चर्च और नक्सलवादी गठबन्धन उजागर हो गया… भाग-2…
Alliance between Church and Naxalites India
(गत भाग से जारी…) इस बात के साफ़ सबूत हैं कि कुछ अन्तराष्ट्रीय ईसाई संस्थायें उत्तर-पूर्व के राज्यों में आतंकवाद को खुला समर्थन दे रही हैं, उनका मकसद है समूचे उत्तर-पूर्व को भारत से अलग करना। इन विभिन्न आतंकवादी संगठनों को चर्च की ओर से पैसा और हथियार मुहैया करवाये जा रहे हैं।
त्रिपुरा
इस राज्य में नेशनल लिबरेशन ऑफ़ त्रिपुरा (NFLT) की स्थापना दिसम्बर 1989 में हुई थी। अपने स्थापना के समय से ही इसे बैप्टिस्ट चर्च का खुला समर्थन हासिल है, हालांकि इस संगठन पर 1997 में प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, लेकिन इसकी गतिविधियाँ बांगलादेश से सतत जारी हैं। नोआपारा बैप्टिस्ट चर्च के सचिव नागमनलाल हालम को सीआरपीएफ़ द्वारा सन् 2000 में आतंकवादियों को सीमापार करवाने और 60 जिलेटिन की छड़ें रखने के आरोपों में गिरफ़्तार किया गया था। इसी चर्च के दो अन्य कर्मचारियों को NFLT को हथियार सप्लाई करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। हालम ने स्वीकार किया था कि वे NFLT के लिये हथियार खरीदने में बिचौलिये की भूमिका निभाते थे। एक और चर्च अधिकारी जतना कोलोई को भी NFLT के शिविर में गुरिल्ला प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिये गिरफ़्तार किया जा चुका है।
त्रिपुरा के जंगलों में आदिवासियों को जबरिया धर्मान्तरित करने का धंधा जोरशोर से चलता है। NFLT पर कई बार स्थानीय आदिवासियों ने आरोप लगाये हैं कि वह धर्मान्तरण के जरिये उनकी स्थानीय संस्कृति को खतरे में डाल रहा है, लेकिन दिल्ली की लूली-लंगड़ी सरकारों तथा त्रिपुरा के मार्क्सवादियों की शह पर यह काम धड़ल्ले से जारी रहा। अब स्थिति यह है कि वहाँ के स्थानीय लोग अल्पसंख्यक हो गये हैं और दुर्गापूजा जैसा वार्षिक त्यौहार भी वे शान्ति से नहीं मना पाते। NFLT के घोषणापत्र में कहा गया है कि वे त्रिपुरा में 'क्राईस्ट" का राज्य लाकर रहेंगे। जमातिया नाम का आदिवासी समुदाय अपने परम्परागत रूप से मार्च में भगवान "गादिया" की पूजा करता आया है, जिसे वे शिव का अवतार मानते हैं, लेकिन चर्च और आतंकवादियों ने यह पूजा क्रिसमस के दिन करने हेतु "आदेश" दिया है। इन आतंकवादी समूहों को ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड के बैप्टिस्ट चर्चों से भी लगातार पैसा मिलता है। जो भोले-भाले आदिवासी इनकी बात नहीं मानते, उनकी औरतों के साथ अपहरण और बलात्कार किया जाता है, और उन्हें ईसाई धर्म मानने पर मजबूर कर दिया जाता है, और जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिन्दू संगठन वहाँ काम करने जाते हैं, तो उन्हें धमकियाँ दी जाती हैं और उन पर जानलेवा आक्रमण किये जाते हैं। अगस्त 2000 में स्वामी शान्तिकलि महाराज की हत्या कर दी गई थी। इसी प्रकार दिसम्बर 2000 में जमातिया कबीले के मुख्य पुजारी लबकुमार जमातिया की भी हत्या की गई, उनका भी कसूर वही था जो कि लक्ष्मणानन्द सरस्वती का था, यानी कि हिन्दुओं को धर्मान्तरण के खिलाफ़ जागृत करना। सिर्फ़ सन 2001 में त्रिपुरा में कुल 826 आतंकवादी हमले हुए और जिसमें 405 लोग मारे गये और 481 आदिवासियों का अपहरण हुआ।
नागालैण्ड
नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैण्ड (NSCN) के दो गुट हैं, दोनों ही गुट ईसाईयों द्वारा ही संचालित हैं और इन्हें वर्ल्ड काउंसिल ऑफ़ चर्चेस से आर्थिक मदद मिलती रहती है, चीन भी इन्हें हथियारों से मदद करता रहता है। NSCN के न्यूयॉर्क, जिनेवा और हेग में अपने ऑफ़िस हैं, जिस पर डिस्प्ले बोर्ड लगे हैं "पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ नागालैण्ड"। नागालैण्ड के इन दोनों आतंकवादी गुटों ने संयुक्त राष्ट्र में अब तक दो बार स्वतन्त्र नागालैण्ड की गुहार लगाई है। नागालैण्ड में इन दोनों गुटों की सरकार चलती है, वे लोगों से पैसा वसूलते हैं। भारत सरकार के कर्मचारियों की एक तिहाई तनख्वाह "नागालैण्ड टैक्स" के रूप में छीन ली जाती है। नागालैण्ड में अधिकतर सरकारी बैंक बन्द हो चुके हैं, क्योंकि उसमें से भारी धनराशि लूटी जा चुकी है। इन संगठनों के लेटरहेड पर लिखा हुआ है "नागालैण्ड फ़ॉर क्राईस्ट"। स्वतन्त्रता के बाद त्रिपुरा में ईसाईयों की संख्या नगण्य थी, जबकि आज 1,20,000 है, जो कि पिछली जनगणना (1991) के अनुसार 90% का उछाल है। अरुणाचल प्रदेश की स्थिति और भी भयावह है, उस राज्य में सन् 1961 में 1,710 ईसाई थे, लेकिन आज सिर्फ़ 40-45 सालों में बढ़कर एक करोड़ से ऊपर हो गये और चर्चों की संख्या हो गई है 780… आंध्रप्रदेश, जहाँ एक ईसाई मुख्यमंत्री हैं, में दूरदराज के इलाकों में रोज-ब-रोज एक नया चर्च खुलता है, क्या वाकई में ईसाई संस्थाएं इतनी समाजसेवा कर रही हैं? लेकिन यह सारी सूचनायें कांग्रेस सरकार और सेकुलरों के लिये या तो बेकार हैं या फ़िर "संघ का दुष्प्रचार" भर हैं।
लालच की हद तो यह है कि धर्मान्तरण होने के बाद चर्च से भारी आर्थिक मदद लेने के बावजूद ये "भगोड़े" लोग भारत सरकार से आरक्षण का लाभ लेने के लिये हल्ला करते हैं और सेकुलर लोग जो गरीबों के हमदर्द होने का दम भरते हैं, वास्तविक दलितों और पिछड़े वर्गों के हक मारकर इन्हें आरक्षण और अन्य सुविधायें दिलवाने की पैरवी करते रहते हैं, यानी धर्मान्तरित होने वाले को दोहरी मलाई मिलती है। चर्च भी इसमें अपना फ़ायदा देखते हुए इसका समर्थन करता है, जबकि असल में जो लोग धर्मान्तरित होकर ईसाई बनते हैं उनके लिये चर्च भी अलग होता है और उनसे दोहरा और अपमानजनक बर्ताव जारी रहता है, मूलरूप से ईसाई व्यक्ति इन्हें कभी भी दिल से स्वीकार करने को तैयार नहीं होता। चर्च भी अपना "कथित भारतीयकरण" करने में लगा हुआ है, आजकल दलितों को धर्मान्तरण के बाद नाम बदलने पर जोर नहीं दिया जाता, दूरदराज के गाँवों में जहाँ बहुत ज्यादा अशिक्षा है, वहाँ पादरी गाँव में जाते हैं व अपने साथ यीशु की धातु की मूर्ति ले जाते हैं व भगवान की एक मूर्ति लकड़ी की भी ले जाते हैं, फ़िर दोनो को आग में डालते हैं, स्वाभाविक है कि भगवान की मूर्ति जल जाती है, लेकिन यीशु की मूर्ति सही-सलामत निकलती है, बस फ़िर भोले-भाले आदिवासियों का "ब्रेन-वॉश" करने में कितनी देर लगती है। हालांकि इस प्रकार के चमत्कार दिखाकर तो हिन्दुओं के बाबा भी अपनी दुकानदारियाँ चलाये हुए हैं, लेकिन यहाँ मामला साफ़-साफ़ देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। चर्च का भारतीयकरण करने के फ़ेर में आजकल छोटे-छोटे गाँवों में "फ़ादर" सफ़ेद की बजाय गेरुए अथवा पीले वस्त्र पहनने लगे हैं ताकि किसी को कोई शक न हो, लेकिन मौका मिलते ही वे अपने "असली रूप" में आ जाते हैं यानी कि भगवानों को भला-बुरा कहते हुए यीशु का गुणगान करना। यह स्थिति मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा धर्मान्तरण किये जाने से अधिक खतरनाक है, क्योंकि औरंगजेब जैसे मुस्लिम आक्रांता जब हिन्दुओं का धर्म परिवर्तित करवाते थे, तब नाम, भेष और रहन-सहन सभी बदलना पड़ता था, लेकिन ईसाई संस्थायें दलितों को ईसाई भी बना रही हैं और उनके नाम भी नहीं बदलतीं फ़िर धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण की बैसाखी मिलती रहती है, और असली गरीब दलितों (जिन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया) का हक मारा जाता है…
शायद भारत ही विश्व एकमात्र ऐसा देश होगा जहाँ बहुसंख्यक आबादी को ही दबकर रहना पड़ता हो… लेकिन UPA की अध्यक्षा जब देश की सर्वेसर्वा हों, आस्तीन में सेकुलर बैठे हुए हों, मीडिया भी इनके साथ हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये…
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10 comments:
naksalvaade aur maaovaadee aatankiyon ke hathiyaar aur paisa bhee kaheen se to aa rahaa hai. jis paise se hathiyaar khareede jaate hain usee paise se pravaktaa bhee khareede jaate hai.
संप्रग की नेता सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द क्रिश्चियन नेताओं का ही घेरा बना हुआ है और ये सब शक्तिशाली पदों पर है---अम्बिका सोनी, मार्गरेट अल्वा, एके एंटोनी, ऑस्कर फर्नांडिज, आंध्र के मुख्यमंत्री रेडडी। यह अकारण नहीं है कि नक्सलवाद पर चुप्पी साध ली जाती है और इसके सामाजिक प्रतिरोधी संगठन सलवा जुडुम को असंवैधानिक और मानवता विरोधी बताया जाता है। संघर्ष बहुत व्यापक है। हमें डटे रहना हैं।
समस्या भंयकर है और आपके इस लेख में Comment कम है शायद कम को ही समझ आया
कोइ बात नही जिसे समझ आया है वैसे देशभक्त अपने स्तर पर चर्च का देशद्रोह पुर्ण इरादा के खिलाफ लडने के लिये तैयार हैं। मिडीया को तो पैसा मिलता है चर्च से और सोनिया तो खुद मुस्लिम ईसाई है। कुछ देशद्रोही है या फिर मुर्ख सेकुलर और सिर्फ बचे हिन्दुस्तान में 1% हिन्दु जो लडे़गें आखरी दम तक ।
हमरे देश में सिर्फ दलित ही धर्मांतरण करते है इसका एकमात कारण दलितों को सवर्ण हिन्दू नही मानते छूआछूत की भावना आज भी हमारे देश में है / जो थोडे पैसे के लालच मे मान सम्मान पाने के लिए धर्मांतरण अपनाते हैा
सुरेश भाऊ छत्त्तीस्गढ के दो हिस्से आदिवासी बहुल हैं। एक है बस्तर जिसको सारी दुनिया जानती है। दूसरा है सरगुजा जिसे कोई नही जानता।ये धर्मांतरण का सबसे बडा अडडा है।यहां उरांव जाती को सुनियोजित ढंग से इसाइ बनाया गया और नतीजा ये की बस्तर से खूबसूरत होने के बावजूद इसको कोइ नही जानता।यहां कहते है की एशिया का सबसे चर्च है,क्यों आखिर इस क्यों का जवाब तो ढूंढना पडेगा।बहुत दमदारी से लिखा है,जारी रखिये,चाहे कुछ लोग आप को राष्ट्र तोडक साबित करने पर तुले रहे कुछ फ़र्क नही पडता।
ऐसे लेख छप कर जन जन तक पहूँचने चाहिए. आखिर भारत से बड़ा कोई नहीं.
@शायद भारत ही विश्व एकमात्र ऐसा देश होगा जहाँ बहुसंख्यक आबादी को ही दबकर रहना पड़ता हो… लेकिन UPA की अध्यक्षा जब देश की सर्वेसर्वा हों, आस्तीन में सेकुलर बैठे हुए हों, मीडिया भी इनके साथ हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये…
यही यथार्थ है. देश की सरकार की नकेल एक विदेशी और ईसाई के हाथों में है. अंग्रेज चले गए हैं पर उनका राज अभी भी जारी है.
aapne likha to bilkul theek hai, lekin yahan ke bahusankhyak hindoo aankhen hote huye bhi kuchh nahin dekh pate, ye khud kuchh bhi nahin karna chahte, ye chahte hain ki ooopar se koi aakar inki samasyaon ka samadhan kar de, napunsak jaati hai yah
आपका ब्लॉग समसामायिक है. आप इस महाआन्दोलन को जारी रखिये. साम्यवदियो ने तो देश का बुरा हाल कर दिया. अब माओवादियो ने .
बन्धुवर आजके दौर में लगता है कि देशद्रोही मुसलमान और राष्ट्रतोड़क ईसाई देश के दामाद बने बैठे हैं.... हम कब तक चुप बैठें... कब तक प्रतीक्षा करें कि नरेंद्र भाई मोदी प्रधानमन्त्री बनें और इन नरपिशाचों का संहार करें....
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