Friday, September 19, 2008

हिन्दी सप्ताह विशेष : राज ठाकरे और करुणानिधि में भेदभाव क्यों?

Raj Thakre Mumbai Anti-Hindi Movement
सबसे पहले एक सवाल – कितने लोग हैं जिन्होंने मेगास्टार रजनीकान्त को चेन्नई शहर के किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में हिन्दी में बोलते सुना है? रजनीकान्त की मातृभाषा मराठी है, उनके जीवन का काफ़ी सारा समय कर्नाटक में बीता, फ़िर वे तमिल के सुपरस्टार बने। इसी तमिलनाडु के एक और हीरो हैं करुणानिधि, जिन्होंने हिन्दी विरोध की ही राजनीति से अपना जीवन शुरु किया था और आज इस मुकाम तक पहुँचे हैं। बहुत लोगों को याद है कि साठ के दशक में तमिलनाडु में सभी दुकानों पर तमिल भाषा के बोर्ड लगाना अनिवार्य किया गया था, और हिन्दी के साइनबोर्ड पर कालिख पोती गई थी। आज लगभग वही काम मुम्बई में राज ठाकरे करने की कोशिश कर रहे हैं (उनके सफ़ल होने की सम्भावना फ़िलहाल नहीं के बराबर है), तो उस पर इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है? दूसरी तरफ़ जया बच्चन हैं जो लगभग दंभी अन्दाज़ में ठाकरे का मखौल उड़ाते हुए कहती हैं कि “हम यूपी वाले लोग हैं, तो हम हिन्दी में ही बोलेंगे…”। सोचा जा सकता है कि जिस परिवार को मुम्बई में 30-40 साल होने आये, मुम्बई ने ही उन्हें पहचान दी, रोजी-रोटी दी, आज भी वह “हम यूपी वाले हैं…” की मानसिकता से बाहर नहीं आ पाया है, तो इसमें किसे दोष देना चाहिये? निश्चित रूप से यह सिर्फ़ मुम्बई में ही सम्भव है, कोलकाता या चेन्नई में नहीं।

अक्सर मुम्बई के “मेट्रो कल्चर” की दलील और दुहाई दी जाती है, क्या चेन्नई और कोलकाता मेट्रो नहीं हैं? फ़िर वहाँ जाकर रहने वाला व्यक्ति कैसे तमिल और बांग्ला को अपना लेता है? और वही व्यक्ति मुम्बई में अपना सारा जीवन मराठी का एक शब्द बोले बिना निकाल लेता है? क्या “मेट्रो कल्चर” का मतलब स्थानीय भाषा और संस्कृति की उपेक्षा करने का लाइसेंस है? आम मध्यमवर्गीय मराठी व्यक्ति मुम्बई की सीमा से लगभग बाहर हो चुका है, आज मुम्बई सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यापारियों, शेयर दलालों, धनपतियों और अन्य राज्यों से आये लोगों का शहर बन चुका है। जब राज ठाकरे इस मुद्दे को उठाते हैं तो बुद्धिजीवियों और चैनलों में तत्काल उन्हें “लगभग आतंकवादी” घोषित करने की होड़ लग जाती है, जबकि करुणानिधि यदि दिल्ली में भी प्रेस कान्फ़्रेंस आयोजित करते हैं तो भी तमिल में ही बोलते हैं, लेकिन कहीं कोई बात नहीं होती। हिन्दीभाषियों द्वारा मराठी भाषा को मुम्बई में जितने हल्के तौर पर लिया जाता है, उतना वह तमिल भाषा को चेन्नई में नहीं ले सकते, वह भी तब जबकि मराठी भाषा की लिपि देवनागरी है, तमिल या मलयालम की तरह द्रविड नहीं। तमिल के मुकाबले, मराठी सीखना बेहद आसान है, लेकिन फ़िर भी ऐसी घोर उपेक्षा? इसमें किसका दोष है? क्या राज ठाकरे का, कि वह मराठी में बोर्ड लगाने की बात कह रहे हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में मराठी में बोलने का आग्रह कर रहे हैं, या फ़िर उनका जो अभी भी “हम यूपी वाले हैं…” की मानसिकता में जी रहे हैं?

एक शख्स हैं श्री साईसुरेश सिवास्वामी, तमिल हैं और लगभग 23 वर्ष पूर्व नौकरी के सिलसिले में मुम्बई आये थे। उन्होंने हाल के विवाद पर रेडिफ़.कॉम पर एक लेख लिखा है, जिसमें वे कहते हैं “जब मैं जवान था तब चेन्नई में हिन्दी साइनबोर्ड को कालिख पोतने वाला वहाँ “लोकल हीरो” समझा जाता था, और जब मैं मुम्बई आया तो यह देखकर हैरान था कि यहाँ मराठी का नामोनिशान मिटता जा रहा है और कोई भी साईनबोर्ड मराठी में नहीं है। यहाँ तक कि मुझे खुद शर्म महसूस होती है कि इतने वर्ष मुम्बई में बिताने के बावजूद मेरी हिन्दी अधिक शुद्ध है, मराठी की बनिस्बत…”। बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि “शिवसेना ने भी मराठी पर उतना जोर नहीं दिया, क्योंकि उसे महानगरपालिका से आगे बढ़कर राज्य की सत्ता चाहिये थी जो सिर्फ़ मराठी वोटों से नहीं मिल सकती थी, अन्ततः शिवसेना ने भी सिर्फ़ बम्बई को “मुम्बई” बनाकर इस मुद्दे से अपना हाथ खींच लिया…” लेकिन बाहर से आने वालों का यह फ़र्ज़ बनता था कि वह स्थानीय भाषा का सम्मान करते, उसके साथ चलते और उसे दिल से अपनाते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि मराठी माणुस स्वभावतः बेहद सहिष्णु, लोकतान्त्रिक और अपने काम से काम रखने वाला होता है। उसके सीधेपन को उसकी सहमति जानकर अन्य राज्यों के लोग आते गये, हिन्दी थोपते गये, पैसे के जोर पर मुम्बई में ज़मीनें हथियाते गये और एक आम मराठी व्यक्ति धीरे-धीरे मुम्बई से बाहर हो गया। राज ठाकरे को भी मराठी से बहुत प्रेम है ऐसा नहीं है, साफ़ है कि वह भी अपनी राजनीति को चमकाने के लिये ऐसा कर रहा है, लेकिन उसने जो मुद्दा उठाया है वह कई स्थानीय लोगों के दिल के तार हिलाता है। मंत्रालय और मुख्य कार्यालयों का कामकाज या तो हिन्दी में होता है या अंग्रेजी में, मराठी कहीं नहीं है। रोज़ाना नये अंग्रेजी स्कूल खुलते जा रहे हैं, जहाँ हिन्दी “भी” पढ़ाई जाती है, लेकिन मराठी स्कूलों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है, ज़ाहिर है कि यह राज्य सरकार का दोष है, लेकिन जो व्यक्ति मुम्बई में रहकर इलाहाबाद में स्कूल खोल सकता है, उसका फ़र्ज़ बनता है कि वह एकाध मराठी स्कूल मुम्बई में भी खोले।



लेकिन राज ठाकरे बहुत देर कर चुके हैं, उनके इस मराठी-अमराठी मुद्दे की पकड़ बनाने के लिये मुम्बई में इतने मराठी बचे ही नहीं हैं कि राज ठाकरे की राजनीति पनप सके। पिछले “मुम्बई मनपा” चुनावों में राज ठाकरे इसका मजा चख चुके हैं। राज ठाकरे द्वारा मराठी की बात करते ही अन्य प्रान्तों के लोग उनके खिलाफ़ लामबन्द हो जाते हैं और वे अकेले पड़ जाते हैं, ऐसा ही होता रहेगा, क्योंकि मुम्बई में बाहर से आने वालों की संख्या अब इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि अब वहाँ यह मुद्दा चलने वाला नहीं है। यह मुम्बई के स्थानीय मराठियों का दुर्भाग्य तो है, लेकिन इसके जिम्मेदार वे खुद ही हैं जो उन्होंने चेन्नई जैसा आन्दोलन नहीं चलाया और बर्दाश्त करते रहे।

हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, सप्ताह और पखवाड़ा मनाया जा रहा है, अच्छी बात है। हिन्दी-हिन्दी भजने वाले सिर्फ़ एक बार करुणानिधि को हिन्दी सिखाकर दिखायें, हिन्दी भाषा की अलख उत्तर-पूर्व के राज्यों (जहाँ से हिन्दीभाषियों को भगाया जा रहा है) और तमिलनाडु में जलाकर दिखायें। हालांकि अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के कारण अब स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है और दक्षिण के लोग भी हिन्दी सीखना चाहते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि बगैर इसके उत्तर भारत में काम चलाना मुश्किल होगा, लेकिन यह स्थिति दक्षिण से बाहर जाने वालों की है, दक्षिण में जाकर बसने वालों को वहाँ की स्थानीय भाषा सीखना-बोलना अभी भी आवश्यक है, जबकि मुम्बई में ऐसा नहीं है। दरअसल हिन्दी प्रांतों के लोग क्षेत्रीय भाषाओं को गम्भीरता से लेते ही नहीं हैं, यदि सीखना भी पड़े तो मजबूरी में ही सीखते हैं। वे इस बात को नहीं समझते कि उस क्षेत्रीय भाषा का भी अपना विराट साहित्य संसार है। वे हिन्दी को ही श्रेष्ठ मानते हैं, और क्षेत्रीय भाषा को संख्याबल से दबाने का प्रयास करते हैं। इसके ठीक उलट मराठी व्यक्ति है जो जिस प्रान्त में जाता है वहाँ की भाषा, बोलचाल का लहजा और पहनावा तत्काल पकड़ लेता है, मैं आपको बनारस के कई मराठी परिवार दिखा सकता हूँ, जिनकी धोती, मुँह में पान और अवधी तथा खड़ी बोली को सुनकर आप विश्वास नहीं करेंगे कि यह व्यक्ति ठेठ मराठी है। मराठी व्यक्ति कभी अन्य राज्यों में “गुट” नहीं बनाता, दबंगता नहीं दिखाता, न ही राजनीति में कोई खास दिलचस्पी रखता है। एक ज़माने में कर्नाटक से लेकर अटक (अफ़गानिस्तान) तक मराठा साम्राज्य फ़ैला हुआ था, लेकिन क्या आज की तारीख में महाराष्ट्र छोड़कर किसी भी अन्य राज्य में मराठी वोट बैंक नाम की कोई चीज़ है? क्या अन्य राज्यों में मराठियों ने कभी राजनैतिक ताकत जताने या सामाजिक दबाव बनाने की कोशिश की है? महाराष्ट्र से बाहर कितने विधायक और सांसद मराठी हैं? इन प्रश्नों के जवाबों को अन्य राज्यों में बसे हुए विभिन्न राज्यों के लोगों को लेकर उसका प्रतिशत निकालिये, स्थिति साफ़ हो जायेगी।

मेरा जन्म मध्यप्रदेश में हुआ है और कर्मस्थली भी यही है और मुझे इस पर गर्व है। मेरी हिन्दी कई हिन्दीभाषियों से बेहतर है, गाँधीसागर बाँध के कारण मध्यप्रदेश के हितों को चोट लगने पर मैं राजस्थान को गरियाता हूँ, और विद्युत मंडल के बँटवारे में यदि मध्यप्रदेश के साथ अन्याय हुआ तो छत्तीसगढ़ को भी खरी-खोटी सुनाता हूँ, और ऐसा ही होना चाहिये। जो भी व्यक्ति जहाँ रहे, जिस जगह काम करे, जहाँ अपना आशियाना बनाये, रोजी-रोटी कमाये-खाये, उसे वहाँ की भाषा-संस्कृति में घुल-मिल जाना चाहिये, तभी सामाजिक समरसता बनेगी। ये नहीं कि रहते-खाते-कमाते तो दुबई में हैं, लेकिन अस्पताल खोलेंगे आज़मगढ़ में, नागरिक तो हैं कनाडा के लेकिन सड़क बनवायेंगे टिम्बकटू में…



यह थोड़ा विषयान्तर हो सकता है लेकिन इस मौके पर विदेशों में बसे भारतीयों को भी इस मुद्दे से सीखने की आवश्यकता है, ऐसा क्यों होता है कि भारतीय जिस देश में जाते हैं वहाँ के स्थानीय समाज को वे नहीं अपनाते हैं। कई परिवार ऐसे हैं जो 30-40 साल से ब्रिटेन-कनाडा-न्यूजीलैण्ड में बसे हुए हैं, वहीं नौकरी-व्यवसाय करते हैं, उनकी नागरिकता तक ब्रिटिश है, वे भविष्य में कभी भी भारत नहीं आने वाले, लेकिन ताज़िन्दगी वे “भारत-भारत” भजते रहते हैं, यहाँ की सरकार भी उन्हें भारतवंशी(?) कहकर बुलाती रहती है, आखिर क्यों? फ़िर कैसे वहाँ का स्थानीय समाज उनसे जुड़ेगा? “हम तो यूपी वाले हैं…” की मानसिकता वहाँ भी दिखाई देती है और फ़िर जर्मनी, फ़िजी, अरब देशों, मलेशिया, केन्या सभी जगहों पर भारतीयों(?) पर हमले होते रहते हैं। रहे होंगे कभी आपके वंशज भारतीय, लेकिन अब तो आप और आपके बच्चे इंग्लैण्ड के नागरिक हैं, फ़िर भारत इंग्लैण्ड को क्रिकेट में हराये तो आप तिरंगा क्यों लहराते हैं? और फ़िर अपेक्षा करते हैं कि स्थानीय व्यक्ति आपका सम्मान करे?

यह सारा खेल पेट से जुड़ा हुआ है, हर जगह स्थानीय व्यक्ति को लगता है कि बाहर से आया हुआ व्यक्ति उसकी रोजी-रोटी छीन रहा है, इसका फ़ायदा नेता उठाते हैं और इसे भाषा का मुद्दा बना डालते हैं, और दोनों व्यक्तियों में आपसी सामंजस्य न होने के कारण आग और भड़कती जाती है। राज ठाकरे और करुणानिधि में कोई अन्तर नहीं है, दोनों ही क्षेत्रीयतावाद की राजनीति करते हैं, भाषा के विवाद पैदा करते हैं, अन्तर सिर्फ़ इतना है कि राज ठाकरे गालियाँ खा रहे हैं…और करुणानिधि मलाई। राज ठाकरे को गालियों से मलाई का सफ़र तय करने में अभी काफ़ी समय लगेगा… क्योंकि मराठी लोग ही उनका साथ नहीं देने वाले… लेकिन फ़िर भी स्थानीय भाषा के सम्मान और उसे “दिल से” अपनाने का मुद्दा तो अपनी जगह पर कायम रहेगा ही…

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23 comments:

Debashish said...

आपका लेख अच्छा है सुरेश, पर दो बातें मुझे कहना चाहुंगा
१. मुद्दा यहाँ जोर जबरदस्ती का है, राज का अंदाज़ गुंडई का है। अगर किसी अन्य राजनीतिक मुद्दे के तरह यह मुद्दा उठाते तो किसी को आपत्ति नहीं होती। पर कर क्या रहे हैं? सिनेमा के सबसे लोकप्रिय अभिनेता पर निजी हमले कर रहे हैं, टेक्सी चालकों और सामन्य नागरिकों को जानबूझकर तकलीफ पहुंचा रहे हैं उनके चीजें तोड़ फोड़ रहे हैं। यह अपना पक्ष रखने का तरीका नहीं।
२. भाषा को थोपना गलत है, कलकत्ते में दशक बिताने के बाद वहाँ का सरदार अपनी खुशी से बांग्ला बोलता है, घर पर पंजाबी में ही बात होती है। मैं ईटीवी मराठी पर कॉमेडी एक्सप्रेस चाव से देखता हूँ पर कल राज के गुंडे आकर मुझे इसे देखने पर मजबूर करने लेगे तो मैं यह कतई नहीं करुंगा।

Suresh Chiplunkar said...

देबू भाई पूरे आदर के साथ कहना चाहूंगा कि इस प्रकार की गुंडई तमिलनाडु में भी हो चुकी है, और बंगाल में भी… राज ठाकरे तो विशुद्ध राजनीति कर रहे हैं, लेकिन उनके साथ के युवक हताशा में गुंडई पर उतर आये हैं जब वे देख रहे हैं कि भाषा तो मुम्बई से गई ही, नौकरियां भी बाहर वाले ले जा रहे हैं… राज ठाकरे सिर्फ़ आग में घी डाल रहे हैं, आग तो पहले से लगी हुई थी… जिस प्रकार भाजपा-संघ परिवार हिन्दुओं की सहिष्णुता को ललकार दे रहे हैं, वैसे ही राज ठाकरे ने भी स्थानीय युवाओं की नब्ज पर हाथ रखा है…

Abel said...

मैं देबाशीष साहब की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत हूं. मैं खुद 7 साल की आयु में 25 साल पहले महाराष्ट्र आया और आज खुद को गर्व से महाराष्ट्रीयन कहता हूं. मेरी पत्नी महाराष्ट्रीयन हैं और मराठी मेरी प्रथम भाषा है. सुरेशजी ने ठीक कहा कि "क्योंकि मराठी लोग ही उनका साथ नहीं देने वाले…" क्योंकि ऎन यही लोग मराठी भाषा की दुर्दशा के ज़िम्मेदार हैं. अपनी भूल सुधारने कि बजाये गरीब टॅक्सीवाले, मज़दूर और पनवाडीयों को पीटनेसे और उनकी रोज़ी रोटी छीनने से भाषा या राज्य का कोई भला नहीं होने वाला हां, उनके तथा-कथित ठेकेदारों का शायद हो.

SHASHI SINGH said...
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SHASHI SINGH said...

सुरेशजी, आपकी बेवाक राय का मैं प्रशंसक रहा हूं, मगर इस तरह के मुद्दे समाज को बांटने के अलावा और कुछ भी नहीं दे सकते। यदि भाषायी गुंडई कोलकाता और चेन्नई में भी हो चुकीं हैं तो क्या इसी आधार पर मुम्बई में भी गुंडई की जानी चाहिये? आज कोलकाता अपनी उस गुंडई की कीमत औद्योगिक उजाड़ के रूप में चुका रहा है इससे हर कोई परिचित है। दक्षिण के भी किसी नेता को यदि राष्ट्रीय स्तर पर जलवे दिखाने की खुजली होती है तो हिन्दी उसके लिए उत्तर की भाषा न हो कर राष्ट्रीय भाषा हो जाती है। कुछ सालों पहले तमिल नेता जयललिता उत्तर प्रदेश में अपनी एक सभा में हिन्दी बोलकर सबको चौका चुकी हैं।

खुद अपनी बात कहूं तो मेरा मानना है कि अपनी भाषा-संस्कृति से सही मायनों में प्यार करने वाला किसी दुसरी भाषा-संस्कृति का अपमान कर ही नहीं सकता है। यदि कोई ऐसा करता है तो निश्चित तौर पर किसी भाषा-संस्कृति से उसका कोई लेना देना नहीं है... न दुसरे की और न ही अपनी।

भाषा-संस्कृति से इतर मैं एक सवाल उठाता हूं। कोलकाता बंगालियों का और चेन्नई तमिलों का जरूर हो सकता है मगर मुम्बई या दिल्ली सिर्फ वहां के स्थानीय लोगों का नहीं हो सकता है। जहां दिल्ली देश की प्रशासनिक राजधानी है वहीं मुम्बई आर्थिक राजधानी है। राजधानी यानी उस पर दावा पूरे देश का है। लिहाजा यहां न तो किसी पर रोक लगायी जा सकती है और न ही कोई बात थोपी जा सकती है। अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे क्षेत्रीय अस्मिता का पैरोकार नहीं देशद्रोही कहा जाना चाहिये।

संजय बेंगाणी said...

जया बच्चन ने जब कहा की हम युपी वाले है...तो थोड़ा आघात लगा. युपी वाले है इस लिए हिन्दी बोलेंगे? फिर हम क्या करेंगे? हिन्दी यूपीवालों की बपौती नहीं है. वह भारत की भाषा है. और उनका दंभ बहुत खला.

गुंडई से आप थोपना चाहो तो कौन स्वीकारेगा?
इसलिए राज से असहमती है. मगर मराठी हो या गुजराती यहाँ तक कि हिन्दी भी अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है.

संजय तिवारी said...

लंबा लेख और उस पर उतनी ही लंबी टिप्पणियां. अच्छा लगा.

Suresh Chiplunkar said...

अब तक प्राप्त टिप्पणियों से लगता है कि मैं अपना विचार लोगों तक ठीक से नहीं पहुँचा पाया, क्योंकि स्थानीय भाषा और स्थानीय लोगों के दर्द और उनके सरोकारों के बारे में कोई सकारात्मक टिप्पणी नहीं, बाहर से गये लोगों के स्थानीय भाषा के बारे में फ़र्ज़ के बारे में कुछ नहीं, "जहाँ रहो वहीं के फ़ायदे के बारे में सोचो" के विचार पर भी कोई टिप्पणी नहीं, देखते हैं कि मेरा दृष्टिकोण ठीक से पहुँचता है या नहीं? और टिप्पणी आ जायें फ़िर एक और पोस्ट बनती है :)

दिनेश पालीवाल said...

राज ठाकरे जी ठीक ही कह रहें हैं |
अगर हम भारतीय अपनी अपनी मातृभाषा ही ठीक से अपना लेते तो ये हालत नहीं होती |
अब बड़ा मुश्किल है |
२२ बीबियों और १८ सालियों वाला हमारा भारत (माता नहीं बाप) एक रखैल इंग्लिश का गुलाम हो गया है |
हमें तो माँ और मौसी से गोरी मेम ज्यादा पसंद आ रही है |


बिजली गई | बाकी फिर ............


dcp

सत्याजीतप्रकाश said...

सुरेशजी,
जहां हिंदी भाषियों का सवाल है, हिंदीभाषी हिंदी पट्टी में रहकर ही कई भाषाएं सीखते हैं. मसलन, मैं बिहार के बेगूसराय से हूं, मुझे बेगूराय की क्षेत्रीय भाषा अंगिका स्थानीय भाषा के रूप में विरासत में मिली. मेरी मातृभाषा मैथिली बनी. स्कूल आया तो वहां हिंदी सीखा.. बस लिखना, बोलना नहीं. फिर आगे बढ़ा तो अंग्रेजी सीखनी पड़ी, जो अब तक नहीं आई. एक हिंदुस्तान सैंकड़ों भाषाएं, हर इंसान अगर रोजगार के सिलसिले में विभिन्न राज्यों में रहे तो विभिन्न राज्यों की सभी भाषाएं सीखना उसके लिए संभव नहीं होगा. मैं बिहारी होते हुए भी भोजपुरी, मगही लिख-बोल नहीं पाता हूं. जबकि बिहारी होने के नाते मुझे भोजपुरी आनी चाहिए, क्योंकि यह कई देशों में बोली जाती है.
हम जितना विरोध हिंदी का करते हैं, उससे आधा विरोध अंग्रेजी के लिए नहीं कर सकते हैं. भारतीय भाषाओं का आपसी हित जुड़ा हुआ है. इसलिए विरोध अंग्रेजी का होना चाहिए. लेकिन ऐसा करने की हिम्मत न चेन्नई वालों में है न राजठाकरे में और न कोलकाता वाले में. क्योंकि हमलोग मानसिकता के गुलाम हैं और छुद्र राजनीतिज्ञों के हाथों की कठपुतली.

भुवनेश शर्मा said...

महाराष्ट्र से बाहर कितने विधायक और सांसद मराठी हैं?

हमारे तो ग्‍वालियर के ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया खुद मराठी हैं सांसद हैं, मंत्री भी हैं, उनकी बुआ भी सांसद हैं

वैसे मुद्दे के दूसरे पक्ष को रखना भी जरूरी था जो आपने किया हालांकि कुछ असहमतियां हो सकती हैं
बधाई

Deepak Purohit said...

सुरेशजी मुझे लगताहै आप कुंठित विचारधार के हो चुके हैं. कोई किसी की नौकरी नहीं छिनता है जिसमें काबिलियत है, गट्स है, मेहनती है उसे काम मिलता है. वो क्या कारण है कि एक मराठी को नौकरी नहीं मिल पाती*जरा इस पर गौर फरमाइये* किसी एक व्यक्ति के मुंह का निवाला छिनकर खुद खाना या अपने ही किसी भाई को खिलाना कहां की नियति है. अरे इतनी ही हिम्मत है तो किसी परप्रांतीय के ठीक बाजू में दुकान लगाईये और चला कर दिखाईये मैं मान जाउंगा*. परप्रांतीय सुबह ६ बजे दुकान खोल कर बैठ जाएगा*. और स्थानीय आदमी १० के पहले दुकान पर नहीं आता. शाम ७ बजे तक वह अपने घर पर होता है* क्या मुंबई में परप्रांतीयों से सामान सिर्फ परप्रांतीय ही करते हैं*. क्या स्थानीय महाराष्ट्र का व्यक्ति उनकी दुकान पर नहीं जाता. दूसरे राज्यों के गांवों से आदमी मुंबई आता है और मुंबई के सारे रास्ते बहुत जल्द जान जाता है. फिर एक टैक्सी लेकर अपना काम धंधा शुरु कर देता है. अनजान शहर में* स्थानीय आदमी टैक्सी चलाने में संकोच करता है. उसे शर्म आती है.

जिन राज्यों में कमाई का साधन नहीं था उन राज्यों के लोग अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए अपना गांव, अपना परिवार छोडकर हजारों कि.मी. दूर मुंबई, हैद्राबाद, कोलकाता, आसाम, चेन्नई चले गए हैं. वे वहां मेहनत कर पैसा कमाने गए क्योंकि उन्हें पता था कि वे अपना परिवार गांव में छोडकर आए हैं. उन्होंने कभी स्थानीय राजनीति नहीं की. आज का लोकल आदमी काम-धंधे में, नौकरी में राजनीति, लिडरी, पहले करता है.बाहरी आदमी अपने काम से मतलब रखता है.१०० रुपए मजदूरी का काम वह ८० रुपए में भी करने को तैयार हो जाता है.. स्थानीय आदमी १०० पर ही अडा रहता है और खाली बैठा रहता है*. लेकिन ८० रुपए में काम नहीं करेगा*

अशोक पाण्डेय said...

हिन्‍दी बढ़ेगी तो अन्‍य भारतीय भाषाएं भी साथ-साथ बढ़ेंगी। भारतीय भाषाएं आपस में लड़ेंगी तो फायदा विदेशी भाषा को होगा(जो अभी तक हो रहा है)।

..आपस में प्रेम करो देशप्रेमियों।

Suresh Chiplunkar said...

भाई दीपक पुरोहित जी ने मुझे कुंठित दिमाग वाला घोषित कर दिया है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि बिहार के लोगों को ही रेल्वे में अधिक नौकरियाँ क्यों मिलती हैं, इसमें किस "गट्स" का कमाल है? महाराष्ट्र राज्य में गैंगमैन जैसे पदों के लिये बिहार के मजदूरों की क्या आवश्यकता है? उन्होंने यह भी नहीं फ़रमाया कि बिहार और उत्तरप्रदेश से ही अधिक संख्या में पलायन क्यों होता है? बिहार की बदहाली के लिये राज ठाकरे कितने जिम्मेदार हैं और नहीं तो जो जिम्मेदार हैं क्या आज तक बिहारवासियों ने उनसे जवाब-तलब किया है?

brahmanand said...

ek dusare chor ko isliye sahi nahi kha ja sakta ki isi tarah ke aur bhi chor hai. aur rahi bat "dusare chor" ki wo to sidhe gunda gardi kar rha hai.bat kewal bhasa ki nahi hai .logo ko marna pitna ,hath pair kat dena kha tak sahi hai jo ye "dusara chor" kar rha hai?

Dr Prabhat Tandon said...

सुरेश जी आप ने एक दूसरे एंगल से बात को रखने की कोशिश की है और शायद इस पर कम से कम मेरा ध्यान तो गया ही नही , लेकिन मुद्दे विचारणीय अवशय हैं और हम उन से भाग ्भी नही सकते।

Deepak said...

भाई सुरेशजी अपने पहले गलत शब्द के लिए माफी चाहूंगा* हम कहते हैं कि मुंबई में परप्रांतियों ने कब्जा कर लिया है* उन्होंने राशन कार्ड बना लिया*. झोपडे बना लिए*. फुटपाथ पर कब्जा कर लिया*. सडकों में खोमचे (ठेले) लगाकर दुकानदारी बढा ली आदि.. इत्यादि* वगैरह* वगैरह* उन्हें कब्जा किसने करने दिया* स्थानीय मराठी माणुस ने* उनके राशन कार्ड किसने बनाए*. स्थानीय मराठी माणुस ने*.. झोपडे किसने बनने दिए* स्थानीय मराठी माणुस ने**सडकों पर दुकान किसने लगाने दी* स्थानीय मराठी माणुस ने** सरकारी स्थानीय अधिकारी, कर्मचारी ही उनसे रिश्वत लेकर उनके राशन कार्ड बना रहे हैं*पुलिस का पांडु (हवलदार) रोज उनसे रिश्वत लेकर शाम को घर जाता है क्या यह बात किसी को पता नहीं*. अरे स्थानीय सरकारी अधिकारी ही तो बेईमान है* मैंने पहले ही कहा है कि जिन राज्यों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी*. रोजगार के साधन नहीं थे* ऐसे ही राज्यों के लोग पेट भरने के लिए,, परिवार को पालने के लिए अपना सब कुछ छोडकर हजारों कि.मी. दूर निकलते हैं. वे पूरी मेहनत करते है* कुछेक लोग समाजविरोधी हो सकते हैं*. और वह हर भाषा, प्रांत में मिलेंगे*. जनाब आप उज्जैन में रहते है. मुंबई के किसी भी भाषा वाले व्यक्ति से पूछ लीजिए*. कि मेहनती कौन है*.? कोई भी शख्स अपने यहां किसी को काम देने से पहले यह नहीं देखता कि वह किस जात का है, किस प्रांत का है*. आप भी घर में काम वाली रखते वक्त यह नहीं देखते होंगे कि वह किस प्रांत से है*. बल्कि हम उसका काम देखते हैं, वह मेहनती है या नहीं*.. छुट्टियां तो नहीं मारता रहेगा* आदि* जात-पात, प्रांतवाद देखकर कोई अपने घर में, कार्यालय में, फैक्ट्री में किसी को नौकरी नहीं देता* अगर ऐसा होता तो सर्वप्रथम वह अपने खानदान के लोगों को ही नौकरी पर रखता*..
मैं एक बात आप सबको बता दू कि मुद्दा प्रांतवाद का नहीं है*. मुद्दा है उनकी कमाई का*. सभी को उनकी कमाई से जलन होती है*. मुंबई में एक वडापाव बेचने वाला, ठेलेवाला, सब्जी वाला, दूधवाला* अनुमानित २०, ५० हजार रुपए तक कमा लेता है. जिसका एक छोटा सा होटल वह लाखों रुपए कमाता है और अपने गांव में ले जाता है. बहन-बेटियों का ब्याह कराता है, बच्चों को पढाता है. और यही बात अन्य लोगों को नागवार गुजरती है और कहते हैं कि - ये साले भइया, बिहारी वहां से खाली लोटा लेकर आते हैं और यहां से कमाकर वापस जाते हैं. (ये खाली लोटे वाली बात काफी साल पहले एक प्रख्यात नेता-अभिनेता ने मारवाडयों के लिए कही थी) मैं कहता हूँ ये तो खाली लोटा लेकर आए थे*. और बिल्डिगें खडी कर ली*. इन लोगों के पास तो सब कुछ था* परिवार, पैसा, घर-बार*सब कुछ* फिर भी कुछ नहीं कर पाए* क्या कारण है*
हमें यह पता करना होगा कि स्थानीय व्यक्ति क्यों पिछड रहा है*. अगर उसे नौकरी नहीं मिल रही है तो कमियां ढूंढिये.. वह क्यों पिछड रहा है*.क्या सारे स्थानीय लोगों को नौकरी नहीं मिलती*

Deepak said...

भाई देवाशीषजी की बात से सहमत हू*. राज अपनी दुकानदारी के लिए यह मुद्दा उठा रहा है. उसे पता है बच्चन फैमिली को निशाना बनाने से बात दूर तलक जाएगी* और उसके मुद्दे को हवा मिलेगी* सबका ध्यान इस ओर आएगा*यह वोटों की राजनीति है*अब जो व्यक्ति पिछले ५० सालों से महाराष्ट्र में रह रहे हो.. और आप उसे कहेंगे कि वह परप्रांतीय है तो उसके मन में क्या बितेगी*. फिर वह कोई भी धर्म का काम (जैसे की बच्चन ने स्कूल खोला उत्तर प्रदेश में) महाराष्ट्र में क्यों करेगा*. अपने जन्मस्थान में जाएगा*. जो लोग ६०-७० वर्ष पहले महाराष्ट्र आ गए.. चाहे वह किसी भी भाषा के हो. उनके मन में अब यह बात आ रही है कि पहले मुस्लिम, फिर तमिल, तेलुगु और अब हिन्दी भाषी शायद एक दिन हमारे ऊपर भी आए* तो क्यों ना अपने पैतृक गांव में सुविधाएं आदि बनाकर रखी जाए*.
राज को सम्मान चाहिए वह भी जोर-जबरदस्ती से*. उसे सिर्फ महाराष्ट्र की राजनीति करनी है.. मेरा दावा है कि अब वह कभी जिदगी में महाराष्ट्र से बाहर जाने वाला नहीं*. बाल ठाकरे महाराष्ट्र से बाहर कब गए* मुझे भी याद नहीं आ रहा है*. राज घर का शेर है.
यह मुद्दा बरसों से चला आ रहा है. देखिएगा ५-१० साल बाद भी यही मुद्दा रहेगा. परप्रांतियों को हटाओ. महाराष्ट्र बचाओ. जिन कामों को स्थानीय लोगों ने निम्न दर्जे का माना था परप्रांतीय वे काम कर रहे हैं. अब उस धंधे से कमाई अच्छी होने लगी तो हमें ऐतराज होने लगा. कॉम्पिटीशन होना चाहिए*. परप्रांतियों को भगाने की बजाय उनके बाजू में दुकान लगाईये*. मेहनत करिए*. आप सफल होगे तो परप्रांतीय अपने आप चला जाएगा* उसके हटाकर दुकान लगाओगे*. बिना मेहनत किए जमे जमाए धंधे पर कब्जा करना चाहते हैं.

Suresh Chiplunkar said...

दीपक भाई, लम्बी-लम्बी टिप्पणियों के लिये धन्यवाद, लेकिन मुझे लगता है कि हम मुद्दे से भटक गये हैं। मेरे लेख का आशय था कि 1) जब बाहर के लोग चेन्नई में तमिल, कोलकाता में बंगाली बोलते हैं तो मुम्बई में मराठी क्यों नहीं बोलते? (कोई जवाब नहीं…) 2) चेन्नई में जबरदस्ती तमिल बुलवाई गई लेकिन मुम्बई में ऐसा नहीं किया गया, क्या यह मराठियों की सहिष्णुता नहीं है? 3) उप्र-बिहार से सर्वाधिक पलायन होता है, इन राज्यों की बदहाली के लिये कौन जिम्मेदार है? (कोई जवाब नहीं…) 4) रेल्वे में बिहारियों का प्रतिशत ज्यादा क्यों है? (सिर्फ़ टेलेण्ट के आधार पर तो नहीं हो सकता)। रही बात स्थानीय लोगों और बाहरी लोगों के काम की, तो अमेरिका और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी भारतीयों को "हमारी नौकरी खाने वाला" की निगाह से ही देखा जाने लगा है, ये एक मानव स्वभाव है। आपने इस बात का भी गोलमोल जवाब दिया कि मुम्बई में इतने साल रहने के बावजूद क्यों कोई व्यक्ति "अपने गाँव"(?) में स्कूल खोलता है? इसका साफ़ मतलब है कि उसने इस शहर को दिल से नहीं अपनाया, उसका मकसद सिर्फ़ मुम्बई से पैसा कमाना है… फ़िर उसे स्थानीय व्यक्ति "परप्रान्तीय" कहता है तो क्या गलत है? इस बात का भी कोई जवाब नहीं मिला कि जब रजनीकान्त सरेआम तमिल में बोलते रहते हैं तो हिन्दी फ़िल्म कलाकारों को (कम से कम मुम्बई में) मराठी में बोलने में शर्म क्यों आती है? (कईयों को तो हिन्दी बोलने में भी शर्म आती है) आशा है कि इन सवालों के भी जवाब मिलेंगे…

Abel said...

आदरणीय सुरेशजी,

आपने सही कहा. क्यॉंकि मूलरूप से मुद्दा ही गलत था और यही वजह है कि प्रतिक्रियायें भी उसी के अनुरूप आ रही हैं. मैं आपसे अपेक्षा कर रहा था कि जब मुंबई में राज ठाकरे के अनुयायिओं (?) ने गुंडागर्दी की तब आपकी कलम जागेगी. उसके विपरीत आज आप राष्ट्रभाषा के विरूद्ध लिख रहे हैं वह भी राष्ट्रभाषा में. शायद बी. जे. पी और संघ यहीं मार खाता है.

रही बात मराठी की तो मेरा मराठी प्रेम मैं अक्सर इस तरह से सिद्ध करता हूं कि किसी भी मुसलमान से मराठी में बात करता हूं और शायद आपको निराशा होगी कि लगभग 99.99 स्थानिक मुसलमानों ने हमेशा मराठी में ही जबाब दिया.

मैं हरगिज़ आपको ग़लत सिद्ध करने की कोशिश नहीं कर रहा पर तथ्य सामने रखना मेरा कर्तव्य है.

Abel said...

आदरणीय सुरेशजी,

आपने सही कहा. क्यॉंकि मूलरूप से मुद्दा ही गलत था और यही वजह है कि प्रतिक्रियायें भी उसी के अनुरूप आ रही हैं. मैं आपसे अपेक्षा कर रहा था कि जब मुंबई में राज ठाकरे के अनुयायिओं (?) ने गुंडागर्दी की तब आपकी कलम जागेगी. उसके विपरीत आज आप राष्ट्रभाषा के विरूद्ध लिख रहे हैं वह भी राष्ट्रभाषा में. शायद बी. जे. पी और संघ यहीं मार खाता है.

रही बात मराठी की तो मेरा मराठी प्रेम मैं अक्सर इस तरह से सिद्ध करता हूं कि किसी भी मुसलमान से मराठी में बात करता हूं और शायद आपको निराशा होगी कि लगभग 99.99 स्थानिक मुसलमानों ने हमेशा मराठी में ही जबाब दिया.

मैं हरगिज़ आपको ग़लत सिद्ध करने की कोशिश नहीं कर रहा पर तथ्य सामने रखना मेरा कर्तव्य है.

दहाड़ said...

सुरेश जी का मुद्दा सही है,जिसकी खाओ उसकी गाओ.और ये बात-बात मे संघ को लानत भेजने वाले संघ के बारे में कितना जानते हैं,संघ की पूरे देश में लगभग ६०००० शाखायें हैं,जहां प्रार्थना संस्क्रत में ही गायी जाती है.

COMMON MAN said...

lekh achcha hai, mudda bhi achcha hai, is desh men samanta to kabhi aa hi nahi sakti, isliye is desh men kabhi sudhar hoga hi nahin