Tuesday, May 13, 2008

चिदम्बरम जी अल्पसंख्यक का मतलब सिर्फ़ मुसलमान नहीं होता…

UPA Chidambaram Minority Appeasement Budget
अब तक यह समझा जाता था कि केन्द्रीय बजट भारत के प्रत्येक नागरिक के लिये समान अवसर प्रदान करता है, बजट में किये गये प्रावधानों से किसी एक धर्म का नहीं सबका भला होता है, लेकिन यह सोच कितनी गलत थी, आइये देखते हैं। अपने पिछले लगातार पाँच बजटों में यूपीए सरकार ने एक नया फ़ॉर्मूला गढ़ लिया है जो कि आने वाले समय में और बढ़ता ही जायेगा, वह है “अल्पसंख्यकवाद”। पिछले कुछ दशकों में राजनैतिक और अब आर्थिक लाभ लेने के लिये “अल्पसंख्यक” का लेबल लगवा लेने का फ़ैशन बढ़ता ही जा रहा है, पहले जैन, फ़िर आर्य समाजी, रामकृष्ण मिशन सम्प्रदाय आदि धीरे-धीरे विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यकों में शामिल होने के लिये आवेदन कर रहे हैं, कुछ सम्प्रदाय “राज्य आधारित” सुरक्षा चाहते हैं और “हम हिन्दू नहीं हैं, उनसे अलग हैं…” की गुहार लगाने लगे हैं। ऐसा लगता है कि भारत में “बहुसंख्यक” होना अब असुविधाजनक होता जा रहा है और “अल्पसंख्यक” बन जाना सम्मानजनक!!!

चिदम्बरम साहब के पिछले बजटों में “अल्पसंख्यक” (Minority) शब्द का उल्लेख बार-बार होता रहा है, लेकिन ताजा बजट में शर्म मिटते-मिटते अब अल्पसंख्यक का मतलब हो गया है सिर्फ़ “मुस्लिम”। कैसे? बताते हैं… 2004-05 के बजट में यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम को 50 करोड़ रुपये दिये थे, बजट में कहा गया था कि ये पैसा अल्पसंख्यक कल्याण, विशेषकर उनकी शिक्षा के लिये खर्च किया जायेगा (यानी कि उनके कल्याण और शिक्षा के लिये नेहरू, इन्दिरा और राजीव ने अब तक कुछ नहीं किया था), कुछ किया तो सिर्फ़ यूपीए ने। यूपीए के दूसरे बजट में कहा गया कि “अल्पसंख्यकों को देश की मुख्य धारा में लाना है…और उनका विकास करना है…” (इसका मतलब भी यही निकलता है कि 15 अगस्त 1947 से 28 फ़रवरी 2006 तक सारे अल्पसंख्यक सभी कांग्रेस सरकारों द्वारा, विकास से दूर ही रखे गये थे)। लड़कियों के लिये स्कूल, अल्पसंख्यक इलाकों में आंगनवाड़ियाँ, अल्पसंख्यक छात्रों को प्रायवेट कोचिंग की सुविधा जैसे कई “अल्पसंख्यक” कल्याण की विभिन्न योजनाओं का उल्लेख और ढिंढोरा था। अब देखिये, अगले बजट में चुपचाप और धीरे-धीरे “अल्पसंख्यक” का मतलब मुसलमान में बदल गया। अगले बजट में 200 करोड़ रुपये मौलाना आजाद शिक्षा फ़ाउंडेशन को दिये गये और 13 करोड़ रुपये उर्दू के विकास के लिये।



ताजा बजट (2008-09) तो खुल्लमखुल्ला “मुसलमानों” के फ़ायदे के लिये एक-सूत्रीय कार्यक्रम में बदल गया। बजट भाषण के पैराग्राफ़ 47 की हेडिंग है “अल्पसंख्यक”, मतलब क्या? अल्पसंख्यक मामलों के लिये बजट प्रावधान 500 करोड़ से बढ़ाकर 1000 करोड़ कर दिया गया, ताकि “सच्चर कमेटी” की सिफ़ारिशों पर तेजी से अमल किया जा सके (सच्चर कमेटी के लिये भी अल्पसंख्यक का अर्थ केवल और केवल मुसलमान ही था)। बजट की अन्य योजनाओं में, 90 अल्पसंख्यक बहुल जिलों (पढ़ें मुस्लिम) में विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिये 3780 करोड़ रुपये, प्री-मेट्रिक स्कॉलरशिप के लिये 80 करोड़ रुपये, मदरसों के आधुनिकीकरण के लिये 45 करोड़, मौलाना आजाद शिक्षा फ़ाउंडेशन को और 60 करोड़ रुपये, तथा सबसे खतरनाक बात यह कि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों (इसे पढ़ें ‘मुस्लिम’) में खासतौर से सरकारी क्षेत्र बैंकों की 544 शाखायें (खामख्वाह… धंधा हो या ना हो) खोलना शामिल हैं, यहाँ खत्म नहीं हुआ है अभी… 2008-09 में अल्पसंख्यकों को केन्द्र की अर्ध-सरकारी सेनाओं में अधिक से अधिक नियुक्तियाँ देना भी इस बजट में शामिल है। जाहिर है कि यह सब सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमानों को फ़ायदा पहुँचाने के लिये किया गया, इसमें “अल्पसंख्यक” शब्द का कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी आदि बाकी सभी कांग्रेस के अनुसार “अल्पसंख्यक” की परिभाषा में नहीं आते। यह एक बेहद खतरनाक परम्परा शुरु की गई है और समाज को धर्म के आधार पर बाँटने के कई कदमों में से यह एक है… सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से भी ज्यादा खतरनाक।

लगभग हरेक भारतीय जानता है कि राजनेताओं की घोषणाओं के मंसूबे क्या होते हैं। सारी घोषणायें सिर्फ़ वोट के लिये होती हैं, चाहे इससे समाज कितने ही टुकड़ों में बँट जाये या कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो जाये, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता है। “अल्पसंख्यक इलाकों” में बैंकों की विशेष शाखायें खोलने के क्या गम्भीर नतीजे हो सकते हैं सेंट्रल बैंक, अम्मापट्टी की इस घटना से सिद्ध हो जायेगा…

तमिलनाडु का एक जिला है पुदुकोट्टई, जिसका एक कस्बा है अम्मापट्टी। यहाँ की सेंट्रल बैंक की शाखा में कुछ मुसलमान युवकों ने बैंक के दो कर्मचारियों को ट्रांसफ़र करने की माँग की। शायद ये कर्मचारी उन मुसलमानों को “लोन देने और अन्य लाभ देने” में अडंगे लगा रहे थे। बैंक मैनेजर ने उनकी माँग सिरे से खारिज कर दी। उन मुसलमान युवकों ने मैनेजर को धमकी दी कि 15 अक्टूबर 2007 तक यदि इन कर्मचारियों का ट्रांसफ़र नहीं किया गया तो वे बैंक को “ताला” लगा देंगे (जी हाँ सही पढ़ा आपने, “ताला लगा देंगे” कहा)। घबराये हुए बैंक मैनेजर ने पुलिस और जिला प्रशासन को शिकायत की और पुलिस सुरक्षा की माँग की। अब देखिये भारत की कानून-व्यवस्था… स्थानीय तहसीलदार के नेतृत्व में “शांति बैठक” आयोजित की गई। सेंट्रल बैंक के जनरल मैनेजर वहाँ शांति से उपस्थित हुए, लेकिन वे मुस्लिम युवक तहसीलदार के दफ़्तर में नहीं आये। उन्होंने माँग की कि पुलिस और बैंक अधिकारी मस्जिद में “जमात” में आयें वहीं बात होगी। बेचारा, जनरल मैनेजर (जो कि किसी अन्य राज्य का था) “जमात” से चर्चा करने को तैयार हो गया, शर्त ये थी कि तहसीलदार, बैंक अधिकारी और जमात के पाँच सदस्य चर्चा करेंगे, लेकिन पाँच की जगह वहाँ सौ से अधिक मुसलमान इकठ्ठा थे। मैनेजर ने चुपचाप उनकी बात सुनी और कहा कि “वह बैंक जाकर उन कर्मचारियों का पक्ष सुनेंगे, उसके बाद नियमानुसार जो होगा वह किया जायेगा”, लेकिन भीड़ ने उनका घेराव कर दिया और उन कर्मचारियों का तत्काल लिखित में ट्रांसफ़र करने की माँग करने लगे। मैनेजर ने यह कहकर मना कर दिया कि ट्रांसफ़र करने के अधिकार उसके पास नहीं हैं। जनरल मैनेजर के बैंक पहुँचने से पहले ही कुछ युवाओं ने बैंक जाकर उसके शटर बन्द कर दिये और ताला लगा दिया, जबकि स्टाफ़ बैंक के अन्दर ही था। वहाँ उपस्थित पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने DSP को खबर की, वे खुद आये और बैंक का ताला खोला।

लेकिन मुद्दा हल नहीं हुआ था, बल्कि और बिगड़ गया। मामले की रिपोर्ट एसपी को की गई, जो आधी रात को ताबड़तोड़ अम्मापट्टी पहुँचे और गुस्से में उन मुस्लिम युवकों से कहा कि “आप लोगों का यह काम गैरकानूनी है, जैसे आपने बैंक के कर्मचारियों को बन्द कर दिया है, वैसे ही यदि जमात के सदस्यों को बन्द करें तो आपको कैसा लगेगा?” इस बात पर एक नया मुद्दा भड़क गया कि एसपी ने जमात के खिलाफ़ ऐसा कैसे कहा? कलेक्टर को बीचबचाव करने आना पड़ा, लेकिन जमात की नई माँग थी कि उन कर्मचारियों के ट्रांसफ़र के साथ-साथ एसपी पर भी कार्रवाई होना चाहिये। जबकि बैंक कर्मचारियों की माँग थी कि हमलावरों को गिरफ़्तार किया जाये, वरना एक “नई परम्परा” शुरु हो जायेगी!!! यह सारा वाकया तमिल साप्ताहिक “तुगलक” में दिनांक 31.10.2007 को छप चुका है, यहाँ तक कि “जमात” ने भी इस घटना की पुष्टि की लेकिन विवाद की वजह नहीं बताई। इस समूचे मामले का और भी दुखद पहलू यह है कि किसी अन्य अखबार या पत्रिका ने इस खबर को छापने की “हिम्मत” नहीं दिखाई। रही बात राज्य शासन की तो वह भी उसी तरह चुप्पी साधे रहा जैसा कि सोनिया के सामने मनमोहन साधे रहते हैं या बुश के सामने मुशर्रफ़।

इस घटना के सबक हमारे लिये स्पष्ट हैं, यदि सरकार (कांग्रेस) किसी धर्म विशेष के लोगों के लिये खास उनके “इलाकों” में बैंक खोलती है, तो वह समुदाय (इसे “जमात” पढ़ें) अपनी मनमानी अवश्य करेगा। बैंक अपने नियम-कायदों से नहीं, बल्कि जमात के हुक्म के अनुसार लोन बाँटेंगी या कर्मचारियों के तबादले करेंगी। उन खास इलाकों में धर्म विशेष को सुविधा के नाम पर खोले गये “स्कूल”, आंगनवाड़ी, या बालवाड़ी केन्द्र का हश्र भी कुछ ऐसा ही होगा, जब प्राचार्य को धमकाकर नाजायज काम करवाये जायेंगे। हरेक शहर में एक या दो मोहल्ले ऐसे होते हैं जहाँ मुसलमानों का बाहुल्य होता है, उस मुहल्ले में कभी आयकर छापा नहीं पड़ता, कभी नल नहीं काटे जाते, कभी बिजली चोरी का केस नहीं बनता, कभी अतिक्रमण मुहिम नहीं चलाई जाती, खुलेआम सरकारी सम्पत्ति की मुफ़्तखोरी की जाती है और सरकारें (गुजरात को छोड़कर) पंगु बनकर देखती रहती हैं, सिर्फ़ वोट की खातिर नहीं, बल्कि सरकारों में गलत काम को ठीक करवाने का साहस ही नहीं होता। उससे भी खतरनाक बात यह होती है कि जब दूसरा अल्पसंख्यक समुदाय किसी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय को इस प्रकार की “सुविधा” लेता हुआ देखेगा तो उसके मन में या तो गुस्सा आयेगा या निराशा। जी हाँ, चिदम्बरम साहब… आपकी सच्चर समिति और “विशेष बजटीय प्रावधान” कांग्रेस को मुसलमानों के वोट तो दिलवा सकते हैं, लेकिन समाज के बीच बढ़ती खाई को और चौड़ा भी करते जा रहे हैं, इसका आपको जरा भी खयाल नहीं है…

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सन्दर्भ – यह एस.गुरुमूर्ति के एक लेख का संकलन, सम्पादन और अनुवाद है।

6 comments:

mahashakti said...

कुछ को लगता है कि अल्‍पसंख्‍यको में सिर्फ मुस्लिम ही आते है कोई यह जानने की कोशिश नही करता कि अल्‍पसंख्‍यको में भी कोई अल्‍पसंख्‍यक है।

बेहतरीन लेख

Suresh Chandra Gupta said...

आप ने बहुत सही बात कही है. ऐसा कहने के लिए आपको वधाई और मेरा धन्यवाद. इस मुस्लिम कांग्रेस शासित देश भारत में कम लोग ही ऐसा कहने की हम्मत जुटा पाते हैं. डरते हैं कि अगर ऐसा कहेंगे तो कम्युनल करार दे दिए जायेंगे. यह मुस्लिम कांग्रेस शासित देश भारत में ही हो सकता है कि पार्लियामेन्ट पर हमला करने का दोषी इसलिए सरकार का दामाद बन जाता है क्योंकि वह मुसलमान है. यह मुस्लिम कांग्रेस शासित देश भारत में ही हो सकता है कि प्रधानमंत्री यह कहे कि देश के सब साधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है. मुसलमान अल्पसंख्यक हैं और अब मनमोहन सिंह चक्कर चला रहे हैं उन्हें एस सी को मिलने वाले आरक्षण लाभ भी मिलें. मैं जहां का रहने वाला हूँ वहाँ मुसलमानों के पास बहुत पैसा है, पर एक भी मुसलमान आय कर नहीं देता. सब नंबर दो का धंधा करते हैं. मनमोहन सिंह और चिदंबरम अगर यह बात नहीं जानते तो उन्हें सरकार में रहने का कोई हक़ नहीं है. मेरे शहर में मुसलमान ७० प्रतिशत हैं, पर वह अल्पसंख्यक हैं, पर ३० प्रतिशत हिन्दू बहुसंख्यक हैं.

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

महोदय पहले पार्टीवाद से बाहर निकलें..फिर बहस हो सकती है..विषय अच्छा है

संजय बेंगाणी said...

बात तो खरी कही.


जब उन्होने कहा देश के संसाधनो पर पहला हक अल्पसंख्यको का है, तभी हम तो जैन होने के नाते खुशी से फूल गये. फिर राजनेताओं का शब्दकोष देखा तब पता चला अल्पसंख्यक माने केवल मुसलमान.
मुसलमान को मुसलमान कहो तो साम्प्रदायिक और अल्पसंख्यक कहो तो धर्मनिरपेक्ष.

Gyandutt Pandey said...

येल्लो, हम तो वही समझते थे जो चिदम्बरम जी समझते हैं। :)

भुवनेश शर्मा said...

बहुत सही लेख.

हमें तो लगता है कि अब कुरान पढ़ने मे और देरी नहीं करनी चाहिए. :)
वैसे आपके रीडर्स आज 17 ही दिख रहे हैं बाकी के शायद धर्मनिरपेक्ष निकले जो लेख पढ़कर किनारा कर लिये :)