Thursday, August 28, 2008

ऐ “सेकुलर” उठ, जम्मू से ध्यान बँटाने के लिये कंधमाल चल…

Secularism, Jammu Agitation & Kandhamal
इस देश में एक परम्परा स्थापित होती जा रही है कि यदि आप हिन्दू हैं और अपने धर्म के प्रति समर्पित हैं और उसकी रक्षा के लिये कुछ भी करते हैं तो आप “हिन्दू राष्ट्रवादी” कहलायेंगे, जिनकी तुलना “नाजियों” से की जायेगी, और यदि आप हिन्दू हैं और गला फ़ाड़-फ़ाड़कर हिन्दुत्व और हिन्दुओं के खिलाफ़ चिल्लायेंगे तो आप “महान सेकुलर” कहलायेंगे, यही बीते साठ सालों की भारत की राजनीतिक विडम्बना है, जो अब धीरे-धीरे वर्ग-संघर्ष का रूप लेती जा रही है। “सेकुलर” लोग जब RSS और उसके संगठनों की ओर एक उंगली उठाते हैं तो उनकी तरफ़ चार उंगलियाँ स्वयमेव उठ जाती हैं और ये चार उंगलियाँ स्वतन्त्रता के साठ वर्षों में की गई अनगिनत भूलों की गवाही होती हैं। खुद की गिरेबान में झाँकने की बजाय, “सेकुलरिज़्म” का बाना ओढ़े हुए ये “देशद्रोही” हर घटना के लिये RSS को जिम्मेदार ठहराकर मुक्त होना चाहते हैं। लेकिन यह ढोंग अब ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है, इन “सेकुलरों” की पोल खुलने लगी है।

ताज़ा मामला है उड़ीसा में कंधमाल जिले का, जहाँ हिंसा हुई है, कुछ लोग मारे गये हैं और कई घायल हुए हैं। घटना की जड़ में है 83 वर्षीय स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की कायरतापूर्ण हत्या। स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती उड़ीसा के जंगलों में आदिवासियों के बीच 1967 से लगातार काम कर रहे थे। स्वामीजी ने कई स्कूल, अस्पताल और मन्दिर बनवाये हैं, जो आदिवासियों के बीच शिक्षा का प्रसार करने में लगे हैं। सेकुलरों को खासतौर पर यह बताने की आवश्यकता है कि आज जो कंधमाल की स्थिति है वह रातोंरात नहीं बन गई। 23 दिसम्बर 2007 को इसकी शुरुआत की गई थी, जब ब्रहमनीगाँव में ईसाईयों ने गाँव में स्थित मन्दिर के सामने ही चर्च का एक गेट बनाने की कोशिश की। वहाँ के स्थानीय निवासियों और हिन्दुओं ने इस बात का विरोध किया क्योंकि चर्च का एक गेट पहले से ही मौजूद था, जो कि मन्दिर से दूर था, लेकिन फ़िर भी जबरन वहाँ एक गेट बना ही दिया गया, जिसके बाद ईसाई-हिन्दू संघर्ष की शुरुआत हुई, चूँकि उस गाँव में ईसाईयों की संख्या ज्यादा है, अतः हिन्दुओं को बलपूर्वक दबा दिया गया। जब लक्ष्मणानन्द सरस्वती जी उस गाँव में पहुँचे तो उनकी कार पर भी हिंसक ईसाईयों द्वारा हमला किया गया जिसमें उनके दो सहायक गम्भीर रूप से घायल हुए थे (यानी कि यह घटना लगभग आठ माह पुरानी है)। स्वामीजी उस समूचे इलाके में श्रद्धा और आदर के केन्द्र हैं, उनके हजारों समर्थकों से ईसाईयों के झगड़े शुरु हो गये। कई लोग इन झगड़ों में घायल हुए, कई मकान जलाये गये और सम्पत्ति को नुकसान पहुँचा। यहाँ तक तो स्थिति नियन्त्रण में थी, लेकिन जब ब्रहमनीगाँव, झिंझिरीगुड़ा, कटिंगिया, और गोदापुर इलाकों में हुए हमलों के आरोपियों की धरपकड़ की गई तो उसमें से अधिकतर नक्सली और माओवादी उग्रवादी थे, जिनका घनिष्ठ सम्बन्ध चर्च से था। इन उग्रवादियों से 20 रायफ़लें और अन्य घातक हथियार बरामद किये गये। यह सब बढ़ते-बढ़ते आखिर इसका अन्त बुजुर्ग स्वामी जी की हत्या में हुआ, क्योंकि माओवादियों और ईसाईयों की आँखों में खटकने वाले और उनके धर्मान्तरण के रास्ते में आने वाले वही एकमात्र व्यक्ति थे। “सेकुलरवादी” वहाँ चल रहे घटनाक्रम को अल्पसंख्यकों पर हमला बता रहे हैं, लेकिन स्वामी जी की हत्या के बारे में एक भी शब्द नहीं बोलते, यह है उनका दोगलापन।




उड़ीसा के गरीब/आदिवासी जिले हों, या मध्यप्रदेश का झाबुआ/धार जिले या गुजरात का डांग… सभी जगह लगभग एक ही घटनाक्रम होता है। पहले दूरदराज के आदिवासी इलाकों में एक छोटा सा चर्च खुलता है (ज़ाहिर है कि समाजसेवा के नाम पर), फ़िर एक स्कूल, एक अस्पताल और छोटी-मोटी संस्थायें। अगला कदम होता है गरीब और अनपढ़ लोगों के “ब्रेनवॉश” का, उन्हें धीरे-धीरे बरगलाने का और उनकी झोंपड़ियों में क्रॉस और यीशु की तस्वीरें लगवाने का, फ़िर मौका पाते ही धन का लालच देकर धर्मान्तरण करवाने का। यदि जनसंख्या के आँकड़े उठाकर देख लिये जायें तो पता चलेगा कि नागालैण्ड, मिजोरम जैसे प्रदेशों में इसी नीति के तहत धीरे-धीरे ईसाईयों की संख्या बढ़ाई गई, और अब जब वे बहुसंख्यक हो गये हैं तो हिन्दुओं को वहाँ से भगाने का काम शुरु हो गया है, यह तो हिन्दू ही है जो बहुसंख्यक होने के कारंण भारत में (और अल्पसंख्यक होने के कारण बांग्लादेश, पाकिस्तान, मलेशिया, फ़िजी आदि में) जूते खाता रहता है – Courtsey Congress। और सब हो चुकने के बाद “सेकुलर” मीडिया को सबसे आखिर में सारी गलती हिन्दूवादी संगठनों की ही दिखाई देती है।

हरेक घटना का ठीकरा संघ के माथे पर फ़ोड़ना “सेकुलरों” का प्रिय शगल बन गया है, उन घटनाओं के पीछे के इतिहास, प्रमुख घटनायें, यह सब क्यों हुआ? आदि पर मीडिया ध्यान नहीं देता है और सेकुलर उसे ध्यान देने भी नहीं देते, बस गला फ़ाड़कर हिन्दूवादियों के विरुद्ध चिल्लाने लगते हैं, लिखने लगते हैं, बकवास करने लगते हैं… जानबूझकर आधी-अधूरी जानकारी दी जाती है, ताकि जनता भ्रमित हो और संघ के खिलाफ़ एक माहौल तैयार किया जा सके, यही सब पिछले साठ साल से सुनियोजित ढंग से हो रहा है। जिन्होंने संघ को जाना नहीं, समझा नहीं, करीब से देखा तक नहीं, वे भी उसकी आलोचना में जुट जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता है कि झाबुआ और धार जैसे इलाकों में आदिवासियों से शराब छुड़वाने का महती काम संघ ने काफ़ी सफ़लतापूर्वक किया, उन्हें यह भी पता नहीं होता कि किसी भी राष्ट्रीय आपदा या बड़ी दुर्घटना के समय सबसे पहले संघ के कार्यकर्ता वहाँ पहुँचते हैं, न ही इस बात पर कभी विचार किया जाता है कि संघ के बौद्धिक या किसी अन्य कार्यक्रम में ब्राह्मण-दलित-ठाकुर एक साथ एक पंगत में बैठकर भोजन करते हैं, बड़े कार्यक्रमों में मंच पर नेताओं के लिये जगह नहीं होती, आडवाणी जैसे नेता तक ज़मीन पर बैठे देखे जा सकते हैं, पथ संचलन जैसे विशाल कार्यक्रमों के लिये भी प्रशासन की मदद नहीं के बराबर ली जाती है, हजारों कार्यकर्ताओं का भोजन घर-घर से व्यक्तिगत रूप से जुटा लिया जाता है… कभी विचार किया है कि आखिर ऐसा क्या आकर्षण है, वह कौन सी विचारधारा है जिसके कारण व्यक्ति आजीवन संघ से बँधा हुआ रहता है, यहाँ तक कि अविवाहित रहते हुए, घर-परिवार को छोड़कर कार्यकर्ता सुदूर गाँवों में जाते हैं, क्यों?




लेकिन यह सब समझने के लिये चाहिये होती है “दृष्टि”, जो कि “नेहरूवादी मोतियाबिन्द” के कारण आ नहीं सकती। जीवन भर सिर्फ़ अपना स्वार्थ देखने और चाटुकारिता करके परिवारवाद को बढ़ावा देने वाले लोग संघ को कभी नहीं समझ सकते, और संघ को इससे कोई शिकायत भी नहीं है, संघ को “मीडिया”(?) का सहारा लेने की भी कभी आवश्यकता महसूस नहीं हुई, बल्कि संघ खुद मीडिया से दूर रहता आया है। कभी देखा है कि दशहरा पथ संचलन के अलावा संघ का कोई कार्यक्रम मीडिया में आया हो? जबकि दो कौड़ी का नेता जो पैसा देकर थोड़ी सी भीड़ जुटाता है वह “हेडलाइन” पा जाता है।

बहरहाल, यहाँ पर मसला संघ का नहीं है, बल्कि बगैर सोचे-समझे, विवाद की पृष्ठभूमि समझे-जाने बिना टिप्पणी करने, विवाद-फ़साद करने, संघ के विरुद्ध धरने-प्रदर्शन-बयानबाजी करने की “सेकुलर मानसिकता” का है। राहुल गाँधी यूँ ही नहीं अपने उड़ीसा दौरे में अचानक सुरक्षा घेरा तोड़कर आदिवासियों के इलाके में रात बिताने चले जाते हैं। हमें अक्सर बताया जाता है कि “What an IDEA Sir जी”, यानी कि जो सफ़ेद चोंगे में है वही असल में समाजसेवी है, मानवतावादी है, साक्षात ईश्वर का अवतार है और बाकी के सभी लोग शोषण और अत्याचार कर रहे हैं। सेकुलरों को पहले खुद की तरफ़ उठी हुई चारों उंगलियों का इलाज करना चाहिये, फ़िर संघ की तरफ़ उठने वाली उंगली की ज़रूरत ही नहीं रह जायेगी। संदेश साफ़ है, पहले अपनी गिरेबान में झाँको, फ़िर दूसरों को उपदेश दो, साठ साल से जो “सेकुलर” “क्रिया” चल रही है, उसकी “प्रतिक्रिया” के लिये भी तैयार रहो… लेकिन होता यह है कि लालू-मुलायम जैसे खुलेआम सिमी की तारीफ़ करने वाले लोग इनके रहनुमा बने फ़िरते हैं और “सेकुलरिस्ट” इस पर ऐतराज़ भी नहीं करते।

जल्द ही वह दिन आयेगा जब “सेकुलर” शब्द सुनते ही व्यक्ति चप्पल उतारने को झुकेगा…

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16 comments:

jitendra said...

as always true statement.

संजय बेंगाणी said...

हिन्दु संगठनो को मीडिया प्रबन्धन नहीं आता. टेरेसा से ज्यादा मगर निस्वार्थ काम करने वालों को कौन जानता है?

Anil Pusadkar said...

sangh nahi hota to pata nahi log kise gali dete.chadm dharm-nirpekshata ne bantadhar kar diya hai desh ka.sahi likha aapne

girdhari said...

कैसे हैं आप, क्या आपने हिन्दू धर्म ग्रन्थ नहीं पढ़े?
हिन्दू धर्म ग्रन्थों में लिखा है 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति'

इस का अर्थ बेचारे सेकुलरिष्टियों ने ये लगाया है कि हिन्दू पर की गयी हिंसा हिंसा नहीं होती है.

इनकी अक्ल का दोष भी नहीं है, बेचारे उलटे (यानी वाम मार्गी) हैं ना! उल्टा ही समझेंगे!

Pratik Jain said...

बंधु आपने बहुत ही बढिया टिप्‍पणियां की हैं। विशेष रूप से नेहरूवादी मोतियाबिंद और यह कि सेक्‍यूलर शब्‍द सुनते ही व्‍यक्ति चप्‍पल उतारने को झुकेगा बहुत ही बढिया‍ लगा। पता नहीं इन वामपंथियों और सेक्‍यूलरों की आत्‍मा कब जागेगी।

एक-दो दिन पहले नइदुनिया में कानपुर में बम ब्‍लास्‍ट के संबंध में जो खबर छपी थी उसमें लेखक की टिप्‍पणी पढकर घोर निराशा हुइ। लेखक का कहना था कि बजरंग दल आदि भी आतंकवादी गतिविधियों में लगे हुए हैं। लेकिन मुझे कोइ ये बताए कि हिंदू कब तक सिर्फ चोट खाकर चुप बैठा रहे।

डा० अमर कुमार said...

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यह मोतियाबिन्द तो बहुतों को दिख रहा है,
आपरेशन करना भी अपरिहार्य है, पर ऎसा तरीका न अपनाया जाय कि,
गलत आँख का आपरेशन हो जाय,
तरीका गलत इसलिये है, कि सुविधावादी हिन्दुओं को भी साथ लाना पड़ेगा ।

संजय तिवारी said...

हेडिंग बहुत अच्छी है. बाकी आपके लिखने में तथ्य से ज्यादा एक हिन्दू का गुस्सा है.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

विचारणीय, तदुपरान्त चिन्तनीय...। साधुवाद।

lata said...

kabtak log TATHYON ko lekar chat-te rahenge? ek hindu ka gussa dusre hindu ke dimag me hi nahi ghusta to bakiyon se kya apeksha ki jae. hindu sirf isiliye hamesha maat khate aaye hain kyonki vo kabhi sanghthit nahi ho pae, sabne hamesha isi bat ka fayda uthaya hai aur uthate bhi rahenge. kisi ko itna bhi sahansheel hone ki zarurat nahi ki vo uski kamzori lagne lage.

पंगेबाज said...

आपका हेडिंग अच्छा है पर ? क्यो साहब आप क्या समझ रहे थे सुरेश जी ने सुकुलरो को कंधमाल ले जाने के लिये कोई फ़्री का वाहन जुगाड दिया है ?
असलियत यही है कि आप जैसे लोग दाये बाये मुंह कर आखिर मे हिंदू श्ब्द को ले आते है आपका खुदा स्त्यानाश करेगा :)

Supratim said...

Friends .....
I do agree to what you have posted in the blog but just ask yourself one concise question Can you justify the torture, harassment and murder of woman and children.
Swamiji's murder had to be avenged but at what cost and at whom. Till now nobody knows who killed Swamiji.

Hinduism is known to be the most tolerant religion on the face of this planet. Since I belong to Orissa I to agree with the facts of mass conversion of Hindus to Christianity by catholic churches, but are we not equally to be blamed for this. For centuries and till today also we have a caste system. Even today many SC/ST persons are not allowed to enter temples in very remote areas of Orissa. You give them discrimination and expect them to obey your orders also. These churhes opened their shop lured the poors with money and other benefits and converted them. but tell me if you were at the receiving end as a poor sc/St and some body offered you money and better facilities would not you also grab the opportunity.

Friend as you said while pointing a finger at some body you forgot that three fingers are pointing toward you only.

स्वप्निल 'सेकुलर' said...

मैं कंधमाल पहुँच गया हूँ. कल धरना दूँगा. मैं दुनिया भर के सेकुलरों को जुटा लूँगा. मेरी सेकुलरी को पहचानो. ये राष्ट्र सेकुलर है. अब तो मुझे चीन और नेपाल से सेकुलरी इंपोर्ट करने का लाईसेन्स मिल गया है. अब देखो मैं कितनी सेकुलरी ले आता हूँ इस देश में. इस देश का हवा, पानी, दादी, नानी सबको सेकुलर बना दूँगा. पिछले महीने ही मैंने एक हज़ार पेड़ों को सेकुलर बनाया है. अगले महीने पन्द्रह सौ पेड़ों को सेकुलर बनाने का टारगेट है हमारा. हमारा टारगेट है कि साल २०२० तक इस देश में ९० प्रतिशत बैलों को और ८० प्रतिशत भैंसों को सेकुलरता का टॉनिक पिलाकर पूरी तरह से सेकुलर बनाना है.

तुम कम्यूनल हो मानकर सेकुलर को पहचान
सेकुलर वाले देश में कम्यूनल है मेहमान

mayank said...

सुरेश जी, ये भी सेकुलर लोगों का एक तरीका है जली हुई नुन्नु पर बरनौल लगाने का.

Gyan vane said...

Har action ka reaction hota hai par pata nahi kyun hinduon par jo aaghat hota hai uska reaction kyun nahi hota.
Hinduon ke is sthiti ka karan shayad unka jarurat se jyada udaar hona he hai.
Bhaae udarta sabke liye nahi hote.
SHATHE SHATHYAM SAMACHARET(neech ke sath neechta ka vyavahar karna chahiye).
Jab bhe hinduon ko hamare desh me mara jata hai kashmeer me hindu mare jate hain to mujhe keval BJP ko chod ke kisi bhe party ka kuch bhe reaction nahi milta padhne ko.
Bhagwan shree krishn GETA me kahte hai ki he ARJUN dharm ki raksha me marjana bhe shreyaskar hai.
Yadi abhi hindu swabhiman nahe jaga to shayad ye SANATAN DHARM khatare me pad jayega.
Kashmer me jo ho raha hai vo hinduon ko samapt karne k shadyantr ka he hissa hai.
Hum apne he desh me dusre darje ke nagrik ho kar raha gaye hain.
Yadi RSS(jise america ne aatankvadiyon ki suche me dal rakha hai) VHP,BAJARANGDAL jaise sangathan na hote to na jane kabka bharat bhe muslim rashtr ban jaya hota.

Umesh said...

ईसाईयो द्वारा स्वामी जी की हत्या की खबर नेपाल के समाचार पत्रो मे नही दिखाई दी । वही पुज्य दारा सिंह ने दुष्ट ग्राहम स्टेन का वध किया तो वह खबर महिनो तक सम्प्रेषित करती रही भारत की न्युज एजेंसीयां । यह कैसा सेकुलरीज्म है ? जब तक ईन की पिटाई नही होगी, ये नही सुधरेंगे ।

तपन शर्मा said...

सच लिखा है जनाब... बिल्कुल सच..
कुछ ऐसा ही मैंने भी लिखा था:

कोसी से कंधमाल तक...कहानी राजनीति की...
http://tapansharma.blogspot.com/2008/08/blog-post_30.html