रेडियो की यादें (भाग-2) (विविध भारती और टीवी उदघोषकों के बारे में)
All India Radio Vividh Bharti Doordarshan
1982 के एशियाड के समय भारत में रंगीन टीवी का उदय हुआ, हालांकि लगभग 1990 तक कलर टीवी भी एक “लग्जरी आयटम” हुआ करता था (अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखिये कि अब कलर टीवी चुनाव घोषणा पत्रों में मुफ़्त में बाँटे जाने लगे हैं)। “सुदर्शन चेहरे वाले” कई उदघोषक रेडियो से टीवी की ओर मुड़ गये, कुछ टीवी नाटकों / धारावाहिकों में काम करने लगे थे। उन दिनों चूंकि टीवी नया-नया आया था, तो उसका काफ़ी “क्रेज” था और उस दौर में रेडियो से मेरा नाता थोड़ा कम हो गया था, फ़िर भी उदघोषकों के अल्फ़ाज़, अदायगी और उच्चारण की ओर मेरा ध्यान बराबर रहता था। अन्तर सिर्फ़ इतना आया था कि टीवी के कारण मुखड़े का दर्शन भी होने लगा था इसलिये शम्मी नारंग, सरला माहेश्वरी, जेवी रमण, सरिता सेठी आदि हमारे लिये उन दिनों आकर्षण का केन्द्र थे। सरला माहेश्वरी को न्यूज पढ़ते देखने के लिये कई बार आधे-आधे घंटे यूँ ही बकवास सा “चित्रहार” देखते बैठे रहते थे। वैसे मैंने तो मुम्बई में बचपन में स्मिता पाटील और स्मिता तलवलकर को भी टीवी पर समाचार पढ़ते देखा था और अचंभित हुआ था, लेकिन “हरीश भिमानी” की बात ही कुछ और थी, महाभारत के “समय” तो वे काफ़ी बाद में बने, उससे पहले कई-कई बार उन्हें सुनना बेहद सुकून देता था। टीवी के आने से उदघोषकों का चेहरा-मोहरा दर्शनीय होना अपने-आप में एक शर्त थी, उस वक्त भी तबस्सुम जी अपने पूरे शबाब और ज़लाल के साथ पर्दे पर नमूदार होती थीं और बाकी सबकी छुट्टी कर देती थीं। रेडियो के लिये उन दिनों मंदी के दिन थे ऐसा मैं मानता हूँ। फ़िर से कालचक्र घूमा, टीवी की दुनिया में ज़ीटीवी नाम के पहले निजी चैनल का प्रवेश हुआ और मानो धीरे-धीरे उदघोषकों की शुद्धता नष्ट होने लगी। लगभग उन्हीं दिनों आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरु हुआ था, अंग्रेजी लहजे के उच्चारण और अंग्रेजी शब्दों की भरमार (बल्कि हमला) लिये हुए नये-नवेले उदघोषकों का आगाज़ हुआ, और जिस तेजी से फ़ूहड़ता और घटियापन का प्रसार हुआ उससे संगीतप्रेमी और रेडियोप्रेमी पुनः रेडियो की ओर लौटने लगे। उदारीकरण का असर (अच्छा और बुरा दोनो) रेडियो पर भी पड़ना लाजिमी था, कई प्रायवेट रेडियो चैनल आये, कई योजनायें और भिन्न-भिन्न तरीके के कार्यक्रम लेकर आये, लेकिन एक मुख्य बात से ये तमाम रेडियो चैनल दूर रहे, वह थी “भारतीयता की सुगन्ध”। और इसी मोड़ पर आकर श्रोताओं के बीच “विविध भारती” ने अपनी पकड़, जो कुछ समय के लिये ढीली पड़ गई थी, पुनः मजबूत कर ली।
विविध भारती, जो कि अपने नाम के अनुरूप ही विविधता लिये हुए है, आज की तारीख में अधिकतर लोगों का पसन्दीदा चैनल है। लोगबाग कुछ समय के लिये दूसरे “कांदा-भिंडी” टाइप के निजी रेडियो चैनल सुनते हैं, लेकिन वे सुकून और शांति के लिये वापस विविध भारती पर लौटकर आते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे कि हॉट-डॉग खाने वाले एकाध-दो दिन वह खा सकते हैं, लेकिन पेट भरने और मन की शांति के लिये उन्हें दाल-रोटीनुमा, घरेलू, अपनी सी लगने वाली, विविध भारती पर वापस आना ही पड़ेगा। मेरे अनुसार गत पचास वर्षों में विविध भारती ने अभूतपूर्व और उल्लेखनीय तरक्की की है, जाहिर है कि इसे सरकारी मदद मिलती रही है, और इसे चैनल चलाने के लिये “कमाने” के अजूबे तरीके नहीं आजमाना पड़े, लेकिन फ़िर भी सरकारी होने के बावजूद इसकी कार्यसंस्कृति में उत्कृष्टता का पुट बरकरार ही रहा, और आज भी है।
विविध भारती के मुम्बई केन्द्र से प्रसारित होने वाले लगभग सभी कार्यक्रम उत्तम हैं और उससे ज्यादा उत्तम हैं यहाँ के उदघोषकों की टीम। मुझे कौतूहल है कि इतने सारे प्रतिभाशाली और एक से बढ़कर एक उदघोषक एक ही छत के नीचे हैं। कमल शर्मा, अमरकान्त दुबे, यूनुस खान, अशोक सोनावणे, राजेन्द्र त्रिपाठी, महेन्द्र मोदी… इसी प्रकार महिलाओं में रेणु बंसल, निम्मी मिश्रा, ममता सिंह, आदि। लगभग सभी का हिन्दी उच्चारण एकदम स्पष्ट, आवाज खनकदार, प्रस्तुति शानदार, फ़िल्मों सम्बन्धी ज्ञान भी उच्च स्तर का, यही तो खूबियाँ होना चाहिये उदघोषक में!!! आवाज, उच्चारण और प्रस्तुति की दृष्टि से मेरी व्यक्तिगत पसन्द का क्रम इस प्रकार है – (1) कमल शर्मा, (2) अमरकान्त दुबे और (3) यूनुस खान तथा महिलाओं में – (1) रेणु बंसल, (2) निम्मी मिश्रा (3) ममता सिंह। इस लिस्ट में मैंने लोकेन्द्र शर्मा जी को शामिल नहीं किया है, क्योंकि वे शायद रिटायर हो चुके हैं, वरना उनका स्थान पहला होता। महिला उदघोषकों में सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं रेणु बंसल, फ़ोन-इन कार्यक्रम में जब वे “ऐस्स्स्स्सा…” शब्द बोलती हैं तब बड़ा अच्छा लगता है, इसी प्रकार श्रोताओं द्वारा फ़ोन पर “मैं अपने मित्रों का नाम ले लूँ” पूछते ही निम्मी मिश्रा प्यार से “लीजिये नाआआआआ…” कहती हैं तो दिल उछल जाता है। ममता सिंह जी, अनजाने ही सही, अपना विशिष्ट “उत्तरप्रदेशी लहजा” छुपा नहीं पातीं। मुझे इस बात का गर्व है कि कई उदघोषकों का सम्बन्ध मध्यप्रदेश से रहा है, और अपने “कानसेन” अनुभव से मेरा यह मत बना है कि एक अच्छा उदघोषक बनने के लिये एक तो संस्कृत और उर्दू का उच्चारण जितना स्पष्ट हो सके, करने का अभ्यास करना चाहिये (हिन्दी का अपने-आप हो जायेगा) और हर हिन्दी उदघोषक को कम से कम पाँच-सात साल मध्यप्रदेश में पोस्टिंग देना चाहिये। मेरे एक और अभिन्न मित्र हैं इन्दौर के “संजय पटेल”, बेहतरीन आवाज, उच्चारण, प्रस्तुति, और मंच संचालन के लिये लगने वाला “इनोवेशन” उनमें जबरदस्त है। मेरा अब तक का सबसे खराब अनुभव “कमलेश पाठक” नाम की महिला उदघोषिका को सुनने का रहा है, लगता ही नहीं कि वे विविध भारती जैसे प्रतिष्ठित “घराने” में पदस्थ हैं, इसी प्रकार बीच में कुछ दिनों पहले “जॉयदीप मुखर्जी” नाम के एक अनाउंसर आये थे जिन्होंने शायद विविध भारती को निजी चैनल समझ लिया था, ऐसा कुछ तरीका था उनका कार्यक्रम पेश करने का। बहरहाल, आलोचना के लिये एक पोस्ट अलग से बाद में लिखूंगा…
व्यवसायगत मजबूरियों के कारण आजकल अन्य रेडियो चैनल या टीवी देखना कम हो गया है, लेकिन जिस “नेल्को” रेडियो का मैने जिक्र किया था, वह कार्यस्थल पर एक ऊँचे स्थान पर रखा हुआ है, जहाँ मेरा भी हाथ नहीं पहुँचता। उस रेडियो में विविध भारती सेट करके रख दिया है, सुबह बोर्ड से बटन चालू करता हूँ और रात को घर जाते समय ही बन्द करता हूँ। ब्लॉग जगत में नहीं आया होता तो यूनुस भाई से भी परिचय नहीं होता, उनकी आवाज का फ़ैन तो हूँ ही, अब उनका “मुखड़ा” भी देख लिया और उनसे चैटिंग भी कर ली, और क्या चाहिये मुझ जैसे एक आम-गुमनाम लेकिन कट्टर रेडियो श्रोता को? किस्मत ने चाहा तो शायद कभी “कालजयी हीरो” अर्थात अमीन सायानी साहब से भी मुलाकात हो जाये…
पाठकों को इस लेख में कई प्रसिद्ध नाम छूटे हुए महसूस होंगे जैसे पं विनोद शर्मा, ब्रजभूषण साहनी, कब्बन मिर्जा, महाजन साहब जैसे कई-कई अच्छे उदघोषक हैं, लेकिन मैंने सिर्फ़ उनका ही उल्लेख किया है, जिनको मैंने ज्यादा सुना है। राजनीति और सामाजिक बुराइयों पर लेख लिखते-लिखते मैंने सोचा कि कुछ “हट-के” लिखा जाये (“टेस्ट चेंज” करने के लिये), आशा है कि पाठकों को पसन्द आया होगा…
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10 comments:
बहुत अच्छा चिट्ठा !
मुझे रेणु (बंसल) जी का दरअसल बोलना बहुत अच्छा लगता है।
मुझे शहनाज़ ख़ान की आवाज़ बहुत खनकदार और बहुत अच्छी लगती है। पहले रात में उनकी आवाज़ में छाया गीत सुनना बहुत अच्छा लगता था। अभी बहुत दिनों (या सालों) से उनकी आवाज़ विविध भारती पर नहीं सुनी।
युनुस जी के साथ मेरा बड़ा रोचक अनुभव रहा। मैं विविध भारती पर उनको सुनती थी ख़ासकर मंथन में। जिस अंदाज़ से वो अंथन प्रस्तुत करते थे - उनकी शैली उनकी विचारों की परिपक्वता मैं सोचती थी यूनुस जी ज़रूर मध्यम आयु के चालीस से पचास के बीच के व्यक्ति होंगें। पहली बार बालश्रम विषय पर मैनें मंथन के फोन-इन-कार्यक्रम में भाग लिया और यही पहली बार था जब मैनें उनसे फोन पर बात की तब भी मुझे ऐसा ही लगा। पर जब मैनें ब्लाग देखने शुरू किए तभी यूनुस जी ने रेडियोवाणी शुरू किया - परिचय पढकर तस्वीर देखकर मैं वाकई हैरान रह गई। देखिए रेडियो कैसा धोखा भी देता है… पर मज़ा आया…
तबस्सुम के लिए तो मैं बजाज पंखों के विज्ञापन की तर्ज पर कहना चाहूँगी - तबस्सुम का जवाब नहीं !
अन्नपूर्णा
वास्तव मे बहुत ही अच्छा लगा.
शम्मी नारंग, सरला माहेश्वरी, जेवी रमण. इन तीनों की तो मुझे भी याद है.
आजकल रेडियो सुनना नहीं के बराबर हो गया है इसलिए वर्तमान के बारे मे ज्यादा नहीं जानते.
हाँ ऍफ़ एम् पर एक से एक उदघोषक भरे पड़े हैं. नाम नहीं पता.
उनको सुनना भी अच्छा लगता है.
मुद्दा केवल यही नहीं बल्कि कार्यक्रम प्रस्तुतीकरण का भी है। समाचार को अगर समाचार की तरह सुनना है तो आज भी दूरदर्शन ही सुहाता है। इस पर भी कभी लिखें क्योंकि वाकई जिस तरह समाचार सुनाये नहीं बल्कि थोपे जा रहे हैं उससे उकताहट होने लगती है।
दीपक भारतदीप
नवाज़िश आपकी ; करम आपका सुरेश भाई,राष्ट्रीय क़द के नामों मे आपने मुझ जैसे पिद्दी के शोरबे को भी शामिल कर दिया. हाँ लेकिन ये भी कहना चाहूँगा कि रामसिंह,क़ब्बन मिर्ज़ा,ब्रजेन्द्र मोहन (मौजीरामजी)ब्रजभूषण साहनी,सरिता सेठी,सविता बजाज,(सब विविध भारती)गोपाल शर्मा,विजयलक्ष्मी(दोनो रेडियो सिलोन)विश्वदीपक त्रिपाठी,ओंकारनाथ श्रीवास्तव,आले हसन,परवेज़ आलम,भारतरत्न भार्गव(सभी बी.बी.सी) के अलावा इन्दौर आकाशावाणी की इंदु आनंद और केवलकृष्ण नैयर (बाद में महानिदेशक आकाशवाणी) की आवाज़ों का जादू कानो पर आज भी छाया हुआ है .मेरा हमेशा मानना है कि पूरी एक ज़िन्दगी भी कम है इन सब महान आवाज़ों से सीखने के लिये. हाँ एंकरिंग में सबसे मज़ेदार अनुभव तबस्सुम जी के साथ रहा है और एक बार हरीश भिमाणी के साये में भी कुछ कहने का सौभाग्य ख़ाकसार को मिला है.बोलने की दुनिया का सबसे बड़ा और मुश्किल कारनामा है सरल बोलना और ये इन आवाज़ों ने कर दिखाया है जिनका ज़िक्र आपने (मुझे छोड़कर)और मैंने किया है.और हाँ इन सब को सुनकर हम सब ने शुध्द बोलने का संस्कार भी पाया है ये क्या किसी एहसान से कम नहीं हम सब पर.
वो जमान और था " ये आल इंडीया रेडियो है" मे कोई बात थी जी. अब तो एफ़ एम पर घटिया भाषा के साथ घटिया बाते सुनिये बस :)
हमारा तो पूरा परिवार रेडियो-रसिक है साहब !
ये टिप्पणी भी रेडियो सुनते हुए
ही कर रहा हूँ कि
आपने बहुत अच्छी जानकारी दी है.
हट-के लिखने का ये सिलसिला
डट-के ज़ारी रखिए न !
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शुभकामनाएँ
डा.चंद्रकुमार जैन
नाल्को का एक ट्रांजिस्टर मेरे पास भी था जो स्कूल के दिनों में मेरा सबसे बड़ा साथी था। अच्छा लेख लिखा आपने। मेरा मत है कि रेडिओ की जितनी संभावनाएँ इस देश में हैं उसका बहुत कमतर वास्तविक रूप में आ पाया है। नए चैनल कुकुरमुत्तों की तरह फैलते जा रहे हैं पर उनके द्वारा की जाने वाली प्रोग्रामिंग में ना तो कोई सोच है ना ही कोई विविधता। विविध भारती जैसे संगठन जो कुछ हट के देने में सक्षम है, जिसमें इतने दक्ष उद्घोषक हैं, खुद इस सरकारी उपेक्षा की शिकार है।
मुझे अच्छी तरह याद बात १९९८-१९९९ की है एक कार्यक्रम विविध भारती पे आती थी मंगलवार को हेलो - फरमाइश जिसे सुनने के लिए मैं क्रिकेट को झोड़ कर सुनता उसमे अक्सर कमल शर्मा जी होते थे तब किसी पुरुष श्रोता ने मजाकिया अंदाज़ में कमल जी से कहा था "कमल जी अगर मैं लड़की होता तो आप से शादी कर लेता !"
ये सुनकर हमे बहुत हंसी आई थी ! वाकई उनकी आवाज़ में एक कसक है जो अपनी और खिचती है !
सुरेश , जी पिछले दिनों हमने समाचार में सुना मार्च अंत तक की बी.बी.सी बंद होने वाली है ! अगर आप के पास वक़्त हो तो उसके बारे में जरुर लिखिए .................बहुत ही लम्बा हमसफ़र रहा है बी.बी.सी ................
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