Saturday, July 12, 2008

कलाम, काकोड़कर और परमाणु करार (भाग-2)

Nuclear Deal India America IAEA
(भाग-1 “कलाम और काकोड़कर… से आगे…) जिस प्रकार राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता, अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति में भी ऐसा ही होता है। अमेरिका ने आज ईराक को कब्जे में किया है कल को वह ईरान पर भी हमला बोल सकता है। ईरान भी आज तक भारत को अपना दोस्त कहता रहा है, लेकिन क्या कभी उसने ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन पर गम्भीरता और उदारता का परिचय दिया है? भारत को “ऊर्जा” की सख्त आवश्यकता है, इसलिये हमें तेल-गैस को छोड़कर अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को खंगालना ही होगा (हालांकि यह एक बहुत देर से उठाया हुआ कदम है, लेकिन फ़िर भी…), इसके लिये परमाणु ऊर्जा, भारत में विस्तृत और विशाल समुद्र किनारों पर पवन ऊर्जा चक्कियाँ, वर्ष में कम से कम आठ महीने भारत में प्रखर सूर्य होता है, इसलिये सौर ऊर्जा… सभी विकल्पों पर एक साथ काम चल रहा है, इनमें से ही एक है थोरियम रिएक्टरों से बिजली उत्पादन । विश्व परमाणु संगठन द्वारा दी गई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 3 लाख टन थोरियम (समूचे विश्व का 13%) मौजूद है, जिसका शोधन किया जा सकता है, ऐसे में यदि अपने दीर्घकालीन फ़ायदे के लिये अमेरिका से करार कर लिया तो क्या बिगड़ने वाला है?

सबसे अधिक “चिल्लपों” मची हुई है, भारत की परमाणु भट्टियों के निरीक्षण को लेकर… पता नहीं उसमें ऐसा क्या है? भारत परमाणु शक्ति का शांतिपूर्ण उपयोग करने वाला एक जिम्मेदार देश है, हम पहले से ही परमाणु अस्त्र सम्पन्न हैं, यदि कभी निरीक्षण करने की नौबत आई और निरीक्षण दल में यदि अमेरिकी ही भरे पड़े हों तो भी उसमें इतना हल्ला मचाने की क्या जरूरत है? अक्सर हमें “अखण्डता”, “सार्वभौमिकता” आदि बड़े-बड़े शब्द सुनाई दे जाते हैं, लेकिन अपनी गिरेबाँ में झाँककर देखो कि वाकई में भारत कितना “अखण्ड” है और उसकी नीतियों में कितनी “सार्वभौमिकता” है? सरेआम पोल खुल जायेगी…

भारत के तमाम पड़ोसियों में से एक भी विश्वास के काबिल नहीं है (एक नेपाल बचा था, वह भी लाल हो गया), ऐसे में परमाणु करार के बहाने यदि हमारी अमेरिका से नज़दीकी बढ़ती है तो बुरा क्या है? वामपंथी यदि सत्ता में आते ही चार साल पहले से थोरियम रिएक्टर की मांग करते तो उनका क्या बिगड़ जाता? एक घटिया से मुद्दे पर सरकार गिराने चले हैं और उधर चीन अरुणाचल पर अपना दावा ठोंक रहा है, काहे की सार्वभौमिकता? और अमेरिका का विरोध क्यों? भारतवासियों में एक सर्वे किया जाना चाहिये कि वे अमेरिका पर अधिक विश्वास करते हैं या चीन पर? वामपंथियों की आँखें खुल जायेंगी…

और अन्त में सबसे बड़ी बात तो यही है कि किन्हीं दो देशों, या दो शक्तियों में कोई भी समझौता आपसी फ़ायदे के लिये होता है, उस समझौते को जब मर्जी आये तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। ऐसा कहाँ लिखा है कि भारत को अपने तमाम समझौतों का पालन ताज़िन्दगी करते ही रहना होगा। जब हमारी सुविधा होगी तब हम अपना नया रास्ता पकड़ेंगे, जैसे राजनीति में नहीं, वैसे ही कूटनीति में “नैतिकता” का क्या काम? हिटलर ने रूस से समझौता किया था, लेकिन उसी ने रूस पर हमला किया, पाकिस्तान हमेशा इस्लाम-इस्लाम भजता रहता है, लेकिन वही अमेरिका से सबसे अधिक पैसा और हथियार लेता है, उत्तर कोरिया ने भी परमाणु बम बनाने की धमकी देकर अमेरिका और यूरोपीय संघ से अच्छा माल झटक लिया है, चीन ने सरेआम अपनी नदियों का रास्ता मोड़ लिया है और आगे जाकर वह भारत को ही दुख देगा (मतलब यह कि हरेक देश को अपना फ़ायदा सोचना चाहिये, लेकिन “भारत महान” को “लोग क्या कहेंगे…” की फ़िक्र ज्यादा सताती है)। रही बात गुटनिरपेक्षता की, तो अब कहाँ हैं कोई “गुट” और किससे निभायें “निरपेक्षता”? जब अमेरिका ही विश्व का सर्वेसर्वा बन चुका है, चीन उसको चुनौती दे रहा है (यही सच है कि हम अगले 25 वर्षों में भी दोनो की बराबरी नहीं कर सकते हैं), तो फ़िर मौके का फ़ायदा उठाने में क्या गलत है?

इंडियन एक्सप्रेस में भारत के परमाणु आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्रीनिवासन का एक लेख है, उसके अनुसार भारत को फ़िलहाल यूरेनियम की सख्त आवश्यकता है, जबकि भारत की धरती में लगभग एक लाख टन यूरेनियम होने की सम्भावना है, जिसका दोहन किया जाना अभी बाकी है। यदि भारत-अमेरिका करार हो गया और उसे आईएईए की मंजूरी मिल गई तो हम यूरेनियम कहीं से भी खरीद सकते हैं, अमेरिका से ही लें यह कोई जरूरी तो नहीं। सन् 2050 तक भारत की ऊर्जा जरूरतें थोरियम-यूरेनियम 233 से पूरी होने लगेंगी। पोखरण-2 के बाद तिलमिलाये हुए अमेरिका ने हम पर कई आरोप लगाकर कई तरह के प्रतिबन्ध लगाये, आज वही अमेरिका खुद आगे होकर हमसे परमाणु समझौता करने को बेताब हो रहा है, क्योंकि वह जान चुका है कि भारत से अब और पंगा लेना ठीक नहीं, उसे हमारी जरूरत है और हम हैं कि शंका-कुशंका के घेरे में फ़ँसे हुए खामख्वाह उसे लटका रहे हैं, जबकि हम अपने हित की कुछ शर्तें थोपकर उससे काफ़ी फ़ायदा उठा सकते हैं।

एक बार समझौता हो तो जाने दें, अमेरिका के हित भी हमसे जुड़ जायेंगे, हमारे वैज्ञानिकों को नई-नई तकनीकें और नये-नये उपकरण मिलेंगे, शोध में तेजी आयेगी जिससे भारत निर्मित थोरियम रिएक्टरों की राह आसान बनेगी। यदि अमेरिका हमसे फ़ायदा उठाना चाहता है, तो हम बेवकूफ़ क्यों बने रहें, हम भी अपना फ़ायदा देखें। यदि खुदा न खास्ता आने वाले भविष्य में समझौते में कोई पेंच दिखाई दिया, या कोई विवाद की स्थिति बनी, तो “हम चले अपने घर, तू जा अपने घर…” भी कहा जा सकता है, और हो सकता है कि आने वाले दस वर्षों में भारत का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों युवा हों, तब तक भारत की युवा शक्ति विश्व में अपना लोहा मनवा चुकी होगी, फ़िर डरना कैसा? क्या हमें अपने आने वाले युवाओं पर भरोसा नहीं करना चाहिये? सिर्फ़ इसलिये कि कब्र में पैर लटकाये हुए कुछ “कछुए” और कुछ “धर्मनिरपेक्ष” मेंढक, इस समझौते का विरोध कर रहे हैं? राजनेता (चाहे वह वामपंथी हो या दक्षिणपंथी) वोट के लिये सौ बार झूठ बोलेगा, लेकिन कलाम और काकोड़कर को कोई चुनाव नहीं लड़ना है…

खैर… सारे झमेले में फ़िर भी एक बात तो दमदार है कि, प्याज के मुद्दे पर गिरने वाली सरकारें आज परमाणु मुद्दे पर गिरने जा रही हैं, कौन कहता है कि भारत ने तरक्की नहीं की…

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7 comments:

दीपक भारतदीप said...

हमेशा की तरह आपकी एक बेहतर प्रस्तुति। मेरा विचार तो यह है कि अमेरिका से बेहतर संबंध भारत के हित में ही रहने वाले हैं। बचपन में अपने कुछ बुजुर्गों को कहते सुना था कि जो संपन्न हो उसकी मित्रता तो फलती है पर जो कंगाल है वह भला आर्थिक रूप से वक्त पर कैसे काम आ सकता है। जहां तक अमेरिका के बारे में मेरा विचार है तो एक प्रश्न अक्सर मेरे दिमाग में आता है कि ‘भारत और अमेरिका में आखिर किस बात पर टकराव हो सकता है।’ वह दुनियां भर में अपनी ताकत दिखाता है पर भारत तो दूसरों के मामले में कभी दखल ही नहीं देता तो फिर ऐसा लगता नहीं हैकि कभी टकराव होगा।
दीपक भारतदीप

अरुण said...

प्याज के मुद्दे पर गिरने वाली सरकारें आज परमाणु मुद्दे पर गिरने जा रही हैं, कौन कहता है कि भारत ने तरक्की नहीं की… :) की है जी बिलकुल की है ,अब तो १००% मान गये जी :)

संजय बेंगाणी said...

नेपाल (ह)लाल हो गया, यह भारत की हार है.


प्याज पर सरकार जाना...कितना समझदार है मतदाता?


बाकि तरक्की तो खूब हुई है.

विचार said...

आपने जो बातें रखीं वह पूरी तरह जायज़ हैं, पर पर्यावरण के लिहाज़ से परमाणु तकनीक का कोई भी प्रयोग बर्बादी की ओर एक कदम है. सैद्धांतिक भौतिकशास्त्र भी आज तक परमाणु कचरे के निपटारे का कोई सुरक्षित हल नहीं खोज पाया है. उसके पास दो ही तरीके हैं पहला कंटेनरों में सील करके खतरनाक विकिरण वाले कचरे को गहरे समुद्र में दफना दिया जाए. दूसरा इस कचरे को पृथ्वी की कक्षा से दूर अन्तरिक्ष में डंप कर दिया जाए. और जिस भी ज़मीन पर एक बार परमाणु भट्टी लग जाए वह भूमि कुछ लाख वर्षों तक मानव-उपयोग के लायक नहीं रह जाती. फ़िर भारत में तो अस्पतालों में नकली दवाएं उपयोग की जातीं है, सेना के हथियार आतंकवादियों को बेच दिए जाते हैं. फ़िर कैसे उम्मीद करें की इतने अधिक संयंत्रों की सुरक्षा और कचरे के निपटारे के फंड की गंगा में घपलेबाज़ हाथ नहीं धोयेंगे? और अगर कोई भी दुर्घटना होती है तो भयावह जनहानि होगी क्योंकि हर संयंत्र मानव आबादी के पास ही होगा(भारत का जनसँख्या घनत्व ही इतना अधिक है).

पर आज इस तकनीक का प्रयोग हमारी मजबूरी है, सब मिल कर नर्क मचा रहें हों तो एक ही पक्ष से नैतिकता और अच्छाई का पालन करने की उम्मीद नहीं की जा सकती. पर फ़िर भी यह सच्चाई है की हमारी सभ्य दुनिया 'सामूहिक पागलपन'(mass neurosis) का शिकार हो चुकी है. जो इस पागलापन में शामिल नहीं होना चाहता उसका अस्तित्व ही पूरी दुनिया मिटा देना चाहती है.

सही तो यह होगा की हर देश ऐसी जीवनशैली प्रयोग में लाये जिससे इतनी ऊर्जा की ज़रूरत ही न पड़े. पर यह सपना ही रहेगा ऐसा कभी सम्भव नहीं हो पाएगा. क्या पता अगले पाँच सात दशकों बाद हम मानव ख़ुद को बचा भी पाते हैं या नहीं?

ab inconvenienti said...

परमाणु कचरे के बारे में अधिक जानकारी के लिए देखें:

परम ऊर्जा चरम विनाश (भाग १)
परम ऊर्जा चरम विनाश(भाग २)

विधान चंद्र उपाध्याय said...

aare bhai saab dogale hai ye cominust.

विधान चंद्र उपाध्याय said...

aare bhai saab dogale hai ye cominust.