था अब नहीं है...पर समस्‍या यही है कि आखिरकार चुनकर तो चोर-लुटेरे ही आने हैं

आपकी बात से सौ फीसदी सहमत हूं कि कांग्रेस ही और केवल कांग्रेस ही इसके‍ लिए जिम्‍मेदार है

आईये सब मिलकर संकल्‍प लें कि कांग्रेस नाम के कलंक को इस देश से मिटाने में चुनाव में उसके खिलाफ मतदान करें

prakharhindutva said...

Sir, just wanted to remind u of my blog

www.prakharhindu.blogspot.com
new articles added

अब मुझे यह सिद्ध करने की लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं कि इसलाम और मार्क्सवाद इस देश के दो सबसे बड़े ख़तरे हैं। ये दोनों ही समुदाय अपनी कलुषित मानसिकता और विषाक्त विचारों से समाज को दूषित करने का घोर प्रयत्न निरन्तर करते रहते हैं। यह लोग हमेशा सच्चे राष्ट्रप्रेमियों को उनके मार्ग से डिगाने का भी प्रयास करते रहते हैं। इन लोगों में तार्किक शक्ति का सर्वथा अभाव रहता है। विचारों का कोई आधार नहीं होता। हो भी कैसे? देश की नींव खोदना जिनका लक्ष्य हो उनके विचार का आधार ढूँढना मूर्खता ही कहा जाएगा। और इनका साथ देने वाले सेक्युलरवादी तो इतने घाघ हैं

Shastri said...

"मूल समस्या है भारतीयों के चरित्र की, हम इतने अनुशासनहीन और अकर्मण्य हैं कि जब तक कोई मजबूत डण्डा हमारे सिर पर न तना हो हम काम नहीं करना चाहते,"

बहुत सही लिखा है!

प्रिय सुरेश, मैं कहने ही वाला था कि अपने चिट्ठे का 'आवरण' बदल दो, कि अचान यह नया आवरण दिख गया. बहुत अच्छा चुनाव किया.

ऊपर की तरफ जो तीन "Edit Me" हैं उनको भी जल्दी ही बदल दो! एक में चाहो तो अपने इष्ट चिट्ठों की सूची डाल देना

सस्नेह -- शास्त्री

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

स्वाधीनता का अर्थ ही है सेल्फ ड़िसिप्लिन किन्तु राजनीति हमारे जीवन में जीन्स तक में उतार दी गई है,यही सारे फसाद की जड है।वैसे नये कलेवर में आप बहुत जँच रहे हैं बधाई लेकिन उम्मीद है वैचारिक कलेवर यथावत रहेगा।