Friday, August 15, 2008

“धर्मनिरपेक्षों” को नंगा करने के लिये जम्मू वाले बधाई के हकदार हैं…

Jammu Kashmir Agitation Economic Solution
जम्मू में चल रहा आंदोलन अब एक महीने से ऊपर हो चुका है। सदा की तरह हमारे “सेकुलर” मीडिया को यह आंदोलन ठीक से दिखाई नहीं दे रहा, जबकि कश्मीर में सिर्फ़ चार दिन पुराने आंदोलन में उन्हें “देश को तोड़ने का खतरा” दिखाई देने लगा। मीडिया की आंखों में छाये “मोतियाबिन्द” का यह हाल है कि उन्हें जम्मू में तिरंगा लहराते युवक और श्रीनगर में बीते 20 सालों से पाकिस्तानी झंडा लहराते युवकों में कोई फ़र्क नहीं दिखता… लानत है ऐसी बुद्धिजीवी मानसिकता पर जो “राष्ट्रवाद” और “शर्मनिरपेक्षता” में भी अन्तर नहीं कर पाती।

कश्मीर नामक बिगडैल औलाद को पालने-पोसने और उसे लाड़-प्यार करके सिर पर बैठाने के चक्कर में जम्मू और लद्दाख नाम के दो होनहार, आज्ञाकारी और “संयुक्त परिवार” के हामी दो बेटों के साथ साठ साल में जो अन्याय हुआ है, यह आंदोलन उसी का नतीजा है, इतनी आसान सी बात सत्ता में बैठे नेता-अधिकारी समझ नहीं पा रहे हैं। अंग्रेजी मीडिया में यह सवाल उठाये जा रहे हैं कि “कश्मीर किस रास्ते पर जा रहा है?”, “कश्मीर का हल क्या होना चाहिये?” आदि-आदि। कोई भी सरकार हो यह अंग्रेजी मीडिया लगभग हमेशा सत्ता प्रतिष्ठान के नज़दीकी होते हैं, अपनी “नायाब” नीतियाँ सरकार को सुझाते रहते हैं और सरकारें भी अक्सर इन्हीं की सुनती हैं और उसी अनुरूप उनकी नीति तय होती है चाहे वह आर्थिक नीति हो या कोई और…



पहले भी लिखा जा चुका है कि कश्मीर समस्या के सिर्फ़ दो ही हल हैं, या तो उसे पूरी तरह से सेना के हवाले कर दिया जाये और आंदोलन को बेरहमी से कुचला जाये (जैसा चीन ने तिब्बत में किया), या फ़िर दूसरा रास्ता है कश्मीर को आज़ाद कर दो। आज जो कश्मीरी फ़ल व्यापारी मुज़फ़्फ़राबाद जाकर अपने फ़ल बेचना चाहते हैं उन्हें अपने मन की कर लेने दो। यदि “आर्थिक भाषा” में ही उन्हें समझना है तो ऐसा ही सही। कानूनी रूप से कश्मीरियों को पाकिस्तान में फ़ल बेचने की अनुमति दी जाये, वे भी यह जान सकें कि उभरती हुई आर्थिक शक्ति और एक खुली अर्थव्यवस्था में धंधा करना ज्यादा फ़ायदेमन्द है या एक “भिखारीनुमा” पाकिस्तान के साथ। बहुत जल्दी उन्हें पता चल जायेगा कि किसके साथ रहने में ज्यादा फ़ायदा है। लेकिन शर्तें ये होना चाहिये कि, 1) कश्मीरी लोग साठ साल से मिल रही भारत सरकार की “खैरात” नहीं लेंगे, कोई सब्सिडी नहीं, कोई योजना नहीं, कोई विशेष पैकेज नहीं, किसी प्रकार की “खून-चुसाई” नहीं… 2) सैयद शाह गिलानी और मीरवाइज़ उमर फ़ारुक जैसे लोग जिन्हें कश्मीरी अपना नेता मानते हैं, भारतीय सेना द्वारा उनको मिल रहा सुरक्षा कवच हटा लिया जाये… 3) आतंकवादियों के रहनुमा मुफ़्ती मुहम्मद और उनकी बिटिया की तमाम सुविधायें कम कर दी जायें…4) यदि भारतीय व्यक्ति कश्मीर में कोई सम्पत्ति नहीं खरीद सकता है तो कश्मीरी भी भारत में कुछ न खरीदें… देखते हैं कि यह “शर्तों का ये पैकेज” वे लोग स्वीकारते हैं या नहीं? मुफ़्ती, फ़ारुक, गिलानी और मीर जैसों को साफ़-साफ़ यह बताने की जरूरत है कि हम आपको यह अत्यधिक मदद देकर आज तक अहसान कर रहे थे, नहीं चाहिये हो तो अब भाड़ में जाओ…

लेकिन पेंच यह है कि ये सारी शर्तें पहले लालू-मुलायम-पासवान नाम के तीन नये मुल्लाओं को स्वीकार हों। फ़िलहाल तो सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्षों की बोलती बन्द है, उन्हें समझ नहीं आ रहा कि अमरनाथ भूमि के मामले में क्या बकवास करें, चाहे मीडिया हो, चाहे लालूनुमा जोकर नेता हों, चाहे धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगवीर-समूह हों… जम्मू के हिन्दुओं का “रिएक्शन” देखकर सभी के सभी को साँप सूंघ गया है…असल में हमेशा की तरह “महारानी और गुलाम” टाइप के धर्मनिरपेक्ष लोग सोच रहे थे कि जम्मू के हिन्दू जूते खाते ही रहेंगे और कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन अब पासा पलट गया है तो उन्हें “सर्वदलीय बैठक” नज़र आ रही है, उन्हें भाजपा का “सहयोग” चाहिये, क्यों भाई ज़मीन वापस छीनते वक्त भाजपा से पूछा था क्या?



विश्वास कीजिये, जिसे “मुफ़्तखोरी” की आदत लग जाती है, वह भिखारी आपकी सब शर्तें मान लेगा लेकिन कोई काम नहीं करेगा, कश्मीरियों को भी लौटकर भारत के पास ही आना है, सिर्फ़ हमें कुछ समय के लिये संयम रखना होगा। हमें ही यह संयम रखना होगा कि जब भी कोई भारतीय वैष्णो देवी तक जाये तो आगे कश्मीर न जाये, हमें अपनी धार्मिक भावनाओं पर नियन्त्रण रखना होगा कि सिर्फ़ पाँच साल (जी हाँ सिर्फ़ 5 साल) तक कोई भी भारतवासी अमरनाथ न जाये, पर्यटन का इतना ही शौक है तो लद्दाख जाओ, हिमाचल जाओ कहीं भी जाओ, लेकिन कश्मीर न जाओ… विदेशियों को भी वहाँ मत जाने दो… न वहाँ के सेब खाओ, न वहाँ की पश्मीना शॉल खरीदो (नहीं खरीदोगे तो मर नहीं जाओगे), कश्मीर में एक फ़ूटी कौड़ी भी भारतवासियों द्वारा खर्च नहीं की जाना चाहिये… हमारे पैसों पर पलने वाले कश्मीरी पिस्सुओं के होश ठिकाने लगाने के लिये एक आर्थिक चाबुक की भी जरूरत है… सारा आतंकवाद हवा हो जायेगा, सारी धार्मिक कट्टरता पेट की आग में घुल जायेगी… वे लोग खुद होकर कहेंगे कि भारतीयों कश्मीर आओ… धारा 370 हटाओ, यहाँ आकर बसो और हमें भूखों मरने से बचाओ… आतंकवाद का हल आम जनता ही खोज सकती है। जैसा उसने पंजाब में किया था, वैसे ही कश्मीर में भी इन फ़र्जी नेताओं को जनता लतियाने लगेगी… बस कुछ कठोर कदम और थोड़ा संयम हमें रखना होगा…


, , , , , , ,

21 comments:

अनुराग said...

पूरी तरह से सहमत हूँ आपसे.......

Rajeev Ranjan said...

सुरेश जी..


अक्षरक्ष: सत्य लिखा है आपने। आपकी मीडिया को लताड भी सही है..शायद यही कारण है कि समाचार माध्यम अपनी अस्मिता खो चुके हैं।


आपको स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें..


***राजीव रंजन प्रसाद

ek aam aadmi said...

boss dikkat yeh ki media bhi "dharmnirpeksh" hai, wo bhi ektarfa baatein chhapta hai.aapke jaise logon ko vaastav men politics men bhi aan chahiye tabhi is desh ke liye kuchh kiya jaa sakta hai.

मीत said...

बिल्कुल सही लिखा है सुरेश . "धर्मनिरपेक्ष" - मज़ाक़ बना कर रखा दिया गया है इस देश में इस शब्द का.

gg1234 said...

Sirjee,

Kashmir ko control karne ka bada aur mahatwpurna kaaran yeh bhi hai ki pakistan ko milne waale kaafi saare paani ke stotra kashmir mein hain. Isiliye Kashmir chodna strategically galat kadam hoga...

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी आप की एक एक बात सच हे, ओर ज्यादा तर भारतीया चाहते भी हे, इन दो रास्तो के सिवा ओर कोई दुसरा रास्ता नही, अगर बेटा भी बे काबु हो जाता हे तो सयाने मां वाप भी यही करते हे, धन्यवाद

पंगेबाज said...

100% सहमत , पर इन हरामजादो , कमीनो , हरामखोरो , देश के लुटेरे ,देश द्रोहियो , देश के नेताओ को भी समझ तो आये

purva said...

"कश्मीर नामक बिगडैल औलाद।"
क्या हसीन उद्गार हैं आप के।
क्षमा करें, मैं आप से और इस आलेख पर आई टिप्पणियों से 100 प्रतिशत असहमत हूँ। यह देश को तोड़ने वाली भाषा है।

Udan Tashtari said...

स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

चन्दन चौहान said...

सही कहा जम्मु में हिन्दु मर रहें हैं लेकिन वहा के राज्यपाल को अभी भी हज का चिन्ता सताये जा रहा है आखिर कब तक चलेगा तुष्टिकरण का निती आखीर अन्धें हिन्दु सेकुलर का आँख कब खुलेगा

चन्दन चौहान said...

सही कहा जम्मु में हिन्दु मर रहें हैं लेकिन वहा के राज्यपाल को अभी भी हज का चिन्ता सताये जा रहा है आखिर कब तक चलेगा तुष्टिकरण का निती आखीर अन्धें हिन्दु सेकुलर का आँख कब खुलेगा

चन्दन चौहान said...

सही कहा जम्मु में हिन्दु मर रहें हैं लेकिन वहा के राज्यपाल को अभी भी हज का चिन्ता सताये जा रहा है आखिर कब तक चलेगा तुष्टिकरण का निती आखीर अन्धें हिन्दु सेकुलर का आँख कब खुलेगा

चन्दन चौहान said...

सही कहा जम्मु में हिन्दु मर रहें हैं लेकिन वहा के राज्यपाल को अभी भी हज का चिन्ता सताये जा रहा है आखिर कब तक चलेगा तुष्टिकरण का निती आखीर अन्धें हिन्दु सेकुलर का आँख कब खुलेगा

Dr Prabhat Tandon said...

बिल्कुल सहमत हूँ , आपसे !!

shubhi said...

इस मायने में आपसे सहमत हूँ कि मीडिया बायस्ड है लेकिन बलपूर्वक किसी आंदोलन को कुचलना क्या यह गाँधी के रास्ते पर चलने वाले देश के लिए किसी भी तरह से उचित है। हमें जटिल प्रश्नों का समाधान खोजने के लिए विशालह्दय होना जरूरी है न कि वैसा ही रास्ता अख्तियार करना जैसाकि कट्टपंथी कर रहे हैं।

Nitish Raj said...

जैसे को तैसा, बिल्कुल सही लिखा और कहा गया।
आप ने जो शर्तें रखी है उस से तो तीन बंदर सहमत नहीं हो सकते। एक हल ये भी है कि जम्मू और घाटी के लोगों को एक बार खुद ये निर्णय लेने दो, कि वो क्या चाहते हैं। दिल्ली मैं बैठकर सर्वदलीय बैठकों से कुछ निकलने वाला नहीं। हल तो वहां ही है। लेकिन एक आम आदमी ने क्या बिगाड़ा है जो कि गेहुं के साथ वो घुन की तरह पिस रहा है। हर नेक दिल ये ही चाहता है कि पहले ये आग बुझ जाए फिर फैसले होते रहें।

anitakumar said...

sahamat hain aap se , no special treatment should be given to them

mahashakti said...

इतनी व्‍यपक टिप्‍पणी और लेख के बाद कुछ कहना शेष नही रहा जाता है।

जय श्रीराम

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मन्युरसि मन्युम मयि देहि!

lata said...

pata nahi kya hoga is desh ka..ye sidhi-sidhi baten bhi kisi ko desh todne wali lagti hain( kyonki vo DHARAM-NIRPEKSH hain) aur kisi ko abhi bhi UDAR-MAN hone ki sujhti hai.
ye log kab samjhnege ki hindu kabhi bhi kisi ke liye ghatak nahi hota, vo swabhaw se ugrra bhi nahi hota par jab uske hi ghar me ghus ke uske sare adhikar smapt kar dusron ko diye jane lagen, use uske hi ghar se nikalkar bahar kar dene ke halat paida ho jane lage to uske pas kya rasta bach jata hai..aaj bhi jammu wale kisi ko bhagane ki bat nahi kar rahe vo sirf apna hak mangne ke liye uthe hain jo unhe mangne ki zarurat nahi thi kyonki vo sab jo unse chhina ja raha hai vo sabse pahle unhi ka hai..DHARM-NIRPEKSH aur DAYALU logon ko unki jagah par khade hokar sochne ki zarurat hai..kisi ko itna bhi na jhukaya jae ki vo tut jae

sandy said...

i appriciate ur thought..