Sunday, May 18, 2008

पलायनवादी, कायर हिन्दू बुद्धिजीवी समस्याओं का सामना कैसे करते हैं…

How Coward Hindus Face Problems
आत्मपीड़ा और स्व-आलोचना का यदि कोई पैमाना मानें तो हिन्दुओं का स्थान उसमें विश्व में सबसे ऊपर आता है। विगत सौ वर्षों में “खुद से घृणा करने की कला” में हिन्दुओं ने महारत हासिल कर ली है। राजनेता, मीडिया, तथाकथित सेक्यूलर, बुद्धिजीवी(?), मानवाधिकार कार्यकर्ता जो हिन्दुओं को गाली देने में सबसे आगे रहते हैं उनमें ज्यादातर हिन्दू ही हैं। हिन्दुओं का सबसे बड़ा दुश्मन आज की तारीख में कोई है तो वह है “हिन्दू”।

हिन्दुओं के दिमाग को समझना काफ़ी आसान है, इस लेख में पलायनवादी और कायर हिन्दुओं की मानसिकता को समझने की कोशिश की गई है। जब भी हिन्दुओं पर कोई संकट आता है, या कोई समस्या उत्पन्न होती है, या कोई घटना उन्हें नुकसान पहुँचा सकती है, तब हिन्दू समस्या का सामना कैसे करते हैं? किसी भी मुश्किल या समस्या से निपटने के तो तरीके होते हैं, पहला उसे समस्या मानो और उसका मुकाबला करो, उस समस्या का समाधान ढूंढने के लिये उपाय करो, और कुछ कदम उठाओ तथा दूसरा तरीका है संकट या समस्या को समस्या मानो ही मत। यदि हिन्दू हित की कोई समस्या है और उसके हल के लिये कदम उठाना पड़ें तो जाहिर है कि विवाद होंगे, तनाव होगा, झगड़े होंगे, आक्रमण करना पड़ेगा, जबकि यदि हम समस्या को समस्या मानें ही नहीं तो क्या होगा, कुछ नहीं, कोई झगड़ा-टंटा नहीं, कोई विवाद नहीं, कोई लड़ाई नहीं। सीधी सी बात यही है कि दूसरा रास्ता ज्यादा आसान है, पहला वाला कठिन है। बरसों से हिन्दू दूसरा वाला रास्ता अपनाते आये हैं, समस्या की अनदेखी करो, रेत में शतुरमुर्ग की तरह अपना सिर छुपा लो, लेकिन उससे तूफ़ान का खतरा कम नहीं हो जाता, बल्कि और बढ़ जाता है। सुविधाभोगी और कायर हिन्दू अपना “आज” सुविधाजनक बनाने के लिये अपने “कल” को मुश्किलों के हवाले कर रहे हैं।

फ़िर सवाल उठता है कि आखिर ये कायर हिन्दू अपनी समस्याओं को सुलझाते कैसे हैं? कई तरीकों में से सबसे आसान तरीका होता है खुद हिन्दुओं पर, अपने भाई-बन्धुओं पर “सांप्रदायिक” होने का आरोप लगाकर। सबसे पहले “घरघुस्सू” बुद्धिजीवी हिन्दू खुद ही हिन्दुओं पर “संकीर्ण विचारधारा वाले” (Narrow Minded), कट्टरपंथी (Fundamentalist) आदि होने का आरोप करेगा। जाहिर है कि हिन्दू द्वारा हिन्दू पर शाब्दिक हमला करना आसान होता है, क्योंकि हिन्दू खुद ही कम आक्रामक और कम हिंसक है। जबकि असली दुश्मन से निपटना उन बुद्धिजीवियों के लिये काफ़ी मुश्किल है, इसलिये हिन्दू बुद्धिजीवी “संत” होने का ढोंग रचता है और अपने ही धर्म के लोगों को खरी-खोटी सुनाने का उपक्रम करता है। क्योंकि उसे मालूम है कि यदि उसने दूसरे धर्म के खिलाफ़ कुछ कहा तो जूते खाना निश्चित है। ऐसे में नेता, मीडिया, धर्मनिरपेक्ष(?) सभी लोग एक सुर में हिन्दुओं को ही कट्टरवादी और दंगों के लिये दोषी बताने लगते हैं, क्योंकि उनमें यह नैतिक और मानसिक ताकत नहीं होती कि वे “जेहाद”, “आतंकवाद” को गलत ठहरा सकें या उसकी कड़ी आलोचना कर सकें। लगे हाथों हमारे महान मानवाधिकारवादी भी आतंकवादियों और अपराधियों के मानवाधिकारों को लेकर बेहद चिंतित हो जाते हैं, भले ही कश्मीरी पंडित अपने ही देश में सड़ते रहें। हम हिन्दू कभी भी बढ़ती हुई मुसलमान आबादी या तेज होते जा रहे ईसाई धर्मान्तरण को लगातार नजरअंदाज करते जाते हैं। हम ये कभी मानते ही नहीं कि ये कोई समस्या है, या इससे हिन्दुओं को या भारत को खतरा है। है न मजेदार तरीका समस्या से निपटने का, बस उसे नजर-अंदाज कर दो। हिन्दू बुद्धिजीवी इस बात पर भी कभी बहस नहीं करते कि कश्मीर से हिन्दुओं को चुन-चुनकर भगा दिया गया है, उन्हें चिंता होती है फ़िलिस्तीन की या फ़िजी की। यदि गलती से कभी बहस कर भी ली तो उसके हल के नाम पर शून्य, अमेरिका-पाकिस्तान का मुँह तकते रहेंगे जिन्दगी भर, ये है "टिपीकल" धर्मनिरपेक्षतावादी तरीका।



हिन्दुओं ने इतिहास से कभी सबक न सीखने की कसम खा रखी है। सारे आँकड़े और तथ्य चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि अगले बीस वर्षों के भीतर हम दूसरे विभाजन की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन मीडिया और बुद्धिजीवी इसे नहीं मानेंगे। इसके बजाय वे उन संस्थाओं की आलोचना करेंगे जो कि धर्म आधारित जनगणना करती हैं। जब उन्हें धर्म आधारित जनगणना के आँकड़े बताये जायेंगे तो वे उसे खारिज कर देंगे और उसे “बकवास” और एक “सेक्यूलर” देश में गैरजरूरी बतायेंगे। इसके पीछे का उद्देश्य साफ़ होता है, तथाकथित बुद्धिजीवी मुख्य मुद्दे को दरकिनार करके जनसंख्या के आँकड़ों को ही गलत बताकर उसे मुख्य मुद्दा बना देंगे, इससे असली मुद्दे पर पलायन करने में आसानी होती है। सनद रहे कि 1948 में जिन उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिन्दू जनसंख्या बहुसंख्यक थी उनमें से पाँच राज्यों में 2001 की जनगणना के अनुसार ईसाई बहुसंख्यक हो गये हैं, जबकि असम में मुसलमान जनसंख्या तेजी से बढ़कर 32% तक हो गई है और किसी-किसी जिले में यह 60% तक है, लेकिन कायर हिन्दू बुद्धिजीवी इसे बकवास कहकर टाल देंगे।

मुसलमान संप्रदाय को मुख्य धारा में लाने के लिये उनमें आधुनिक शिक्षा का प्रसार जरूरी है, परिवार नियोजन अपनाने पर बल देना जरूरी है, उन्हें यह समझाने की जरूरत है कि अवैध बांग्लादेशियों को पनाह देने की बजाय पुलिस में रिपोर्ट करें, लेकिन इसके लिये पहले “समस्या” को “समस्या” मानना होगा न!!! उससे लड़ना होगा, लेकिन पलायन में माहिर हिन्दू बुद्धिजीवी ये नहीं करेंगे। इसलिये जब उमा भारती को हुबली में “विवादित स्थल” पर तिरंगा फ़हराने के आरोप में गिरफ़्तार किया जाता है तब हमारे ही हिन्दू भाई-बन्धु कभी ये जानने की कोशिश नहीं करते कि कथित विवादित स्थल “विवादित” क्यों है, वह विवादित कब और कैसे बना, क्या देश में कहीं भी तिरंगा फ़हराना विवादित हो सकता है? ये जानने की बजाय बुद्धिजीवी भाजपा को कोसने लगते हैं कि वह खामख्वाह विवादित मुद्दों को हवा दे रही है, दंगे करवाना चाहती है, हिन्दू वोटों के लिये यह सब कर रही है आदि-आदि। यही बुद्धिजीवी “भावनाओं को चोट पहुँचने” के आधार पर वन्देमातरम का गायन ऐच्छिक कर देते हैं। जब शंकराचार्य को गिरफ़्तार किया जाता है तब हमें सीख दी जाती है कि “कानून सबके लिये बराबर है, कानून का पालन करना चाहिये…” मीडिया में कहीं यह चर्चा नहीं की जाती कि हो सकता है कि इसके पीछे भी किसी की साजिश हो, यहाँ तक कि जब शंकराचार्य सुप्रीम कोर्ट से बाइज्जत बरी हो जायें तब भी उस खबर को पीछे के पन्ने पर कहीं कोने में छापा जायेगा, भले ही अफ़जल गुरु को फ़ाँसी देने में टालमटोल की जाती रहे (उस वक्त “कानून” और सुप्रीम कोर्ट जाने कहाँ चला जाता है)।

असल में हिन्दुओं में ही काफ़ी सारे “अवैध और काले पैसे वाले”, कुछ “डरपोक” और कुछ “सेक्यूलर” दिमाग वाले गद्दार भरे हुए हैं। इन लोगों को बांग्लादेशियों के अवैध घुसपैठ में कोई समस्या नजर नहीं आती, इन्हें मदरसों से चलाये जा रहे अभियान दिखाई नहीं देते, इन्हें चर्च द्वारा आदिवासियों के बीच किये जा रहे धर्मान्तरण में कुछ भी गैरवाजिब नहीं लगता। ये लोग सोमनाथ मन्दिर को सरकारी पैसे से बनवाने का विरोध करेंगे लेकिन मस्जिदों को प्रतिवर्ष दिये जा रहे करोड़ों रुपये की मदद पर चुप्पी साध जायेंगे। यदि शिक्षा पद्धति में “वैदिक गणित” या “नैतिक शिक्षा” की बात भर की जाये तो उन्हें “भगवाकरण” का खतरा दिखाई देने लगता है, सरस्वती वन्दना के विरोध में भी ये लोग “धर्म” ढूंढ लेते हैं। इनके अनुसार वनवासी क्षेत्रों में सिर्फ़ और सिर्फ़ “चर्च” ही समाजसेवा कर रहा है, बाकी के सब लोग वहाँ शोषण कर रहे हैं।



हकीकत तो ये है कि यदि इन समस्याओं को हम लोग समस्या मानें तो इसके निदान के लिये हमे “कुछ” करना पड़ेगा, लेकिन भगोड़ी मानसिकता वाले हिन्दू कुछ करना नहीं चाहते, इसलिये संकट के हल की बात नहीं उठती। बस लगातार प्रचार करते रहो कि हिन्दू धर्म सहनशील है, अनेकता में एकता का समर्थक है, हिन्दू धर्म आध्यात्म से भरपूर है और कभी हिंसा की पैरवी नहीं करता आदि-आदि। हिन्दुओं का खूब सारा समय, पैसा और ऊर्जा विभिन्न प्रकार की पूजाओं, यज्ञों, भागवत कथाओं, बाबाओं और स्वामियों की चरण-वन्दना जैसे निकम्मे कामों में खर्च होता है। जमाने भर को “गीता के कर्म के सिद्धांत” की दुहाई देते नहीं थकते, लेकिन जब खुद कुछ सच्चा कर्म करने की बारी आती है तो पीठ दिखा कर भाग जाते हैं। जिस गीता में अधिकतर हिन्दुओं का विश्वास है, जिस गीता पर हाथ रखकर कसमें खाई जाती हैं, उसमें स्पष्ट लिखा है कि अधर्म के खिलाफ़ लड़ना हरेक का कर्तव्य है, बल्कि अधर्म का नाश करने के लिये यदि कृष्ण की तरह चालबाजियाँ भी करना पड़ें तो भी कोई हर्ज नहीं, उसी गीता को हम भूल चुके हैं। अपना नपुंसकतावाद छिपाने के लिये हमने “सेक्यूलर” और “अहिंसा” का मुखौटा ओढ़ लिया है। अहिंसा के मूल सिद्धांत को हमने अपनी “अकर्मण्यता” छिपाने के लिये उपयोग कर लिया है। जबकि महात्मा गाँधी ने खुद एक जगह लिखा है “My own experiences but confirm the opinion that the Mussalman as a rule is a bully, and the Hindu is a coward; where there are cowards there will always be bullies.” अर्थात “मुसलमान जब शासक बनता है तब वह निर्दयी और दबंग होता है, जबकि हिन्दू शासक डरपोक…” यहाँ तक कि एक बार उन्होंने यह भी कहा कि “यदि मुझे डरपोक और अत्याचार सहन करने तथा हिंसा में से एक को चुनना पड़े तो मैं हिंसा पसन्द करूँगा…भले ही अहिंसा मेरा सिद्धांत हो”। लेकिन शतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गड़ाये बैठे हिन्दू ये सोचते रहते हैं कि तूफ़ान नहीं आने वाला या अपने-आप टल जायेगा। उसकी इस मानसिकता को हवा देते रहते हैं हिन्दू बुद्धिजीवी और कथित धर्मनिरपेक्ष लोग, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि बांग्लादेश से घुसपैठ रोकी जाये, पाकिस्तान से आतंकवाद पर सीधी बात की जाये, देश के नागरिकों में देशप्रेम की भावना जगाना, आतंकवादियों को खदेड़-खदेड़ कर मारना, जो आतंकवादी और दुर्दान्त आतंकवादी पकड़ में आ जायें उन्हें तत्काल मार गिराना, पुलिस तंत्र में शामिल राजनीति, खुफ़िया तंत्र को मजबूत करना, जैसे कठोर उपाय किये बिना हम यूँ ही सतत जूते खाते रहेंगे। पाकिस्तान, बांग्लादेश या देश में रह रहे कुछेक गद्दार लोग हिन्दुओं के उतने बड़े दुश्मन नहीं है, असली दुश्मन तो हैं हमारे अपने ही लोग, वे लोग जो समस्या को समस्या मानते ही नहीं और धर्मनिरपेक्षता के उपदेश पिलाते रहते हैं…।

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सन्दर्भ : शची रायरीकर, 22 जनवरी 2005
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