Friday, August 22, 2008

खबरदार…यदि नरेन्द्र मोदी का नाम लिया तो…

Growing Economy of India & Youths
इतिहास में पहली बार हमें ओलम्पिक में दो-चार पदक मिले हैं, जिसमें एक स्वर्ण भी है। निश्चित ही इस उपलब्धि पर समूचे देश को गर्व है। स्वर्ण पदक भले ही अभिनव बिन्द्रा ने अपने एकल प्रयासों से और पिता द्वारा हासिल आर्थिक सम्पन्नता के कारण हासिल किया हो, लेकिन कुश्ती के वीर सुशील कुमार और मुक्केबाज विजेन्दर पूर्णतः मध्यमवर्ग से आते हैं, इन्होंने बहुत आर्थिक संघर्षों के बाद यह मुकाम हासिल किया है। यह मात्र संयोग नहीं है कि जिन खेलों में भारत को पदक मिले हैं वह खेल आक्रामकता और एकाग्रता का सम्मिश्रण हैं।

भारत को स्वर्ण मिलते ही पाकिस्तान के एक नेता ने कहा भी था कि “भारत में निशानेबाजी जैसा आक्रामक खेल जानबूझकर सिखाया जा रहा है और भारत आक्रामक है ही…” ज़ाहिर है इस बयान को हँसी में उड़ा दिया जाना चाहिये। यह बयान एक कुंठित पाकिस्तानी का है, जिसका देश साथ में आज़ाद होने के बावजूद भारत से बहुत-बहुत पीछे रह गया है (हरेक मामले में)। पाकिस्तानियों का यह बयान उनकी धर्म-आधारित व्यवस्था के मद्देनज़र आया हो सकता है, जिसके कारण वे लोग कभी तरक्की नहीं कर पाये, लेकिन भारत की निगाह से देखें तो यह मात्र संयोग नहीं है। निशानेबाजी, कुश्ती और मुक्केबाजी तीनों खेल आक्रामकता, जीतने का जज़्बा और एकाग्रता मांगते हैं, और भारत का आज का युवा इन तीनों का मिश्रण बनकर उभर रहा है। निकम्मे, कामचोर और भ्रष्ट खेल अधिकारियों के बावजूद खिलाड़ी आगे आ रहे हैं। खुली अर्थव्यवस्था के कारण आज के युवा के पास अधिक मौके उपलब्ध हैं, वह धीरे-धीरे पिछली सदी की मानसिकता से बाहर निकल रहा है, सूचना क्रांति के कारण इस युवा को बरगलाना इतना आसान नहीं है। लेकिन साथ ही साथ यह युवा अब “जीत” को लेकर आक्रामक हो चला है, और यह एक शुभ संकेत है, और जब मैं “युवा” कह रहा हूँ, इसका मतलब सिर्फ़ शहरी या महानगरीय युवा नहीं होता, छोटे-छोटे कस्बों और नगरों से आत्मविश्वास से लबरेज़ युवक सामने आ रहे हैं, वे आँख में आँख मिलाकर बात करते हैं और हिन्दी बोलने में झेंपते नहीं हैं, उन्हें अब अन्याय और शोषण पसन्द नहीं है और वे सिर्फ़ और सिर्फ़ जीत चाहते हैं। क्या यह बदलाव तेजी से बदलते भारत का प्रतीक है? क्या अब हम “उड़ान” भरने को पूरी तरह तैयार हैं? मेरा जवाब होगा “हाँ”…। इस उभरते हुए “युवा विस्फ़ोट” को अब सही दिशा देने की ज़रूरत है, देश को सख्त आवश्यकता है एक युवा और ऊर्जावान नेतृत्व की, जो वर्तमान में कुर्सी पर काबिज “थकेले” नेताओं की जगह ले सके। ऐसे नेताओं से निज़ात पाने का वक्त आ चुका है जो कब्र में पैर लटकाये बैठे हैं लेकिन कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ऐसे नेताओं को धकियाना होगा जो त्वरित निर्णय तक नहीं ले पाते और सोच-विचार में ही समय गुज़ार देते हैं, भले ही समय उन्हें पीछे छोड़कर आगे निकल चुका हो। विश्व के दूसरे नेताओं, उनकी फ़िटनेस, उनकी देशभक्ति की नीतियों (यानी मेरे देश को जिस बात से फ़ायदा हो वही सही है) को देखकर कई बार शर्म आती है, कि क्या “सिस्टम” बनाया है हमने!! देश की आबादी में 55% से अधिक संख्या 22-40 आयु वर्ग की है, और उन पर राज कर रहे हैं 75-80 वर्षीय नेता जो अपनी बूर्जुआ नीतियों को अभी भी ठीक मानते हैं। वही सड़े-गले नेता, वही एक परिवार, सदियों से चला आ रहा भ्रष्टाचार, नेताओं को अपने इशारे पर नचाती नौकरशाही, थके हुए कामचोर सरकारी कर्मचारी, सब कुछ बदलने की आवश्यकता है अब…



देश के युवक अपने बूते पर सॉफ़्टवेयर के क्षेत्र में दुनिया पर परचम लहराये हुए हैं, IIT/IIM एक ब्राण्ड नेम बन चुका है, क्रिकेट में 20-20 विश्वकप जीता जा चुका है, कुश्ती और मुक्केबाजी में पदक भी आ चुका है, लेकिन हमारे भ्रष्ट नेता और मनमौजी अफ़सरशाह अभी भी सुधरने को तैयार नहीं हैं। हमारा युवा पिछड़ेपन को “जोर लगाकर पटकना” चाहता है, वह भ्रष्टाचार पर “मुक्कों” की बरसात करना चाहता है, उसका “निशाना” आर्थिक विकास पर सधा हुआ है, बस उसे ज़रूरत है एक सही युवा नेता की, जिसमें काम करने का अनुभव हो, दृष्टि खुली हुई हो, “भारत का हित” उसके लिये सर्वोपरि हो, जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो, परिवारवाद से मुक्त हो, जो देश के गद्दारों को ठिकाने लगा सके, जो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर “नये भारत की नई दहाड़” दिखा सके (बकरी की तरह मिमियाता न हो), जो चीन को आँख दिखा सके, जो बांग्लादेश को लतिया सके, जो पाकिस्तान को उसकी सही औकात दिखा सके, जो नई सदी में (जिसके 8 साल तो निकल चुके) भारत को सच्चे अर्थों में “महाशक्ति” बना सके… है कोई आपकी निगाह में?

और हाँ… खबरदार जो नरेन्द्र मोदी का नाम लिया तो… (हा हा हा हा हा………)


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16 comments:

संजय बेंगाणी said...

चलिये नहीं लेते नाम. बाकी भविष्य बताएगा, कौन कहाँ जाता है.

फिलहाल तो भारत के सुनहरे भविष्य की कामना करते है.

रंजन said...

ना मोदी न कोई और....

संजीव कुमार सिन्हा said...

आपने सही इशारा किया है। फिलहाल तो श्री नरेंद्र मोदी ही आशा के केंद्र नजर आते है। वे विकास पुरूष भी है और देशद्रोहियों के लिए काल पुरूष भी। श्री मोदी ने कहा था कि गुजरात की धरती पर कोई आतंकी हमला करने का दुस्‍साहस नहीं कर सकता यदि किया तो उसे पाताल से भी ढूढ निकालूंगा। कई वर्षों तक तो आतंकवादी हौसला नहीं जुटा पाये और जब दुस्‍साहस किया तो सचमुच श्री मोदी ने आतंकवादियों को धर दबोचा। काश देश के प्रधानमंत्री और ग्रिह मंत्री(Home Minister) श्री मोदी से सीख ले पाते।

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

वही ढ़ाक के तीन पात

सागर नाहर said...

खबरदार!!!
पत्रकार आने वाले हैं। नमो का नाम पढ़कर।

Anil Pusadkar said...

umeed pe duniya tiki hai.ye sach hai yuva aaj har tarah se taiyyar hai.han budhau netaon ko jinke paon kabar me latke hain,unhe thode se dhakke ki zarurat hai,aur wo yuva hi dega,aapse sahmat hun.koi na koi to aayega saamne

भुवनेश शर्मा said...

श्‍श्‍श्‍श....मुझे यहां कुछ सांप्रदायिकता की बू आ रही है. :)
जय हो मनमोहन की सेक्‍युलर सरकार उर्फ बंटाधार

COMMON MAN said...

he ghor saampradayik bande, tujhe dharm-nirpeksh log jel bhej denge, but narendra modi is the only choice

Anil said...

आजकल राजनीति कर रहे युवाओं में से तो कोई भी ऐसा नहीं है. मुझे लगता है की हम सारे एक विचार रखने वाले चिट्ठाकार ही मिल-जुलकर किसी को बचपन से ही प्रशिक्षण देकर नेता बनाएं तो बहुत ही बढ़िया रहेगा! :)

Nitish Raj said...

अभी देश को जो कामयाबी मिली है वो उज्जवल भविष्य की और राह है...लेकिन नेताओं में मोदी से इक्तफाक रखता हूं लेकिन उनके बड़बोलेपन से नहीं.

eSwami said...

मुझे लगता है की हम अभी भी छोटी छोटी सफ़लताओं पर ज्यादा ही उछल जाते हैं. पाकिस्तान से तुलना कर बेहतर महसूस करने वाले समाज को जापान और जर्मनी और अब तो चीन जैसों से भी कुछ सीखना चाहिये.

Suresh Chandra Gupta said...

आप कुछ भी कहिये, कितना ही खबरदार करिए, मैं तो नरेन्द्र मोदी का ही नाम लूँगा. दूसरा नाम कोई बताये कोई.

पंगेबाज said...

देखिये हमे आप इस प्रकार के पचडो मे ना घसीटे , जिससे हम साम्प्रदायिक ताकतो के हाथ मजबूत करते दिखाई दे , इसीलिये हम यहा टिपियाने के बजाय लालू जी मुलायम जी, सोनिया जी और जामामस्जिद के शाही इमाम पाटिल साहब,महेश भट्ट , शबाना जी और सच्च्र साहब के साथ मोदी सरकार द्वारा तंग किये गये अल्पसख्यको के यहा जा रहे है,
हम मोदी की बहादुरी तब ही मानेगे जी जब वो इन हमलो के लिये पकडे गये बंदो को बाकी लोगॊ की तरह से कुछ नोट सोट दे , जबरन कुछ हिंदुओ को पकड कर इस जुर्म मे कि वो बम विस्फ़ोट के वक्त मरने के बजाय इधर उधर क्यो घूम रहे थे अंदर करदे :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

भ‍इया, हम तो पहले से ही खबरदार हैं! कत्तई नाम नहीं लेंगे। ...बस सबका काम देख रहे हैं। उन पत्रकारों का भी जो अब गुजरात में बिला गये हैं...

Gyan vane said...

Bhaae hum to narendra moae ka he name lenge.
Kyunki vahe ak neta hai jo hum dusre darje(hindu) k nagriko k bare me bhe kuchh karta hai kiya hai aur aage bhe karega.

indianrj said...

Akhir rajniti mein Waanprasth kyon nahin hota?