Sunday, July 13, 2008

परमाणु करार – कांग्रेस द्वारा एक पत्थर से कई शिकार

Indo-US Nuclear Deal Politics
सारे देश में एक “अ-मुद्दे” पर बहस चल रही है, जबकि मुद्दा होना चाहिये था “भारत की ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी हों?”, लेकिन यही भारतीय राजनीति और समाज का चरित्र है। इस वक्त हम विश्लेषण करते हैं भारत की अन्दरूनी राजनीति और उठापटक का… कहते हैं कि भारत में बच्चा भी पैदा होता है तो राजनीति होती है और जब बूढ़ा मरता है तब भी… तो भला ऐसे में परमाणु करार जैसे संवेदनशील मामले पर राजनीति न हो, यह नहीं हो सकता…।

पिछले एक माह से जारी इस सारे राजनैतिक खेल में सबसे प्रमुख खिलाड़ी के तौर पर उभरी है कांग्रेस। कांग्रेस ने एक पत्थर से कई पक्षी मार गिराये हैं (या मारने का प्लान बनाया है)। पिछले चार साल तक वामपंथियों का बोझा ढोने के बाद एकाएक मनमोहन सिंह का “मर्द” जागा और उन्होंने वामपंथियों को “परे-हट” कह दिया। चार साल पहले वामपंथियों की कांग्रेस को सख्त जरूरत थी, ताकि एक “धर्मनिरपेक्ष”(??) सरकार बनाई जा सके, मिल-बाँटकर मलाई खाई जा सके। चार साल तक तो बैठकों, चाय-नाश्ते के दौर चलते रहे, फ़िर आया 2008, जब मार्च के महीने से महंगाई अचानक बढ़ना शुरु हुई और देखते-देखते इसने 11% का आंकड़ा छू लिया। कांग्रेसियों के हाथ-पाँव फ़ुलाने के लिये यह काफ़ी था, क्योंकि दस-ग्यारह माह बाद उन्हें चुनावी महासमर में उतरना है। महंगाई की कोई काट नहीं सूझ रही, न ही ऐसी कोई उम्मीद है कि अगले साल तक महंगाई कुछ कम होगी, ऐसे में कांग्रेस को सहारा मिला समाजवादी पार्टी (सपा) का। दोनों पार्टियाँ उत्तरप्रदेश में मायावती की सताई हुई हैं, एक से भले दो की तर्ज पर “मैनेजर” अमरसिंह का हाथ कांग्रेस ने थाम लिया। कांग्रेस जानती है कि नंदीग्राम, सिंगूर आदि के मुद्दे पर बंगाल में और भ्रष्टाचार व सांप्रदायिकता के मुद्दे पर केरल में वामपंथी दबे हुए हैं और उन्हें खुद अगले चुनाव में ज्यादा सीटें मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, जबकि प्रधानमंत्री बनने (बहुमत) का रास्ता उत्तरप्रदेश और बिहार से होकर गुजरता है। मायावती नामक “हैवीवेट” से निपटने के लिये दो “लाइटवेट” साथ लड़ेंगे, और बिहार में लालू तो एक तरह से सोनिया के दांये हाथ ही बन गये हैं, ऐसे में इस समय वामपंथियों को आराम से लतियाया जा सकता था, और वही किया गया।

अब देखिये एक परमाणु मुद्दे ने कांग्रेस को क्या-क्या दिलाया –
1) एक “टेम्परेरी” दोस्त दिलाया जो उत्तरप्रदेश (जहाँ कांग्रेस लगभग जीरो है) में उन्हें कुछ तो फ़ायदा दिलायेगा, बसपा और सपा को आपस में भिड़ाकर कांग्रेस मजे लेगी, सपा के कुछ मुसलमान वोट भी कांग्रेस की झोली में आ गिरने की सम्भावना है।
2) “तीसरा मोर्चा” नाम की जो हांडी-खिचड़ी पकने की कोशिश हो रही थी, एक झटके में फ़ूट गई और दाना-दाना इधर-उधर बिखर गया, और यदि सरकार गिरती भी है तो हल्ला मचाया जा सकता है कि “देखो-देखो…राष्ट्रहित में हमने अपनी सरकार बलिदान कर दी, लेकिन वामपंथियों के आगे नहीं झुके… आदि” (वैसे भी कांग्रेस और उसके भटियारे चमचे, “त्याग-बलिदान” आदि को बेहतरीन तरीके से सजाकर माल खाते हैं), और इसकी शुरुआत भी अखबारों में परमाणु करार के पक्ष में विज्ञापन देकर शुरु की जा चुकी है।
3) यदि सरकार गिरी तो ठीकरा विपक्ष के माथे, खासकर वामपंथियों के… और यदि सरकार नहीं गिरी तो एक साल का समय और मिल जायेगा, पहले वामपंथियों की भभकियाँ सुनते थे, अब सपाईयों की सौदेबाजी सहेंगे, कौन सा कांग्रेस की जेब से जा रहा है।

इस राजनैतिक खेल में सबसे घाटे में यदि कोई रहा तो वह हैं “लाल मुँह के कॉमरेड” (कांग्रेसी चाँटे और शर्म से लाल हुए)। यदि वे महंगाई के मुद्दे पर सरकार गिराते तो कुछ सहानुभूति मिल जाती, लेकिन समर्थन वापस लेने का बहाना बनाया भी तो क्या घटिया सा!! असल में चार साल तक सत्ता की मौज चखने के दौरान आँखों पर चढ़ चुकी चर्बी के कारण महंगाई उन्हें नहीं दिखी, लेकिन बुढ़ाते हुए पंधे साहब को परमाणु करार के कारण मुस्लिम वोट जरूर दिख गये, इसे कहते हैं परले दर्जे की सिद्धांतहीनता, अवसरवाद और राजनैतिक पाखंड। भाजपा फ़िलहाल “मन-मन भावे, ऊपर से मूँड़ हिलावे” वाली मुद्रा अपनाये हुए है, क्योंकि यदि वह सत्ता में होती तो कांग्रेस से भी तेजी से इस समझौते को निपटाती (समझौते की शुरुआत उन्होंने ही की थी)। भाजपा को लग रहा है कि “सत्ता का आम” बस मुँह में टपकने ही वाला है उसे सिर्फ़ वक्त का इंतजार करना है… हालांकि यह मुगालता उसे भारी पड़ सकता है, क्योंकि यदि सरकार नहीं गिरी, चुनाव अगले साल ही हुए, मानसून बेहतर रहा और कृषि उत्पादन बम्पर होने से कहीं महंगाई दर कम हो गई, तो चार राज्यों में जहाँ भाजपा सत्ता में है वहाँ “सत्ता-विरोधी” (Anti-incumbency) वोट पड़ने से कहीं मामला उलट न जाये और एक बार फ़िर से “धर्मनिरपेक्षता” की बाँग लगाते हुए कांग्रेस सत्ता में आ जाये। कांग्रेस के लिये तो यह मामला एक जुआ ही है, वैसे भी जनता तो नाराज है ही, यदि इन चालबाजियों से “सत्ता के अंकों” (यानी 272 मुंडियाँ) के नजदीक भी पहुँच गये तो फ़िर वामपंथियों को मजबूरन, यानी कि “सांप्रदायिक ताकतों” को सत्ता में आने से रोकने के नाम पर (इस वाक्य को पढ़कर कृपया हँसें नहीं) कांग्रेस का साथ देना ही पड़ेगा…

तो भाइयों कुल मिलाकर यह है सारा कांग्रेस का खेल… जबकि “कम्युनिस्ट” बन गये हैं इस खेल में “तीसरे जोकर”, जिसका वक्त आने पर “उपयोग” कर लिया जायेगा और फ़िर वक्त बदलने पर फ़ेंक दिया जायेगा… आखिर “धर्मनिरपेक्षता”(?) सबसे बड़ी चीज़ है…

अब सबसे अन्त में जरा “कम्युनिस्ट” (COMMUNIST) शब्द का पूरा अर्थ जान लीजिये –
C = Cheap
O = Opportunists
M = Marionette (controller - China)
M = Mean
U = Useless
N = Nuts
I = Indolents
S = Slayers
T = Traitors

क्या अब भी आपको कम्युनिस्टों की “महानता” पर शक है?

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8 comments:

mahashakti said...

बेहद उम्‍दा लेखन, जितना अच्‍छा लिखा है वह किसी दैनिक समाचार पत्र के सम्‍पादक ही लिख सकता है। करार को हथियार बनाया है। सत्‍ता जायेगी परमाणु करार ये अपने साथ अपने कंग्रेस कमेटी में ही करेगें।

मनमोहन का जाना तो तय है।

Shastri said...

प्रिय सुरेश, अपने हर लेख के समान आप ने इस बार भी बहुत ही सटीक एवं युक्तियुक्त विश्लेषण प्रस्तुत किया है.

अपनी सशक्त कलम को चलते रहने दो. यह बहुत लोगों की आंखे खोल देगी!!!

अरुण said...

हमेशा की तरह सटीक विवेचनात्मक अध्ययन , मुझे हमेशा लगता है कि मै बीबी सी पर कुछ सुन रहा हू वही शैली वही ढंग वही तरीका और सब कुछ उधेड फ़ेकना

निशिकान्त said...

बहुत ही सुन्दर लिखा है आप ने। ब्लोग पर मेरा पहला दिन है। वैसे नेट पर बहुत दिनो से हूं । उम्मीद करता हू कि आप के और भी लेख पठने को मिलेगे।

Cyril Gupta said...

सरकार गिराने के लिये महंगाई मुद्दा न बनकर परमाणू ऊर्जा करार बना. सचमुच अजीब बात है.

सुनते हैं भारत-अमेरिका के बनते संबंधों से चीन परेशान है. सही भी लगता है. चीन की परेशानी भारत में महंगाई से नहीं बढ़ती, भारत के परमाणू ऊर्जा निर्भर बनने से बढ़ती है.

चीन के प्रभाव वाली बात में दम दिखता है

डा० अमर कुमार said...

एक बेबाक एवं प्रौढ़ विश्लेषण है, यहाँ !
साधुवाद..

संजय बेंगाणी said...

वामपंथी महानता पर कोई शक नहीं था और न अब है. बल्कि वह ज्यादा प्रबल हुआ है :)

Akhil Gokhale said...

Thanks once again for writing an excellent article. Whatever you wrote about Communist, it’s more than 100% true. Due to vote bank, even BJP is opposing this deal even though they stated this initially, this is very sad. But, as said, in politics, everything is fair ….
Come to deal, very few people (even politicians) knows about exact draft. I am very surprised to see lots interviews of lots of politicians who are giving interviews to news channel about deal. Do they really know actual deal, I doubt.
-Akhil