Monday, August 11, 2008

कैसा “राष्ट्रीय स्वाभिमान”? हम बिना रीढ़ वाले लोग हैं…

15 August National Pride of India
9 अगस्त अभी ही बीता है, 15 अगस्त भी आने वाला है। ये दो तारीखें भारत के स्वतन्त्रता इतिहास और लोकतन्त्र की लड़ाई के लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। 8 अगस्त को चीन में विश्व के सबसे खेल आयोजन “ओलम्पिक” का उद्घाटन समारोह हुआ। समूचे विश्व के प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति इस समारोह में शामिल हुए। लेकिन विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र होने का दावा करने वाले, चीन के बाद दूसरी एशियाई महाशक्ति होने का दम भरने वाले, 125 करोड़ की विशाल आबादी और 60% “युवा” जनसंख्या वाले देश से प्रतिनिधित्व करने के लिये किसे बुलाया गया? प्रधानमंत्री को या राष्ट्रपति को? नहीं जी, दोनों को निमन्त्रण तक नहीं भेजा गया, बुलाया गया सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को। सोनिया गाँधी को UPA का अध्यक्ष (अर्थात प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों को नौकरी पर रखने की ताकत) होने के नाते और राहुल बाबा को शायद उनके पुत्र होने के नाते (और तो कोई खासियत फ़िलहाल नहीं दिखाई देती)। इनके साथ गये भारी-भरकम लाव-लश्कर, चमचे-लगुए-भगुए और खेल मंत्रालय के निकम्मे-मोटे अधिकारी, जिनकी लार टपक रही है 2010 में दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों के बजट को देखते हुए

वैसे तो यह प्रत्येक देश का अपना आंतरिक मामला है कि वह अपने यहाँ समारोह में किसे बुलाये या किसे न बुलाये। “प्रैक्टिकली” देखें तो चीन के रहनुमाओं ने एकदम सही निर्णय लिया कि सोनिया गाँधी को बुलाया जाये। जो व्यक्ति देश में सबसे अधिक “पावरफ़ुल” होता है सामान्यतः उसे ही ऐसे महत्वपूर्ण आयोजनों में बुलाया जाता है, ताकि आपसी सम्बन्ध मजबूत हों। यहाँ तक तो यह चीन का मामला है, लेकिन इसके आगे की बात भारत का अपना मामला है। हमारे देश में लोकतन्त्र है, सौ करोड़ लोगों द्वारा चुना गया एक प्रधानमंत्री है, एक मंत्रिमण्डल है, एक प्रणाली है। भारत के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति की (चाहे वह कैसा भी हो) न सिर्फ़ हमारे देश में बल्कि विदेशों में भी एक विशिष्ट इज्जत होती है, एक बना-बनाया “प्रोटोकॉल” होता है, जिसे निभाना प्रत्येक देश का कर्तव्य होता है। हम कोई ऐरे-गैरे नत्थू खैरे नहीं हैं, कि इतने बड़े देश की कोई सरेआम इज्जत उतारता रहे। लेकिन ऐसा हुआ है और लगातार हो रहा है। जब चीन ने बीजिंग ओलम्पिक के लिये सोनिया गाँधी को निमंत्रण भेजा था तो उस निमन्त्रण को आदर के साथ यह कहकर वापस किया जा सकता था कि या तो भारत के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को भी इसमें शामिल किया जाये या फ़िर इसे सधन्यवाद वापस माना जाये।



निमन्त्रण पत्र मिलने और समारोह के बीच भी काफ़ी समय था, चीन के दूतावास के मार्फ़त और उच्च स्तरीय चैनल के माध्यम से यह संदेश भेजा जा सकता था कि आपने जो किया है वह अनुचित है और तत्काल “भूल-सुधार” किया जाये। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, जब भाजपा शुरुआत से कह रही थी कि मनमोहन तो एक “बबुआ प्रधानमंत्री” हैं, “एक नकली प्रधानमंत्री” हैं तब हमारा “सेकुलर” मीडिया भाजपा की आलोचना करता था कि वह देश और देश के प्रधानमंत्री की इज्जत खराब कर रही है। लेकिन अब सरेआम सारे विश्व के सामने चीन ने हमारे प्रधानमंत्री को उनकी “सही जगह” दिखा दी है तो कोई हल्ला नहीं? कोई विवाद नहीं? कोई आपत्ति नहीं कि आखिर इतने बड़े लोकतन्त्र का ऐसा अपमान क्यों किया जा रहा है? राहुल गाँधी को विश्व मंच पर एक नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करने की इस परिवार की यह योजना थी, जिसमें सोनिया सफ़ल हुई हैं। इतने बड़े आयोजन में जहाँ समूचे विश्व के मीडिया की आँखें नेताओं पर टिकी थीं, तब विश्व को पता चला कि भारत नाम के देश में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नाम की कोई चीज नहीं है, उनकी कोई औकात नहीं है, उन्हें बुलाया तक नहीं गया है, क्या इससे भारत का सम्मान दोगुना हो गया? लेकिन बात-बात पर बतंगड़ बनाने वाले कम्युनिस्ट (जो कि अब समर्थन वापस ले चुके हैं) भी खामोश हैं, क्योंकि यह उन्हीं की परम्परा है जहाँ पोलित ब्यूरो का महासचिव राज्य के मुख्यमंत्री से अधिक ताकतवर होता है और उसी को हर जगह बुलाया जाता है, और चीन जो कि उनका “मानसिक मालिक” है उसी ने यह हरकत की है तो “लाल बन्दरों” के मुँह में दही जमना स्वाभाविक है। लेकिन यदि किसी सरकारी कार्यक्रम में भाजपा के मुख्यमंत्री की जगह “सरसंघचालक” को बैठा दिया जाये तो फ़िर देखिये कैसे हमारे “धर्मनिरपेक्ष लंगूर” उछलकूद मचाते हैं, जिनका साथ देने के लिये “सेकुलर बुद्धिजीवी और सेकुलर मीडिया” नाम के दो नचैये सदैव तत्पर रहते हैं। पाँच करोड़ गुजरातियों द्वारा पूर्ण बहुमत से तीसरी बार चुने गये नरेन्द्र मोदी को अमेरिका की सरकार, वहाँ हल्ला मचा रहे मानवाधिकारवादियों(?) के दबाव में वीज़ा देने को तैयार नहीं है लेकिन “सेकुलर मीडिया” और हमारे माननीय प्रधानमंत्री दोनों ही एक मुख्यमंत्री के सार्वजनिक अपमान पर चुप्पी साधे हुए हैं, और क्यों साधे हुए हैं यह भी स्पष्ट हो गया है कि जब इन्हें “खुद के अपमान” की ही फ़िक्र नहीं है और इसके खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठाते तो नरेन्द्र मोदी के पक्ष में क्या बोलेंगे? यह है हमारा असली राष्ट्रीय चरित्र और असली “सेकुलरिज़्म”!!! ज़रा एक बार किसी वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी को वीज़ा देने से मना करके देखो, या हवाई अड्डे पर किसी अमेरिकी मंत्री के कपड़े उतारकर तलाशी लेकर देखो, पता चल जायेगा कि “राष्ट्रीय स्वाभिमान” क्या होता है। क्या आत्मसम्मान भी कोई सिखाने की चीज़ होती है?



कहने का तात्पर्य यही है कि अब इस देश में लोगों को देश के सम्मान और अपमान तक की फ़िक्र नहीं रह गई है। यही मीडिया, यही नेता, यही कार्पोरेट जगत (364 दिन छोड़कर) 15 अगस्त आते ही “देशभक्ति” की बासी कढ़ी पर पन्ने के पन्ने रंगेगा, लाउडस्पीकरों पर चिल्ला-चिल्लाकर दिमाग की पाव-भाजी बना देगा, लेकिन इनमें से एक ने भी उठकर चीन से यह नहीं कहा कि “ये लो अपना निमन्त्रण पत्र, हमें नहीं चाहिये, यह हमारे प्रधानमंत्री / राष्ट्रपति का अपमान तो है ही, सौ करोड़ लोगों का भी अपमान है… चीन वालों तुम्हारे निमन्त्रण पत्र की पुंगी बनाओ और…@#%^$&*(^%# ”, लेकिन यह बोलने के लिये दम-गुर्दे चाहिये होते हैं, रीढ़ की हड्डी मजबूत होना चाहिये, जो कि भ्रष्टाचार और अनाचार से खोखले हो चुके देश में नहीं बचे। ओलम्पिक की उदघाटन परेड में भारतीय दल की “यूनिफ़ॉर्म” तक में एकरूपता नहीं थी, तो राष्ट्र के प्रमुख मुद्दों पर एकता कहाँ से आयेगी, इसीलिये कोई भी आता है और हमें लतियाकर चलता बनता है, हम अपनी रोजी-रोटी में ही मस्त हैं, कमाने में लगे हैं, देश जाये भाड़ में। हाँ, 15 अगस्त को (यदि छुट्टी का दाँव नहीं लग पाया तो मजबूरी में) अपने ऑफ़िस में एक अदद झंडा फ़हराने पहुँच जायेंगे, जिसे देर शाम को बेचारा अकेला चौकीदार हौले से उतारेगा, तब तक तमाम अफ़सरान और बाबू थकान उतारने के लिये “नशे में टुन्न” हो चुके होंगे…

अभी तो 15 अगस्त मना लो भाईयों… “सेकुलरिज्म” और भ्रष्टाचार का यही हाल रहा तो हो सकता है कि सन् 2025 में एक अवैध बांग्लादेशी की नाजायज़ औलाद, भारत का प्रधानमंत्री बन जाये…


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18 comments:

lata said...

Suresh ji, aapki baton se sahmat hun aur shayad mere jaise bahut se log honge jinki bhawanon ko aapne shabd diye hain.
Aapka bahut dhanyawad.
Par apne vicharon ko shabd-rup me dekhne ke bad dil udas ho gaya hai kyonki hum log kahi, kuch bhi nahi kar pa rahe hain aur jinke hath me taqat hai kuch karne ki, vo ab karodon ke mol bikne lage hain. Aaj humara BHARAT phir se kuch logon ka INDIA banne ki rah par chal pada hai.

भुवनेश शर्मा said...

ये आप ठीक नहीं कर रहे हैं....अगली बार जब देश में इटली की देवी की कृपा से इमरजेंसी जैसी स्थितियां फिर बनीं तो आप जैसों को सबसे पहले लाल किले पर फांसी दी जाएगी.

बाज आ जाईये ऐसी हरकतों से और सुबह शाम इटली की देवी, और राहुल देव की उपासना कीजिए...यह पूजा बहुत फलदायी है. और मंदिर-वंदिर जाना छोड़कर अपने घर में ही इनका एक मंदिर बना लीजिए....और रोज शाम सेकुलर भक्‍तों में प्रसाद बांटिए. :)
जय हो राहुल देवता की...जय हो इटली महारानी की

अनुनाद सिंह said...

आप तो ऐसे लिख रहे हैं जैसे वह दिन भूल गये हों जब देवीजी ने "त्याग" का नाटक खेला था और सारे सेक्युलर मेडिया ने कई दिन तक उस नाटक को पूरे देश को दिखाया था।

उस शर्मनाक घटना के आगे तो यह कुछ भी नहीं है।

Cyril Gupta said...

सुबह पढ़कर लगा की लेख में आक्रोश कुछ ज्यादा है. लेकिन शाम को IBN7 पर जब नेता रूपी चोरों को देश का सौदा करते देखा तो लगा की सचमुच देश में आत्मसम्मान नहीं.

क्या इस रात की सुबह होगी?

anitakumar said...

हमेशा की तरह इस बार भी काफ़ी जोरदार तरीके से आप ने एकदम सही मुददा उठाया, पता नहीं इस रात की सुबह कब होगी , होगी भी या नहीं

Anil said...

कुछ लोगों की नज़रों में भारत माता की आबरू अब दिल्ली के जीबी रोड या कलकत्ता के सोनागाछी से भी कम हो गई है. कोई भी कभी भी आकर कुछ भी ले जाता है. यह निमंत्रण तो कुछ भी नहीं, इससे बड़े-बड़े किस्से भी हैं सुनाने को. सिक्किम के बदले तिब्बत दे दिया, फिर भी अरुणाचल और कश्मीर का १/३ हिस्सा है चीन के पास. चीन की सैन्य, वैज्ञानिक और आर्थिक शक्ति दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की पर है. और हम अपने पते हुए दमन से इज्ज़त छुपाने की असफल चेष्टा कर रहे हैं. यह सब बदलना पड़ेगा. हम सभी बदलेंगे. शीघ्र ही. १५ अगस्त का इंतज़ार न करें, आज ही आज़ादी की घोषणा करें.

बालकिशन said...

"धीरे-धीरे रे मना धीरे सबकुछ होय
माली सींचे सौ घडा ऋतू आए फल होय"

अनुराग said...

samajh nahi paya aapne mera comment kyu nahi liya tha...fir bhi dubara likh raaha hun.....aapne bahut jyada bhavuk aor gusse me likha hai..ek hindustaani hone ke naate aap kuch jyaada hi chinta kar gaye hai desh ke logo ki...reed ki haddi to kab ki fracture ho gayi hai...ab bas lash dho rahe hai...

lata said...

balkishan ji,aapse kshama chaungi par ab dhire dhire ki baten na kijiye, ab shant-man kar baithne ka samay nahi aur na hi bhagwan bharose rahne ka. isi manovriti ne hamesha hindustaniyon ko dusre ka gulam banaya hai..itne anubhawon ke bad kam se kam ab to bhartiyon ko jagna chahiye aur videshiyon ko sar chadhana chhod dena chahiye.Mana sabkuch karne wale bhagwan hi hain par unhone is insan ko ek adad dimag bhi diya hua hai agar vo iska istemal nahi karega to uska bhagwan bhi mailk nahi ho sakta.
aap sabse prarthna hai ki ab hame josh aur jagrukta ki zarurat hai,jada kahi kuch nahi to apne aas-pas jagrukta aur josh hi failaen. apne matlab ki baton me har vakt desh ko, desh ke halat ko zarur shamil karen..baton baton se hi shayad hum log apne logon ko jaga saken. mana ki aaj abhi isi vakt "is lekh" par mere ek upnnays likh dene se bhi kuch nahi ho paega par hum log agar milkar apne aas pas in muddon ke bare me bat karenge to shayad har soya hua jagega aur tab kam se kam har admi apne VOTE ka isemal to zarur karega, shayad isse hi kuch hal nikal kar aayen.

पंगेबाज said...

बालकिशन जी ने सही कहा है धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होये. सब धीरे धीरे ही हो रहा है, पचास सालो मे धीरे धीरे ही हम गुलामी की और अग्रसर है जी .

शोभा said...

बात तो आप ठीक कह रहे हैं किन्तु मैं अनुरोध करती हूँ कि राष्ट्रीयता की लहर में एक डुबकी लगा ही ली जाए।

op said...

नेता और अधिकारी तो अपने स्वार्थ में अंधे बने हुए है, गरीब और अनपढ़ अपनी गरीबी और जाहिली से लाचार हैं परन्तु भाइयों आप लोग किस "कृष्ण" का इंतजार कर रहे हैं....... सब कुछ जानकर भी खामोश बैठे हैं........... आप जानते हैं की अधिसंख्यक देशभक्त , कुछ हजार या शायद लाख देशद्रोहियों के आगे लाचार क्यों हैं.......... क्योंकि वो संगठित हैं और हम केवल एक दूसरे का मुंह ताकते रहते हैं....... आइये हम भी एकजुट हों और एक मंच बनायें जिससे हम इन मुट्ठी भर गद्दारों को अपनी और आने वाली पीढियो की जिंदगी बर्बाद करने से रोक सकें............ एकता में ही शक्ति है ये तो आप सब ने बचपन से ही सुना है.
ऐसा ही एक प्रस्ताव मैंने चिपलूनकर जी को भेजा था पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.......... क्या केवल कलम घिसने से फर्ज पूरा हो जायेगा (क्षमा कीजियेगा ....... मैं चिपलूनकर जी के विचारों और लेखनी का भक्त हूँ.......... अनादर का कोई इरादा नहीं है)

parth pratim said...

Lekh to bahut pasand aaya par main is baat se sahmat nahi ki ham (yane aam aadmee) bina rirh wale log hain. Bina rirh wale .... hamre desh ke we mahapurush hain jinhe hamne hamare desh ka samvidhan, sanskriti, sanskaar aur swabhimaan ki raksha karne ke liye chunkar 5 sitara sanskriti ka lutf utthane ke liye bheja hai.

ek aam aadmi said...

maanyawar, bahut behatar ho yadi netrutva karne ki or badha jaaye, soton ko jagana padega. rasta yahi hai ki khud hi sansad me jaaya jaye

smart said...

sir ye kangreshi..... hai. manmohan singh ko to drkh kar aisa lagata hia ki kya kisi aadami me swabhi maan itana gir sakata hai???????

smart said...

sir ye kangreshi..... hai. manmohan singh ko to drkh kar aisa lagata hia ki kya kisi aadami me swabhi maan itana gir sakata hai???????

योगेन्द्र मौदगिल said...

is sabke bawzood

aazadi ki shubhkamnaen

swatantrata divas aap bhi manaen

or ham bhi manaen

Pratik Jain said...

2025 इतनी दूर कहां जा रहे हैं सुरेशजी। गंदी घिनौनी कांग्रेस पार्टी के रहते कुछ ही महीनों में यह संभव है।