Sunday, May 25, 2008

सोनिया-राहुल के गाल पर कन्नड़ तमाचा

Karnataka Elections, Congress, JDU, Secularism
कर्नाटक के नतीजे आ चुके हैं, भाजपा का दक्षिण में पहला कदम सफ़लतापूर्वक पड़ चुका है। इसके पीछे गत 15 वर्षों की मेहनत, कार्यकर्ताओं का खून-पसीना तो है ही, कांग्रेस पार्टी के “सेक्यूलरिज्म”, एनडीटीवी के महान(?) पत्रकारों के विश्लेषण आदि भी शामिल हैं। चुनाव से पहले कांग्रेस ने जीतने पर टीवी देने का वायदा किया था, मानो गरीबों का मजाक उड़ा रही हो कि “लो टीवी पर देखो कि महंगाई कितनी बढ़ रही है”, “लो हमारे दिये टीवी पर देखो कि राहुल बाबा के रोड-शो कैसे धुंआधार होते हैं”। क्या-क्या पापड़ नहीं बेले सोनिया-राहुल तथा गौड़ा-स्वामी की खानदानी जोड़ियों ने… किसानो के कर्ज माफ़ करवाये, मध्यम वर्ग को खुश करने के लिये छठा वेतन आयोग दिया, मुसलमानों को खुश करने के लिये “खच्चर कमेटी” बनाई, एसएम कृष्णा को महाराष्ट्र से लाये, हेगड़े की बेटी को चुनाव में खड़ा किया, लेकिन सब-सब बेकार, पानी में चला गया। कर्नाटक की जनता बाप-बेटे की नौटंकी और पीठ में छुरा घोंपने की आदत से तंग आ चुकी थी और उसने भाजपा को सत्ता सौंप दी।

सन 2004 से अब तक 24 चुनावों में 16 बार हार का सामना कर चुकीं “त्यागमूर्ति” सोनिया गाँधी अब भी कांग्रेसियों की तारणहार बनी हुई हैं, क्या खूब चरण-वन्दना का नमूना है। इन चुनावों ने एक बार फ़िर साबित किया है कि अंग्रेजी प्रेस को भारत की सही पहचान नहीं है (ताजा उदाहरण मायावती की जीत) ये पहले भी कई बार साबित हो चुका है, लेकिन फ़िर भी “अक्ल है कि उनको आती नहीं…” ऊटपटांग विश्लेषण दिये जायेंगे, नकली आँकड़े फ़ेंके जायेंगे, “धर्मनिरपेक्षता” (चाहते हुए भी यहाँ गाली नहीं दे सकता) पर सिद्धान्त पेश किये ही जायेंगे, पता नहीं कब ये लोग समझेंगे कि संघ-भाजपा एक विचारधारा है, जो कि आसानी से नहीं मिटती और लाखों-करोड़ों प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं जो अखबारों में, नेट पर, चर्चाओं, व्याख्यानों में अपना प्रयास जारी रखते हैं, चुपचाप और लगातार…धर्मनिरपेक्षतावादी(?) जितना ज्यादा भाजपा को गरियाते हैं उतना ही इन कार्यकर्ताओं का इरादा पक्का होता जाता है। ये पहला सेमीफ़ायनल था, दूसरा सेमीफ़ायनल दिसम्बर में मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ चुनाव में होगा फ़िर फ़ायनल मई 09 में लोकसभा के चुनाव, जहाँ ढोंगी और दोमुँहे वामपंथियों को धूल चटाने का सुनहरा मौका मिलेगा…

ये भाजपा के लिये भी एक अच्छा मौका है फ़िर से अपने को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का। कंधार के पापों से मुक्ति तो कभी नहीं मिलेगी, हालांकि कई प्रतिबद्ध वोटरों ने वोट न देकर भाजपा को इसकी सजा दे दी थी। अब भाजपा को कंधार जैसी निकृष्ट हरकत से तौबा करना चाहिये, चन्द्रबाबू नायडू, ममता बैनर्जी, फ़ारुख अब्दुल्ला, शरद यादव जैसे क्षेत्रीय “मेंढकों” का उपयोग तो करना चाहिये लेकिन इनके दबाव में नहीं आना चाहिये, दबंगता से अपनी शर्तें मनवाना चाहिये, राम जन्मभूमि, धारा 370, समान नागरिक संहिता, आतंकवाद को सख्ती से कुचलना, आतंकवादियों को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिये जल्दी से जल्दी फ़ाँसी दिलवाना जैसे कामों को प्राथमिकता देना चाहिये…लेकिन क्या भाजपा नेतृत्व ये सब कर पायेगा???

, , , , , , , ,

7 comments:

Mired Mirage said...

आशा है कन्नड़ लोग अपने निर्णय के लिए कभी पछताएँगे नहीं।
घुघूती बासूती

Shastri said...

सुरेश का हर विश्लेषण असामान्य रूप से सश्क्त होता है. लिखते रहें, समाज को इन विश्लेषणों की बेहद जरूरत है.

भुवनेश शर्मा said...

ऐसे ही झन्‍नाटेदार तमाचे की जरूरत थी.....

विचार said...

घ्ग्घूति जी, पछताये तो वो जिसके पास कोई विकल्प हो, कांग्रेस, गौडा, और गठबंधन सभी को तो मौका दे कर देख चुके. अब हाथ में रहा ही क्या? चलो एक मौका भाजपा को भी देकर देख लेते हैं, वरना पछताने की आदत तो है ही सही

अरुण said...

कैसे है अब रवीश बाबू ?

अनुनाद सिंह said...

भारत में आजादी के बाद कांग्रेस अ.ग्रेजी प्रेस को येन केन प्रकारेण जिलाये रखी है तो अंग्रेजी प्रेस विसेशी नेतृत्व वाली कांग्रेस को !

क्या खूब जोड़ी है। पर धीरे-धीरे दोनो का अन्त नजदीक आ रहा है। भारत का सबसे बड़ा अंग्रेजी अखबार प्रथम पन्द्रह स्थानो में जगह नहीं बना पा रहा।

संजय बेंगाणी said...

लेकिन क्या भाजपा नेतृत्व ये सब कर पायेगा???

पता नहीं, वोट डालते समय यही सवाल हमारे मन में भी रहेगा.


बहरहाल तो जय कर्णाटक. :)