Monday, August 25, 2008

नरेन्द्र मोदी नाम का “पेट दर्द” और ब्लॉग में “टैग” का बहाना…

हालांकि मुझे यह तो मालूम था कि “नरेन्द्र मोदी” का नाम लेने भर से गुजरात में कई समस्यायें हल हो जाती हैं लेकिन जिस बात का सिर्फ़ अन्देशा था कि मोदी का नाम सुनने भर से कई लोगों के “पेट में मरोड़” उठने लगती है, वह आखिरकार सच हो ही गया। हिन्दी के एक वरिष्ठ और महान ब्लॉगर हैं श्री अनिल रघुराज जी। बहुत उम्दा लिखते हैं, मैं खुद इनका सब्स्क्राइबर हूँ, शोधपूर्ण और तर्कसंगत लेखों के मालिक हैं ये साहब। इन सज्जन को मेरे लिखे हुए ब्लॉग में “टैगों” (Tags का हिन्दी बहुवचन शायद यही होता होगा) के उपयोग पर अचानक आपत्ति हो गई (जबकि यह टैग मैं पिछले 6-8 महीनों से उपयोग कर रहा हूँ) और इन्होंने मेरी हँसी उड़ाते हुए व्यंग्यात्मक शैली में उस पर लेख लिख मारा। इसमें उन्होंने सवाल उठाये हैं कि आखिर मैं ब्लॉग के अन्त में इतने टैग क्यों लगाता हूँ? और “विषयान्तर” टैग क्यों लगाता हूँ? उनका पहला वाक्य है – “काफी दिनों से देख रहा हूं कि कुछ ब्लॉगर छटांक भर की पोस्ट पर किलो भर के टैग लगा देते हैं। इधर पोस्ट का आकार तो बड़ा हो गया है, लेकिन टैग का वजन अब भी उस पर भारी पड़ता है”, उन्हें मेरी पोस्टें “छटाँक” भर की दिखती है, जबकि मित्रों का कहना है कि मैं कुछ ज्यादा ही लम्बी पोस्ट लिखता हूँ (बल्कि कई बार तो मुझे 3-4 भागों में एक पोस्ट को देना पड़ता है) इस छटाँक भर “दृष्टिदोष” पर वारी जाऊँ। फ़िर तुरन्त रघुराज जी अपने असली “दर्द” पर आ जाते हैं, व्यंग्य कसते हुए कहते हैं, “सुरेश जी झन्नाटेदार अंदाज़ में लिखते हैं, जैसे अभी कोई धमाका कर देंगे। उनकी राष्ट्रभक्ति पर उंगली उठाना पूर्णमासी के चांद में दाग खोजने जैसा है। सेकुलर बुद्धिजीवियों पर तो ऐसे उबलते हैं कि वश चलता तो सबको सूली पर लटका देते या बंगाल की खाड़ी में फेंकवा देते…”। यह है इनका असली दर्द, “टैग-वैग” वाली बात तो मुलम्मा भर था, जिसे हम “कलई” कहते हैं, जैसे कि एक पैकेट जिसमें रखकर पत्थर मारा जाये तो सामने वाले को पता न चले। टैग की आपत्ति इन्होंने यहीं पर खत्म कर दी और असली मुद्दे पर आ गये, यानी कि जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया, जी हाँ “नरेन्द्र मोदी”।

लेकिन पहले वाली बात पहले की जाये (यानी कि जो कलई है, उसकी)। समझ में नहीं आया कि मेरे ज्यादा टैग लगाने से रघुराज जी को क्या आपत्ति है? क्या मैंने किसी पाठक से कहा है कि पूरी पोस्ट “टैग सहित” पढ़ो, वरना गोली मार दूंगा? ये तो कुछ ऐसा ही हुआ कि पूरा अखबार पढ़ने के बाद व्यक्ति कहे कि आखिरी पेज पर बीड़ी का विज्ञापन क्यों छापा? लोग अखबार पढ़ने आते हैं या बीड़ी खरीदने… उन्हीं का तर्क है कि “इनका मकसद अगर ज्यादा से ज्यादा पाठक खींचना है तो मान लीजिए कोई Hindi Typing on Computers सर्च करके मोदी वाली पोस्ट पर आ जाए तो क्या यह उसके साथ धोखाधड़ी नहीं है?” भाई रघुराज जी, यदि टैग लगाने से पाठक नहीं आते हैं तो भी आपको तकलीफ़ है? फ़िर लगे ही रहने दीजिये, मत आने दीजिये मेरे चिठ्ठे पर पाठकों को… आप इतने बारीक टैग पढ़कर अपनी आँखें क्यों खराब करते हैं? और यदि टैग लगे हों और इस बहाने से कोई पाठक खोजता हुआ हिन्दी ब्लॉग पर आ जाये तो भी आपको आपत्ति है? यानी चित भी मेरी पट भी मेरी? “धोखाधड़ी” शब्द का जवाब यह है कि, इसमें कुछ भी गलत नहीं है, मेरा ब्लॉग सभी विषयों पर केन्द्रित होता है, मैं विभिन्न विषयों पर लिखता हूँ, ऐसे में यदि “गलती से ही सही” किसी टैग से सर्च करके कोई अंग्रेजी पाठक मेरे हिन्दी चिठ्ठे पर आता है तो क्या इससे हिन्दी ब्लॉग जगत का नुकसान हो जायेगा? अपने चिठ्ठे की रैंकिंग बढ़ाने के लिये न तो कभी मैंने “सेक्स” नाम का टैग लगाया, न ही “एंजेलीना जोली” नाम का, फ़िर क्या दुःख है भाई? रघुराज जी यहीं नहीं थमे, अपनी बात को वज़नदार बनाने के चक्कर में बेचारे “दीपक भारतदीप” जी की एक-दो पोस्ट को मेरे साथ लपेट ले गये। दीपक जी एक बेहद सीधे-सादे इंसान हैं, रहीम, कबीर, चाणक्य आदि पर ज्ञानवर्धक लेख लिखते हैं, किसी के लेने-देने में नहीं रहते, न किसी से खामख्वाह उलझते हैं। उन दीपक जी को भी नसीहत देते हुए रघुराज जी उनके अंग्रेजी हिज्जों पर पिल पड़े (कि स्पेलिंग गलत है)। जबकि मेरे हिसाब से अंग्रेजी में यदि कोई गलती है भी तो उसे नज़र-अन्दाज़ किया जाना चाहिये, क्योंकि वह हिन्दी ब्लॉगरों की भाषा ही नहीं है, लेकिन यदि बाल की खाल न निकाली तो फ़िर महान पत्रकार कैसे कहलायेंगे?

सीधी तरह तर्कों से बताओ कि ज्यादा “टैग” लगाने से क्या-क्या नुकसान हैं? कितने पाठक हैं जो लेख के साथ “टैग” भी पढ़ते हैं और उसके कारण उकता जाते हैं? यदि ज्यादा टैग लगायें तो क्या तूफ़ान आ गया और यदि कम टैग लगाऊँ तो क्या कहर बरपा होगा? (जवाब का इंतजार रहेगा) तो ये तो थी मुलम्मे वाली (यानी कलई, यानी नकली) बात, अब आते हैं उनके असली दर्द पर…

पहले व्यंग्यात्मक शैली में मेरी हँसी उड़ाने के बाद इन्होंने नरेन्द्र मोदी को घसीटने की कोशिश की, और उनका असली दर्द खुलकर सामने आ गया। नरेन्द्र मोदी, भाजपा या संघ की किसी भी तरह की तारीफ़ से दिल्ली/मुम्बई में बैठे कई लोगों को “पेचिश” हो जाती है, वे उस तारीफ़ करने वाले की आलोचना के बहाने ढूँढते हैं, और चूँकि ज़ाहिरा तौर पर वे “सेकुलर”(?) होते हैं इसलिये सीधे तर्कों में बात नहीं करते। ये बात वे खुद जानते हैं कि जैसे ही वे सेकुलर शब्द का उल्लेख भर करेंगे, शाहबानो केस का भूत उनका गला पकड़ लेगा, जैसे ही सेकुलर भजन शुरु किया जायेगा, कांग्रेस के 40 साला राज में हुए सैकड़ों हिन्दू-मुस्लिम दंगे एक साथ कोरस में उनका साथ देने लग जायेंगे, जैसे ही वे “फ़िलीस्तीन” नाम का मंझीरा बजायेंगे, जम्मू के विस्थापित हिन्दू उनके कपड़े उतारने को बेताब हो जायेंगे… सिलसिला अन्तहीन है, इसलिये ये लोग एक “गैंग” बनाकर अपरोक्ष रूप से हमला करते हैं, कुछ लोग पहले ईमेल भेजकर गरियाते हैं, फ़िर एकाध सेकुलर लेखक इस अदा में पोस्ट पटकता है कि “हम ही श्रेष्ठ हैं, बाकी के सब कीड़े-मकोड़े हैं…”।

अक्सर नसीहत दी जाती है कि ब्लॉग का कंटेण्ट (सामग्री) महत्वपूर्ण होता है और वही ब्लॉग आगे ज़िन्दा रहेगा, और मुझे लगता है कि डेढ़ साल में 250 से अधिक एकल ब्लॉग लिखने, 80-85 सब्स्क्राइबर होने और 34,000 से ज्यादा हिट्स आने के बाद, ब्लॉग में कण्टेण्ट सम्बन्धी किसी सेकुलर सर्टिफ़िकेट की मुझे आवश्यकता नहीं है। सांप्रदायिकता का मतलब भी मुझे समझाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि सफ़दर नागौरी भी उज्जैन का है और सोहराबुद्दीन भी था। मैं एक आम लेखक हूँ, जो दिल से लिखता है दिमाग से नहीं। मुझे दिल्ली/मुम्बई में पत्रकारिता में कैरियर नहीं बनाना है जो मैं किसी की चमचागिरी करता फ़िरूँ, और कौन नहीं जानता कि ये तथाकथित पत्रकार किस मिट्टी के बने होते हैं। कुछ पत्रकार आरुषि हत्याकांड की “क्लिप” दिखा-दिखाकर चैनल की टीआरपी बढ़ने पर शैम्पेन की पार्टी देते हैं, तो कुछ चापलूसी में इतने गिर जाते हैं कि अपने ज़मीर का सौदा कुछेक हज़ार रुपये में कर डालते हैं। एक साहब तो विदेशी बाला से शादी रचाने के फ़ेर में अपनी देसी बीवी को जलाकर मार चुके हैं, अस्तु।

यह बात मैं पहले भी कह चुका हूँ कि मैं “नेटवर्क” बनाने के मामले में एकदम असफ़ल हूँ, मैंने अपने ब्लॉग पर कोई ब्लॉग-रोल नहीं लगाया हुआ है, ज़ाहिर है कि मेरा चिठ्ठा भी बहुत कम लोगों के ब्लॉग रोल में मौजूद है, मैं खामख्वाह की टिप्पणियाँ भी कम ही कर पाता हूँ, इतनी सारी पोस्ट लिखने के बावजूद चिठ्ठाचर्चा में मेरे चिठ्ठे की चर्चा कभी भूले-भटके ही होती है, न मुझे ऐसी “फ़ोरम” पता हैं जहाँ से अपने चिठ्ठे का प्रचार किया जाता है, लेकिन मुझे सिर्फ़ लिखने से मतलब है, कौन पढ़ता है, कौन नहीं पढ़ता, कितनी टिप्पणियाँ आती हैं, इससे कोई मतलब नहीं। यदि मुझे हिट्स का मोह होता तो मैं दिन भर सिर्फ़ टिप्पणियाँ ही करता या लम्बा-चौड़ा ब्लॉग रोल बनाता (जिससे की एक-दूसरे की पीठ खुजाने की शैली में मेरा चिठ्ठा भी कई लोग अपने ब्लॉग रोल में लगाते) और बड़े पत्रकारों की चमचागिरी करता रहता, लेकिन जैसा कि मैंने कहा, मैं “नेटवर्क” बनाने में कमज़ोर हूँ। हाँ… मेरे ब्लॉग पर सभी तरह का माल मिलेगा, “टैग” भी और विज्ञापन भी (मैं कोई संत-महात्मा नहीं हूँ जिसे ब्लॉग से कमाई बुरी लगे)। मैं ब्लॉग जगत में आया ही इसलिये हूँ कि मुझे किसी घटिया से सम्पादक की चिरौरी न करना पड़े, क्योंकि मेरे लेख छापने की ताब शायद ही किसी अखबार में हो।

इस “छटाँक भर” लेख का लब्बेलुआब ये है कि रघुराज जी का यह “टैग” वाला लेख सरासर एक बहाना था, कुछ “स्वयंभू” बड़े पत्रकारों को मेरे पिछले कुछ लेख चुभ गये हैं खासकर “सेकुलर बुद्धिजीवी…”, “धर्मनिरपेक्षों को नंगा करने के लिये जम्मूवासी…” और “राष्ट्रीय स्वाभिमान…” वाला, इससे वे तिलमिला गये हैं, लेकिन मैं इसमें क्या कर सकता हूँ? मैं तो खुल्लमखुल्ला कहता हूँ कि मैं इसी प्रयास में हूँ कि “सेकुलर” शब्द को एक गाली बना दूँ, कोई छिपाने वाली बात नहीं है। कान का मैल निकालकर साफ़-साफ़ सुनें… मैं पीठ पीछे से हमला नहीं करता, मुझे मखमल के कपड़े में लपेट कर जूता मारना नहीं आता, हम तो पानी में जूता भिगो-भिगोकर मारने वालों में से हैं। मैं हर प्रकार के और किसी भी भाषा शैली के ईमेल और लेख से निपटने में सक्षम हूँ (बल्कि यदि कुछ व्यक्तिगत ईमेल सार्वजनिक कर दूँ तो कईयों की पोल खुल जायेगी, लेकिन वह मेरी नीति के खिलाफ़ है)। जब मैं किसी से नहीं उलझता तो कोई मुझसे खामख्वाह न उलझे, बात करनी हो तो तर्कों के साथ और मुद्दे पर करे, “अ-मुद्दे” को मुद्दा बनाकर नहीं। आशा है कि दीपक भारतदीप जी भी इन सभी बिन्दुओं से सहमत होंगे। दीपक जी पहले भी एक पोस्ट में कह चुके हैं कि महानगरों में रहने वाले कुछ ब्लॉगर अपने-आपको ज़मीन से दो इंच ऊपर समझते हैं और कस्बों और छोटे शहरों से आने वाले ब्लॉगरों को अपने तरीके से हांकने की कोशिश करते हैं या नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं (श्री रवि रतलामी जी अपवाद हैं, क्योंकि उनका काम बोलता है) और इस कोशिश में “पत्रकार नाम की बिरादरी” ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है, आशा है कि इस छटांक भर लेख में शामिल विभिन्न बिन्दुओं पर बहस के काफ़ी मुद्दे मिलेंगे और कईयों के दिमाग के जाले साफ़ होंगे।

अब अन्त में कुछ शब्द मेरे उन सब्स्क्राइबरों के लिये जो यह सोच रहे होंगे कि आखिर यह लेख क्या बला है? क्योंकि मेरे 90% सब्स्क्राईबर, ब्लॉग जगत से नावाकिफ़ हैं और वे नहीं जानते कि हिन्दी ब्लॉग-जगत में यह सब तो चलता ही रहता है। कृपया मेरे ऐसे पाठक इस लेख को “इग्नोर” करें, यह समझें कि गलती से यह लेख उनके मेल-बॉक्स में आ गया है…

अब इस पोस्ट के साथ “पचास ग्राम के टैग” भी नहीं लगाता और देखता हूँ कि इससे ट्रैफ़िक पर कोई असर पड़ता है या नहीं। तो ब्लॉगर बन्धुओं, अब इस “छटाँक” भर की पोस्ट पर किलो भर की टिप्पणियाँ मत कर दीजियेगा। आप इसे बुरा सपना मानकर भूल जाइये, क्योंकि बुरे सपने बार-बार आना अच्छी बात नहीं है…

31 comments:

संजय बेंगाणी said...

हिन्दी साहित्य जगत हो या फिर अब ब्लॉग जगत, यह सब तो चलता रहेगा. आप तो बीना मखमल में लपेटे जूते मारो भाई. मुस्कुराते हुए पढ़ी है पूरी पोस्ट.

COMMON MAN said...

priya mahoday, main to kahta hoon hamare secular buddhijeevion aur netaon ko middle-east se hi apne secular abhiyaan ki shuruaat karni chahiye. duniya men sambhavt: ab do hi secular mulk hain jo ki ek pratishat honge isliye baaki ninyanve pratishat deshon ko bhi secular banayen to achcha ho

Antar said...

धन्यवाद, अनिल जी को जिन्होने मुझे आप से मिलवाया | मैं देखने आया था कि छंटाक भर की पोस्ट पर किलो की टैग कैसी लगती है | आप का जवाब पढ कर मज़ा आ गया|

Gyandutt Pandey said...

मस्त!

भुवनेश शर्मा said...

आप तो बस देशद्रोहियों पर दनादन जूते बरसाते जाईये...बुद्धिजीवियों को भाड़ में जाने दीजिए

अनिल रघुराज said...

सुरेश जी, एक बार फिर आपने झन्नाटेदार अंदाज़ में लिखा है। मैं इस शैली का कायल हूं। खुद भी ऐसा लिखने की कोशिश करता हूं। लेकिन लिख नहीं पाता। जहां तक नरेंद्र मोदी की बात है तो मैं इस शख्स से बेइंतिहा नफरत करता हूं, इसलिए नहीं कि मैं सेकुलरवादी हूं, बल्कि इसलिए यह शख्स झूठा और मक्कार है। मैं भी मानता हूं सेकुलरवाद हमारी राजनीति का एक ऐसा छद्म है जिसे फौरन खत्म कर देना चाहिए और इस छद्म को बेनकाब करना ज़रूरी है। मैं तो यहां तक चाहता हूं कि संविधान के आमुख में जोड़ा गया सेकुलर या पंथनिरपेक्ष शब्द हटा लेना चाहिए।
आप कह सकते हैं कि नरेंद्र मोदी इस समय 6 करोड़ गुजरातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनसे नफरत करना सभी गुजरातियों से नफरत करना है। मैं ऐसा न तो मानता हूं, न ही करता हूं। मैं गुजरात, वहां की संस्कृति, वहां के निवासियों का पूरा आदर करता हूं। उनकी उद्यमशीलता कायल हूं। संयोगवश मेरी पत्नी भी गुजराती हैं।
रही टैग या लेबल की बात तो मैं अब भी यही मानता हूं कि पोस्ट जिस विषय से ताल्लुक रखती है, टैग या लेबल उसी से संबंधित होने चाहिए। विषय से इतर टैग लगाना न तो व्यावसायिक लिहाज से उपयोगी है, न ही पाठकीय या लेखनीय नैतिकता के लिहाज। और, आप जूते भिगोकर मारिए, सही पिटाई के लिए इस नाचीज का सिर एक बार नहीं, हज़ार बार हाज़िर रहेगा।

Cyril Gupta said...

ईंट का जवाब चट्टान से?

अब कुछ-कुछ subtext पढ़ना सीख रहा हूं, आपके लेख में भी.

अशोक पाण्डेय said...

''यदि मुझे हिट्स का मोह होता तो मैं दिन भर सिर्फ़ टिप्पणियाँ ही करता या लम्बा-चौड़ा ब्लॉग रोल बनाता''

सुरेश जी, आपके इस कथन से मैं असहमत हूं। मेरे जैसे कई ऐसे ब्‍लॉगर होंगे जो ब्‍लॉगरोल इसलिए बनाते हैं कि इससे उन्‍हें उनके हिसाब से पठनीय चिट्ठों तक पहुंचने में सहुलियत होती है। मेरे खुद के ब्‍लॉगरोल में कितने ऐसे चिट्ठों के नाम हैं, जिन्‍हें लिखनेवालों को शायद इसका पता भी न हो। आपका चिट्ठा भी उसमें है। और, मैं यह बात आज तक किसी ब्‍लॉगर को बताने नहीं गया कि देखिए मैंने अपने ब्‍लॉगरोल में आपका लिंक दे दिया है। बल्‍कि कई लोगों को ऐसा करते देखता हूं तो मुझे यह बड़ा अजीब लगता है। मेरा सौभाग्‍य है कि जिन दो चार लोगों ने अपने ब्‍लॉगरोल में मुझे जगह दी है, उन्‍होंने भी मुझपर कभी अहसान नहीं जताया।

भाई, मेरा तो अनुभव है कि एक-दूसरे की पीठ खुजानेवाले अधिकांश लोगों के ब्‍लॉगरोल छोटे होते हैं, क्‍योंकि उसमें सिर्फ उसी जमात के चिट्ठे शामिल किए जाते हैं।

रही बात टिप्‍पणियों की तो भइया कोई किसी पर टिप्‍पणी नहीं करेगा तो ब्‍लॉगरी बहुत ही नीरस हो जाएगी। प्रोत्‍साहन जरूरी होता है, खासकर नए चिट्ठालेखकों के लिए। और फिर, कोई आपके घर बार-बार आए, और आप उसके घर झांकने भी न जाएं तो यह तो अहंकार है, शिष्‍टाचार के विरुद्ध तो है ही।

दीपक भारतदीप said...

क्या बात है? आपकी आपत्तियों के जवाब के सामने तो विरोधी टिके ही नहीं। हथियार डाल गये। बहुत जोरदार लिखा है।
दीपक भारतदीप

anitakumar said...

:)आप के लेख हम ई-मेल में प्राप्त करते हैं इस लिए कि हमें आप का लिखा अच्छा लगता है। हमारा ध्यान तो कभी न टैग्स की तरफ़ गया न विज्ञापनों की तरफ़, सिर्फ़ लिखा अच्छा लगता है वही देखते हैं ।

अनिल रघुराज said...

दीपक जी, एक हिंदुस्तानी तहजीब को हथियार डालना मत समझिए। मेरी टिप्पणी गौर से पढ़ते तो आपको पता चल जाता है कि मैं मोदी को अब भी मक्कार मानता हूं और अनाश्यक टैग लगाने को पाठकों के साथ धोखाधड़ी।
सच को सच कहने का दम है, लेकिन विनम्रता भी अपनी परंपरा और संस्कृति से सीखी है। अनावश्यक विवाद को खत्म करना भी ज़रूरी समझता हूं।
इतनी आत्ममुग्धता ठीक नहीं कि विरोध को भी समर्थन समझ लिया जाए।

चन्दन चौहान said...

Are Bhai Sahab Memiyane Do Inhe Aap Likhte Raho

netfandu said...

suparv blog this is really good blog . plz keep it up
visit my blog
www.netfandu.blogspot.com

अनूप शुक्ल said...

बढ़िया। धांसू। मुंह्तोड़ जबाब। लेकिन मुंह किसका टूटा?

जहां तक टैग वाली बात है मैं अनिल रघुराज की बात से सहमत हूं। चिट्ठाचर्चा करने वाले बहुत लापरवाह हैं। नियमित आपके ब्लाग की चर्चा नहीं करते। आपको तो खैर उसकी परवाह नहीं लेकिन उनको तो देखना चाहिये।

आप लगता है गालिब के सच्चे भक्त हैं। गलिब कहते हैं न!

हम रगों में दौड़ते-फ़िरने के नहीं कायल,
आंख से ही न टपका तो लहू क्या ?

अनिल रघुराज

madgao said...

अव्व्ल तो ख़ामख़ा गलत पंगा लेना नहीं चाहिये था, अब अगर गलत समझ आ रहा है तो पीछे हटनें मे ही बड्प्पन है। अब बिलावज़ह गाँधीगिरी से क्या फ़ायदा? अस्ल समस्या तो कुछ सुसराली लगती है,पुरानें ज़मानें में सुसराल वालों को गाली बकनें की ऱवायत रही है। आप तो नये ज़मानें के प्रगतिशील हैं,छोड़िये बाबा आदम की बुराईयाँ। वैसे मक्कार होना तो ऊपर वाले की नेमत में शुमार होता है,इस दोज़खी ज़मानें में-ख़ाश कर तरक्की पसंदों को तो यह निहायत पसंद है! अब जब नामी गिरामी पत्रकार?? विनोद दुआ जब हाथ में चूड़ियाँ और कान में बुन्दे पहन रहे हों तो टैग लगा कोई ब्लाग को आभूषित कर रहा है तो उसमें ख़ुन्नसियानें से क्या फ़ायदा?

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

मुझे जो कहना था वह अशोक पाण्डे जी ने बखूबी कह दिया। बस इतना जोड़ दूँ कि ब्लॉगर का उद्देश्य अच्छा लिखना और अच्छा पढ़ना ही होना चाहिए। बाकी, मान्यता प्राप्त करने के हठकण्डे तो बहुतेरे हैं। ...लेकिन टिकाऊ वही हैं जो अन्दर से मजबूत हैं।

वैचारिक मतभेद का सम्मान करने में एक अलग आनन्द है। यह बहुत अच्छी चीज है।

lata said...

:)आप के लेख हम ई-मेल में प्राप्त करते हैं इस लिए कि हमें आप का लिखा अच्छा लगता है। हमारा ध्यान तो कभी न टैग्स की तरफ़ गया न विज्ञापनों की तरफ़, सिर्फ़ लिखा अच्छा लगता है वही देखते हैं ।

Mai bhi AMITKUMARJI se sahmat hun.
Apko is tarah ki faltu baton ki parwah karne ki zarurat nahi, aap jis pratibadhdhta ke sath zaruri mudde uthate rahe hain,aap hamare liye aadarsh hain. apni shakti ko bekar ki baton me zaya na karen.

Suresh Chandra Gupta said...

अरे भाई लोगों, यह टैग बैग का चक्कर छोड़ो. ब्लाग लिखो और दूसरों के ब्लाग पर टिपण्णी करो.

अब रही नरेन्द्र मोदी की बात. अनिल जी इस शख्स से बेइंतिहा नफरत करते हैं और मैं इस शख्स से बेइंतिहा मोहब्बत करता हूँ. मैं चाहता हूँ कि भारत के सारे राजनीतिबाज नरेंद्र मोदी जैसे हो जायं. बैसे लोग नफरत क्यों करते हैं यह मैं आज तक नहीं समझ पाया. अरे भाई आप किसी से सहमत न हों यह तो ठीक है पर किसी की राय आपसे अलग है तो आप उस से नफरत करना शुरू कर देंगे, यह ठीक नहीं है. नफरत शैतानी जज्बा है. शैतान में नहीं खुदा में यकीन लाओ. प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से.

पंगेबाज said...

सही कहा जी आप सभी ने , अब कुछ लोग है जो इंतहा नफ़रत पालते है , हम नही पास सकते , हमारी औकत नही है जी इत्ते महगे शौक पालने की, और जब कोई पत्रकार किसी से घोषणा के साथ बेंइंतहा नफ़रत करता है तो उसकी पत्रकारिता का का क्या मापदंड होगा ये सोचने की बात है ? अगर ऐसे लोग पत्रकारिता मे है जो हम जानते है ढेरो है कुछ के जमीर बिके कुछ नफ़रत पाले है , कुछ कुछ और .कैसे यकीन करे की जब ये लेखनी चलाते है तो इमानदार रहते होगे अपनी जिम्मेदारी के प्रति , वैसे आपने सही लिखा है जी , म भी एक ऐसे पत्रकार के बारे मे जानता हू जो मोदी से चिढते है, पता नही पिछले दिनो उन्होने नई शादी की थी विदेश से लौट कर , पुरानी पत्नी को आग के हवाले किया था और ससुराल वालो को पुलिस के आखिर पत्रकार है जी इत्ती तो चलती है ना? फ़िर दिल्ली छोड गये, कोई भी पत्रकार दिल्ली का बतादेगा कि कौन थे :)सुना है बढिया लिखते है टैग वैग का हमे पता नही जी कैसे लगाते है उनका बस नही चला वरना मोदी का भी अपनी पुरानी बीबी जैसा हाल कर डालते , फ़िलहाल ्शायद वो भी ,नफ़रत पाल कर ही काम चला रहे होंगे जी :)

Neelima said...

इधर टैग को लेकर काफी गहमागहमी और लफडेबाजी को देखकर हमें याद आया कि हमने तो अपनी पोस्टों पर टैग शैग लगाना अरसे से छोडा हुआ है ! अब पता चल रहा है टैग का महात्म्य ..!

संजय बेंगाणी said...

भारत के सभी मुख्यमंत्रियों की सूची बनाई जाय और फिर उनपर कुछ बिम्दूओं के साथ विचार किया जाय, मसलन भाई-भतिजा वाद, परिवार को आगे बढ़ाना, पैसा बनाना, रेवड़ियाँ बांटना, अपने प्रदेश के लिए अगले पचास वर्षो तक की सोच, विकास, ढ़ांचागत विकास वगेरे....फिर मोदी से नफरत की वजह बताई जाय, तो समझ में आए. नहीं तो समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का बाजा बजाते रहो....

Suresh Chiplunkar said...

सभी बन्धुओं का आभार व्यक्त करता हूँ टिप्पणी करने के लिये… हालांकि पिछले डेढ़ साल से मैं किसी भी बहस में उलझने से बचता रहा हूँ, कई लोगों ने मुझे व्यक्तिगत मेल भेजकर भी उकसाने की कोशिश की, लेकिन पता नहीं इस बार कैसे मैं अपना संयम खो बैठा… मुझे लगता है कि इस बहस को यहीं पर खत्म किया जाये… जो मेरा समर्थन करते हैं उनका आभार और जो नहीं करते हैं उनका भी शुक्रिया… अब सिर्फ़ अन्य विचारोत्तेजक, समाजसेवी लेख लिखने पर विचार किया जाये ऐसा आग्रह है… इसे यहीं समाप्त समझा जाये, इस बहाने शायद मैं अपनी बात (यानी खामख्वाह कोई मुझसे न उलझे) समझाने में सफ़ल हुआ हूँ… एक बार फ़िर सभी का आभार… अब आगे चलें…

Cyril Gupta said...

एक टिप्पणी में यह शेर पढ़ा
"हम रगों में दौड़ते-फ़िरने के नहीं कायल,
आंख से ही न टपका तो लहू क्या ?"

मुआफ़ कीजियेगा, शेर ग़लत है. सही शेर है

'रग़ों में दौड़ते फ़िरने के हम नहीं कायल
जब आंख़ ही से न टपका तो फ़िर लहू क्या है'

इसके रचेता महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब हैं. नीचे अनिल रघुराज जी का नाम लिखा था, जो शायद ग़लती से हुआ.

अनूप शुक्ल said...

शेर जित्ता याद था उत्ता लिख दिया। सही करने का लेकिन इस बात में कोई दुविधा नहीं थी कि ये शेर गालिब का है। दो बार ऊपर लिखा। अनिल रघुराज गलती से ही लिख गया।

अनूप शुक्ल said...

शेर जित्ता याद था उत्ता लिख दिया। सही करने का लेकिन इस बात में कोई दुविधा नहीं थी कि ये शेर गालिब का है। दो बार ऊपर लिखा। अनिल रघुराज गलती से ही लिख गया।

theprudentindian said...

Suresh Hi!

:)
Befitting reply, good one.

However I do not agree with your 'blog roll' point, I too carry a link on my 'humble' blog to your this blog. And why do I carry that? Simply because I think some of my readers who know Hindi, should read this as well. :)

Anyway, the line I liked most is, "मैं तो खुल्लमखुल्ला कहता हूँ कि मैं इसी प्रयास में हूँ कि “सेकुलर” शब्द को एक गाली बना दूँ, कोई छिपाने वाली बात नहीं है। ".
:)
I extend my all out and unconditional support for this most 'pious' cause.

Keep up the good work.

PI.

Sanjeet Tripathi said...

हमारे हिंदी ब्लॉगजगत के एंग्री यंगमैन जी ;)

अपन तो पत्रकार नाम की ही बिरादरी के हैं फिर भी आपकी लेखन शैली के कायल, पंखे, फैन जो कहें हैं।

अनिल जी के ही शब्दों में कहूं तो आपके झन्नाटेदार शैली को कॉपी कर पाने की कोशिश भी की है पर असफल ही रहा।

और हां वाकई आपने इस बार तो ईंट का जवाब चट्टान से दे दिया है।

India Child Health Care said...

hiiiii

COMMON MAN said...
This comment has been removed by the author.
COMMON MAN said...

ab to maine bhi khoob tag lagane shuru kar diye hain

Fire said...

great, you are the samll fire in big dark inida. Your slap will serve indina soul. These are not seculer basically they are anti hindu anit india and anit culture.Keep it up . i salute you sir.
Sat sat abhinandan aap ko. Padbandan aap ko. Bharvarsh ka salam aap ko.
regards