Monday, May 5, 2008

शवयात्रा, श्मशान और शवदाह के बारे में (भाग-1)

Less wood Hindu Cremation Environment
बहुत दिनों से विचार कर रहा था कि इस विषय पर लिखा जाये। खोजबीन करने पर पाया कि इस विषय पर कुछ खास उल्लेखनीय नहीं लिखा गया है, जबकि “मौत” ही इस जीवन का सबसे बड़ा सत्य है जिससे बड़े से बड़ा पैसे वाला, प्रसिद्धि वाला भी नहीं बच सकता। भारत में हिन्दुओं की परम्परा के अनुसार मृत्यु के बाद शव को जलाने की प्रथा है। इस लेख में मैंने सिर्फ़ हिन्दुओं की इस पद्धति पर ही लिखने की कोशिश की है, अन्य धर्मों या समुदायों के अन्तिम संस्कार के बारे में लिखना उचित नहीं है, क्योंकि उनकी पद्धतियाँ, संस्कार आदि अलग-अलग होते हैं जिसके बारे में मेरी जानकारी कम है।

यहाँ तक कि हिन्दुओं में भी चूंकि कई पंथ हैं, समुदाय हैं, जातियाँ हैं, उपजातियाँ हैं, जिनमें दाह संस्कार के अलग-अलग तरीके अपनाये जाते हैं। इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को चोट पहुँचाने का नहीं है, बल्कि दाह संस्कार ठीक ढंग से हो, “मिट्टी” को सही तरीके से ठिकाने लगाया जाये, कोई फ़ूहड़ता न हो, और न ही शोकाकुल व्यक्तियों को मानसिक चोट पहुँचे, यह है।


व्यक्तिगत रूप से मुख्यतः दो कारणों से मैं शव के दाह संस्कार के खिलाफ़ हूँ। पहला, देश में एक वर्ष में लगभग 5 करोड़ पेड़ सिर्फ़ शवदाह के लिये काटे जाते हैं, हिन्दुओं की आबादी एक अरब पहुँचने वाली है और दूसरी तरफ़ जंगल साफ़ होते जा रहे हैं (सोचकर कंपकंपी होती है कि बाकी के कामों के लिये कितने करोड़ पेड़ काटे जाते होंगे)। और दूसरा, हमारी तथाकथित “पवित्र” नदियाँ जो पहले से ही उद्योगपतियों द्वारा प्रदूषित कर दी गई हैं, शवों की राख और अस्थि विसर्जन से बेहद मैली हो चुकी हैं। लेकिन मन में संस्कारों की इतनी गहरी पैठ होती है कि मृत्यु के बाद विद्युत शवदाह के लिये उठने वाली इक्का-दुक्का आवाज सख्ती से दबा दी जाती है और अन्ततः लकड़ियों से ही शव को जलाना होता है। बड़े शहरों में तो धीरे-धीरे (मजबूरी में ही सही) लोग विद्युत शवदाहगृहों का उपयोग करने लगे हैं (एक तो श्मशान पास नहीं होते और दूसरा लकड़ियों के भाव भी अनाप-शनाप बढ़ गये हैं), लेकिन कस्बों और गाँवों में आज भी विद्युत शवदाहगृहों को आम जनता “अच्छी निगाह”(?) से नहीं देखती। अक्सर इन शवदाह गृहों का उपयोग लावारिस लाशों, भिखारियों, बगैर पहचान के सड़क दुर्घटनाओं में मरे हुए लोगों के लिये नगर निगम और पुलिस करती है। जबकि आज जरूरत इस बात की है कि आम जनता को विद्युत शवदाह के बारे में शिक्षित और जागरूक किया जाये। न सिर्फ़ विद्युत शवदाह बल्कि अंगदान के बारे में भी, क्योंकि मरने के बाद तो शरीर मिट्टी हो गया, अब कम से कम उसके दो-चार अंग तो काम में लिये जायें। हाल ही में मालवा के कुछ समाजसेवियों ने सम्पूर्ण “शरीर दान” करने के संकल्प को फ़ैलाने का काम किया है। मेडिकल कॉलेज बढ़ रहे हैं, उनमें छात्रों की संख्या बढ़ रही है, उन्हें “प्रैक्टिकल” के लिये “शरीर” नहीं मिल रहे, कॉलेज प्रबन्धन दुर्घटनाओं में मरे हुए कटे-फ़टे शवों से काम चला रहा है, ऐसे में यदि पूरी तरह से साबुत स्वस्थ शरीर का मुर्दा उन्हें मिल जाये तो विद्यार्थियों को सीखने में आसानी होगी, लेकिन “मरने के बाद मुक्ति” वाला फ़ण्डा(?) शरीर दान करने से रोकता है। राह मुश्किल जरूर है, लेकिन धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है, लोग पहले आँखे ही आसानी से दान नहीं करते थे, परन्तु जैसे अब नेत्रदान तेजी से फ़ैल रहा है, उसी तरह “देहदान” भी बढ़ेगा। विषय इतना विस्तृत और रोचक है कि न चाहते हुए भी विषयांतर हो ही जाता है, मैं बता रहा था शवदाह के बारे में और पहुँच गया “देहदान” पर…

तो पेश है मेरी दसियों शवयात्राओं में शिरकत के अनुभव का निचोड़, मेरी कोशिश होगी कि इसमें अंत तक हरेक बात पर लिखा जाये। भारत इतना विशाल और भिन्नताओं से भरा है अतः पाठकों से भी आग्रह है कि अपने क्षेत्र विशेष की शवदाह परम्परा, तरीके, खासियत आदि का उल्लेख अपनी टिप्पणियों में अवश्य करें, ताकि लोगों को विभिन्न संस्कृतियों के बारे में पता चल सके। हम शुरु करते हैं “एकदम शुरु” से…। शुरु से मेरा मतलब है कि मौत कहाँ हुई है उससे, यदि मौत घर पर ही हुई है तो सबसे पहले उस कमरे को जितना हो सके खाली कर लेना चाहिये, मुर्दे को नीचे कमरे के बीचोंबीच जमीन पर सीधा लेटाकर, सिर्फ़ मुँह खुला रखते हुए बाकी पूरा चादर से ढँक देना चाहिये, ताकि अंतिम दर्शनों के लिये आने वाला आसानी से उसकी परिक्रमा भी कर सके और दण्डवत प्रणाम भी कर सके। जाहिर है कि ये बात शोक संतप्त परिजनों को बाद में सूझेगी, इसलिये यार-दोस्तों-मित्रों को पहल करके सबसे पहले ये काम करना चाहिये। कई बार देखने में आया है कि मुर्दा किसी पलंग पर पड़ा रहता है, जो कि कमरे एक कोने में होता है, आसपास रोने-धोने वालों की भीड़ होती है, ऐसे में जो बाहर से आता है वह बेचारा सहमा सा दरवाजे के बाहर से ही नमस्कार करके चलता बनता है, यदि वाकई कोई मृतक का खास मित्र है तो वह व्यथित होता है कि वह छू न पाया, या ठीक से देख न पाया। नाते-रिश्तेदारों, सगे-सम्बन्धियों में से किसी मुख्य व्यक्ति से पहले ही पूछ लें कि “क्या आसपास के किसी रिश्तेदार का इंतजार करना है?”, यदि ऐसा हो तो आने वालों को तत्काल सूचना दे दें कि शवयात्रा फ़लाँ के आने के बाद इतने बजे निकलेगी। यदि ज्यादा समय लगने वाला हो तो बर्फ़ की सिल्ली की व्यवस्था भी कर लें और शरीर को बर्फ़ की सिल्ली पर शिफ़्ट कर दें। यदि मौत किसी अस्पताल में हुई है, या दुर्घटना की वजह से हुई है तो एम्बुलेंस के घर आने से पहले ये सारी व्यवस्थायें हो जायें तो अच्छा। साथ ही यदि बॉडी पोस्टमॉर्टम की हो और चेहरा विच्छेदित हो तो कोशिश करें कि बॉडी कम से कम समय ही घर पर रखी जाये, और किसी तरह समझा-बुझा कर ऐसे शव का विद्युत शवदाह करवाने का प्रयास करें। जारी रहेगा…अगले भाग में

भाग-2 में आप पायेंगे अर्थी को सजाने और चिता को सही ढंग से लगाने का तरीका…

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11 comments:

गुस्ताखी माफ said...

सुरेश जी हर धर्म अपनी रीतियां सुविधा से गढ़ता है. हिन्दुओं में जलाने या पानी में बहाने की रीति इसलिये पड़ी क्योंकि यहा उस समय लकड़ी और जल बहुतायत में था.
अरब में मृत शरीर को दफनाने की क्रिया इसलिये की गयी क्योंकि वहां न पानी था न लकड़ी. आज के युग में विद्युत शवदाह ही उचित है.
मुझे याद पड़ता है कि लोहिया जी ने अपनी वसीयत में अपने शव के लिये विद्युत शवदाह को चुना था और उन्हे विद्युत शवदाह में ही जलाया गया था.
आपके लेख की अन्य कड़ी की प्रतीक्षा है

sanjay patel said...

सुरेश भाई.
क्या लाजवाब विषय ढूंढा है आपने.
मेरी जानकारी में रतलाम जंक्शन में एक शख्स हैं जो कंडे से चिता जलाने में एक्सपर्ट हैं.अत्यंत कम संख्या में वे कंडों का उपयोग करते हैं और शव के आसपास कंडे की जमावट कुछ ऐसी करते हैं कि आधे घंटे के समय में अंतिम संस्कार पूरा हो जाता है. अर्थी को सजाने और चिता को सही ढ़ंग से जलाने को प्रचारित करना बहुत ज़रूरी है. जिस तरह से मनुष्य आत्म-केंद्रित होता जा रहा है उससे यह मुश्किल होता जाएगा कि आपके यहाँ लोग जमा होकर इस काम को अंजाम दे दें. इस मामले में सुरेश भाई आप मुझसे सहमत होंगे कि गाँवों में स्थिति शहर से बेहतर है . वहाँ सहकार का भाव अधिक है और मानवीयता का प्रतिशत भी .हम शहर वाले जिस तरह से बिगडैल तबियत के होते जा रहे हैं और घर और समाज जिस तरह से टूट रहे हैं , सामाजिकता जिस तरह से ख़ारिज हो रही है जल्द ही टर्न की बेसिस पर ब्लू डार्ट या कोई दीगर कुरियर सर्विस अंतिम संस्कार का काम हाथ में ले लेगी और कमाई के नए समीकरण पैदा कर लेगी. मुंबई में तो शव-पेटिका में पेटी बंद करने वाले एक क्रिश्चियन सज्जन हैं भी जिनके इश्तेहार मिड डे में छपते भी रहते हैं और उनकी पंच लाइन है...पीपल आर डाइंग टू अवेल अवर सर्विसेज़....इन्दौर में बजाजखाना चौक में भी ओशो नाम की पान की दुकान है जहाँ अब शव यात्रा का पूरा साज़ो-सामान मिलने लगा है...कहीं ऐसा न हो कि अपने साँची पाँइट्स पर दुग्ध निगम ऐसी सुविधा शुरू दे...इसमें बुरा क्या है.
आपने एक खरे और चर्चा न किये जाने वाले विषय पर जानकारी शुरू की है ...साधुवाद आपका.
अर्ज़ किया है कि.....
ज़िंदगी का भी ठिकाना है
ज़िन्दगी रही...रही....न रही.

दीपक भारतदीप said...

आपने आज बढि़या मुद्दा उठाया है। मैं आपके साथ ही इस ब्लाग पर यह पोस्ट पढ़ने वाले हर व्यक्ति से अनुरोध करूंगा कि पढ़कर टिप्पणियां लिखकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री न समझें बल्कि अपने आसपास के लोगों को यह बात समझाते भी रहें। मैंने कई बार ऐसे अवसरों पर देखा है लोग समाज सुधारों पर सहमत होते हैं पर फिर उसी ढर्रे पर चलते हैं। कभी तो लगता है कि गूंगे बहरों के समाज में जी रहे हैं। शव जलाने में लकड़ी का उपयोग बंद हो-इस पर सब सहमति देते हैं पर फिर अपने घर में किसी के गमी होने पर उसके उतराधिकारी समाज के भय के विद्युत शवदाह ग्रह का उपयोग भी नहीं करते हैं। इस प्रसंग में एसा भी होता देखा है कि लकडि़यों के बिकवाने के चक्कर में कई स्थानों पर विद्युत शवदाह गृह भी खराब बताये जाते हैं। कुछ लोग शिकायत करते है कि उसमें शव पूरी तरह जलता नहीं हैं-मेरे ध्यान में यह नहीं आया है क्योंकि अभी तक जितनी भी शवयात्राओं में गया हूं उसमें लकडियों का उपयोग ही होते देखा है। बहरहाल इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचना चाहिए। इस विषय पर लिखने के अलावा आगे भी समाज में इस विषय पर चर्चा करते रहें।
दीपक भारतदीप

अरुण said...

आपने बहुत सही सवल उठाया है , शहरो मे आजकल लोगो के पास समय भी कम होता है,इसलिये आपको अन्तिम संसकार के वक्त इस बात के हक मे बहुर्त लोग मिल जायेगे, पर अपने परिवार मे ऐसा कुछ होने पर उन्हे कर्मकांड ही याद रहते है बस, और अक्सर लकडि बेचने वालो के सोज्न्य से ये खराब भी बहुत रहते है,
यहा एक जैन साहब है जो अंधे लोगो के क्ल्याण के लिये एक संस्था से सालो से जुडे है,पिछले दिनो उन्होने बहुत कार्य किया और शासन से फ़रीदाबाद मे गैस चालित शव दाह ग्रह सेंक्शन तो करा लिये पर लगने का काम सरकारी है और अगले दशक तक शायद हो जाये , सबसे अच्छी बात मुझे उनकी यह लगी की सबसे पहले उन्होने जैन समाज को " आप जीवन भर हत्या के दोष से मुक्त रहने की कोशिश करने वाले समाज का अंग हो और मरने के बाद सैकडॊ छोटे जीव जो लकडी के अंदर रहते है के मरने का कारण बनते हो क्या आप इस के पाप से मुक्त हो पाओगे ? कह कर इसके समर्थन मे जुटा लिया

राज भाटिय़ा said...

आप के विचारो से सहमत हू,धन्यवाद एक अच्छी जानकारी देने के लिये.

rc sharma said...

savdah ke bare mai sochna ajj ki mahti abasyakta hai

RAJENDRA said...

yadyapi mene is baar apki post padhane men deri kar di hai par mujhe bahut accha laga kyonki vishay bahut gambhir hai. Is vishaya men apne jo baten uthai hain ve vicharniya hain.

nitin tyagi said...

अर्थी को जलाने से पेड काटे जा रहे हैं ,जबकि अर्थी जलाने में सिर्फ सुखी लकड़ी प्रयोग में लायी जाती है |
पेड इसलिए कम हो रहें हैं क्योकि इस देश में सिगेरट बनाने वाली कंपनीया इससे कही ज्यादा गीले पेड काट रहीं हैं |
अर्थी को जलाने से पेड कम होते हैं ये आप का तर्क बिलकुल गलत है |
राख को गंगा जल में डालने से प्रदूषण नहीं होता |
अस्थियों के अलावा जो कुछ गंगा जी में डाला जाता है उससे प्रदूषण होता है |सरकार को चाहिए की वहाँ पर कूड़े आदि व् मल मूत्र की व्यवस्था करे |

सतीश सक्सेना said...

महत्वपूर्ण विषय लिया है आपने, अंगदान और देहदान पर जागरूकता बेहद आवश्यक है जो दुर्भाग्य से इस समय बिलकुल नहीं है, मृत शरीर के यह अंग, किसी और के, बरसों काम आयेंगे परमार्थ की यह भावना लोगों में बहुत कम ही है, और कोई दान करता भी है तो घर वालों को पता नहीं होता अथवा अंतिम समय कोई अस्पताल को सूचित नहीं करता ! मैंने देहदान के साथ साथ एनी अंग भी अपोलो हस्पताल में दान कर रखे हैं मगर घर में जितना सपोर्ट मिलना चाहिए उसका अंश भी नहीं मिला !
आपका यह लेख वाकई बहुत बढ़िया लगा ...शायद ही कभी इस विषय पर किसी ने लिखा होगा अफ़सोस है कि मैंने बहुत दिन बाद पढ़ा !
शुभकामनायें सुरेश भाई !

Anonymous said...

suresh jee, u r 100% right. lekin apko ek zehadi se ladna hai aur wo hai zakir nayak, jo apne tarko se kayi logo ko aksar confuse karta hai....

Mahendra Gupta said...

Vandemataram Sir,
Apki Prerna Landon Top.
Mai samajhata hu Samaj sudhar apne ghar se suru hota hai. Is liye apne bachcho aur patni se aaj hi Kah diya ki mera savdah Bijali se hona chahiye
Netra ka faishla pahela se ho chuka hai.
Bahut shubhkamnaye apko!