Wednesday, October 1, 2008

दारू चढ़ने के बाद बके जाने वाले विशिष्ट बोल…

बात है सन् 1988 की, यानी बीस साल पहले की, जब हमारी इन्दौर में नई-नई नौकरी लगी थी। हम चार रूम पार्टनर थे, चारों टूरिंग जॉब में थे, और जो रूम हमने ले रखा था, मकान मालिक को यह बताकर लिया था कि दो ही लड़के रहेंगे, क्योंकि हमें मालूम था कि हममें से कोई दो तो हमेशा टूर पर रहेंगे, लेकिन संयोग से (या कहें कि दुर्योग से) कभी-कभार ऐसा मौका आ ही जाता था कि हम चारों साथ-साथ उसी शहर में पाये जाते थे, तब समस्या यह होती थी कि अब क्या करें? यदि रात को जल्दी घर पहुँचें तो मकान मालिक को कैफ़ियत देनी पड़ेगी, फ़िर क्या था हमारा एक ही ठिकाना होता था, छावनी चौक स्थित “जायसवाल बार”। खूब जमती थी महफ़िल जब मिल जाते थे चार यार…।

दो-चार दिन पहले एक ई-मेल प्राप्त हुआ जिसमें दारू पीने के बाद (बल्कि चढ़ने के बाद) होने वाले वार्तालाप (बल्कि एकालाप) पर विचार व्यक्त किये गये थे। वह ई-मेल पढ़कर काफ़ी पुरानी सी यादें ताज़ा हो आईं, उन दिनों की जब हम भी पीते थे। जी हाँ, बिलकुल पीते थे, सरेआम पीते थे, खुल्लमखुल्ला पीते थे, छुप-छुपकर नहीं, दबे-ढ़ंके तौर पर नहीं।

आज वह ई-मेल देखा और बरसों पुरानी याद आ गई, उन दिनों में जब हम चारों की ही शादी नहीं हुई थी और कम्पनी की मेहरबानी से जेब में पैसा भी दिखता रहता था। 1988 में तनख्वाह के तौर पर उस प्रायवेट कम्पनी में 940 रुपये बेसिक मिलता था, टूरिंग के लिये 120 रुपये रोज़ाना (होटल खर्च) अलग से। महीने में 20-22 दिन तो टूर ही रहता था, सो लगभग 1000 रुपये महीने की बचत हो ही जाती थी। लेकिन उन दिनों उस उमर में भला कोई “बचत” के बारे में सोचता भी है? (ठीक यही ट्रेण्ड आज भी है, वक्त भले बदल जाये नौजवानों की आदतें नहीं बदलतीं)। दारू-सिगरेटनुमा छोटी-मोटी ऐश के लिये उन दिनों 1000 रुपये प्रतिमाह ठीक-ठाक रकम थी। चारों यार मिलते, साथ बैठते, शाम को 8 बजे बार में घुसते और रात को दो बजे निकलते (जब वहाँ का चौकीदार भगाता)। वो भी क्या सुहाने दिन थे… याद न जाये बीते दिनों की… बार में खासतौर पर काँच वाली खिड़की के पास की टेबल चुनते थे, उन दिनों लड़कियों ने ताजी-ताजी ही जीन्स पहनना शुरु किया था, सो कभी-कभार ही कोई एकाध लड़की जीन्स पहने हुए दिखाई दे जाती थी, बस फ़िर क्या था, उस पर विस्तार से चर्चा की जाती थी (तब तक एक पैग समाप्त होता था)… “बैचलर लाइफ़” की कई-कई यादें हैं कुछ सुनहरी, कुछ धुँधली, कुछ उजली, कुछ महकती, कुछ चहकती हुई… बहरहाल उसकी बात कभी बाद में किसी पोस्ट में की जायेगी, फ़िलहाल आप मजे लीजिये उन चन्द वाक्यों का जो कि दारू चढ़ने के बाद खासमखास तौर पर कहे जाते हैं (कहे क्या जाते हैं, बके जाते हैं)…

मैं यहाँ आमतौर पर बके जाने वाले वाक्य जैसे “यार ये पाँच में से चार लाईटें बन्द कर दे…” (भले ही कमरे में एक ही लाईट जल रही हो), या फ़िर “वो देख बे, खिड़की में भूत खड़ा है…”, “अरे यार मेरे को कुछ हो जाये तो 100 डायल कर देना…”, “भाई मेरे को चढ़ी नहीं है तू टेंशन नहीं लेना…”… ये तो कॉमन लाईने हैं ही लेकिन और भी हैं जैसे –

1) तू मेरा भाई है भाई… (अक्सर ये भाई… टुन्न होने के बाद, “बाई” सुनाई देता है)
2) यू नो आय एम नॉट ड्रन्क!!! (पीने के बाद अंग्रेजी भी सूझने लगती है कभी-कभी)
3) हट बे गाड़ी मैं चलाऊँगा…
4) तू बुरा मत मानना भाई… (साथ में पीने के बाद सब आपस में भाई-भाई होते हैं)
5) मैं दिल से तेरी इज्जत करता हूँ…
6) अबे बोल डाल आज उसको दिल की बात, आर या पार… (चने के झाड़ पर चढ़ाकर जूते खिलवाने का प्रोग्राम)
7) आज साली चढ़ ही नहीं रही, पता नहीं क्या बात है? (चौथे पैग के बाद के बोल…)
8) तू क्या समझ रहा है, मुझे चढ़ गई है?
9) ये मत समझना कि पी के बोल रहा हूँ…
10) अबे यार कहीं कम तो नहीं पड़ेगी आज इतनी? (खामखा की फ़ूँक दिखाने के लिये…)
11) चल यार निकलने से पहले एक-एक छोटा सा और हो जाये…
12) अपने बाप को मत सिखाओ बेटा…
13) यार मगर तूने मेरा दिल तोड़ दिया… (पाँचवे पैग के बाद का बोल…)
14) कुछ भी है पर साला भाई है अपना, जा माफ़ किया बे…
15) तू बोल ना भाई क्या चाहिये, जान हाजिर है तेरे लिये तो… (ये भी पाँचवे पैग के बाद वाला ही है…)
16) अबे मेरे को आज तक नहीं चढ़ी, शर्त लगा ही ले साले आज तो तू…
17) चल आज तेरी बात करा ही देता हूँ उससे, मोबाइल नम्बर दे उसका… क्या अपने-आपको माधुरी दीक्षित समझती है साली…
18) अबे साले तेरी भाभी है वो, भाभी की नज़र से देखना उसको आज के बाद…
19) यार तू समझा कर, वो तेरे लायक नहीं है… (यानी कि मेरे लायक ही है…)
20) तुझे क्या लगता है मुझे चढ़ गई है, अबे एक फ़ुल और खतम कर सकता हूँ…
21) यार आज उसकी बहुत याद आ रही है…

और सबसे खास और सम्भवतः हर बार बोला जाने वाला वाक्य…
22) बस…बहुत हुआ, आज से साली दारू बन्द… (तगड़ी बहस और लगभग झगड़े की पोजीशन बन जाने पर)

और इस अन्तिम “घोषवाक्य” पर सच्चाई और निष्ठा से अमल करने वाले 5% ही होते हैं, जिनमें मैं भी शामिल हूँ…

ऐसा माना जाता है कि जीवन में सबसे गोल्डन समय होता है बचपन का जो कि सही भी है क्योंकि बचपन में हमें किसी बात की चिन्ता नहीं करना पड़ती, परन्तु मेरे हिसाब से जीवन का एक और दौर गोल्डन होता है - वह है नौकरी लगने और शादी होने के बीच का समय, जिसे हम “प्योर बैचलर लाइफ़” कह सकते हैं, जब जेब में पैसा भी होता है और पत्नी-बच्चों की जिम्मेदारी भी नहीं होती… इस गोल्डन दौर में ही असली और खुलकर मौजमस्ती की जाती है। हाँ, एक बात है कि… उम्र का यह गोल्डन दौर ज़्यादा लम्बा भी नहीं होना चाहिये… वरना…। हर काम करने का एक समय होता है, यदि व्यक्ति उसके बाद भी अपना शौक जारी रखे तो समझना चाहिये कि उसका शौक व्यसन बन चुका है, इसलिये शराब पीने की मनाही नहीं है, लेकिन आपको अपनी “लिमिट” पता होना चाहिये और आपमे इतना आत्मविश्वास होना चाहिये कि जब चाहें उसे छोड़ सकें, नहीं तो फ़िर वह आनन्द नहीं रह जायेगा, बल्कि लोगों और परिवार को दुःख पहुँचायेगा।

बहरहाल, जिसने कभी पी नहीं, वह इसको नहीं समझ सकता, लेकिन उसे आलोचना करने का भी हक नहीं है, क्योंकि उसे क्या मालूम कि “सुरा” क्या बला होती है, बड़े-बड़े लोगों ने इस “चमत्कारिक शै” के बारे में बहुत सारे कसीदे काढ़ रखे हैं… डॉक्टर भी कहते हैं कि यदि रोज़ाना एक पैग लिया जाये तो शरीर कई बीमारियों से बचा रह सकता है… तो हम और आप क्या चीज़ हैं…

अन्त में एक वाकया –
रोज-ब-रोज पीकर घर आने वाले पति से पत्नी ने कहा कि कल से मैं भी तुम्हारे साथ बार में चलूंगी और शराब पियूंगी, देखते हैं क्या होता है?
पति ने समझाया कि शराब तुम्हारे लायक नहीं है, तुम वहाँ मत चलो।
पत्नी ने जिद की और दोनों साथ में बार में पहुँचे, व्हिस्की का ऑर्डर दिया।
पहला सिप लेते ही पत्नी ने बुरा सा मुँह बनाया और लगभग उबकाई लेते हुए बोली, “कितना घटिया, कसैला और कड़वा स्वाद है”…
पति दार्शनिक अन्दाज़ में बोला – देखा!!! और तुम सोचती थीं कि हम लोग यहाँ ऐश करते हैं…

नोट : कभी-कभी ऐसी पोस्ट भी लिख लेना चाहिये…

22 comments:

पंगेबाज said...

और कभी कभार टिपिया भी देना चाहिये इस से कोई उसूल नही टूटते :)

संजय बेंगाणी said...

बड़ी टून्न पोस्ट है भाई...पी के मत लिखा करो :)

COMMON MAN said...

bas mujhe mobile wali baat thodi si khatki, shayad 88 men mobile nahin the

Sanjeet Tripathi said...

सही है।
कृपया इसे भी देखें।

"थोड़ी थोड़ी पिया करो"

http://sanjeettripathi.blogspot.com/2007/10/thodi-thodi-piya-karo.html

प्रयास said...

वैसे जानकारी के लिये बताना चाहूँगा कि भारतवर्ष में पहली कॉल १९९५ (1995) में नोकिया के फोन से की गयी थी.

pryas.wordpress.com

Udan Tashtari said...

ये लो भाई एक टिप्पणी..मजा आ गया न भाई-इसके वास्ते. और तू बोल ना भाई क्या चाहिये, जान हाजिर है तेरे लिये तो…तू मेरा भाई है भाई… :)

सजीव सारथी said...

kamaal maaza aa gaya....kabhi kabhi milte rahne chahiye chaar yaar cheers :)

सजीव सारथी said...

kamaal maaza aa gaya....kabhi kabhi milte rahne chahiye chaar yaar cheers :)

मथुरा कलौनी said...

क्‍या बात है। आज ही मैंने अपने डिप्रेशन के बारे में व्‍लॉग लिखा हे। अवश्‍य पढ़ना मेरे भाई।
मैं आज भी, अभी भी अपने डिप्रेशन का इलाज कर रहा हूँ।

दीपक भारतदीप said...

सुरेश चिपलूनकर जी,
आपका यह पाठ बहुत अच्छा लगा। ऐसे में कुछ न कुछ तो मुझे लिखना ही था। लिख डाला। बहुत बढि़या आलेख है।
दीपक भारतदीप
..........................................
देखता था शराब की नदी में
डूबते-उतरते उस
कलम के सिपाही को
कई बार लड़खड़ाते हुए
उसकी निगाहों में थी
बाहर निकलने के मदद की चाहत
दिखता था किसी बात से आहत
लड़खड़ाती थी जुबां बोलते हुए

कई बार किनारे वह आया
मैने अपना हाथ बढ़ाया
पर लौट जाता था
तब मैं डर जाता था
उसकी सूनी आंखों को
पढ़ते हुए
समय निकलता गया
नदी का दृश्य बदलता गया
अब वह वहां नजर नहीं आता
उसकी यादों से मन भर आता
बढ़ने लगते हैं हाथ कलम की तरफ
पराजित योद्धा की याद कर
जम जाती है मन में बर्फ
मैं बार बार जाता हूं
शराब की नदी के किनारे
उसे देखने की चाहते लिये हुए
मगर बोतल कांच की है तो क्या
उसमें अपना अक्स कौन देख पाता है
रात को खुले आसमान की
देखता हूं तो
उसका चेहरा ख्यालों में आता है
नहीं उससे कोई हमदर्दी मेरी
पर उसके शब्दों उड़ते देखता हूं
जो होते पंख लगाये हुए
शराब की नदी भी
कहीं न कहीं बहती हुई दिखती है
पर वह उसका चेहरा नजर नहीं पाता
पर उसके जिन हाथों में होते ही शाम
होता था जाम
वह नजर आते हैं अब भी
शब्दों को कबूतर की तरह उड़ाते हुए
.................................

Neeraj Rohilla said...

हमेशा की तरह आपकी एक और बेहतरीन पोस्ट,

जब मैने दारू पीना शुरू किया था तो एक मित्र ने गुरू मंत्र दिया था । उसने कहा था कि जब मूड अच्छा हो तभी पीना, हल्की सी भी उदासी हो तो २ मील दूर से सलाम कर लेना । क्योंकि दुख में पिया तो आदत बनते देर न लगेगी ।

आज भी उसी मंत्र पर कायम हैं ।

Ghost Buster said...

तुम डरो मत भाआय ... बेहिचक लिखो... हिच्च्च ... लिखते रहो .... हिच्च्च

PD said...

क्या लिखे हैं गुरू.. बस छा गये जी.. हमारा तो डायलौग होता है "अगर आज चढ गई तो कभी ना पियूंगा.."
फिर दोस्त लोग जो नहीं पिये होते हैं वो जज बनते हैं और अगली सुबह बताते हैं कि इसे सच में नहीं चढा था.. :)

PD said...
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सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

यार तू समझा कर, वो तेरे लायक नहीं है…ये मत समझना कि पी के बोल रहा हूँ…
हा,हा,हा, मजेदार।

Suresh Chandra Gupta said...

बहुत खूब. लगता है पी कर लिखी है, क्योंकि होश में तो कोई ऐसी समझदारी की बातें लिखता नहीं.

चन्दन चौहान said...

मेरे लिये कोई काम का लेख नही है क्यों की में तो दारु नही पीता हू

lata said...

Ji han kabhi-kabhi is tarah ke lekh bhi likhe jane chahiye :)

उम्दा सोच said...
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उम्दा सोच said...

जिन में बसी जानकी , रम में बसे राम , व्हिस्की में बसे विष्णु , शम्पेन में श्याम , बीअर में ब्रह्मा बसे , देसी में बसे हनुमान , किस किस का त्याग करू , हर बोतल में भगवन .

Arvind Mishra said...

यार तूं ऐसी ही बातें किया कर ये क्या मजहबी झोल लेकर बैठ जाता है जब तब .....

Vanesh Garg said...

Hats off sir ji