Thursday, October 9, 2008

चर्च और नक्सलवादी गठबन्धन उजागर हो गया…(भाग-1)

Alliance between Church and Naxalites India
नक्सली कमाण्डर पांडा ने एक उड़िया टीवी चैनल को दी गई भेंटवार्ता में दावा किया कि स्वामी लक्ष्मणानन्द को उन्होंने ही मारा है। पांडा का कहना था कि चूंकि लक्ष्मणानन्द सामाजिक अशांति(???) फ़ैला रहे थे, इसलिये उन्हें खत्म करना आवश्यक था। जिस प्रकार त्रिपुरा में NFLT नाम का उग्रवादी संगठन बैप्टिस्ट चर्च से खुलेआम पैसा और हथियार पाता है, उसी प्रकार अब यह साफ़ हो गया है कि उड़ीसा और देश के दूरदराज में स्थित अन्य आदिवासी इलाकों में नक्सलियों और चर्च के बीच एक मजबूत गठबंधन बन गया है, वरना क्या कारण है कि इन इलाकों में काम करने वाली मिशनरी संस्थाओं को तो नक्सली कोई नुकसान नहीं पहुँचाते, लेकिन गरीब और मजबूर आदिवासियों को नक्सली अपना निशाना बनाते रहते हैं?

कुरेदने पर पांडा ने स्वीकार किया कि नक्सलियों के उड़ीसा स्थित कैडर में ईसाई युवकों की संख्या ज्यादा है, उन्होंने माना कि उनके संगठन में ईसाई लोग बहुमत में हैं, उड़ीसा के रायगड़ा, गजपति, और कंधमाल में काम कर रहे लगभग सभी नक्सली ईसाई हैं।

पांडा की इस स्वीकृति से दो सवाल उठते हैं, पहला तो यह कि लक्ष्मणानन्द की हत्या की जिम्मेदारी अब वे क्यों ले रहे हैं? सबसे पहले इन्हीं माओवादियों कहा कि हाँ हमने यह हत्या की है, फ़िर उनका बयान आया कि नहीं हम इस प्रकार की धार्मिक हत्याएं नहीं करते, और अब फ़िर एक इंटरव्यू आया कि हाँ हमने हत्या की है, आखिर क्या मतलब है इसका? असल में शायद पांडा को उड़ीसा के अन्दरूनी इलाकों में हिन्दुओं की इतनी तीव्र प्रतिक्रिया का अंदेशा नहीं था, और अब चूंकि उनके काडर में ही फ़ूट पड़ने की नौबत आ गई तो उन्हें यह जिम्मेदारी लेना सूझा। दूसरा, यह कि कहीं यह स्वीकृति मिशनरियों को हिन्दुओं के हमले से बचाने की साजिश तो नहीं? जिससे कि मिशनरियों को “पवित्र गाय” दर्शाया जाये।

दूसरी तरफ़ देश में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग नाम का एक “पालतू बिजूका” भी है, जो तभी काम करता है जब किसी राज्य में मुस्लिम या ईसाईयों पर हमले और अत्याचार होते हैं। इस अल्पसंख्यक आयोग के लिये हिन्दू कहीं भी अल्पसंख्यक नहीं होते। जब भी किसी राज्य में जैसे नागालैण्ड, जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, वहाँ उन पर अत्याचार होते हैं, या फ़िर कश्मीर जैसे राज्य जहाँ से लगभग सभी हिन्दुओं को भगा दिया गया है, वहाँ इस आयोग के सदस्य झाँकने भी नहीं जाते। इस नकली आयोग को मिजोरम से भगाये जा रहे हिन्दू भी नहीं दिखते, इस आयोग को त्रिपुरा में शरणार्थी कैम्पों में रह रहे 30000 हिन्दू भी दिखाई नहीं देते। इन्हें चिन्ता होती है सिर्फ़ गुजरात और उड़ीसा की।



अब उड़ीसा में राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग की जा रही है, बजरंग दल और विहिप पर प्रतिबन्ध लगाने के लिये जोर-शोर से गला फ़ाड़ा जा रहा है, चारों ओर यह माहौल तैयार करने की कोशिश जारी है कि मुस्लिम आतंकवाद नाम की कोई चीज़ नहीं होती या मिशनरी सिर्फ़ सेवा करती हैं, बाकी के लोग (यानी संघ परिवार) सिर्फ़ भड़काने में लगे हुए हैं। हो सकता है कि सोनिया को खुश करने के लिये शिवराज पाटिल और मनमोहन मिलकर उड़ीसा में राष्ट्रपति शासन लगा भी दें, आखिर सत्ता और पावर मैडम के हाथ में है, लेकिन कांग्रेस यह भूल न ही करे तो बेहतर होगा। पहले ही कांग्रेस हरियाणा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश यानी सिर्फ़ तीन बड़े राज्यों में सत्ता में है, कहीं अगले आम चुनाव में वह और भी सिमटकर क्षेत्रीय पार्टी न बन जाये। राष्ट्रपति शासन लगाने की यह माँग बेहद बचकाना इसलिये भी है कि जब 1993 में मुम्बई बम विस्फ़ोट हुए तब भी, और मुम्बई में ही सदी के सबसे भीषण दंगे हुए तब भी, महाराष्ट्र की सुधाकरराव नाईक सरकार को बर्खास्त नहीं किया गया था। जबकि कांग्रेसी लोग सत्ता के इतने लालची हैं कि सैयद सिब्ते रजी (झारखंड के खलनायक) और रोमेश भंडारी (उत्तरप्रदेश के खलनायक) जैसे राज्यपालों और गुलाम नबी आज़ाद जैसे गैर-जनाधारी नेता को पालते-पोसते हैं।

सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार केरल में 63 पादरियों पर मर्डर, बलात्कार, अवैध वसूली और हथियार रखने के मामले विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज हैं। केरल पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार पिछले सात वर्षों में दो पादरियों को हत्या के जुर्म में सजा मिल चुकी है, जबकि दस अन्य को “हत्या के प्रयास” की धाराओं में चार्जशीट किया गया है। माकपा का कैडर, नक्सली और चर्च ये तीनों मिलकर एक घातक “कॉम्बिनेशन” बनाते हैं। इसके लिये काफ़ी हद तक हमारे आस्तीन में पल रहे “सेकुलर” भी जिम्मेदार हैं। इन लोगों के आँखों पर “धर्मनिरपेक्षता” की ऐसी मजबूत पट्टी बँधी हुई है कि इन्हें यह भी दिखाई देना बन्द हो गया है कि देश का हित किसमें है, राष्ट्रवाद क्या है और देशद्रोह किसे कहते हैं। सेकुलर लोग धर्मान्तरण या मुस्लिम आतंकवाद को खतरा तभी मानेंगे जब यह उनके द्वार तक पहुँच जायेगा, और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

सरकार को चाहिये कि सभी मिशनरियों के खातों की बारीकी से जाँच की जाये, उनके सम्बन्धों के बारे में खुफ़िया जानकारी एकत्रित की जाये और एक स्वतन्त्र जाँच एजेंसी से चर्च और नक्सलियों के आपसी अन्तर्सम्बन्धों पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की जाये। लेकिन सोनिया गाँधी के रहते यह सम्भव नहीं है, क्योंकि अपने उड़ीसा दौरे के समय राहुल गाँधी एक रात बगैर सुरक्षा एजेंसियों को बताये अचानक गायब हो गये थे और बाद में पता चला कि वे घने जंगलों में एक मिशनरी के कामकाज को देखने(???) चले गये थे, इसलिये जनता को ही जागरूक बनना होगा, चुनावों में वोट देने के लिये घर से निकलना होगा और कांग्रेस नाम के इस कैंसर को देश से हटाना होगा… हिन्दुओं के सब्र का इम्तहान लिया जा रहा है, अब देखना यही है कि यह बाँध कब फ़ूटता है, एक बार गुजरात में यह फ़ूट चुका है, लेकिन “सेकुलर” और कांग्रेसी उससे कोई सबक सीखने को तैयार नहीं हैं…

(भाग-2 में जारी रहेगा…)


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12 comments:

COMMON MAN said...

सेकुलर लोग धर्मान्तरण या मुस्लिम आतंकवाद को खतरा तभी मानेंगे जब यह उनके द्वार तक पहुँच जायेगा, और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

bilkul sahi kah rahe hain, tab inhi ki peedhian inhi ko kos rahi hongi aur unke aansoo pochhne wala bhi koi nahi hoga.

COMMON MAN said...
This comment has been removed by the author.
संजय बेंगाणी said...

किसने कहा सेक्युलरों को दिखता नहीं?

बस वे मानने को तैयार नहीं. ऐसा तब भी था जब पाकिस्तान बन जाएगा, इसकी चेतावनी दी जाती थी मगर उसे दिमागी फितुर बताते रहे. आज परिणाम सामने है.

Anil Pusadkar said...

जिस दिन हिंदूओं के सब्र का बांध फ़ूटेगा उस दिन वो सब कुछ बहा कर ले जायेगा,कथित सेक्युलर और फ़र्ज़ी बुद्धिजीवी भी नही बच पायेंगे। आपको दशहरे की बहुत-बहुत बधाई।

ab inconvenienti said...

उडीसा के बारे में राजीव गाँधी की तरह सिर्फ़ यह कहना ही पर्याप्त है:

जब बड़े पेड़ धराशाई होते हैं तो कुछ झाड़-पौधे भी उसकी चपेट में आ जाते हैं.

उडीसा की बजरंगी प्रतिक्रिया में कुछ भी ग़लत नहीं है

भुवनेश शर्मा said...

सही है जी....कांग्रेस को तो इस बार हर हाल में उखाड़ना होगा

Ghost Buster said...

बहुत बढ़िया लेख. हमेशा से देश के शिक्षा केन्द्रों से लेकर मीडिया तक पर वामपंथियों का पूरा कब्जा रहा है, जिन्होंने कभी सच्चाई को सामने नहीं आने दिया. इन मक्कारों की कलई खोलने के आपके प्रयास अत्यन्त सराहनीय हैं.

Suresh Chandra Gupta said...

@माकपा का कैडर, नक्सली और चर्च ये तीनों मिलकर एक घातक “कॉम्बिनेशन” बनाते हैं। इसके लिये काफ़ी हद तक हमारे आस्तीन में पल रहे “सेकुलर” भी जिम्मेदार हैं।

आप ने बिल्कुल सही विश्लेषण किया है. भारत की प्रभुसत्ता के लिए खतरा बढ़ता ही जा रहा है.

Satyajeetprakash said...

सुरेश,
गला फाड़-फाड़कर चिल्लानवाले धर्म-निरपेक्षियों ने लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद का दृश्य नहीं देखा होगा. मैंने देखा है, सौ-दो सौ नहीं, हजारों-हजार आदिवासी करुण क्रंदन कर रहे थे, फूट-फूट कर रो रहे थे, ऐसे जैसे कि उनका सबकुछ लुट गया हो, व्यक्ति के लिए जिसने अपने जीवन के चालीस बहुमूल्य साल उन लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में समर्पित कर दिया. उसकी हत्या कर दी जाती है और उस पर ये धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार जुबां तक नहीं खोलते हैं, उलटे बजरंग दल और विहिप पर प्रतिबंध का राग अलापते हैं, इससे ये तो होना ही था. आठ महीने पहले भी करीब तीन सौ ईसाईयों ने लक्ष्मणानंद पर हमला किया किया. वजह यही थी कि वे धर्मांतरण की आड़ में रोड़ा बने हुए थे. जिसे इन लोगों ने हटा दिया.

मिहिरभोज said...

क्या भाई लोग टिप्पणी करने को नहीं आये इधर

lata said...

aapse 100% sahmat.

rajput said...

मै आप के लेख से बकाए प्रभावित हूँ l आप ने कट्टरवाद को रोकना चाह है l