Wednesday, May 7, 2008

शवयात्रा, श्मशान और शवदाह के बारे में (भाग-3)

Less wood Hindu Cremation Environment
(भाग-2 से जारी…) अब चिता को जमाने का सही तरीका… यदि कण्डे उपलब्ध हों तो सबसे नीचे कण्डों की सेज बनाना चाहिये, फ़िर उसके ऊपर एक मोटी लकड़ी सिर की तरफ़ और दो मोटी लकड़ियाँ दोनों बाजू में रखना चाहिये, ताकि शरीर जब जलकर नीचे बैठे तो साइड से खिसक न जाये। अब बीच में बची हुई जगह पर पतली लकड़ियाँ जमाकर मुर्दे को उस पर लिटायें। अब सबसे पहले छाती पर एक मोटी लकड़ी, दूसरी सिर पर तथा तीसरी घुटनों पर रखें, जलने के दौरान अक्सर यही तीन स्थान अपने स्थान से खिसकने की सम्भावना होती है। बाकी की पतली लकड़ियाँ बीच-बीच में फ़ँसा दें, लेकिन इस तरह कि हवा का आवागमन बना रहे। बीच के खाली स्पेस में थोड़ा-थोड़ा फ़ूस भरते रहें जो हल्का सा बाहर की ओर निकला रहे, क्योंकि सबसे पहले उसी में आग लगानी है। प्रदक्षिणा के बाद जैसे ही व्यक्ति अग्नि दे, चारों तरफ़ के फ़ूस में आग लगाना शुरु करें, और बाकी लोगों को वहाँ से “हवा आने दो…” कहकर हटा दें, एक बार कण्डे आग पकड़ लें तो काम आसान हो जाता है, वैसे तो मुर्दे पर कर्मकांड के दौरान घी छिड़का / लेपा ही जायेगा, तो बाकी बची राल को धीरे-धीरे चिता में झोंकना शुरु करें ताकि आग तेजी से भड़के। चिता जमाते समय इस बात का खास खयाल रहे कि मुर्दे के हाथ और पैर पास-पास हों तथा उसके साइड में कम-से-कम एक-दो लकड़ियाँ अच्छी तरह से जमी हुई हों, कई बार देखा गया है कि आधी चिता जलने के बाद मुर्दे का एक हाथ या एक पैर बाहर आ जाता है। खैर, यहाँ आकर काम लगभग समाप्त हो जाता है, बस दूर बैठकर चिता के 75% जलने का इंतजार कीजिये, हो सकता है कि खोपड़ी फ़ूटने की आवाज भी सुनाई दे जाये, न भी दे तो क्या, अब मृतात्मा को अन्तिम नमस्कार कीजिये, शोक संतप्त को धीरज बँधाइये और घर जाइये, नहाइये-धोइये और अपने काम से लग जाइये, एक न एक दिन तो आपको भी यहीं आना है…

अब बात करते हैं पर्यावरण की… जैसा कि मैंने पहले कहा कि लकड़ियों से शवदहन की परम्परा को अब हमें वक्त रहते बदलना होगा, और विद्युत शवदाह की ओर चलना होगा। इसके लिये मन में पैठी ग्रंथियों को निकाल बाहर करने की आवश्यकता है। विद्युत शवदाह एक बेहतरीन, कम खर्च वाला, कम समय वाला, और पर्यावरण हितैषी उपाय है। लेकिन जब तक जागरूकता नहीं फ़ैलती, कम से कम तब तक हमें इस पारम्परिक चिता दहन में ही कुछ बदलाव करके लकड़ियों का उपयोग कम से कम करना चाहिये। यह काम दो क्विंटल और 20 कण्डे में हो सकता है, जरूरत है सिर्फ़ तकनीक को अपनाने की। मुझे इन्दौर, भोपाल, देवास, गोधरा, उज्जैन आदि जगहों पर जाकर शवयात्रा में शामिल होने का मौका मिला है, इन सबमें मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है गोधरा की श्मशान व्यवस्था ने। यहाँ चिता जलाने के लिये लोहे के पिंजरानुमा ब्लॉक बनाये गये हैं, एक स्टैण्ड पर रखे हुए जो ऊपर से खुले हैं, लेकिन नीचे और साइड से जालीनुमा खुला होता है, इसका फ़ायदा यह होता है कि इसमें कम लकड़ी लगती है, मुर्दे के हाथ पैर बाहर आने के कोई चांस नहीं, अस्थि संचय में भी आसानी, राख-राख नीचे गिर जाती है, बड़ी-बड़ी अस्थियाँ चुन ली जाती हैं। एक और जगह है (मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा), जहाँ अर्थी भी लोहे की रेडीमेड बनी हुई मिलती है, पहले जाकर ले आओ, सिर्फ़ मुर्दे को उस पर बाँधना होता है, और जलाने से पहले उसे श्मशान के कर्मचारी के हवाले कर दो बस… इसमें भी बाँस और खपच्चियों की बचत होती है। असल उद्देश्य है लकड़ी बचाना, यानी पेड़ बचाना चाहे वह कैसे भी हो। रही बात परम्पराओं की, तो वक्त के साथ बदलाव तो जरूरी है, महाराष्ट्र में भी लोगों ने घरों के गणेश विसर्जन अपने घर में एक बाल्टी में करना प्रारम्भ कर दिया है, जब चार-आठ दिन में मूर्ति पूरी तरह घुल जाये, उस पानी को पौधों में डाल दिया जाता है। पर्यावरण खतरों को देखते हुए परम्पराओं से मूर्खों की तरह चिपके रहने में कोई तुक नहीं है।

“मोक्षदा” नाम के एक NGO ने चिता दहन के लिये एक नया मॉडल तैयार किया है, जिसमें चार विभिन्न प्रकार के पर्यावरण हितैषी Eco-friendly (कम लकड़ी लगने वाले) चितादहन यन्त्र हैं, जिनकी कीमत 2 लाख से लेकर 20 लाख तक है (नगर निगमों में पैसे की कोई कमी नहीं है, यदि ईमानदारी से खर्च किया जाये तो)। शहर की जनसंख्या और श्मशान में आने वाले “ट्रैफ़िक” के हिसाब से अलग-अलग क्षमता का यन्त्र लगवाया जा सकता है। इस कीमत में उक्त NGO द्वारा एक स्थानीय व्यक्ति को ट्रेनिंग, और एक वर्ष का लकड़ी सहित पूरा खर्चा तथा मशीन की सर्विसिंग भी शामिल है। संस्था के आँकड़ों के अनुसार यदि यह संयंत्र 20 वर्ष तक सतत काम करता है (जिसमें औसतन 6 शव रोजाना का ऐवरेज रखा गया है) तो लगभग साढ़े चार- पाँच करोड़ रुपये की बचत होगी। यह तो हुई सीधी बचत, इसमें पेड़ों द्वारा मिलने वाली ऑक्सीजन, फ़ल-फ़ूल, जड़ी-बूटियाँ, मिट्टी की पकड़ बनाना, वर्षाजल को जमीन मे संरक्षित करना जैसे अनमोल फ़ायदे भी जोड़ लीजिये, और क्या चाहिये?

लम्बी-लम्बी पोस्ट लिखने की “बुरी आदत”(?) के चलते यह पोस्ट भी विस्तारित हो गई, लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही कहा “विषय भी एकदम ‘हट-के’ था और मजेदार भी…”। बस यही अपेक्षा करता हूँ कि इसमें कई लोगों को कुछ नई जानकारियाँ मिली होंगी, कुछ लोगों को प्रेरणा मिली होगी (कुछ को घृणा भी आई होगी), लेकिन मेरा उद्देश्य एकदम साफ़ रहता है, “जनजागरण”। विद्युत शवदाह का जितना अधिक प्रचार हो उतना अच्छा, चिता में लकड़ियाँ कम से कम लगें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी के लिये कुछ तो पेड़ बचें। दो काम मैं पूरी श्रद्धा के साथ करता हूँ, वर्ष भर में दो-तीन रक्तदान और कम से कम 5-6 शवयात्रा। और शवयात्राओं में जाने का मुख्य मकसद होता है वहाँ फ़ुर्सत में खड़े लोगों में से एकाध दो को विद्युत शवदाह, नेत्रदान और देहदान के बारे में “झिलवाना”… अब जैसे आप लोग मेरे इतने बड़े-बड़े लेख “झेल” गये, वैसे ही कुछ लोग तो वहाँ मिल ही जाते हैं, यदि एक साल में मेरे कहने भर से किसी एक व्यक्ति ने भी विद्युत शवदाह का उपयोग कर लिया, तो मेरी मेहनत सफ़ल!!! आपका क्या कहना है? टिप्पणी न करना हो न कीजिये, लेकिन इतना पढ़ने के बाद अब उठिये और शवयात्रा में शामिल हो जाइये। सिर्फ़ मजे लेने के लिये नहीं परन्तु शामिल लोगों को विद्युत शवदाह, नेत्रदान और देहदान के बारे में बताने के लिये। और कुछ नहीं तो ऐसे ही शाम को टहलते-टहलते श्मशान की तरफ़ हो आइये, देखिये वहाँ कितनी शांति है… क्या कहा!! डर लगता है, भाई मेरे जिंदा व्यक्ति से खतरनाक इस धरती पर और कुछ नहीं है… श्मशान काफ़ी अच्छी जगह है बाकी दुनिया के मुकाबले…

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8 comments:

Udan Tashtari said...

शमशान से डरना कैसा?? वही तो मंजिल है. :)

एक दो दिन में हम आपको अपना शमशानी चिन्तन सुनाते हैं.

अरुण said...

hame to dar lagata hai,isliye ham to aspataal valo ko sara saman de dege jI

Mired Mirage said...

एक साधारण से विषय पर असाधारण लेख व सोच है। बहुत जानकारीपूर्ण लेख है।
घुघूती बासूती

आनंद said...

सुरेश जी,

मसिजीवी की पोस्‍ट से रीडायरेक्‍ट होकर इधर आया और चिता सिरीज़ की तीनों पोस्‍टें पढ़ गया। इस मामले में उपयोगी और बेहतरीन जानकारी देने के लिए आपका बहुत धन्‍यवाद। धन्‍यवाद तो मैं मसिजीवी जी का भी दूँगा, परंतु उनकी पोस्‍ट पर जाकर। यदि उन्‍होंने आज आपकी पोस्‍टों का लिंक नहीं दिया होता (हालांकि उनका संदर्भ दूसरा था), तो शायद मैं आपकी पोस्‍ट इतनी सीरियसली नहीं पढ़ता। - आनंद

siddharth said...

घुघूती जी की पोस्ट से इधर का लिंक मिला। जिस समय यह पोस्ट आयी थी उस समय मैं अपने दादाजी की मृत्यु (२७.०५.२००८) के बाद के सूतक में गाँव गया हुआ था। इन्हीं बातों का साक्षात् अनुभव कर रहा था।
भाग-१ में आपने बताया था कि शव को जिस कमरे में रखा जाय उसे सामानों से खाली कर लेना चाहिए। … …हमारे यहाँ मृत शरीर को घर के भीतर या छत के नीचे रखना वर्जित सा है। आसन्न मृत्यु का विनिश्चय हो जाने पर ही व्यक्ति को घर से बाहर खुले में लिटा दिया जाता है। सभी घर वाले वहीं अन्तिम विदा के लिए खड़े रहते हैं। कदाचित् यह मान्यता हो कि प्राण पखेरू जब उड़े तो घर के भीतर उसे भटकना ना पड़े। खुला आकाश मिल जाय तो अच्छा। यह भी मान्यता है कि मृत्यु के बाद व्यक्ति की आत्मा पहले प्रेत बनकर अपने शव के आस-पास मंडराती रहती है। शरीर और परिजनों का मोह छूटता नहीं है। इसी मोह को छुड़ाने के लिए परिजन मिलजुलकर उसके पार्थिव शरीर को जलाते हैं।
तेरहवीं तिथि तक जो भी कर्मकाण्ड कराये जाते हैं उनका उद्देश्य इसी प्रेत-योनि से छुटकारा दिलाकर वैकुण्ठ में शान्तिपूर्ण स्थान दिलाना होता है। आत्मा की शान्ति के नाम पर पुरोहितों की ठगी की कहानी अलग ही है। इसपर कोई विद्वान यदि सत्य और पाखण्ड के बीच अंतर बताने वाली पोस्ट प्रकाशित करे तो बहुत उपयोगी होगी।

Chasta said...

पर्यावरण बचाने हेतु आपकी पहल तो ठीक है किन्‍तु यह भी विचारिये कि वृक्षों को कैसे ज्‍यादा नष्‍ट किया जा रहा है काट कर या शवदाह से? आज का पर्यावरण किसने बिगाडा है? क्‍या शवदाह से पर्यावरण बिगड जायेगा?

सतीश सक्सेना said...

गणेश विसर्जन के बारे में और जागरूकता आवश्यक है मैं कोशिश करूंगा कि आपके इस अभियान में साथ दूं ! घर में ही जल विसर्जन का तरीका पहली बार पढ़ा हमारे धर्म में यही अच्छी बात है कि हम अपने आपको आसानी से बदल सकते हैं और हमारे देव कभी नाराज नहीं होते !
राम राम !

Ravinder Jayalwal said...

नेत्रदान की पूरी जानकारी व् सावधानी यहाँ से पढ़े
http://www.socialservicefromhome.com/2011/09/blog-post_3878.html