Monday, September 29, 2008

पोप का साम्राज्य और उनका दुःख…

Pope & Conversion in India
जी न्यूज़ पर चर्च के बारे में एक सीरिज़ आ रही है, जिसमें बताया गया है कि भारत सरकार के बाद इस देश में भूमि का सबसे बड़ा अकेला मालिक है “चर्च”, जी हाँ, “चर्च” के पास इस समय समूचे भारत में 52 लाख करोड़ की भू-सम्पत्ति है। इसमें से लगभग 50 प्रतिशत ज़मीन उसके पास अंग्रेजों के समय से है, लेकिन बाकी की ज़मीन तमाम केन्द्र और राज्य सरकारों ने उसे धर्मस्व कार्य हेतु “दान” में दी है।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि धर्म के नाम पर सबसे अधिक रक्तपात इस्लाम और ईसाई धर्मावलम्बियों द्वारा किया गया है। ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना, सेवा करने के लिये स्कूल और अस्पताल खोलना आदि चर्च के मुख्य काम हैं, लेकिन असल में इसका मकसद ईसाईयों की संख्या में वृद्धि करना होता है। गरीब, ज़रूरतमंद, अशिक्षित लोग इनके फ़ेंके हुए झाँसे में आ जाते हैं, रही-सही कसर भारी-भरकम पैसे और नौकरी का लालच पूरी कर देता है। “चर्च” की सत्ता और धन-सम्पत्ति के अकूत भण्डार के बारे में जब-तब कई पुस्तकों और जर्नलों में प्रकाशित होता रहता है। भारत में चर्च फ़िलहाल “गलत” कारणों से चर्चा में है, ज़ाहिर है कि “धर्मान्तरण” के मामले को लेकर। इन घटनाओं पर “पोप” भी बहुत दुखी हैं और उन्होंने भारत में अपने प्रतिनिधियों और भारत सरकार (इसे सोनिया गाँधी पढ़े) के समक्ष चिन्ता जताई है।



पोप का दुखी होना स्वाभाविक भी है, जिस “एकमात्र सच्चे धर्म” का जन्म 2008 वर्ष पहले समूची धरती से “विभिन्न गलत अवधारणाओं को मिटाने के लिये” हुआ था, उस पर भारत जैसे देश में हमले हो रहे हैं। चर्च और पोप की सत्ता जिस “प्रोफ़ेशनल” तरीके से काम करती है, उसे देखकर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ भी शर्मा जायें। जिस तरह विशाल कम्पनियों में “बिजनेस प्लान” बनाया जाता है, ठीक उसी तरह रोम में ईसाई धर्म के प्रचार के लिये “वार-प्लान” बनाया जाता है। यह “योजनायें” विभिन्न देशों, विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न धर्मों के लिये अलग-अलग होती हैं। इन सभी योजनाओं को “गहन मार्केटिंग रिसर्च” और विश्लेषण के बाद तैयार किया जाता है। जिस प्रकार एक कम्पनी अपने अगले आने वाले 25 वर्षों का एक “प्रोजेक्शन” तैयार करती है, उसी प्रकार इसे भी तैयार किया जाता है। ऐसा बताया जाता है कि वर्तमान में ऐसी 1590 योजनायें चल रही हैं जो कि सन् 2025 तक बढ़कर 3000 हो जायेंगी। सन् 2025 के “प्रोजेक्शन” के अनुसार बढ़ोतरी इस प्रकार की जाना है (यानी कि टारगेट यह दिया गया है) वर्तमान 35500 ईसाई संस्थायें बढ़कर 63000, धर्म परिवर्तन के मामले 35 लाख से बढ़कर 53 लाख, 4100 विभिन्न मिशनरी संस्थायें बढ़कर 6000, 56 लाख धर्मसेवकों की संख्या बढ़ाकर 65 लाख (पूरे यूरोप की समूची सेना से भी ज्यादा संख्या) किया जाना है। वर्तमान में चर्च की कुल सम्पत्ति (भारत में) 13,71,000 करोड़ है (जिसमें खाली पड़ी ज़मीन शामिल नहीं है), यह राशि भारत के GDP का 60% से भी ज्यादा है, इसे भी बढ़ाकर 2025 तक 40,00,000 करोड़ किया जाना प्रस्तावित है।

इवेलैंजिकल चर्च द्वारा लाखों की संख्या में साहित्य बाँटा जाता है। वर्तमान में चर्च द्वारा 20 करोड़ बाइबल, 70 लाख बुकलेट, 1,70,000 मिशनरी साहित्य, 60000 पत्रिकायें और 18000 लेख वितरित किये जाते हैं, सन् 2025 तक इसे बढ़ाकर दोगुना करने का लक्ष्य दिया गया है। इसी प्रकार चर्च द्वारा अलग-अलग देशों में संचालित विभिन्न रेडियो और टीवी स्टेशनों की संख्या 4050 से बढ़ाकर 5000 करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। हालांकि चर्च द्वारा अपरोक्ष रूप से “खरीदे हुए” कई चैनल चल ही रहे हैं, लेकिन इससे उनका नेटवर्क और भी मजबूत होगा। बजट देखें तो हाल-फ़िलहाल प्रति व्यक्ति को ईसाई बनाने का खर्च लगभग 1.55 करोड़ रुपये आता है (सारे खर्चे मिलाकर) जिसे 2025 तक बढ़ाकर 3.05 करोड़ प्रति व्यक्ति कर दिया गया है।

दुनिया भर के चार्टर्ड अकाउंटेण्ट्स के लिये एक खुशखबरी है। चर्च द्वारा इन चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को किसी भी बड़ी से बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी से अधिक भुगतान किया जाता है। चर्च द्वारा हिसाब-किताब रखने के लिये लगभग 4800 करोड़ रुपये ऑडिट फ़ीस के रूप में दिये जाते हैं। लेकिन पोप की मुश्किलें यहीं से शुरु भी होती हैं, एक अनुमान के अनुसार चर्च के पैसों में घोटाले का आँकड़ा बेहद खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है, जिसके सन् 2025 तक बहुत ज़्यादा बढ़ जाने की आशंका है। इस प्रकार चर्च एक संगठित MNC की तरह काम करता है, भले ही इसमें आर्थिक घोटाले होते रहते हैं, अधिक जानकारी के लिये International Bulletin of Missionary Research (IBMR, जनवरी 2002 का अंक) देखा जा सकता है।



पोप की मुश्किलें भारत में और बढ़ जाती हैं जब जयललिता और नरेन्द्र मोदी जैसे “ठरकी” लोग धर्मान्तरण के खिलाफ़ अपने-अपने राज्यों में कानून लागू कर देते हैं, उनकी देखादेखी शिवराज और वसुन्धरा जैसे लोग भी ऐसा कानून बनाने की सोचने लगते हैं। यदि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जायेगी तो पोप 2000 साल पुराने इस सबसे पवित्र धर्म को कैसे बचायेंगे? उनकी विशाल “सेना” क्या करेगी? जबकि उसमें से भी 5 लाख लोग प्रतिवर्ष रिटायर हो जाते हैं, उससे अधिक की नई भरती की जाती है। “चर्च” दुनिया की सबसे बड़ी रोज़गार निर्माता “कम्पनी” है। जयललिता और मोदी दुनिया के उस इलाके से आते हैं जहाँ के गरीबों को “सेवा” और “पवित्र धर्म” की सबसे अधिक ज़रूरत है। IBMR की रिपोर्ट के अनुसार भारत में किसी भी गरीब को ईसाई बनाने का खर्च दुनिया के किसी विकसित देश के मुकाबले 700 गुना (जी हाँ 700 गुना) सस्ता है। भारत पोप के लिये सबसे “सस्ता बाजार” है, लेकिन जयललिता और मोदी जैसे लोग उनका रास्ता रोकना शुरु कर देते हैं। पोप और उनके भारतीय “भक्त” इस प्रयास में हैं कि इस प्रकार के कानून और न बनने पायें, जो बने हैं उन्हें भी हटा लिया जाये, टीवी चैनलों पर चर्च की छवि एक “सेवाभावी”, “दयालु” और “मददगार” की ही दिखाई दे (ये और बात है कि नागालैण्ड जैसे राज्य में जैसे ही ईसाई बहुसंख्यक होते हैं, हथियारों के बल पर बाकी धर्मों के लोगों को वहाँ से खदेड़ना शुरु कर देते हैं), और इस कार्य में वे सफ़ल भी हुए हैं, क्योंकि उन्हें भारत के भीतर से ही “सेकुलरिज़्म” के नाम पर बहुत लोग समर्थन(?) के लिये मिल जाते हैं।

तो कहने का तात्पर्य यह है कि पोप अपने विशाल साम्राज्य के बावजूद भारत के मामले में बहुत दुःखी हैं, आइये उन्हें सांत्वना दें… और हाँ यदि आप में भी “सेवा”(?) की भावना हिलोरें लेने लगी हो, तो एक NGO बनाईये, चर्च से पैसा लीजिये और शुरु हो जाईये… भारत जैसे देश में “सेवा” का बहुत “स्कोप” है…


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22 comments:

संजय बेंगाणी said...

आप बहुत सही लिखे हो. आँकड़े कहाँ से जुटा लिए? बहुत खूबम क्योंकि कुछ लोग आँकड़ो की ही भाषा समझते है.

वैसे आपकी बातो को खयाली भय या सिरफिरा चिंतन कहा जाएगा, वैसा ही आज से सत्तर साल पहले जो कहते थे कि सम्भल जाओ पाकिस्तान बन जाएगा तब उन्हे भी कट्टरपंथी ही कहा जाता था, मगर आज सच्चाई सामने है.

Ghost Buster said...

इस समय यूरोप और अमेरिका में ईसाईयत बड़े खतरे में है. मक्डोनाल्ड संस्कृति में रंगी नयी पीढी चर्च से दूर होती जा रही है. अब दुनिया भर के गरीब, पिछडे और अशिक्षित जनसमुदाय के कन्वर्जन पर ही भविष्य की आशा टिकी है.

भुवनेश शर्मा said...

सोच रहा हूं 2025 में ईसाई बनूं या अभी :)
कोई एकाध करोड़ देने वाले चर्च का पता मिले तो बताईयेगा...अपन भी जीसस के भक्‍त बनने को तैयार हैं. :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपको कोटिशः बधाई। इस कच्चा-चिठ्ठा वाली पोस्ट के लिए। इन कथित सेकुलरवादियों ने देश का बेड़ा गर्क कर रखा है।

Anil Pusadkar said...

jay ho mahajaal ke mahaprabhu,satya vachan maharaj.aapki chintaa vaajib hai aur seva ke naam par dharmantaran par tatkaal rok lagni chahiye

Anil Pusadkar said...

jay ho mahajaal ke mahaprabhu,satya vachan maharaj.aapki chintaa vaajib hai aur seva ke naam par dharmantaran par tatkaal rok lagni chahiye

E-Guru Rajeev said...

मैंने सोच रखा है सारे पोपों का धर्मांतरण कर दूँ, वैसे कितने आदमी हैं !!
एक आध आंकडा दे दें, ड्यूटी पर लग जाता हूँ. ;-)

मिहिरभोज said...

आप रोजाना क्यों नहीं लिखते हैं कुछ रिसर्च करनी है तो बंदा हाजिर है....बस आपको एक नाम देने का मन कर रहा है बुरा नहीं मानना .......नाना पाटेकर

Cyril Gupta said...

बहुत जबर्द्स्त रिसर्च है.

सत्याजीतप्रकाश said...

इससे बचने का एक उपाय है, अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व तोड़ो, ईसाई मिशनरी स्कूल अपने आप बंद हो जाएंगे, बाकी अस्पताल तो हम आप भी चला सकते हैं. देशी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा दें. इंटरनेट के यूनीकोडीकरण ने इस काम की शुरूआत कर दी है.
सूत्र- भारतीय भाषा और संस्क़ति ईसाईयत की व्यत्क्रमानुपाती होती हैं.

PD said...

सीधी सच्ची बात.. मैं भगवान को नहीं मानता.. पिछली बार मंदिर कब गया था याद भी नहीं है.. मगर जो सेकुलरवादी सही को गलत कहते फिरते हैं उससे डर लगने लगता है कि कहीं कट्टर हिंदू बन कर ना रह जाऊं..
बहुत बढिया लेख भाई साहब..

रंजना said...

अत्यन्त प्रभावशाली लेख.आपने लगभग सबकुछ कह दिया.आपके एक एक शब्द से सहमत हूँ.बहुत ही सही लिखा है.

mahashakti said...

बेहतरीन लेख, इस लेख को पढ़ने के बाद बहुतों की आखे खुलेगी जिन्हे सिर्फ हिन्‍दु विरोध ही दिखता है। कमेन्ट में बहुत मित्रों ने बहुत कुछ कह दिया है जिससे अब मेरा कुछ कहना सूर्य को दिया दिखाना भर होगा।

जय श्रीराम

Deepak said...

अपने धर्म में नौकरी मिले तो कोई दूसरा धर्म क्यों अपनाएं? हम, अपना धर्म किसी की मदद नहीं करता लेकिन अगर कोई दूसरा धर्म उसकी मदद करता है तो हम धर्म परिवर्तन का आरोप लगाते हैं. वे लोग उसकी मदद करते हैं. उसे काम-धंधा देते हैं. धर्म परिवर्तन तो वह व्यक्ति/परिवार स्वयं खुद करता है. जब हजारों लोग धर्म परिवर्तन करते हैं तो मीडिया वाले चिल्लपो मचाते हैं. फिर टटपुंजे नेता नेतागिरी के लिए पहुँच जाते हैं. उन्हें फिर से अपने धर्म में शामिल किया जाता है उनके पांव धोकर. (जैसे दिलीप सिह जूदेव ने किया). वे जबरन किसी पर दबाव बनाकर धर्म परिवर्तन नहीं कराते हैं. जिस परिवार की सारी परेशानियां (आर्थिक) दूर हो जाती हैं. वह परिवार स्वयं उनके सांचे में ढल जाता है. और जिन्हें आपत्ति है वे ऐसे परिवारों की मदद के लिए आगे आए.

लवली said...

बिल्कुल सही लिखा है आपने ,आश्चर्य है ये लोग ख़ुद को सबसे दयालु और सभ्य कैसे कहते हैं ?

अजित वडनेरकर said...

इनके बारे में तो कुछ भी खरी खरी कही जा सकती है। दूसरे वाले के बारे में भी कभी ऐसी ही खरी खरी कह कर दिखाइये न ! उनकी भी ऐसी ही योजनाएं हैं। कुछ ज्यादा खतरनाक । कहते हैं सबसे नया पंथ है यह । इनके बड़े बाबा ने कुछ बातें लिखी थीं जिनमें युद्ध भी जायज़ था और लूट भी। कई विरोधाभासों वाली इस विचारधारा ने बहुत बड़ी सफलता इसी लिए हासिल की क्योंकि बड़े बाबा ने लूट, युद्ध और भी न जाऩे कितनी नैतिकताओं के बारे में अलग किस्म की व्यवस्थाएं दी थीं जिन्हें अपनाकर कोई भी मनचाही व्याख्या और ऩई व्यवस्था बना सकता था। इस पंथ की बातें विदेशी ज़बान में थी और आज तक इस देश का बेपढ़ा-लिखा तबका तो क्या पढ़ा लिखा तबका भी दावे से नहीं कह सकता कि जो बातें उस पंथ के पुरोहित फैला रहे हैं वे उसकी विवेचना सही कर रहे हैं या नहीं।
बहुत पेंच है। बाबा साहब के बताए रास्ते पर चलने की बजाय सारा जहां हमारा कहनेवालों के खतरनाक मंसूबे दुनिया देख रही है और भुगत रही है।

COMMON MAN said...

bewakoofon ke liye kuchh bhi samjhaya nahi jaa sakta, jo ye kahte hain ki log khud b khud dharmanantarit ho jaate hain vo jhoot bolte hain, talwar ke jor se ya paise ke bal par hi dharmantaran hota hai, yadi khoobion se hi dharmantaran hota to poori duniya men ek-do hi dharm bachte. khatre ko dekhkar bhagna ghor moorkhta hai,

हिन्दुस्तानी एकेडेमी said...

आप हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, इसके लिए साधुवाद। हिन्दुस्तानी एकेडेमी से जुड़कर हिन्दी के उन्नयन में अपना सक्रिय सहयोग करें।

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सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते॥


शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा की कृपा से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों। हार्दिक शुभकामना!
(हिन्दुस्तानी एकेडेमी)
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Suresh Chandra Gupta said...

चर्च अपने धंधे में लगा है. धंधे में फायदा, नुकसान, घोटाला सभी होता है. धंधे में दोगली नीतियाँ भी होती हैं. फ्रांस के राष्ट्रपति चिंता करते हैं भारत में ईसाई मारे जा रहे हैं. वह भारत के प्रधान मंत्री से इस पर विरोध प्रकट करते हैं और कहते हैं कि वह भारत में ईसाइयों को अपने धर्म के अनुसार रहने और उस का प्रसार करने की आजादी की रक्षा करें. मनमोहन जी तुंरत निंदा कर देते हैं पर ईसाईयत के प्रसार के रोकने के बारे में कुछ नहीं कहते किसके कारण यह सब हो रहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति, दूसरी और यह कहते हैं कि सिखों को फ्रांस के कानूनों का पालन करना होगा. अगर फ्रांस का कानून पगड़ी के ख़िलाफ़ है तो वह पगड़ी नहीं पहन सकते. मतलब भारत ईसाइयों के लिए उन के फायदे के कानून बनाए, और सिख अपने धर्म की मर्यादा भंग करके भी फ्रांस के कानून का पालन करें. और इस विषय पर मनमोहन जी सहमति में गर्दन हिलाएं. पोप जानते हैं कि उनकी लगाम एक ईसाई के हाथ में है.

दहाड़ said...

धर्म परिवर्तन का गरीबी/शिक्शा से कोइ लेना देना होता तो आज सबसे ज्यादा मुसल्मानो ने धर्म परिवर्तन किया होता क्योन्कि गरीबी वहां सबसे ज्यादा है\जो अपने धर्म का ना हुआ वो अपने देश या मां-बाप का सगा कैसे होगा\
विवेकानन्द ने कहा था-जब एक हिन्दु धर्मांतरित होता है तो ना केवल एक हिन्दु कम होता है बल्कि देश का एक दुश्मन बढ जाता है

दहाड़ said...

धर्म परिवर्तन का गरीबी/शिक्शा से कोइ लेना देना होता तो आज सबसे ज्यादा मुसल्मानो ने धर्म परिवर्तन किया होता क्योन्कि गरीबी वहां सबसे ज्यादा है\जो अपने धर्म का ना हुआ वो अपने देश या मां-बाप का सगा कैसे होगा\
विवेकानन्द ने कहा था-जब एक हिन्दु धर्मांतरित होता है तो ना केवल एक हिन्दु कम होता है बल्कि देश का एक दुश्मन बढ जाता है

mehta said...

abb hindu ko jagruk karna asan ho rha hai kyo jo isai log mul isai ya videshi hai wo log khud ye man rhe hai shanti kewal hindu dharm me hai lekin dharm se upper bhukh ho rhi hai or iss bat ka fayda ye log utha rhe hai pasa bharat me bhi hai parantu wo pasa swiss banko me jma hai sadhu sant hamare bhi hai parantu sawami jee america me updesh de rhe hai ye ho kya rha hai khud ki jameen to koi or lutne ki koshish kar rha hai aap vedesho me hai jab ki hamare sadhu santo ke pas itna pasa hai ki bharat ko khushhal banaya ja sakta hai par ye log to ek rupya kharch nhi karte ek pop hai apne dharm ko badhata ja rha hai or ek ham hai ki sab kam videshi dabav me kar rhe hai kya koi aaj media me keh sakta hai bharat hindu rashtra tha jab ki islam ki kheti orangjeb ne hinduo ka khun bha kar balat dharm pariwartan se ki thi or isai log to angrego ke raj me aye lekin kehte hai bharat dharm nirpeksh hai ho kya rha hai ek hindu hai jat pat par larai kar rha hai kya abb hame jati pati bhul kar eka nhi hona chahiye .....hindu garv se kho ham ek hai .......................