Tuesday, May 6, 2008

शवयात्रा, श्मशान और शवदाह के बारे में (भाग-2)

Less wood Hindu Cremation Environment
(भाग-1 से जारी) अगला क्रम आता है मुर्दे को अंतिम यात्रा हेतु सजाने का। लगभग हर शहर में एक-दो दुकानें ऐसी होती हैं कि जहाँ इस गतिविधि का सामान तैयार “पैकेज” के रुप में मिलता है। आपको सिर्फ़ जाकर बताना होता है कि मृतक हिन्दू था, मुसलमान था या कुछ और था, ब्राह्मण था, ठाकुर था, या कोई और। सम्बन्धित दुकानदार एकदम अचूक तरीके से आपको एक पूरा पैकेज देता है, जिसमें सफ़ेद कपड़ा, दो बाँस, खपच्चियाँ, मटकी, रस्सी, आटा, जौ, काले तिल, गुलाल आदि सभी सामान एकमुश्त होता है। शवयात्रा का समय तय होते ही तत्काल किसी को भेज कर सामान मंगवा लिया जाये और सामान सावधानीपूर्वक अलग-अलग कर लिया जाये ताकि ऐन वक्त पर किसी तरह की परेशानी न हो। कई समाजों में पूरी तैयारी के पश्चात रिश्तेदारों द्वारा मुर्दे को शॉल ओढ़ाने का चलन होता है, ऐसे में पहले ही सम्बन्धित व्यक्तियों से पूछ लें कि क्या उन्होंने शॉल खरीद ली है। कई बार यह देखा गया है कि जब मुर्दे को बाँधने की तैयारी करते हैं तो कोई एक चीज कम पड़ जाती है या दुकानदार द्वारा पैकेज में गलती से नहीं रखी जाती तब खामख्वाह की भागदौड़ मचती है और अप्रिय दृश्य उत्पन्न होता है।
आइये अब बाँधना शुरु करते हैं… कई बयानवीर, घोषणावीर ऐसे वक्त पर एकदम पीछे नजर आते हैं, आप आगे बढ़िये, इसमें डरने की कोई बात नहीं है, यदि आप मरने वाले को जानते भी नहीं तो क्या हुआ, मरने वाला उठ खड़ा नहीं होगा कि “अबे तू कौन है मुझे उठाने वाला…”। मैंने कई लोगों को डरते हुए देखा है, मानो उनके परिवार में कभी कोई मरेगा ही नहीं, बल्कि ऐसे-ऐसे वीर भी देखे हैं जो लठ्ठ लेकर पड़ोसी का सिर खोल देंगे, लेकिन शवयात्रा में इसलिये नहीं जायेंगे कि “डर लगता है…” खैर उन्हें छोड़िये, दो-दो ईंटें कुछ दूरी पर जमाकर उस पर लम्बे वाले बाँस रखें, बाँस की खपच्चियाँ अमूमन सही नाप की होती हैं उन्हें एक निश्चित दूरी बनाकर रखते हुए दोनो सिरों पर बाँधना शुरु करें, दोनों तरफ़ एक-सवा फ़ुट का अन्तर छोड़ा जाना चाहिये ताकि चारों कंधा देने वाले को आसानी हो। पूरी तरह बँधने के बाद उस पर घास के पूले में से घास फ़ैलाकर बिछा दें और सफ़ेद कपड़ा दोनों सिरों पर छेद करके इकहरा फ़ँसा दें (बाकी का कपड़ा वैसा ही रहेगा, क्योंकि वह मुर्दे को अर्थी पर लिटाने के बाद उस पर दूसरी तरफ़ से आयेगा)। अब धीरे से बॉडी को उठाकर अर्थी पर रखें और बाकी का कपड़ा गले तक लाकर उसे बाँधना शुरु करें। बाँधते समय यह ध्यान रखें कि मुर्दे के दोनों पैरों के अंगूठे आपस में कसकर बाँधे जायें, कई बार देखा गया है कि पैर खुल जाते हैं और एक पैर बाहर लटक जाता है, दोनों हाथ यदि पेट पर रखकर बाँधे जायें तो ज्यादा सही रहता है।

अब बारी आती है ले जाने की, आजकल लगभग हर बड़े शहर, कस्बे में “शव वाहन” उपलब्ध होता है, नगर निगम में ड्रायवर को पहले से फ़ोन करके समय बता दें (अपने तय किये समय से आधा घंटा बाद ही बतायें) ताकि उसका भी कीमती समय खराब न हो, क्योंकि उसे तो दिन भर में आठ-दस शव ले जाने हैं। जब शव-वाहन की व्यवस्था न हो और कंधों पर ही ले जाना हो तो पहले से आठ-दस गबरू जवान छाँट लें और उन्हें “समझा” दें ताकि बीच रास्ते में कोई परेशानी न हो। जैसे ही शव वाहन चौराहे के कोने पर आकर रुके, अर्थी उठाने की जल्दी करें, जल्दी-जल्दी अंतिम दर्शन करवाने की पहल करें, यदि इस वक्त संभालने वाले न हों, तो कई बार बड़ी अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कृपा करके अपने-अपने मोबाइल “साइलेंस” मोड पर रखें, और इसी वक्त कोई जरूरी फ़ोन आ जाये तो दूर जाकर धीमे-धीमे बातें करें। इस वक्त मोबाइल की रिंगटोन बड़ी खीझ उत्पन्न करती है, और बाकी लोग आपको लगभग मार डालने के अन्दाज में घूरेंगे। एक बार एक सज्जन(?) मुर्दे को हार पहनाने के लिये झुके और “कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नैना…” की जोरदार चाइना-स्टाइल रिंगटोन बजी, सोचिये कि शोकाकुल रिश्तेदारों पर क्या प्रभाव पड़ा होगा?

अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर… श्मशान घाट पहुँचने के पहले ही दो-चार पठ्ठों को भेजकर लकड़ी, कंडे, राल (इसका नाम अलग-अलग जगहों पर अलग हो सकता है, हमारे यहाँ इसे “राल” कहते हैं, यह मटमैला सा बड़े दानेदार होता है, जिसे चिता में फ़ेंकने पर आग भड़कती है), फ़ूस, घी, आटा तुलवाकर रख लें। आमतौर पर एक सामान्य व्यक्ति को जलाने के लिये ढाई-तीन क्विंटल लकड़ी (मोटी और पतली मिलाकर) तथा लगभग 40 कण्डे लगते हैं। आजकल गौवंश के बढ़ते नाश के कारण कण्डे आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं, यदि उपलब्ध हों तो बेहतर, शुरुआती आग लगाने के लिये थोड़ा सा फ़ूस (सूखी लम्बी घास) तथा आग भड़काने के लिये घी और राल, बस यही सामान है जो आखिरी वक्त हम और आप सभी कभी न कभी, श्मशान की किसी छत पर बैठकर देख पायेंगे, जी हाँ भूत बनकर। यही वह जगह होती है जहाँ आपको दुनिया भर के “रायचन्द” मिल जाते हैं, जिनके बाप ने भी कभी चिता न देखी हो, वे भी सलाहें देने लगते हैं। वैसे तो श्मशान पर उपलब्ध कर्मचारी सही लकड़ी देगा ही, लेकिन फ़िर भी ध्यान रखें कि कम से कम 6 लकड़ियाँ तो ऐसी हों जिसे हम “डूंड” कहते हैं अर्थात बेहद मोटी, बाकी की लकड़ियाँ पतली होना चाहिये। आपको लकड़ियाँ फ़िल्मों जैसी नहीं मिलेंगी अब जरा मूड हल्का करने के लिये इसे पढ़ें “फ़िल्मी मौत : क्या सीन है”

आखिरी किस्त मिलेगी… भाग-3 में

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13 comments:

अरुण said...

सही है जी , खामखा इधर उधर से राय लेनी, सीधे ब्लोग पर जाईये और सुरेश चिपलून कर जी का ब्लोग खोलिये क्रियाकरम शुरू कीजीये , काहे दादा डैकोत और राय चंदो की ऐसी तैसी करने पर तुले हो.
अब लगे हाथो आप बालको के जनम ,छटी, नामकरण, दष्टौन, जनेऊ,शादी के संसकार इत्यादी के बारे मे भी लिख मारो,(तलाक क्यो और कैसे और कब ले पर हम लिखेगे उसे मत छेडना, वैसे वो मामला आपके लेवल का है भी नही :) ) सच मे बहुत सारे लोग दुआये देगे जी, जहा कोई राय चाहिये बस सुरेश जी का ब्लोग हाजिर , शानदार जी वाकी बहुत शानदार ,
वाकई काम की चीज लिख रहे है आप इस टिप्पणी को मजाक मे मत लीजीयेगा, स्माईली लगाने की हमारी पुरानी आदत है जो शमशान के नाम से भी नही छूट रही :)

अरुण said...

वैसे हम अभी से इसका प्रिंट आऊट ले लिये है वसीहत के साथ रखने के लिये ताकी उस वक्त बालक परेशान ना हो और फ़जीहत कम से कम हो..:)

अरुण said...

वैसे हम अभी से इसका प्रिंट आऊट ले लिये है वसीहत के साथ रखने के लिये ताकी उस वक्त बालक परेशान ना हो और फ़जीहत कम से कम हो..:)

अरुण said...

वैसे हम अभी से इसका प्रिंट आऊट ले लिये है वसीहत के साथ रखने के लिये ताकी उस वक्त बालक परेशान ना हो और फ़जीहत कम से कम हो..:)

राज भाटिय़ा said...

सुरॆश जी धन्यवाद , बहुत ही अच्छी जान कारी दी हे आप ने, ओर इस की जरुरत हम सब को पडती हे,ओर जब जान कारी खुद को हो तो उस समय खाम्खा की प्रेशानियो से बचा जा सकता हे, फ़िर से धन्यवाद

mahashakti said...

व्‍यस्‍तताओं के कारण पिछली पोस्‍ट भी नही पढ़ सका हूँ जल्‍द ही, दोनो पोस्‍ट पढ़कर टिप्‍पणी करूँगा।

आप लिखा हमेंशा अच्‍छा लगता है। यह भी लगेगा :)

सुनीता शानू said...

मोबाईल की रिंग टोन के तो क्या कहने...लोग जाने क्या-क्या लगा कर रखते है...मगर आपने मुर्दे को ले जाने का अर्थी सजाने का जो वर्नण किया है हम उससे अनभिज्ञ थे अब तक...थौड़ा बहुत ही जानते थे...आपने विस्तार से विवरण दिया...

Udan Tashtari said...

सही जा रही है शमशान यात्रा-बहुत ज्ञानवर्धन हो गया. जारी रखिये.

Udan Tashtari said...

सही जा रही है शमशान यात्रा-बहुत ज्ञानवर्धन हो गया. जारी रखिये.

भुवनेश शर्मा said...

सही विषय छांटा है गुरू.

लगे रहो.....

Grey Hat Guy said...

बहुत उपयोगी लेख सुरेशजी

यह हकीकत है कि अंतिम संस्कार तथा मुर्दों के बारे में एक अजीब सा डर या 'स्टिग्मा' अमूमन पाया जाता है. सच पूछें तो यह तुच्छ प्राणी भी इसी डर से ग्रासित था लेकिन अपने पिता की मृत्यू के बाद हम समझे कि इस अवसर पर मदद करना कितना ज़रूरी है. इसके बाद तो एक बार हमने एक बार किसी जानने वाले के लिये पोस्ट मॉर्टम के बाद उनकी जवान बेटी का शव सरकारी अस्पताल से हासिल भी किया और उसे 100 किलोमीटर तक ले कर भी आये

लेकिन बहुत अधिक लंबा खिंचने वाले अंतिम सस्कार से हम अभी भी खीज जाते हैं.

nitin tyagi said...

आप के लेख अच्छे होते हैं लेकिन ये लेख पढ़ कर अच्छा नहीं लगा क्योकि इन बातों में कोई तर्क नहीं है |
जिसको जैसी अर्थी बनानी हो वो बनाये इसके लिए कोई बाध्य नहीं होता |
अर्थी को सुखी लकडियों से जालने से पैड कम हो रहें हैं ,जबकि सिगरत ,सोफा ,व् घर में रोज ऐसे लोग हैं जो हर साल घर में नया फेर्निचेर लगते हैं |
उन पर रोक लगे |

सतीश सक्सेना said...

रायचंद अच्छे लगे और यह भी सही कहा इस मौके पर खूब मिलते हैं ! बहुत बढ़िया श्रंखला ...मगर यहाँ अपने अपनी तर्क भी हैं...जाकी रही भावना जैसी ..क्या कहा जाये मगर कैसे लिखा जाये पूरे देश कि भावनाओं के हिसाब से सुरेश भाई ?? किसी न किसी को ठेस तो जरूर पंहुचेगी !
राम राम सुरेश भाई !