Saturday, May 3, 2008

“मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” - मुक्त यौनाचार की ओर बढ़ता भारत और स्वास्थ्य खतरे

Morning After Pills, FDA, health threats
ऐसा लगता है कि अब यह मान लिया गया है कि “नैतिक शिक्षा” की बात करना दकियानूसी है और सार्वजनिक स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में नैतिकता की बात करना बेवकूफ़ी। सरकारों की सोच है कि समाज को खुला छोड़ देना चाहिये और उस पर कोई बन्धन लागू नहीं करना चाहिये, ठीक वैसे ही जैसा कि सरकारों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये किया हुआ है। फ़िल्मों और टीवी के बढ़ते खुलेपन ने बच्चों को तेजी से जवान बनाना शुरु कर दिया है, डॉक्टर भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि लड़कियों में मासिक धर्म की औसत आयु काफ़ी कम हो चुकी है। भारत के समाज में धीरे-धीरे कपड़े उतारने की होड़ बढ़ती जा रही है, और दुख की बात यह है कि सरकारें भी इसमें खुलकर साथ दे रही हैं। कभी वह “जोर से बोलो कंडोम” का नारा लगवाती हैं, तो कभी एनजीओ (NGO) के माध्यम से ट्रक ड्रायवरों और झुग्गियों में कंडोम बँटवाती हैं। हाल ही में एक और धमाकेदार(?) गोली कुछ जानी-मानी कम्पनियों ने बाजार में उतारी है, जिसे कहते हैं “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” (Morning After Pills)। इस गोली की खासियत(?) और कर्म यह है कि यदि यौन सम्बन्धों के दौरान कोई गलती से कोई असुरक्षा हो जाये और गर्भधारण का खतरा बन जाये तो स्त्री को अगले 72 घंटों के दौरान कभी भी यह गोली ले लेनी चाहिये, इससे गर्भधारण का खतरा नहीं रहता। यह गोली स्त्री के शारीरिक हार्मोन्स में परिवर्तन करके सम्भावित गर्भधारण की प्रक्रिया को रोक देती है। शर्त यही है कि इसे यौन सम्बन्ध के तुरन्त बाद जितनी जल्दी हो सके ले लेना चाहिये, ताकि यह अधिक से अधिक प्रभावशाली साबित हो। यहाँ तक तो सब ठीक-ठीक ही नजर आता है, लेकिन असली पेंच आगे शुरु होता है।



जैसा कि सभी जानते हैं कि भारतवासी कानून तोड़ने में सबसे आगे रहते हैं, किस तरह से अनुशासन को तोड़ा जाये, सरकारी कानूनों को धता बताया जाये, कैसे गड़बड़ी करके अपना फ़ायदा देखा जाये इसमें भारत के लोग एकदम उर्वर दिमाग वाले हैं। सरकारी एजेंसियाँ, और सरकारी कर्मचारी अपना काम कितनी ईमानदारी से करते हैं, ये भी सबको मालूम है। एक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि इन “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” का सर्वाधिक उपयोग कुंआरी लड़कियाँ कर रही हैं। इन गोलियों की सबसे ज्यादा खपत कॉलेज कैम्पस, कोचिंग क्लासेस, ब्यूटी पार्लर के आसपास की मेडिकल दुकानों से हो रही है, ठीक उसी तरह जैसे कि “कंडोम” की बिक्री में उछाल “नवरात्रि” के समय सबसे ज्यादा देखा गया है। उल्लेखनीय है कि इन गोलियों के विज्ञापन में “फ़िलहाल” एक विवाहित स्त्री-पुरुष ही दिखाये जाते हैं, तथा इन गोलियों के पैकेट पर भी फ़िलहाल एक विवाहित स्त्री ही दिखाई गई है। “फ़िलहाल” कहने का तात्पर्य सिर्फ़ यही है कि अभी शुरुआत में कम्पनियों द्वारा ऐसा किया जा रहा है, फ़िर धीरे से पैकेट की स्त्री के माथे से बिन्दी गायब हो जायेगी, फ़िर कुछ वर्षों में उस पैकेट पर अविवाहित नवयुवती दिखाई देगी, इस छुपे हुए संदेश के साथ कि “सेक्स में कोई बुराई नहीं है, जमकर मुक्त आनन्द उठाओ… बस गर्भधारण करना गुनाह है, इससे बचो, हमारी गोली लो और आजाद रहो…”। रही-सही कसर टीवी, अखबार, चिकनी पत्रिकायें पूरी कर ही रही हैं, जो सेक्स पर खुलकर बात कर रही हैं, हमें बताया जा रहा है कि भारतीय नारियों की “सेक्स भूख” बढ़ रही है, हमें लगातार सिखाया जा रहा है कि बाजार में एक से एक कंडोम (सुगंधित भी) मौजूद हैं, सम्बन्ध बनाओ लेकिन सुरक्षित बनाओ…आदि-आदि। कोई भी यह सिखाने को तैयार नहीं कि “संयम” रखना सीखो, “नैतिकता” का पालन करो, एक विशेष उम्र तक यौन सम्बन्धों के बारे में सोचो भी नहीं, बल्कि “रियलिटी शो” में मासूम बच्चों को लिपस्टिक पोतकर, “लव-लव” सिखाया जा रहा है।

यह तो हुआ लेख का नैतिक पहलू, और इसमें बहस की काफ़ी गुंजाइश है, आजकल नारियों-लड़कियों को कोई संदेश देना भी खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि “स्त्री मुक्ति” के नाम पर चढ़ दौड़ने वालियाँ कई हैं। तो फ़िलहाल मैं इसे व्यक्तिगत नैतिकता के तौर पर छोड़ देता हूँ कि जिसे ये गोली लेना हो वह ले, न लेना हो तो न ले।

लेकिन दूसरा पहलू जो कि स्वास्थ्य से जुड़ा है वह मानवीय पहलू है। अमेरिका के फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) जो कि सभी प्रकार के खाद्य पदार्थ और दवाओं को अमेरिका में बेचने से पहले अनुमति देता है, ने अपने अध्ययन निष्कर्षों से चेताया है कि इस प्रकार की “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” के उपयोग से पहले बहुत सावधानी जरूरी है। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि इस प्रकार की गोलियों में एक जहरीला पदार्थ “डाइ-ईथाइल-स्टिल्बेस्टेरॉल” (DES) पाया जाता है, और कई लड़कियों में (चूँकि अमेरिका में गर्भवती किशोरियाँ नाम की कौम आमतौर पर पाई जाती है) इस DES की मात्रा घातक स्तर तक पाई गई है। असल में होता यह है कि चूँकि ये गोलियाँ “ऑन द काउंटर” (OTC) उत्पाद हैं, इसलिये बगैर सोचे-समझे युवतियाँ इसका उपयोग करने लगती हैं जबकि FDA पहले ही DES को जानवरों के लिये प्रतिबन्धित कर चुका है। जैसा कि मैंने पहले कहा कि इनका असर तभी सर्वाधिक होता है जब यौन सम्बन्ध के 24 घंटे के अन्दर इसे ले लिया जाये, लेकिन अक्सर इसे 72 घंटे बाद तक लिया जा रहा है, इसका नुकसान यह है कि तब तक युवती के गर्भवती होने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी होती है। इस स्थिति में घबराहट में वे दो-चार गोलियाँ ले लेती हैं और उसके जहरीले (Carcinogenic) अंश से भ्रूण की हत्या तो हो जाती है, लेकिन स्त्री के शरीर पर इसका बेहद बुरा असर होता है। FDA के अनुसार इन गोलियों के सेवन से कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, सिरदर्द, चक्कर आना, घबराहट, मासिक धर्म में परिवर्तन आदि कई बीमारियाँ भी साथ में हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि मान लो तमाम “सद्प्रयासों” के बावजूद गर्भ ठहर जाये (क्योंकि डॉक्टर स्पष्ट कहते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं ली जा सकती कि इस गोली को लेने के बाद गर्भधारण नहीं होगा) तो इन गोलियों के असर के कारण होने वाले बच्चे का मानसिक विकास अवरुद्ध हो सकता है या वह विकलांग पैदा हो सकता है। यह गोली “कभीकभार” लेने के लिये है, लेकिन होता यह है कि “मुक्त समाज” में लड़कियाँ इसे महीने में आठ-दस बार तक ले लेती हैं, और फ़िर इसके भयंकर दुष्परिणाम होते हैं, यह बुरी सम्भावना भारत के युवाओं पर भी लागू होगी।



ऐसे में विचारणीय है कि भारत जैसे देश में जहाँ न तो ईमानदारी से कोई ड्रग कानून लागू होता है, न ही यहाँ किसी दवाई में क्या-क्या मिला हुआ है इसकी सार्वजनिक घोषणा की जाती है, सरेआम क्रोसिन, विक्स, बेनाड्रिल जैसी आम दवाइयाँ तो ठीक एंटीबायोटिक्स तक बगैर डॉक्टरी पर्चे के बेच दिये जाते हैं… पशुओं के साथ इंसानों के लिये भी खतरनाक “ऑक्सीटोसिन” को ज्यादा दूध के लालच में खुलेआम भैंसों को लगाया जा रहा है… कई ड्रग जो कि सारे विश्व में प्रतिबन्धित हो चुके हैं यहाँ आराम से बिक रहे हैं… ये “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” क्या गजब ढायेंगी? विशेषज्ञ डॉक्टर की देखरेख में ही इन गोलियों को लिया जाना चाहिये, लेकिन असल में क्या होगा ये हम सभी जानते हैं…। पुरुष सत्तात्मक समाज में इन गोलियों के विभिन्न आपराधिक दुरुपयोग होने की भी पूरी सम्भावना है। लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि इसके खिलाफ़ आवाज उठाना या नैतिकता की बात करना भी “संघी” विचारधारा का माना जाता है, ऐसे में खुल्लमखुल्ला यौन दुराचरण के साथ-साथ स्त्रियों के गंभीर स्वास्थ्य क्षरण का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। पश्चिम की नकल करने के चक्कर में भारत तेजी से अंधे कुंए की ओर दौड़ लगा रहा है। जय हो यौन शिक्षा की…

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17 comments:

अरुण said...

सरकार सेक्स शिक्षा के साथ ये गोलिया और कंडोम स्कूलो मे फ़्री बटवाने की योजना बना रही है,आखिर देश को आगे लेजाना है ना :)

जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) said...

चिपलूनकर जी,

आपका सामाजिक तथा नैतिक बुराइयों चुन चुन कर ढूंढ निकालने तथा उस पर लिखने का प्रयास प्रशंसनीय है। किन्तु आज नैतिकता के विषय में कहना 'नक्कारखाने में तूती की आवाज' बन कर रह गई है। और ऐसा होने के लिये हमारी सरकारी नीतियाँ ही जिम्मेदार है, विशेषकर शिक्षा नीति।

मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि आप अपने अभियान में सफल हों।

bhuvnesh said...

एक जरूरी लेख.

लगता है इस नजरिए से तो हम भी आपके 'संघी-साथी' हुए :)

lovely kumari said...

aapne thik kha swasthy sambandhi khtron ke prti jagruk hona chahiye.naitikta to apni sonch hai uski simarekha sonchne walon par hai.par sirf is aadhar par iska virodh galat hai kyonki mera sahar dhanbad bhurn htya me sabse aage hai rajy me,iska karn bete hone ki chah hone ke sath jankari ka aabhaw bhi hai.grbhnirodhakon ka virodh galat hai.han naitikta aap aur hm apne bachchon ko khud sikhaye to jyada achchha hai

Udan Tashtari said...

एक सार्थक आलेख बहुत से मायनों में.

anitakumar said...

आप का लेख हमेशा की तरह सार्थक है और चिन्ताएं एक्दम जायज्। आप की लिखने की शैली के भी हम कायल हैं। लेकिन ये क्या माजरा है अभी अभी तो हम ये लेख कहीं और पढ़ कर आए, शायद कुछ विस्फ़ोट या ऐसा ही कुछ्।क्या आप दो ब्लोग चलाते हैं

अभिषेक ओझा said...

विचारणीय !

सागर नाहर said...

बिलुल सही.. सचमुच चिन्ताजनक है ।

adde said...

Baat bilkul sahi hai,hum culturul hone ka dawa karten hani jabki aaj hm me aur videshiyon me sex ke bare me jyada fark nahi raha hai.voh openly karten hai aur hamare yahan chhup ke.mere 15 me se 13 doston ke ladkiyo se sex sambandh hai aur meri colony ke 90% youngers ki friendship hai freindship ke naam par kya kya hota hai mere khayal se sabhi samajh rahe honge.har ma baap yahi samajh te hai ki mera baccha shareef hai jabki asliat yehi hai ki india me 80% halat kharab hai. ab sarkar condome ya ipills na bante to kya kare.aaj kal kai youngers mobiles me blue films dekhte hai,websites par,doston ke saath program bana kar or friendship ke bahane ladke ladkiya sab kutch kar rehai hai.aur maa baap ye maankar dil ko tasalli dete ahi ki mera bachha shareef hai

RDS said...

भाई जी,

भड़कती भटकती पीढी को खटकने वाला आलेख लिखा है आपने ! जब सरकार ही जान बूझ कर आँख मूँद ले और हैरत करे कि " अरे, ऐसा हो रहा है ? देखते हैं |" तब तो हमारा किसी को कोसने का हक ही ख़तम समझो |

दरअसल, सरकार को आँख मूंदने से रेवेन्यू मिलती है | बल्कि कहीं कहीं तो सरकार भरोसा दिलाती है कि नैतिकता से मुक्ति दिलाकर वह हमें दूसरी आज़ादी दिलाने जा रही है | कडोम के नए नए मोहक विज्ञापन उसकी इसी नीति के प्रमाण हैं | शराब ( सुरा या मदिरा कह कर शराब के असली सुरूर को कोई कम ना करे ) सरकार के लिए लाडली टकसाल है |

बेकार का झंझट मोल न लें | सरकार तो अपनी नीति बदलने से रही | मार्निंग पिल से सरकार और रुकावटी - अफसरों के घरेलू खजानों में जो इजाफा हो रहा है उसे भी तो देखिये ; कितना आनद विभोर कर देने वाला मंज़र है | अरे, आनंद लीजिये |

सरकार का सोच तो शायद यही है कि नैतिकता गुज़रे ज़माने की बातें हैं इसलिए जो इनकी बात करे वो नास्टेल्जिक नहीं तो और क्या है ?



आर डी सक्सेना भोपाल

Datacare said...

Kar Raat mere pati se bhool ho gayee - also read this hasya vyangya on http://kmmishra.wordpress.com

mohit sharma said...

Priya Suresh ji ,
aapke do article padh kar hi mai apka bahut bada fan ho gaya. Aajkal aise baate karne aur likhne wale log birle hi rah gaye hain, sachmuch talab ke kinare nahi baithe hain aapne to toofan khada karne me koi kasar nahi chhodi hai.
aajkal India bahut teji se America banta ja raha hai. Ajjkal viriginity ki baate aur morals ki baate karne waalo ko bewakoof ya puraane khyaalo ka kaha jata hai.Sach baat to ye hai ki sahi galat ki bhi baate aajkal log sochna nahi chahte bas jamaane ke saath chalne ke chakkar me sab kuchh karne ko taiyaar hai.Mujhe yaad hai aaj se 7 8 saal pahle tak naitikta ya morels ki baate hoti thee, kai samaajsewi sangathan bhi inka paath padhaane ko aage aate the , magar aajkal to aisi kamzor awaje bhi aani band ho gayi hai.
Aise me aapke ye lekh meel ka paththar saabt hote hain, aaj ke samaaj ko aapki fearless aur bebaak lekhni ke abhaari hona chahiye.Maaf kijiyega hindi font na hone ki wajah se mai english me blog likh raha hoo.Magar mai bhi ek lekhak hoon aur mujhe sabse jyada pyaari bhasha Hindi hi lagti hai. aur Indian ki bajay mai Bhartiya ya Hindustani kahlane me jyada garva mahsoos karta hoon.
Dhanywaad
Apka Shubhekshoo
Anil Mistri

RAJENDRA said...

sureshji dhanyavad apke lekh badi ruchi se padhata hun. ye jaankari dekar apne sarahniya kaarya kiya hai par mushkil kaam hai sarkari nakkarkhane ki awaz itni tez hai- log aur kuch sun he nahin pa rahe par kripa kar aap lage rahiye

kumarbiswakarma said...

पता नहीं सुरेश जी देश आगे जा रही या पीछे जा रही है ! हिन्दू धर्मं में अक्सर कहते है घर से निकलो तो कोशिश करो पूरब की तरफ जा सके या घर का मुख्य द्वार पूरब की तरफ हो और हम कमबख्तों की मानसिकता को क्या हो गया है हम पश्चिम की तरफ जा रहे है और गर्व से कहते है की हम तरक्की कर रहे है मुझे तो लगता है आने वाले वक़्त जिनकी शादी होगी उनके बच्चे उनकी शादी में chair लगा रहे होंगे और गर्व से कहेंगे हम तरक्की कर रहे है !

Cool prem said...

Aap sub thik soch rahe ho. Govt. Ko ladke ke or ladki ke liye umr 19 se 21 karni chahiye isase pahle agr koi ladki or ladka sex kare to uskeupr ben lagana chahiye. Par bharat me uski umr hai 14 ladki 15 ladka

Cool prem said...

Aap sub sahi kah rahe hai . Govt. Ko kuch karna chahiye govt.ne sex ke liye age 15 v 16 age hai ye dikhata hai ki ham kite age hai amerika me 16v 17 hai

Anonymous said...

Priya Suresh ji,
Aapka lekh padh kar lag raha hai ki abhi bahut log hai jo Hindu sankriti ka liye karya kar rahe hai..
Bahuta accha hai,..
Dhanyavaad,