Sunday, July 6, 2008

सुधा मूर्ति द्वारा लिखित एक बेहतरीन संस्मरण…

विवाह जीवन का एक अनिवार्य संस्कार है। भारत में विवाह कई रीति-रिवाजों के साथ होता है। हमारी हिन्दी फिल्मों में कई कहानियाँ विवाह के विषय पर आधारित हैं। भारत का इतिहास गवाह है कि कई युद्ध विवाहों के कारण लड़े गए।

पहले विवाह संपन्न होने में पूरा एक सप्ताह तक लग जाता था। समय के साथ-साथ इसकी अवधि कम होती गई। पहले तीन दिन और वर्तमान में एक दिन के लिए यह शुभ समारोह होता है। विवाह में जिंदगी की सारी कमाई खर्च हो जाती है। शादी के लिए कई लोग पैसे उधार लेते हैं और सारी जिंदगी इस कर्ज को चुकाते रहते हैं। जब मैंने बँधुआ मजदूरों के साथ बातें की, तब अनुभव किया कि कर्ज चुकाने के कारण उनकी यह अवस्था हुई है। विवाह के समय हम बारातियों के सुख-सुविधा, दुल्हन के श्रृंगार, व्यंजन आदि के विषय पर चिंतित होते हैं।

हाल ही में मैं मास्को (रूस) गई थी। रूस का इतिहास बताता है कि रूस ने कई युद्ध जीते हैं । वहाँ के निवासी इन बातों से गर्वित हो उठते हैं। शहीद वीरों की स्मृतियों में कई स्मारक एवं मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। पहला युद्ध पीटर दी ग्रेट तथा स्वीडन के बीच हुआ था। दूसरा युद्ध फ्रांस के नेपोलियन एवं जार एलेक्जेंडर प्रथम के बीच हुआ था।

मास्को में एक विशाल पार्क स्थित है, जिसका नाम है पीस पार्क। इस पार्क के मध्य में एक स्तंभ है और इस स्तंभ पर रूस में युद्ध की तारीख एवं स्थानों के बारे में लिखा गया था । पार्क में विभिन्न प्रकार के फव्वारे एवं रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। पर्यटकों के लिए यह एक आकर्षक स्थल है। रविवार के दिन मैं पार्क में गई थी। उस दिन हल्की-सी वर्षा एवं ठंड पड़ रही थी। मैं उस सुहावने मौसम का आनंद छतरी के तले ले रही थी। चारों ओर खिलती हरियाली मन को भा रही थी।

अचानक मेरी नजर कम उम्र के एक युगल पर पड़ी। उन्हें देखकर ऐसा लगा कि उनकी शादी हाल ही में हुई है। युवती बीस-बाईस वर्ष की थी, पतली-दुबली एवं नीली आँखों वाली। वह देखने में बहुत ही सुंदर थी। युवक भी उसी की उम्र का था तथा दिखने में आकर्षक था। वह फौजी कपड़े पहने था। युवती के सुंदर चमकते कपड़ों पर मोती जड़े हुए थे। युवती ने एक लंबी पोशाक पहन रखी थी। हाथ में एक गुलदस्ता था तथा युवक छतरी से उसे वर्षा की बूँदों से बचा रहा था ताकि वह भीग न जाए।

मैंने देखा कि वे स्मारक की ओर बढ़ रहे हैं। पहुँचने पर उन्होंने गुलदस्ता रखा एवं झुककर प्रार्थना की। कुछ देर बाद वे वहाँ से चले गए। मैं सोच रही थी कि उनसे प्रश्न करूँ कि वे क्या कर रहे थे? इस रिवाज का क्या अर्थ है, परंतु भाषाओं में अंतर होने के कारण मैं उनसे कुछ पूछ नहीं पा रही थी। उस समय एक वृद्ध व्यक्ति मेरे पास खड़े हुए थे। उन्होंने मुझे साड़ी पहने देखकर कहा कि क्या आप भारतीय हैं?
मैंने कहा- हाँ।

वृद्ध व्यक्ति ने कहा- मैंने राज कपूर की फिल्में देखी हैं। उनकी फिल्में बहुत ही अच्छी हैं। रूस में राज कपूर आए थे। क्या आप यह गाना जानती हैं- मैं आवारा हूँ...।

'क्या आप जानती हैं कि मास्को में भारत के तीन प्रसिद्ध व्यक्तियों की मूर्तियाँ स्थापित हैं?'
मैंने पूछा- कौन हैं वे तीन व्यक्ति? तब वृद्ध ने जवाब दिया, जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गाँधी एवं इंदिरा गाँधी। वार्तालाप के दौरान मैंने उनसे कुछ सवाल किए।

मैंने पूछा- आप अँगरेजी भाषा कैसे जानते हैं?

तब उन्होंने कहा- मैंने विदेश में नौकरी की थी। उसी समय मैंने अँगरेजी सीखी।

मैंने पूछा- क्या आप बता सकते हैं कि नवविवाहिता वर-वधू ने शादी के दिन स्मारक के दर्शन किसलिए किए?

वृद्ध व्यक्ति ने कहा- यह यहाँ की प्रथा है। रविवार एवं शनिवार के दिन शादियाँ होती हैं। वर-वधू अपने नाम को सूचीबद्ध करके प्रमुख राष्ट्रीय स्मारक के दर्शन करते हैं। इस देश के हर युवक को कुछ सालों के लिए सेना में विशिष्ट सेवा देनी पड़ती है। चाहे वह सेना में किसी भी पद पर हो, उस युवक को विवाह के दिन अपने सैनिक वस्त्र ही पहनने पड़ते हैं।

मैंने पूछा- ऐसी प्रथा क्यों प्रचलित है यहाँ पर?

यह कृतज्ञता की निशानी है? रूस ने कई युद्ध लड़े हैं। उनमें हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों की कुर्बानी दी है। चाहे हमने युद्ध हारे हों या जीते हों, उनकी दी हुई कुर्बानी हमारे देश के लिए बहुमूल्य है। नवविवाहित युगलों को याद रखना चाहिए कि वे एक शांतिपूर्ण स्वतंत्र देश में रहे हैं। चूँकि उनके पूर्वजों ने अपने प्राणों की कुर्बानी दी थी। उन्हें उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए। देशप्रेम विवाह समारोह से अधिक महत्वपूर्ण है। हम बुजुर्गों की यह इच्छा है कि यह परंपरा चलती रहे। विवाह के दिन नवविवाहितों को नजदीक के युद्ध स्मारक के दर्शन करना चाहिए।

इस विषय पर मैं सोचने लगी कि हम अपने बच्चों को क्या सीख देते हैं। क्या हम उन्हें 1857 के स्वतंत्रता के लिए लड़े गए युद्ध के बारे में बताते हैं या हम 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में कहते हैं? क्या हम नवविवाहितों को अंडमान की जेल के विषय में बताते हैं, जहाँ पर हजारों लोगों को कालापानी की सजा दी गई थी एवं वे निर्ममता से फाँसी पर चढ़ाए गए थे?

क्या हम भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, शिवाजी, महाराणा प्रताप, लक्ष्मीबाई आदि वीर शहीदों को याद करते हैं? जिन्होंने देश के लिए जान की कुर्बानी दे दी। स्वतंत्र भारत को देखने के लिए वे वीर पुरुष एवं महिला जिंदा नहीं रहे। क्या हम में इतनी कृतज्ञता की भावना है कि उन वीर महापुरुषों को अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन याद करें। हम इस दिन साड़ी, गहने की खरीददारी एवं मनोरंजन के लिए पार्टी में जाते हैं।

मेरी आँखें भर आईं। मैं चाहती हूँ कि यह शिक्षा हम रूस के निवासियों से सीखें और याद करें अपने शहीदों को अपनी खुशियों के अवसर पर।
(यह संस्मरण हाल ही में "नईदुनिया" इन्दौर में प्रकाशित हुआ था)
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इस संस्मरण की भावना के मद्देनजर अब दो शब्द मेरी तरफ़ से…
आज के माहौल से मेल खाता हुआ यह मर्मस्पर्शी लेख है, आम नागरिक के मन में देश के लिये जो जज़्बा अन्य पश्चिमी और यूरोपीय देशों में है, उसका 50% भी भारत के लोगों में नहीं है, यदि होता तो वे दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों की सूची में आगे-आगे नहीं होते… हाँ, दिखावा करने में हम लोग सबसे बेहतर हैं, साल में दो-एक बार सैनिकों के लिये घड़ियाली आँसू बहा लेते हैं बस… आज भी हमारी व्यवस्था शहीदों, शहीदों की विधवाओं और परिवारों के साथ बहुत बुरा सलू्क करती हैं। अफ़जल को अब तक फ़ाँसी नहीं दी जा रही, शहीदों के परिवार पेंशन, गुजारे भत्ते, पेट्रोल पंपों के लिये गिड़गिड़ा रहे हैं, सियाचिन पर सैनिकों के लिये जूते भेजने में अधिकारी पैसे को लेकर आनाकानी करते हैं, लेकिन शर्म हमें आती नहीं… जब रा स्व संघ, मानेकशॉ की अंत्येष्टि के बारे में सवाल उठाता है तो वह सांप्रदायिक, लेकिन कारगिल और पोखरण की वर्षगाँठ भु्ला देने वाले कांग्रेसी "धर्मनिरपेक्ष", यही इस देश का रोना है… राष्ट्र के बारे में, सेना के बारे में बात करना भी सांप्रदायिकता में आने लगा है अब????? असली धर्मनिरपेक्षता यही है कि बच्चों को "ग" से गणेश नहीं बल्कि "ग" से गधा पढ़ाया जाये, शिवाजी के गुणगान की बजाय अकबर को महान बताया जाये, सरस्वती वन्दना और वन्देमातरम् का विरोध करना भी "प्रगतिशीलता" की निशानी माना जाता है… लेकिन जिन लोगों को कश्मीर से ज्यादा चिंता फ़िलिस्तीन की हो, असम-बंगाल की घुसपैठ से ज्यादा चिंता गुजरात की है, उनसे क्या अपेक्षा करें… मानेकशॉ की अंत्येष्टि में "सरकार" सिर्फ़ इसीलिये शामिल नहीं हुई कि कहीं पाकिस्तान-बांग्लादेश नाराज न हो जायें… तरस आता है ऐसी घिनौनी सोच पर, और इनके समर्थकों पर… ऐसे लोग कभी भी "भारत को महान" नहीं बना सकते…

11 comments:

संजय तिवारी said...

बहुत सुंदर, प्रेरक.
(टिप्पणी से आप समझ ही गये होंगे कि मैंने पूरा पढ़ा नहीं.) अच्छा जो हमारी आपकी बात हुई थी उसका क्या हुआ?

अखिल तिवारी said...

बहुत अच्छा लेख है। सुधा जी का संस्मरण दिल को सोचने पर पजबूर करता है। शादी के समय ये सब सोचने की बात तो दूर, दिल्ली में कितने ऐसे लोग हैं जो पता नही कितने बार इंडिया गेट जाके मस्ती करके चले आते होंगे पर शहीद स्मारक देखने और असका महत्व जानने का सोचा भी न होगा...

Gyandutt Pandey said...

बहुत सुन्दर, प्रेरक (हमने लेख पढ़ा है)। सरकार की मजबूरी हो सकती है - राजनैतिक मजबूरी। पर ये जनता को क्या हो गया है। एक चिरकुट सिने हीरो मर जाये तो इतनी पांय-पांय करेंगे लोग। और असली हीरो को सन्नाटा। असल में लोगों को कल्पनालोक में जीने को चाहिये। कोई असल जिंदगी का हीरो नहीं बनना चाहता। वह बहुत डिमाण्डिंग काम है!

सतीश पंचम said...

बहुत ही प्रेरक प्रसंग है, हम सचमुच अपने वीरों को भूलते जा रहे हैं। अच्छा लेख लिखा।

sushant jha said...

लाजवाब लेख...काश हमारे देश में भी ये परंपराएं होती...हालत तो ये है कि युद्ध की चर्चा करने मात्र से आपको दक्षिणपंथी ठहरा दिय़ा जाएगा।

mahashakti said...

मै नतमस्‍तक हूँ,रूस के लोगों की राष्‍ट्रभक्ति देख कर, भारतीयों के विषय में कहने के लिये मेरे पास शब्‍द ही नही है ।

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर्,प्रेरक् लेख्!

अरुण said...

ये हम भी करते है जी सम्मान जिन्होने कुर्बानिया दी उनके नाम आने वाली पीढी को आतंकवादी बता कर पढाते है जिन्होने युद्ध मे शत्रू राष्ट्र की सहायता की , जिन्होने अग्रेजी की सहयता की उन्हे महान बताते घोषित कर देते है. :)

अरुण said...

ये हम भी करते है जी सम्मान जिन्होने कुर्बानिया दी उनके नाम आने वाली पीढी को आतंकवादी बता कर पढाते है जिन्होने युद्ध मे शत्रू राष्ट्र की सहायता की , जिन्होने अग्रेजी की सहयता की उन्हे महान बताते घोषित कर देते है. :)

संजय बेंगाणी said...

आपको बता दूँ, नेहरू तो अण्डमान जेल को ही नष्ट कर देना चाहते थे.

यही है भारत.

anil said...

हम तो सोहराबुद्दीन की मौत पर छाती पीट पीट कर रोने वाले लोग है हमें क्या मतलब है कैप्टन मनोज पांडे की शहादत से ....क्या फर्क पड़ता है योगेन्द्र यादव ने 18 गोलियां खायी थी देश के लिए ....हम तो अफजल को दामाद की तरह बैठा कर उसके उसमें....तेल लगाने वाले लोग है....