Tuesday, November 11, 2008

ब्लॉग में “टिप्पणी मॉडरेशन” तानाशाही का प्रतीक है…

Comment Moderation and Word Verification in Blogs

कई दिनों से सोच रहा था कि इस मुद्दे पर कुछ लिखा जाये, हालांकि इस मुद्दे पर पहले भी कई जगह काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन हाल ही में कुछ ब्लॉगरों के रवैये के कारण इस पर लिखने की प्रेरणा मिली। जैसा कि सभी जानते हैं कि ब्लॉग एक व्यक्तिगत डायरी के समान होता है, एक ऐसी डायरी जो है तो आपकी अपनी, लेकिन आप उसे जमाने को दिखाना भी चाहते हैं (यदि ऐसा नहीं होता तो न ही ब्लॉग एग्रीगेटर होते, न ही गूगल ब्लॉग सर्च)। जब आप अपना लिखा हुआ कोई विचार, कोई लेख, कोई निबन्ध, गीत, चुटकुला, कविता ब्लॉग पर लिखते हैं तो स्वाभाविक है कि आप चाहते हैं कि लोग उसे पढ़ें। जाहिर सी बात है कि यहाँ आकर मामला दोतरफ़ा हो जाता है यानी दो पक्षों के बीच एक संवाद स्थापित करने का यह प्रयास होता है। ऐसे में कोई जरूरी नहीं है कि दूसरा पक्ष यानी कि पाठक आपकी रचना या लेख से सहमत ही हो, क्योंकि असहमति या विरोध का नाम ही तो लोकतन्त्र है।

हाल के दिनों में देखने में आया है कि काफ़ी सारे ब्लॉगरों ने अपने-अपने ब्लॉग पर “कमेण्ट मॉडरेशन” (टिप्पणी मॉडरेशन) लागू किया हुआ है। इसका कारण तो वे ही जानें, लेकिन यह नितांत “तानाशाही” भरा रवैया लगता है। लेखक पहले अपनी बात रख देता है, फ़िर चाहता है कि पाठक उस पर टिप्पणी भी करें, जब पाठक टिप्पणी करके फ़ारिग होता है तो तड़ से लिखा आ जाता है “Your comment has been saved, it will be appear after blog owners approval” या ऐसा ही कुछ। मतलब हुआ कि आपने विरोधी या असहमति दर्शाने वाली टिप्पणी की है तो आपकी टिप्पणी नहीं दर्शाई जायेगी, जो करना है कर लो, मेरी मरजी चलेगी, कोई संवाद नहीं, कोई असहमति नहीं, कोई बहस नहीं, कोई विवाद नहीं, बस मैंने जो बोल दिया वही सच है और वही अन्तिम है। यानी आपकी टिप्पणी आई या नहीं यह देखने के लिये एक बार और उस ब्लॉग पर पधारो, और फ़िर पता चले कि विरोधी टिप्पणी होने के कारण वह नहीं ली गई है तो आपका समय तो बर्बाद हुआ ही, अपमान अलग से हो गया। ऐसा कई बार हुआ है कि बेहद सभ्य भाषा में भी लिखी गई विरोधी टिप्पणी “मॉडरेशन” द्वारा स्वीकार ही नहीं की गई। एक तो वैसे ही हिन्दी ब्लॉग जगत अभी कुँए से बाहर निकला नहीं है, पाठक संख्या कोई खास तेजी से तो नहीं बढ़ रही है, ऐसे में कोई आपके ब्लॉग पर पढ़ने आया है, कुछ बहस करना चाहता है तो पता चलता है कि आप मेंढक की तरह अपने कान बन्द किये हुए बैठे हैं, अगली बार से पाठक कहेगा “भाड़ में जा… मैं क्यों तेरा ब्लॉग पढ़ूँ?”

जब टिप्पणी को हटाने का अधिकार ब्लॉग स्वामी के पास है तो मॉडरेशन की कोई तुक नज़र नहीं आती, यदि कोई गालीगलौज भरी या असभ्य भाषा में टिप्पणी करता है तो ब्लॉग लेखक उसे हटा सकता है, न सिर्फ़ हटा सकता है, बल्कि अपने अगले ब्लॉग में उस अभद्र टिप्पणी करने वाले पाठक का नाम उसके उदगारों के साथ प्रदर्शित कर सकता है कि “देखो भाईयों, ये “सज्जन” इस प्रकार की हरकत करते है, इनके संस्कार ऐसे हैं, मैं इन्हें एक्सपोज करता हूँ…” उस भाई को सजा मिल जायेगी, गालीगलौज करने वाला अपने “संस्कार” दिखा रहा है, आप अपने संस्कार दिखाईये ना!!! लेकिन किसी खास राजनैतिक विचारधारा की टिप्पणियाँ सिर्फ़ इसलिये नहीं लेना कि वह विरोधी टिप्पणी है, विशुद्ध तानाशाही है, और ऐसा कई ब्लॉग पर मैंने पाया है (यह मेरा निजी अनुभव है), कितनी भी सभ्य भाषा में लिखो, कितने ही तथ्य देकर लिखने की कोशिश करो, कुछ “खास” लोग विरोधी टिप्पणी सहन ही नहीं कर पाते, इसे कौन सी मानसिकता कहेंगे? एक बात से मैं जरूर सहमत हूँ कि “अनॉनिमस” (बेनामी) को अवश्य प्रतिबन्धित किया जाये (मैंने भी कर रखा है), क्योंकि जो बेनामी टिप्पणी करता है (या करना चाहता है) वह या तो तर्कहीन और बुद्धिहीन व्यक्ति होता है, अथवा वह एक हीनभावना और बदले से भरा हुआ नपुंसक भी हो सकता है, सो अपने ब्लॉग पर बेनामी टिप्पणी भले ही न लें, लेकिन “नाम” से और खुल्लमखुल्ला की गई असहमति और विरोध की टिप्पणी तो आपको लेना ही चाहिये, उसमें डर कैसा? और यदि आप विरोध नहीं सह पाते हैं तो टिप्पणी का कॉलम ही हटा दीजिये (पहले एकाध दो ब्लॉग पर जब मैंने आँकड़ों के सहारे उन्हें “धमेड़ना” शुरु किया तो उन्होंने यही किया), लेकिन टिप्पणी मंगवाना और फ़िर उसे अपनी “सुविधा” से लेना या हटाना गलत बात है।



ऐसी ही एक और हरकत है “वर्ड वेरिफ़िकेशन” की, कोई आपके ब्लॉग पर आया है, तो उसका स्वागत करने की बजाय आप उससे “लाईसेंस/कागज” मांगने लगते हैं, ये क्या तरीका है? जैसा कि मैंने पहले कहा कि हिन्दी ब्लॉग जगत अभी इतना समृद्ध नहीं हुआ है कि “स्पैमर” यहाँ डाका डालने पहुँचें, यहाँ तो पाठक एग्रीगेटर के जरिये आयेगा या कभीकभार गूगल सर्च करते हुए (यदि आप कुछ ज्यादा ही अच्छे लेखक हुए तो), ऐसे में टिप्पणी करने वाले से ऊटपटाँग शब्दों के “वर्ड वेरिफ़िकेशन” की कवायद करवाना बदतमीजी समझी जा सकती है, और पाठक बिदक सकता है। मैं एक व्यापारी हूँ और इस नज़र से देखा जाये तो आपका ब्लॉग भी एक दुकान ही है और आप खुद भी चाहते हैं कि “ग्राहक” (पाठक) इसमें भरे पड़े रहें, ऐसे में ग्राहक के लिये दुकान के दरवाजे पर “वर्ड वेरिफ़िकेशन” का चौकीदार बिठाना क्या जरूरी है?

आशा है कि जिन लोगों ने इस प्रकार के “अवरोध” लगा रखे हैं, वे उसे हटायेंगे, क्योंकि विचारों का (चाहे वह कैसे भी हों) मुक्त प्रवाह, आदान-प्रदान होना ही चाहिये। इसी प्रकार पाठकों से भी अनुरोध है कि जिस ब्लॉग पर आपकी विरोधी टिप्पणी मॉडरेशन के जरिये नहीं ली जा रही, वहाँ जाना छोड़ दें, उस लेखक को अपनी बनाई हुई दुनिया में ही रमने दीजिये। जिन लोगों को सिर्फ़ खुद की बात पर सहमति ही चाहिये, विरोध नहीं, वे बेशक अपना राग अलापते रह सकते हैं, लेकिन अन्ततः कहलायेंगे वे शतुरमुर्ग ही, जो “तर्कों के तूफ़ान” की ओर अपना पिछवाड़ा किये हुए रेत में मुँह दबाये खड़े हैं…

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39 comments:

दिवाकर प्रताप सिंह said...

सहमत हूं।

संजय बेंगाणी said...

कुछ बातें जिनका समाधान है ही नहीं...

मेरा ब्लॉग वर्डप्रेस पर मगर निजी डूमेन पर है. हर दिन इस पर ढेरों "अश्लील साइट" या वियाग्रा के विज्ञापन टिप्पणी के रूप में आते है. तीन साल पीछे की पोस्टों पर भी आते है. अगर मोडरेशन न हो तो पता ही न चले और ब्लॉग वियाग्रा की दुकान बन जाए. यानी यहाँ मोडरेशन मजबूरी है. चुकीं मोडरेशन है इस लिए वर्डवेरीफिकेशन नहीं रखा है. दोनो का एक साथ होना बेतुका है.

गाली गलोच व राष्ट्रविरोधी टिप्पणी के अलावा हर टिप्पणी को प्रकाशित करता हूँ.

Suresh Chandra Gupta said...

मैं आपके विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ. मैं धीरे-धीरे उन ब्लाग्स पर टिपण्णी करना बंद का रहा हूँ जहां 'कमेन्ट मोडरेशन' या 'शब्द सत्यापन' लगा है. एक ब्लाग पर तो मैंने बंद भी कर दिया है. इस ब्लाग पर नफरत से भरे लेख छापे जाते हैं.

रंजन said...

आप सही कह रहें है सुरेश जी.. वर्ड वेरिफिकेशन तो बकवास है.. और बहुत उलझा मामला है.. लेकिन ये अनजाने मे भी हो है क्योंकि blogspot (word press का पता नहीं) में default से ये चालु रहता है...

जरुरत है नये ब्लो्गर को इसकी जानकारी देने की..

Mired Mirage said...

आपसे बहुत सीमा तक सहमत हूँ । मुझे भी टिप्पणियों पर पहरा बैठाना अखरता है । एकाध बार मजबूरन करना पड़ा । यह आवश्यक नहीं कि टिप्पणीकर्ता ब्लॉगर्स ही हों जिन्हें एक्सपोज किया जा सके । कोई व्यक्ति जो ब्लॉगर नहीं है, बिल्कुल व्यक्तिगत कारणों से भी आपको परेशान कर सकता है । ऐसे में ही मॉडरेशन का रास्ता चुनना पड़ता है । अभी हाल में ही एक सुर्खियों पर रहने वाले ब्लॉग पर मैंने एक बहुत लम्बी टिप्पणी की । बात बहुत सामयिक व राष्ट्रीय एकता के मुद्दे की थी सो मैंने उनके ब्लॉग पर लिखने का निर्णय किया । यह टिप्पणी नहीं छपी । सोचा किसी कारण से मिली नहीं होगी । परन्तु बाद की अन्य टिप्पणियाँ छपीं । एक अन्य ऐसे ही लेख पर मैंने फिर लिखा, परन्तु उन्होंने मेरी टिप्पणी को जगह नहीं दी । सभी मित्र जानते हैं कि मैंने अभद्र भाषा का प्रयोग तो नहीं ही किया होगा । परन्तु क्योंकि मेरी टिप्पणी उनकी राष्ट्रतोड़क बातों की हाँ में हाँ नहीं मिलाती थीं इसलिए उन्होंने इन्हें जगह नहीं दी ।
सुरेश गुप्ता जी की ही तरह मैंने उस ब्लॉग की तरफ जाना ही छोड़ दिया है । शायद वह ब्लॉग केवल कुछ विशेष पाठक वर्ग के लिए लिखा जा रहा है, यह कह दिया गया होता तो अपना समय बर्बाद न करती । मन तो था कि एक पोस्ट लिखकर अपनी टिप्पणियाँ और उनके न छपने पर चर्चा करूँ परन्तु फिर सोचा कि उससे भी क्या होगा ? मेरी ही तरह अन्य लोग भी उस ब्लॉग की सच्चाई देर सबेर जान ही जाएँगे ।
घुघूती बासूती

दीपक कुमार भानरे said...

सहमत हूँ . यदि टिप्पणीकर्ता अनानिमस ( बेनामी ) नही हो तो , टिप्पणीकर्ता के सामने कमेन्ट मोडरेशन और शब्द सत्यापन की बाध्यता रखना उचित प्रतीत नही होता है. धन्यवाद .

मिहिरभोज said...

कुछ जगह टिप्पणी माडरेशन का बङा ही षड्यंत्रात्मक उपयोग हो रहा हैं..वैसे भी मेरे विचार से ये सब डरपोक लोग तर्कों से बचने के लिए करते हैं

Rachna Singh said...

मेरा ब्लॉग मेरा हैं । हिन्दी का हैं इस लिये अग्रीगेटर पर हैं और लोग उसको पढ़ते हैं । अब मुझे अपने ब्लॉग पर क्या क्या करना हैं यानि कमेन्ट मोदेरेशन लगाना हैं या नहीं , वर्ड वेरिफिकेशन लगाना हैं या नहीं , कमेन्ट पुब्लिश करना हैं या नहीं ये सब क्या पाठक तय करेगे ??

मेरी चीज़ हैं मेरी अभिव्यक्ति हैं आप ने पढा , आपने टीपा , आप का मन था , आप का कमेन्ट मुझे अच्छा लगा मैने छापा , मेरी बात का विरोध था मैने हटाया इसके लिये क्या मुझे आप की परमिशन लेनी होगी।

जरुरी हैं की हम लिखे एक दुसरे को पढे नाकि एक दूसरे को बच्चा समझ कर समझाने का काम करे । आप ने कमेन्ट दे दिया , उसने डिलीट कर दिया पढा तो होगा ही आप का मकसद क्या था अपनी बात उस तक पहुचना , हो गया पुरा अब सब को नहीं भी दिख रहा तो आप को क्यूँ बैचेनी हैं । क्या कमेन्ट इस लिये करते हैं की पता चले की हमने ये कहा ??

अगर ब्लॉग अग्रीगेटर पर ना हो तो कमेन्ट भी कम ही होगे तो क्या आप पढ़ना बंद कर देगे । सबसे अच्छा तरीका अगर मेरा लिखा आप को ग़लत लगे तो अपने ब्लॉग पर उस पर पूरा लेख बनाए अपनी बात विस्तार से वहाँ कहे कमेन्ट का झंझट ही ख़तम होता है और ब्लॉग लेखन भी आगे जाता हैं ।

ब्लॉग लिखने वालो पर क्यूँ बंदिश हो की वो पाठक के हिसाब से अपना ब्लॉग चलाये ?????

COMMON MAN said...

ठीक लिखा है, रौशन और फिरदौस तथा अविनास के ब्लाग पर मेरी कई टिप्पणियां नहीं प्रकाशित की गयीं, कुछ स्वनाम धन्य टीवी पत्रकारों ने भी प्रकाशित करने की हिम्मत नहीं दिखाई. बहरहाल अनानिमस वाला विकल्प मैं भी हटाने जा रहा हूं.

Gyan Dutt Pandey said...

रोचक आरोप है।
टिप्पणी मॉडरेशन लगाने के बाद स्पैम के अलावा मुझे शायद ही कोई टिप्पणी उड़ानी पड़ी हो। पर कुछ असुर तत्वों की विघ्नशान्ति के लिये मॉडरेशन उचित जान पड़ता है।
लोगों के विचार भिन्न भी हो सकते हैं।

mehek said...

hame lagta hai wo us ekhak ko ta karne de ke unhe ana blog kaisa chaiye,kisi ko bhi hak nahi kisi aur ke blog par kya ho ye ta karne ka.rachana ji se sehat hun

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

मज़बूरी है.. कई लोग अपमानजनक और व्यक्तिगत बातों पर टिप्पणी कर जातें हैं,तो कई बार बकवास सी बिना मुद्दे और विषय के ..मैं नही बंद करने वाली .

जी.के. अवधिया said...

सुरेश जी, मैं भी आपसे पूर्णतया सहमत हूँ। ब्लॉग की संरचना दो पक्षों के मध्य संवाद स्थापित करने के लिये ही की गई है। यदि टिप्पणी मे किसी लेख से किसी की असहमति झलकती है तो भी टिप्पणी को प्रकाशित ही होना चाहिये।

Mired Mirage said...

रचना जी से भी सहमति है । सही है कि ब्लॉग लेखक की इच्छा कि वह क्या चाहता है । परन्तु क्या ऐसे में कुछ यूँ नहीं सामने ही लगा होना चाहिए कि 'टिप्पणी छापूँ या न छापूँ मेरी मर्जी !' बिल्कुल मर्जी होनी चाहिए परन्तु मूर्ख बनने पर थोड़ा सा दुख होना तो मानव गुण या दोष है ही । हाँ, मैं कुछ अधिक कह गई, राष्ट्रतोड़क शब्द वापिस लेती हूँ । हम बहुत कुछ परिस्थितियों की उपज होते हैं, सो किसी व्यक्ति के लिए ऐसा कहना गलत था । पिछली टिप्पणी को हटा भी सकती हूँ परन्तु तब अपनी गलती का एहसास नहीं रह जाएगा । यह एहसास बना ही रहना चाहिए ।
यह भी सच है कि हर व्यक्ति की सहने की सामर्थ्य अलग अलग होती है । कोई थोड़ी बहुत असहमति सह पाता है, कोई नहीं। जो मुझे गाली लगे वह अन्य को न भी लग सकती है। वैसे ही अभद्रता की परिभाषा भी शायद अलग अलग है । सो यही ठीक होगा कि जो जो चाहे वह करे । पाठक स्वयं ही निर्णय करें कि किस पर टिपियाएं या न । एक दो बार समय व्यर्थ गया भी तो क्या ? आखिर ब्लॉगर की स्वतंत्रता अधिक महत्वपूर्ण है ।
वैसे इस रोचक बहस के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

सागर नाहर said...

मेरा मानना है कि वर्ड वेरिफिकेशन तो अब पुराने चिट्ठाकारों में से शायद किसी के ब्लॉग पर नहीं होगा। यह सिर्फ नये ब्लॉग पर ही सिखाई देता है क्यों कि कई नये चिट्ठाकारों को पता नहीं होता कि इसे कैसे हटाना है और इसे रखने से क्या क्या परेशानी होती है।
अत: आप जब ऐसा देखें एक बार टिप्पणी में समझायें कि वर्ड वेरिफिकेशन की कोई आवश्यकता नहीं होती इसे आप हटा दें..... ।
मॉडरेशन के बारे में नो कमेन्ट्स... हमने तो इसे ना रखकर पहले गालियाँ भी खाई है पर अब भी मॉडरेशन लगाना ठीक नहीं समझते।

सुनीता शानू said...

सुरेश जी सबसे पहली बात आज मॉडरेशन सबसे जरूरी हो गया है, क्योंकि कुछ ऎसे लोग भी हैं जो अभद्र टिप्पणी करते हुए जरा भी हिचकते नही हैं, और मेरे जैसे लोग विवादो से घिरे रहना हर्गिज पसंद नही करते, अगर कीचड़ में पत्थर फ़ेंकेंगे तो छींटे हमारी तरफ़ ही आयेंगे। क्या एक जरा सी बात पर जो हमे पसंद करते है हमारे लेखन को पसंद करते हैं नही आयेंगे? मुझे तो ऎसा नही लगता। मेरे ख्याल से जो महिलाओं को सम्मान देते हैं उन्हे कोई तकलीफ़ नही होगी मॉडरेशन लगाने से,
और सबसे अहम बात क्या यहाँ भी वही पुराना नारा नही लगाया जा रहा जब बच्चों पर और महिलाओं पर हर बात में प्रतिबंध लगाया जाता था, और बात न मानने पर उनकी मजबूरी न समझ उन्हे जाति से बेदखल कर दिया जाता था, यहाँ भी वही करने की तैयारी लग रही है कि मॉडरेशन लगाये जाने पर टिप्पणी न की जाये। हर जगह अंकुश लगाने वाली बात है यह। ब्लॉग हमारा अपना है इस पर क्या लिखना है क्या नही यह हमारा अपना निर्णय है। फ़िर भी हम कभी किसी के खिलाफ़ गलत नही लिखते, और न ही किसी को हमारे ब्लॉग पर आकर अनाप-शनाप लिखने की इजाजत देते हैं
क्षमा प्रार्थी हूँ अगर आपको बुरा लगा, आप जैसे समझदार इंसान से इस तरह की पोस्ट की उम्मीद नही थी। मै सोचती थी आप समझते हैं कि किसी को असहज टिप्पणी मिलना कितना कष्टकारी होता है, और अगर हम टिप्पणी वाले की खोज खबर में समय बीता दें तो ब्लॉग पर इन विवादों से घिरी एक सौ एक पोस्ट हो जायेंगी, न ही हमारे या आपके पास इन सब बातों के लिये समय है न ही खाली फ़सादी दिमाग...
सुनीता शानू

संजय तिवारी said...

सहमत हैं. इस बात के समर्थक भी.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

कमेंट मॉड़रेशन और वर्ड वेरिफिकेशन दोनो ही स्पॅम कमेंटिंग रोकने के लगाए जाते है... जो की सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है...

जिन लोगो ने उपरोक्त वजह से कमेंट मॉड़रेशन लगाया है उन लोगो को इसमे बुरा नही लगना चाहिए...

आपने कहा की कुछ लोग अपनी मन मर्ज़ी की टिप्पणी ब्लॉग पर रखते है.. जो ठीक नही लगती उसे हटा देते है.. जो भी ब्लॉगर ऐसा करते है उन्हे ये ज़रूर बुरा लगेगा...

मैं किसी ब्लॉग पर कोई पोस्ट पढ़ता हू और बैठकर रोमन में टिप्पणी लिखता हू फिर कुछ टूल्स के सहारे उसे हिन्दी में परिवर्तित करता हू.. फिर उसे पोस्ट करता हू.. मगर थोड़ी देर बाद पता चलता है की मेरा कमेंट उस ब्लॉग पर ही नही है.. मुझे तो गुस्सा आएगा ही.. ख़ासकर तब जब मेरा कमेंट शालीन और सभ्य भाषा में किया गया हो..

ये मेरा निजी अनुभव है एक दो बेहतरीन तहरीर लिखने वाले ब्लोगो पर, जिन पर बारह महीने एक ही मौसम छाया रहता है.. उनको सिर्फ़ भोंपु बजाना पसंद है.. तर्क देखते ही उनके प्रष्ट भाग पर अंगारे उबलने लगते है.. और इस से पहले की कोई तर्कसंगत और शालीन टिप्पणी उनका बचा खुचा ईमान भी गिरा दे वो अपनी मॉड़ रेशन रूपी तलवार से इसका गला काट देते है..

आपने अपने लेख में ऐसी बात उठाई इसके लिए बधाई..

Shastri said...

प्रिय सुरेश,

बहुत ही चिंतनीय आलेख है यह.

दृष्टि सत्यापन एक सजा है, अत: नए नवेले चिट्ठाकारों को छोड कर मैं सत्यापन वाले चिट्ठों को नजरअंदाज कर देता हूँ.

हां स्पेम सारथी जैसे जनप्रिय चिट्ठों के लिये एक अभिशाप है एवं प्रति दिन दर्जनों पोर्नोग्राफिक स्पेम सारथी पर पोस्ट होते है.

लेकिन वर्डप्रेस एक विशेष सुविधा देता है कि एक बार किसी की पहली टिप्पणी स्वीकार कर लो तो फिर आगे उसकी सारी टिप्पणियां अपने आप स्वीकार हो जाती हैं.

माडरेशन का दुरुपयोग जरूर हो रहा है. लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है. मनमानी करने दें. कल को उन्हें प्रबुद्ध पाठक/टिप्पणीकार मिलना बंद हो जायेंगे. जैसी करनी वैसी भरनी.

विनीत -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

Shastri said...

मैं यह कहना भूल गया था कि जो लोग छाती पीट कर कहते हैं कि "मेरे चिट्ठे पर मैं कुछ भी करूँ तुम्हारा क्या जाता है" वे यह भूल जाते हैं कि पाठक भी कुछ कहना चाहता है और वह है:

"भाड में जाओ तुम और तुम्हारा 'व्यक्तिगत़' चिट्ठा. यदि तुम पाठकों की इज्जत करना नहीं जानते तो तुम को किस तरह के पाठक मिलेंगे यह हमें मालूम है".

PN Subramanian said...

एक वर्ग विशेष के लिए "मेरी मर्ज़ी" का बना रहना आवश्यक जान पड़ता है.

सच said...

http://truthsach.blogspot.com/

टिपण्णी स्तर यहाँ देखे

COMMON MAN said...

शास्त्री साहब ने लाख टके की बात कही है.

Udan Tashtari said...

सुरेश भाई

आपने अच्छा मुद्दा उठाया है.

मॉडरेशन लगाना तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता किन्तु अभद्र बातें, गाली, वियाग्रा आदि के विज्ञापन आदि-क्या यह सब कोई परिवार के साथ पढ़ना चाहेगा?

माना कि आप उन्हें बाद में अलग कर सकते हैं मगर तब तक तो कितने उन्हें पढ़कर चले जायेंगे कभी भी वापस न आने के लिए.

मेरा ब्लॉग न सिर्फ मेरे परिवार में हर स्तर पर वरन अनेकों परिवारों मे पढ़ा जाता है. दोस्त हैं, उनकी पत्नियाँ हैं, उनके बच्चे, बहुऐं हैं. मैं तो कम से कम अपने ब्लॉग के माध्यम से उन्हें गाली गलोज और अनर्गल प्रलाप नहीं पढ़्वा सकता.

हाँ, विरोध में आई सभ्य टिप्पणी से कोई विरोध नहीं. आज तक शायद ही मॉडरेशान में गाली गलोज, वो भी मुझसे नहीं, किसी और से मेरे मंच को माध्यम बना कर, और विज्ञापन छोड़ कर कुछ भी मॉडरेट किया हो.

निश्चित ही पाठक और उसकी प्रतिक्रिया सर्वोपरि है किन्तु अभद्रता और अनर्गल प्रलापों की मेरे पास जगह नहीं.

घर में असमाजिक तत्वों की घुसपैठ की रोकथाम के इन्तजामों को अगर तानाशाही निरुपित करना चाहें तो भी आपके विचारों का स्वागत है.

तानाशाही और रोकथाम में अंतर करिये, भाई.

पुलिस और प्रशासन अगर असमाजिक तत्वों को गलत काम करने से रोकते हैं तो वो तानाशाह नहीं हो जाते. बस, कानून के रक्षक ही कहलाते हैं. (अपवादों को बीच में मत लाईयेगा. :))

आशा है आप मेरी बात समझेंगे और उसे उसी भावना से लेंगे जिससे मैने कहा है.

शुभकामनाऐं.

दीपक भारतदीप said...

सुरेश जी आपका कहना सही है पर यहां एक बात आपको बता दूं अगर मैंने अपना ब्लाग आज शुरू किया तो शायद आप कभी टिप्पणी ही नहीं लिखते। मुझे यह बात समझने में एक साल लगा था कि वर्डवैरीफिकेशन और माडरेशन नहीं लगाना चाहिये। कम से कम छह सात ब्लाग लेखकों को मैंने यह बात समझाई कि वह यह हटा दें। आपके इस आलेख पर मेरे से पहले 23 टिप्पणियां हैं और सभी प्रसिद्ध और अनुभवी ब्लाग लेखक है अगर वह सहमति जता रहे हैं तो इस बात का भी जिम्मा लें कि वह नये ब्लाग लेखकों को यह बात समझाते चलें। उसके समझ में कब आयेगी यह विचार न करें। ब्लाग की तकनीकी एक दिन में जानना संभव नहीं है इसलिये नवीन लेखकों के साथ इस बारे में रूढ़ता न दिखायें। लिखने में कोई तीक्ष्ण हो सकता है पर ब्लाग तकनीकी के बारें भी वह उतना ही दक्ष हो यह जरूरी नहीं है। जहां तक अभद्र टिप्पणियों का प्रश्न है तो जैसे जैसे हिंदी का लेखन और पाठन बढ़ेगा उसमें भी बढ़ोतरी होगी। यह बात केवल आप और अन्य अनुभवी ब्लाग लेखक जानते हैं नये लोग नहीं। आप इस मामले में ब्लागर को समझायें पर टिप्पणी न करने वाला कड़ा रुख न अपनायें तो शायद अच्छा रहेगा।
दीपक भारतदीप

Suresh Chiplunkar said...

@ संजय बेंगाणी जी "अगर मोडरेशन न हो तो पता ही न चले और ब्लॉग वियाग्रा की दुकान बन जाए. यानी यहाँ मोडरेशन मजबूरी है…" - वाजिब तकनीकी समस्या है।
@ मिहिरभोज "कुछ जगह टिप्पणी माडरेशन का बङा ही षड्यंत्रात्मक उपयोग हो रहा हैं..वैसे भी मेरे विचार से ये सब डरपोक लोग तर्कों से बचने के लिए करते हैं…" - यही मेरा असली मुद्दा था…
@ रचना सिंह जी "अब सब को नहीं भी दिख रहा तो आप को क्यूँ बैचेनी हैं । क्या कमेन्ट इस लिये करते हैं की पता चले की हमने ये कहा??" - फ़िर सार्थक बहस कैसे होगी रचना जी…
@ शास्त्री जी ""भाड में जाओ तुम और तुम्हारा 'व्यक्तिगत़' चिट्ठा. यदि तुम पाठकों की इज्जत करना नहीं जानते तो तुम को किस तरह के पाठक मिलेंगे यह हमें मालूम है" - क्या बात है शास्त्री जी आपने तो एकदम डण्डा चला दिया सर…
@ उड़न तश्तरी "पुलिस और प्रशासन अगर असमाजिक तत्वों को गलत काम करने से रोकते हैं तो वो तानाशाह नहीं हो जाते. बस, कानून के रक्षक ही कहलाते हैं. (अपवादों को बीच में मत लाईयेगा. :))" - सबसे सार्थक और सन्तुलित टिप्पणी…
@ सुनीता शानू जी "आप जैसे समझदार इंसान से इस तरह की पोस्ट की उम्मीद नही थी। मै सोचती थी आप समझते हैं कि किसी को असहज टिप्पणी मिलना कितना कष्टकारी होता है, और अगर हम टिप्पणी वाले की खोज खबर में समय बीता दें तो ब्लॉग पर इन विवादों से घिरी एक सौ एक पोस्ट हो जायेंगी…" - मुझे खेद है कि आपका दिल दुखा…
@ दीपक भारतदीप जी "आप इस मामले में ब्लागर को समझायें पर टिप्पणी न करने वाला कड़ा रुख न अपनायें तो शायद अच्छा रहेगा…" - आपकी सलाह बेहतर है, मैं अपनी अपील वापस लेता हूँ…
@ सागर नाहर जी "मॉडरेशन के बारे में नो कमेन्ट्स... हमने तो इसे ना रखकर पहले गालियाँ भी खाई है पर अब भी मॉडरेशन लगाना ठीक नहीं समझते…" - हम भी आपकी ही कैटेगरी के हैं गालियाँ खा लेंगे, लेकिन मॉडरेशन नहीं लगायेंगे…
सभी टिप्पणीकारों को धन्यवाद यह एक बेहतरीन बहस रही…

विष्णु बैरागी said...

यह ऐसा मुद्दा है जिस पर आंख मूंदकर न तो हां कहा जा सकता है और न ही ना ।
अपनी बात कहते समय अन्‍य की असहमति का सम्‍मान भी किया ही जाना चाहिए । लेकिन यह 'असहमति' शालीन है या नहीं, यह कौन तय करे ।
यदि मैं उपदेश देता हूं तो मुझे उपदेश सुनन के लिए भी तैयार रहना पडेगा । सारा मामला आत्‍मानुशासन और स्‍वैच्छिक अंगीकृत आचरण संहिता जैसा है । इस मुद्दे पर कोई सर्वानुमत वाला हल मिल पाएगा, इसमें सन्‍देह ही है ।
इस विमर्श में एक सुझाव निस्‍सन्‍देह ध्‍यान देने योग्‍य है । वरिष्‍ठ ब्‍लागर यदि नए ब्‍लागरों को सदाशयतापूर्वक परामर्श दें तो समस्‍या का निदान काफी हद तक पाया जा सकता है । मेरे शिक्षक श्रीयुत रवि रतलामी से क्षमा याचना करते हुए (क्‍यों कि अपना नामोल्‍लेख उन्‍हें भला नहीं लगता) अपना अनुभव बता रहा हूं । ब्‍लाग जगत के सन्‍दर्भ में मैं जब भी कभी कोई अनपेक्षित 'हरकत' करता हूं तो वे तत्‍काल ही मुझे टोकते हैं । ऐसा जब-जब भी हुआ, तब-तब हर बार मुझे अपनी भूल की गम्‍भीरता अनुभव हुई । परिणाम यह है कि मेरे ब्‍लाग पर न तो माडरेशन का प्रावधान है, न वर्ड वेरीफिकेशन का और इससे बढकर बात यह कि मैंने जिस-जिस भी ब्‍लाग पर टिप्‍पणी की, वह जस की तस स्‍थान पा गई ।

अनूप शुक्ल said...

सुरेशजी, बात व्यक्तिगत रूप से बुरा मानने की नहीं है। तानाशाही की भी नहीं है। असहज स्थितियों से बचाव के प्रयास की है।
काफ़ी कुछ समीरलाल जी ने कह दिया।
उदाहरण के लिये:
१. आपके ब्लाग पर कॊई आकर आपके बेहद अजीज मित्र के लिये भद्दी गालियां देकर चला जाये।
२. आपके और आपके किसी मित्र के परिवार वालों के लिये अश्लील टिप्पणियां कर जाये।
३. जिसकी आप सपने में भी निंदा न करना चाहे उसके बारे में तमाम ऊलजलूल बातें लिख जाये।
और भी ऐसे ही तमाम काम जिसमें आपको कुछ नहीं कहा जाता लेकिन आपसे जुड़े लोगों के लिये ऐसा कोई लिख जाये जिसे पढ़कर आपसे जुड़ व्यक्ति शर्मिंदा हो जाये।

आप क्या कर लेंगे उसका?

एक और शानदार भड़कीली पोस्ट लिख डालेंगे। तब तक उसका तो काम हो चुका होगा जिसके खिलाफ़ लिखा गया।

ऐसा हो चुका है। चार -पांच उदाहरण तो मैं जानता हूं। इसलिये टिप्पणी माडरेडन कोई तानाशाही नहीं है। यह सम्भावित असहज स्थितियों से भरसक बचाव का प्रयास भी है। तस्वीर का यह पहलू व्यक्तिगत बहादुरी से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

Udan Tashtari said...

यह विमर्श का फॉरमेट पसंद आया.

भविष्य में भी ऐसी ही चर्चा का आकांक्षी हूँ जरुरी मुद्दों पर.

सुरेश जी का बहुत आभार इस विषय को उठाने के लिए और पूरे धैर्य के साथ सबके विचार सुनने के लिए.

दीपक said...

जहाँ तक मै जानता हु सुरेश जी आपने मेरा अजीत जोगी वाला पोस्ट तो पढा ही है और साथ मे की गयी उटपटांग टिप्पणीया भी वह भी बगैर माडरेशन के !!अतः आपको तो मेरा उत्तर पता ही होगा !!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

चर्चा बेशक अच्छी है। एक बात छूटी सी लगती है। वह ये कि टिप्पणी मॉडरेशन का प्रयोग उसे करना पड़ता है जिसके ब्लॉग पर किसी न किसी कारण से ट्रैफिक अधिक होता है; क्योंकि शरारती तत्व भी वहीं आने की कोशिश करते हैं जहाँ उन्हें अधिकाधिक प्रचार मिलने वाला हो। एक ब्लॉगर के लेखन कौशल के अतिरिक्त उसके द्वारा किसी खास विषयवस्तु का चुनाव या उसका अपना खास व्यक्तित्व भी ट्रैफिक का निर्धारण करता है।

जो नये ब्लॉगर हैं, उन्हें तो टिप्पणियों का टोटा लगा रहता है। उन्हें word verification और comment moderation का लफड़ा नहीं पालना चाहिए। जब आप स्थापित हो लें और आपको लगे कि आप को शिकार बनाया जा सकता है, किसी प्रकार की असुरक्षा का भान हो तो उचित बन्दोबस्त अवश्य करलें।

लोकतान्त्रिक देश में जनता के वोट से बादशाहत पाने वाले जननायक भी ‘जेड’ श्रेणी की सुरक्षा घेरे में चलने को मजबूर हैं। आम जनता से दूर हो जाने के सम्भावित नुकसान के बावजूद। अब कुछ लोग इसे बिना वजह के भी मात्र आभिजात्य प्रदर्शन के लिए लगाये रखना चाहें तो उनकी मर्जी। इसका नफा नुकसान वे खूब समझते हैं।

वैसे मैं शास्त्री जी के विचारों का पोषक हूँ।

pallavi trivedi said...

अच्छा मुद्दा है....मैंने अपने ब्लॉग पर न वर्ड वेरिफिकेशन लगाया है और न ही मोडरेशन! हाँ...जो टिपण्णी मुझे ठीक नही लगती या मुझे लगता है की पोस्ट से हटकर निजी तौर पर की गई है उसे मैं डिलीट कर देती हूँ! अभी तक स्पेम कमेंटिंग जैसी परेशानियां मुझे नही आई हैं....लेकिन जिन लोगों ने मोडरेशन सक्षम कर रखा है , निश्चित रूप से उनकी भी अपनी समस्यायें हो सकती हैं! वर्ड वेरिफिकेशन वाकई में तकलीफदेह होता है!
अगर सुरक्षा की द्रष्टि से है तो मोडरेशन उचित है...लेकिन यदि पोस्ट विरोधी टिप्पणियों को प्रकाशित न होने देने के लिए है तो पाठक को नागवार गुजरेगा! इसलिए मुझे लगता है की ये एक विकल्प है ब्लोगर के लिए....यदि वह इसका इस्तेमाल करना चाहता है तो कोई हर्ज़ भी नही है!

lata said...

१. आपलोग इतने बड़े -बड़े ब्लॉगर हैं, इतना लिखते हैं तो पढ़ते भी होंगे,
अगर आप नियमित रूप से किसी ब्लॉगर को पढ़ते होंगे तो इतना तो
अवश्य समझ पाते होंगे की कौन सा ब्लॉगर किस प्रकार की सोच रखता है.
सुरेशजी ने जो वर्ड वेरिफिकेशन और मॉडरेशन की जो बात की है वो मेरी समझ
से कुछ राष्ट्रविरोधी बलॉगर्स के सन्दर्भ मे की होगी. महिला ब्लॉगर्स को इस बारे मे
इतनी तीव्र प्रतिक्रिया की ज़रूरत नही.
२. इस सन्दर्भ मे शास्त्री जी की दूसरी टिप्पणी बिल्कुल उपयुक्त है.

ताऊ रामपुरिया said...

काफी रोचक और सार्थक बहस यहाँ पढने को मिली ! हमको शुरू २ में एक सज्जन ने माँ बहन तक नवाजा ! उपाय स्वरुप किसी ने मोडरेशन की सलाह दी और तबसे ही यह लागू है ! नही प्रकाशित करने की नौबत अभी तक नही आई ! पर मुझे संजय बेंगानी जी की बात भी सही लगती है !

मोडरेशन में एक फायदा और है की आप कमेन्ट पढ़ कर प्रकाशित करते हैं तो आप की जानकारी में सब रहता है ! आप पाठको से जुड़े रहते हैं और सीधे प्रकाशित होने में आप को बार बार टिपणी बक्से तक जाना पड़ता है !
जो की ज्यादातर लोगो के लिए आरामदायक नही रहता !

वैसे साहब अगर ब्लॉग को हम अपनी दूकान कहते हैं तो यह दूकान मालिक पर छोड़ देना चाहिए की वो अपनी दूकान कैसे चलाना चाहता है ?

यहाँ पर यह सार्थक बहस पढ़ कर अति आनंद आया ! इसके लिए धन्यवाद !

Ghost Buster said...

तानाशाह कुछ ज्यादा कड़ा शब्द लगता है पर मैं मूल विचार से सहमत हूँ.

ab inconvenienti said...

ये महिलाओं की ठेकेदारनियाँ हर बात ख़ुद पर क्यों ले लेती हैं? यहाँ साफ़ तौर पर संकेत राष्ट्रद्रोही चिट्ठों की ओर था.

Aaradhna said...

हर महिला ब्लागर ठेकेदारनी नहीं है. ये ठेकेदारनियां महिला-ब्लागर नहीं बल्कि गंदगी के एजेंट है.

masijeevi said...

अभिव्‍यक्ति की स्वतंत्रता के विरोधी औजारों से हमारा व्‍यक्‍त विरोध है अत: विरोधी होने के कारण टिप्‍पणी को पाठक-स्‍पेस में जगह न देने का विरोध करते हैं हांलांकि माडरेशन के औजार की अन्‍य तकनीकी वजहों को स्‍वीकरते हैं। हमने जो तरीका अपनाया है वह यह कि पंद्रह दिन पुरानी पोस्‍टें तो बिना माडरेशन है कि जबकि उससे पहली की पोस्‍ट पहले माडरेट होती है तभी दिखती हैं वजह ये कि स्‍पैम कमेंट पुरानी पोस्‍टों पर ही होते हैं हमारे चिट्ठे पर तो।

मेरी मरजी वाला तर्क लंगड़ा तर्क है, क्‍योंकि चिट्ठाकार चिट्ठे का मालिक नहीं होता वह चिट्ठे की निर्मिति होता है, इस मायने में वह चिट्ठे के पाठकों से निर्मित होता है। ब्‍लॉग सैद्धांतिकी की बेहद उजड्ड समझ है जो पाठकों की सत्‍ता का निषेध करे। चिट्ठे का श्‍वेत हिस्‍सा यानि टिप्‍पणी पृष्‍ठ पाठक का है यहॉं तक कि जब चिट्ठाकार खुद भी अपने चिट्ठे पर टिप्‍पणी करता है तो उसकी हैसियत एक पाठक की ही होती है।

ये सब तो ठीक पर ये जो मित्र कुछ लोगों को दे दनादन राष्‍ट्रविरोधी करार दिए जा रहे हैं उससे हमारी कठोर असहमति है। उसे दर्ज माना जाए।

रौशन said...

यहाँ टिप्पणी संख्या ९ पर कामन मैन साहब ने आरोप लगाया है कि उनकी टिप्पणी हमारे ब्लॉग पर प्रकाशित नही हुई. हम समझते हैं कि कामन मैन साहब ने या तो गलती से हमारा नाम इस लिस्ट में दाल दिया है या फ़िर उन्होंने हमारे ब्लॉग पर टिप्पणी करने के बाद यह नही देखा होगा कि ब्लॉगर ने टिप्पणी पोस्ट की या नही.
सच तो यह है कि हमारे ब्लॉग पर इतने भी लोग नही आते कि हमें कमेन्ट मोडरेशन का इस्तेमाल करना पड़े. जो कोई जो कुछ लिखता है वह तुंरत पब्लिश हो जाता है कभी कभी हमें अगर किसी कमेन्ट से कुछ परेशानी होती है तो हम कमेन्ट करने वाले से अनुरोध करते हैं कि वह उसे हटा दे. जैसा कि हमने कुछ दिन पहले सुरेश चंद्र गुप्त जी से अनुरोध किया. अभी तक हमने किसी भी टिप्पणी को ख़ुद से नही हटाया है.
ऐसे में कामन मैन साहब का यह कहना कि हमने उनकी टिप्पणी नही छापी या तो गलती से कही गई बात है या फ़िर दुर्भावना से कही हुयी बात है . हम समझते हैं इसके लिए उन्हें हमसे अफ़सोस जाहिर करना चाहिए.