Sunday, September 14, 2008

पुलिस वालों जलवा दिखाओ, देशद्रोही नेताओं के भरोसे रहे तो…

Terrorist attack & Indian Police Encounter
बंगलोर, अहमदाबाद, जयपुर के बाद अब दिल्ली का नम्बर भी आ गया, साफ़ है कि कोई भी शहर अब सुरक्षित नहीं रहा, बम धमाके और मौत किसी भी समय किसी भी परिवार को उजाड़ सकते हैं। इस देश में एक गृहमंत्री भी है, जिनका नाम है शिवराज पाटिल (नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा, ठीक वैसे ही जैसे कि उपराष्ट्रपति का नाम भी कम ही लोगों को मालूम होगा)। तो हमारे गृहमंत्री साहब मीटिंग करते हैं, सेमिनार करते हैं, निर्देश देते हैं, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है। वही बरसों पुरानी रट लगाये रहते हैं, "आतंकवादियों का कड़ा मुकाबला किया जायेगा…", "इस तरह की कायराना हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा…", आदि-आदि। रेड अलर्ट और हाई अलर्ट तो एक सरकारी उत्सव की तरह हो गये हैं जो हर महीने-पन्द्रह दिन में आते-जाते रहते हैं, एक कर्मकाण्ड की तरह रेड अलर्ट मनाया जाता है, एक बेगारी की तरह हाई अलर्ट टाला जाता है। फ़िर से सब उसी ढर्रे पर लौट आते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो… फ़िर अखबार और मीडिया देश की जनता की तारीफ़ों(?) के कसीदे काढ़ते हैं कि "देखो कैसे जनजीवन सामान्य हो गया…" "देश की जनता ने अलाँ-फ़लाँ त्यौहार जोरशोर से मनाकर आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब दिया…" इन मूर्खों को कौन समझाये कि क्या जनता अगले दिन अपने काम पर न जाये? या बम विस्फ़ोट हो गया है तो अगले दिन सभी लोग भूखे सो जायें? कोई कामधाम नहीं है क्या, जनजीवन सामान्य न करें तो क्या करें? सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ अपना काम नहीं कर रही, कम से कम आम जनता तो अपना काम करे, उसमें आतंकवाद को जवाब देने की बात कहाँ से आ गई? खैर… जो हो रहा है वह ऐसे ही चलता रहेगा, अब उम्मीद की किरण बची है पुलिस वालों से…

पुलिस वालों, अब तुम्हारे जागने का वक्त आ गया है यदि देशद्रोही नेताओं के भरोसे बैठे रहे और उनके घटिया आदेशों का पालन करते रहे तो एक दिन तुम्हारा परिवार भी ऐसे ही किसी बम विस्फ़ोट में मारा जायेगा तब हाथ मलने के सिवा कोई चारा न होगा। इस लेख के माध्यम से पुलिस वालों से एक अनुरोध है, विनती है, करबद्ध प्रार्थना है कि अब अपना पुलिसिया जलवा दिखाओ, अपने मुखबिरों की नकेल कसो, उनका नेटवर्क मजबूत करो, सूचनायें एकत्रित करो और "व्यक्तिगत स्तर पर देश की खातिर" मुठभेड़ों का जोरदार दौरदौरा चलाओ। चार-छः महीनों में पकड़े जा सकने वाले आतंकवादियों और देशद्रोहियों की लाशें बिछाओ। भले ही उसे आधिकारिक मुठभेड़ न दिखाओ, लेकिन देश के भले के लिये हर पुलिस वाला कम से कम दो-चार समाजविरोधी काँटों को तो साफ़ कर ही सकता है। "सेफ़ मुठभेड़" कैसे की जाती है, यह अनुभवी पुलिस वालों को बताने की ज़रूरत नहीं है, बस इस बात का ध्यान रखना होगा कि कहीं कोई बेगुनाह न मारा जाये, पहले पक्की सूचनायें इकठ्ठा करो, उनको जाँच-परख लो, फ़िर उस आतंकवादी को उड़ा दो। ऐसा दमनचक्र चलाओ कि देशद्रोहियों को पनाह देने वालों का सर चकरा जाये कि आखिर यह हो क्या रहा है? जिसके पास AK-47 बरामद हो वह कोई सन्त तो नहीं हो सकता, जिस घर से RDX और डिटोनेटर बरामद हो रहे हों वह कोई महात्मा का आश्रम तो हो नहीं सकता, उसे वहीं मार गिराओ, उस घर को नेस्तनाबूद कर दो, उस घर में रहने वाले पूरे परिवार को पुलिस की थर्ड डिग्री का मजा चखाओ। सेकुलर लोग कहेंगे कि उस परिवार का क्या दोष है वह तो निर्दोष है, लेकिन बम विस्फ़ोट में मारे जाने वाले भी तो निर्दोष ही होते हैं।



प्रिय पुलिस वालों, हम एक युद्धकाल में जी रहे हैं यहाँ शान्तिकाल के नियम लागू नहीं होते। हो सकता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाये, लेकिन अभी गेहूँ का पिसना अधिक महत्वपूर्ण है, अपनी तरफ़ से सावधानी बरतो, लेकिन यदि कोई बेगुनाह मारा भी जाता है तो उसमें छाती कूटने की आवश्यकता नहीं है, रोजाना कई बेगुनाह सड़कों पर कारों-ट्रकों द्वारा कुचले जाते हैं और अमीरज़ादे पैसा देकर छूट जाते हैं, और फ़िर यह तो देश की सुरक्षा का मामला है, गर्व का मामला है। हे पुलिस वालों, तुम नाकों-चौराहों पर पैसा खाते हो, मर्डर-झगड़ा होने पर दोनों पार्टियों से पैसा खाते हो, तुम FIR लिखने तक का पैसा खाते हो, ये काम तो तुम छोड़ने से रहे तो कम से कम एक नेक काम करो, महीने-दो महीने में एकाध बड़े गुण्डे का एनकाउंटर करो, यदि वह गुण्डा देशविरोधी काम में लिप्त पाया जाये तो जल्दी से जल्दी करो। एक बात होती है "राजदण्ड", दिखने में यह हवलदार के हाथ में एक मामूली डण्डे जैसा दिखता है, लेकिन उस डण्डे का जलाल ही अपराधियों में खौफ़ पैदा करता है। आतंकवादियों के दिलोदिमाग में इस राजदण्ड का ऐसा खौफ़ पैदा करो कि वे कुछ भी करने से पहले दस बार सोचें। हमारे देश की न्याय व्यवस्था पर भी भरोसा रखो, जो न्याय व्यवस्था अबू सलेम, दाऊद इब्राहीम, तेलगी, शहाबुद्दीन जैसों की "मददगार" है, वह कई एनकाउंटर करने के बावजूद तुम्हारी भी "मदद" करेगी, यदि देशद्रोही वकील हैं तो देशप्रेमी वकील भी हैं इस देश में… इसलिये बेखौफ़ होकर इस युद्धकाल में अपना कर्तव्य निभाओ, लोग यह नहीं याद रखते कि पंजाब में कितने बेगुनाह मारे गये, लोग याद रखते हैं केपीएस गिल को…।

और एक अन्तिम बात… "सेकुलर" और "मानवाधिकारवादी" नाम के दो आस्तीन के साँपों (ये साँप अफ़ज़ल को गले लगाये रहेंगे, बांग्लादेशी घुसपैठियों की राशनकार्ड और पैसों से मदद करते रहेंगे, आतंकवादियों को बिरयानी खिलाकर छोड़ते रहेंगे) से दूर रहने की कोशिश करना… जनता तुम्हें लाख-लाख दुआयें देगी जो तुम्हारे बच्चों के ही काम आयेगी। तो उठो और काम में जुट जाओ, शुरुआत जेल में बन्द आतंकवादियों से ही करो… सबसे पहले उन्हें एक दिन छोड़कर खाने में जुलाब की चार गोली खिलाओ…, चुपके से एड्स के इंजेक्शन लगाओ… "असली गोली" बाद में, फ़िर आगे क्या और कैसे करना है यह भी मुझे बताना पड़ेगा क्या???

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10 comments:

नयनसुख said...

"सेकुलर" और "मानवाधिकारवादी" को सांप न कहें
सांप हर जगह टेड़ा चलता है लेकिन वह भी अपने बिल में सीधा ही चलता है ये "सेकुलर" और "मानवाधिकारवादी" तो अपने बिल यानी जन्मभूमि के दुश्मन हैं

"सेकुलर" और "मानवाधिकारवादी" को सांप कहना सांप की बे-इज्जती करना है

संजय बेंगाणी said...

इतना ही जोश होता तो देश हजार साल गुलाम रहता क्या?

Shastri said...

बिना कडाई किये देश की हालत बदलने वाली नहीं है

Anil Pusadkar said...

sahi kaha bhau,bina mare kuch bhi kam hone wala nahi hai.aapki bebak kalam ko dandwat karta hun

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपकी खरी-खरी बातें बिलकुल ठीक हैं। सोचता मैं भी ऐसा ही हूँ, लेकिन ऐसा लिख नहीं सकता। ...हालात कुछ ऐसे ही हैं जहाँ कड़वी गोली देना जरूरी है। आपके हौसले की दाद देता हूँ। धन्यवाद।

COMMON MAN said...

iske hindoo samaaj ke log hi jimmedar hain, dharmguron ko aage aana chahiye aur hindoo samaj ke prabhavi vyaktion ko bhi anyatha hinduon ka naamleva bhi nahi bachega.

सागर नाहर said...

हे हे हे, आज तो बड़ा मजेदार जोक लिख दिये आप।यह सब आप पुलिस वालों से कह रहे हो, जो नेताओं के चमचे हैं, उनकी खाते हैं, उनके इशारे पर अपराधी को छोड़ निर्दोष को फंसा देते हैं। अब क्या क्या बतायें भाई साहब अगर देश को सुधारना है तो सबसे पहले पुलिस व्यवस्था को सुधरना होगा।
और हाँ आप वाकई देश को आतंकवादियों से बचाना चाहते हैं तो ऐसा करिये इस लेख में आतंकवादियों की जगह नेताओं लिख दीजिये।

चन्दन चौहान said...

फ़िर अखबार और मीडिया देश की जनता की तारीफ़ों(?) के कसीदे काढ़ते हैं कि "देखो कैसे जनजीवन सामान्य हो गया…" "देश की जनता ने अलाँ-फ़लाँ त्यौहार जोरशोर से मनाकर आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब दिया…" इन मूर्खों को कौन समझाये कि क्या जनता अगले दिन अपने काम पर न जाये? या बम विस्फ़ोट हो गया है तो अगले दिन सभी लोग भूखे सो जायें? कोई कामधाम नहीं है क्या, जनजीवन सामान्य न करें तो क्या करें? सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ अपना काम नहीं कर रही, कम से कम आम जनता तो अपना काम करे, उसमें आतंकवाद को जवाब देने की बात कहाँ से आ गई? खैर… जो हो रहा है वह ऐसे ही चलता रहेगा

Mai Bhi Yesa Hi Sochta Hoo

parth pratim said...

BAAT KUCHH HAJAM NAHI HUI......

RAJ SINH said...

aapse main kisee halat me sahamat na hota.chahata bhee naheen.par yah bharat ka apatkal hai.aur kya kaha jaye?poore bharat kee yahee monodasha hai.manavadhikar to bharat kee parikalpana hai par deshadhikar? sabse oopar.aur ham to ise maa kahate hain.