Monday, November 10, 2008

चुनाव का मौसम सबसे बेहतरीन लगता है…

Election Campaign in India and Instructions of Election Commission
चार राज्यों में चुनाव का बिगुल बज चुका है और मौसम में चुनावी रंगत घुलने लगी है। जिस प्रकार होली के दिन नज़दीक आते ही एक विशेष प्रकार का मौसम अंगड़ाई लेने लगता है उसी प्रकार अब अगले कुछ दिनों तक हवा में चुनाव का रंग चढ़ा रहेगा। और बस इससे फ़ारिग होते ही अप्रैल के लोकसभा के चुनाव की तैयारियों का असर दिखने लगेगा, यानी कि अगले 6 महीने तक चुनाव का यह मौसम बना रहेगा।

चुनाव का यह मौसम मुझे बहुत भाता है, चारों ओर गहमागहमी है, भागदौड़ है, सरकारी कर्मचारी जो आम आदमी की बात पर कान तक नहीं देते और नम्बर एक के मक्कार और भ्रष्ट होते हैं वे भी चुनाव आयोग के डण्डे के कारण अटेंशन की मुद्रा में हैं, अभी तो वे अपनी बीबी की बात भी नहीं सुनेंगे, और शादी-ब्याह भी कैंसल कर देंगे। देखकर बड़ा अच्छा महसूस होता है कि चलो पाँच साल में ही सही कभी तो शासकीय कर्मचारी काम करता हुआ दिखता है, चुनाव आयोग के बहाने ही सही कभी-कभार लगता है कि “सरकार” नाम की कोई चीज है जो सरकारी कर्मचारियों पर रौब डालती है। जिस तरह से चुनाव आयोग के नाम से लोग यहाँ-वहाँ थर-थर काँप रहे हैं, लगता है कि देश का शासन चुनाव आयोग को ही सौंप देना चाहिये।

मुझे पता नहीं कि कितने लोगों ने मुर्गों, पाड़ों (भैंसा) और सूअरों की लड़ाई देखी है, मैंने तो बचपन में काफ़ी देखी है और बहुत मजा आता था। चुनाव की बेला आते ही बचपन की इन यादों में खो जाता हूँ। चारों तरफ़ उसी तरह का आलम है, थोड़े से “सोफ़िस्टिकेटेड” दो नेता जब चुनाव मैदान में उतरते हैं तो वह मुर्गे की लड़ाई जैसा लगता है (जैसे मुर्गे के पैर में बंधे हुए छोटे-छोटे चाकू से वार होता है ना, वैसा ही इनके चुनावी दंगल में होता है), उससे थोड़े गिरे हुए गुण्डे-बदमाश टाइप के लोगों के चुनाव “पाड़ों की लड़ाई” जैसे लगते हैं (हुंकार भरते हुए, एक-दूसरे को निपटाने के मूड में, सींग से सींग भिड़ाते हुए, खून बहाते हुए, एक दूसरे के समर्थकों पर भी चढ़ बैठने की अदा में), तीसरी कैटेगरी बहुत नीचे स्तर की है (और ऐसे ही लोगों की संख्या ज्यादा है) यानी सूअरों की लड़ाई (इसमें लड़ने वाले खुद भी कीचड़ में लोटते-नोचते-खसोटते हैं और देखने वालों पर भी कीचड़ उछालते हैं)। कहने का मतलब यह कि चुनाव नाम का यह दंगल देखने में बहुत मजा आता है।



सभी पार्टियों के उम्मीदवारों की सूची जारी हो चुकी है, सभी ने नामांकन भर दिया है, बागी भी अपना-अपना झंडा-डंडा थामे मैदान में कूद पड़े हैं। अब अगले कुछ दिन पार्टी उम्मीदवार और विद्रोही उम्मीदवार के बीच “सौदेबाजी” में गुजरेंगे। जो भी विपक्ष में “अपना ही भाई जैसा” आदमी खड़ा हुआ है उसे बिठाने की कोशिशें तेज की जायेंगी। एक भाई ने उस पर चल रहे 4 हत्याओं के मामले वापस लेने की शर्त रखी है, दूसरे ने चालीस लाख माँगे हैं “बैठने” के लिये, क्योंकि पिछले पाँच साल में वह पहले ही 5-10 लाख खर्च कर चुका है “खड़े” होने के लिये। एक जगह एक सज्जन बैठने की एवज में अपनी (सिर्फ़) 15 बसों का “राष्ट्रीय परमिट” चाहते हैं, दूसरी जगह एक और सज्जन सरकार बन जाने की स्थिति में “मलाईदार” निगम या मण्डल में अध्यक्ष पद चाहते हैं और यदि सरकार नहीं बनी तो केन्द्र के किसी आयोग या प्रतिनिधिमण्डल में जगह चाहते हैं। एक और “सज्जन” (सभी सज्जन ही होते हैं यारों…) बैठने के बदले में दो मेडिकल कॉलेज और चार बी-एड कॉलेज खोलने की अनुमति चाहते हैं…सोचिये एक विधायक बनने की क्या कीमत होगी, कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी और कितनी कीमत वह अगले पाँच साल में बनायेगा, सोचते-सोचते दिमाग का दही बन जायेगा। जब-तब “भारत के महान लोकतन्त्र” की दुहाई देने वाले एलीट क्लास के लोग वोट देने जाना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं और यही सबसे ज्यादा आलोचना भी करते हैं।

बहरहाल, अपने जैसे आम आदमी को चुनाव नाम के इस मेले-ठेले में बहुत मजा आता है, सूअरों-मुर्गों की लड़ाई फ़्री में देखने मिल जाती है, गरीबों को कम्बल-दारू मिल जाती है, काला पैसा और भ्रष्टाचार की कमाई जो नेताओं की तिजोरी में बन्द रहती है, वह टेम्पो चलाने वाले, माइक थामने वाले, मंच बनाने वाले, बैनर लिखने वाले, सौ-सौ रुपये लेकर पुतले जलाने वाले और नारे लगाने वाले जैसे हजारों लोगों की जेबों में, कुछ दिनों के लिये ही सही पहुँचती तो है, वापस इस लक्ष्मी को उन्हीं की तिजोरियों में दोगुना-तिगुना होकर पहुँचना है। पन्द्रह-बीस दिनों के लिये हजारों बेरोजगारों को काम मिल जाता है, कई हाथों को बिना कमाये रात को एक “क्वार्टर” दारू मिल जाती है, सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं, कितना-कितना फ़ायदा है चुनावों से… मुझे तो लगता है कि हर साल चुनाव होते रहें तो कम से कम सरकारी कर्मचारी काम करते हुए तो दिखाई देंगे, नेता जितना कमायेगा लगातार उतना ही खर्च भी करता रहेगा, हजारों-लाखों को रोजगार मिलता रहेगा और हमारा भी मनोरंजन होता रहेगा। अभी भारत में ब्रिटेन जैसी व्यक्तिगत और छिछोरी बातों को छापने वाले “टेब्लॉयड” अखबारों की संस्कृति नहीं आई है वरना जैसे नारायणदत्त तिवारी को बुढ़ापे में सरेआम नंगा कर दिया गया है, वैसे हजारों केसेस हमें देखने-पढ़ने-सुनने को मिल जाते, तो चुनाव का मजा और भी दोगुना हो जाता… खैर हमें क्या… कहते हैं “कोऊ नृप होई हमे का हानि…”, लेकिन यहाँ मामला उल्टा है कोई भी नृप (विधायक/सांसद) बने हमें (आम नागरिक) तो हानि ही हानि है, जैसे अमेरिका में “गधा” (डेमोक्रेट) जीते या “हाथी” (रिपब्लिकन) वह तो सारी दुनिया को लतियायेगा ही, उसी प्रकार यहाँ भी हमें चुनाव सिर्फ़ यह तय करना है कि हम किससे अपनी इज्जत लुटवाना चाहते हैं, “इस” पार्टी से या “उस” पार्टी से… बस बीच का यह आचार संहिता का एक महीने का समय बड़ा ही मजेदार-रंगबाज होता है तो इस “चुनाव मौसम” के मजे क्यों न लूटें… चुनाव के बाद तो सारे नेता मिलकर हमारी सबकी………… दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतन्त्र की यह एक विडम्बना है, लेकिन फ़िलहाल इससे बचने और निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।

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7 comments:

संजय बेंगाणी said...

और निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा...तो तमाशा देखो न भाई. हमें भी यह मौसम बहुत रास आता है.

COMMON MAN said...

सर, यही तो दिन हैं जब काले नाग भी केंचुओं की तरह दिखाई देने लगते हैं.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

मेला देखने का शौक तो हम भी रखते हैं बन्धु; लेकिन ये सरकारी नौकरी आड़े आ जाती है :)

भुवनेश शर्मा said...

मैं भी सोच रहा हूं कि इसी बहाने भारतीय लोकतंत्र की दशा पर कुछ पेल दूं और फोकट में बुद्धिजीवी का तमगा ले लूं....कैसी रहेगी ? :)

संजीव तिवारी said...

लगे हैं भाई हम भी इस महाकुंभ के लहरों को गिनते हुए ।

lata said...

afsos ki koi rah nahi milti.

Suresh Chiplunkar said...

@ भुवनेश जी- खबरदार बुद्धिजीवी का तमगा हासिल करने की जुगाड़ न कीजिये, ये "बुद्धिजीवी" शब्द बड़ा ही खतरनाक है…