Sunday, April 20, 2008

कोंकण रेल्वे की एक और खासियत तथा मधु दण्डवते

Konkan Railway ACD Network Sridharan
(भाग-1 से जारी…)
कोंकण रेल्वे की एक और खासियत है “RO-RO” तकनीक –
“RO-RO” का अर्थ है “Roll On – Roll Off”। इस सुविधा के अनुसार माल से पूरी तरह से भरे हुए ट्रक सीधे कोंकण रेल्वे में चढ़ा दिये जाते हैं (ड्राइवर सहित)। कोंकण रेल्वे का समूचा इलाका ऊँची-उँची पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है। इस “रूट” (राष्ट्रीय राजमार्ग 17) पर ट्रक ड्रायवरों को ट्रक चलाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, और काफ़ी एक्सीडेंट भी होते हैं। इधर सड़कों और मौसम की हालत भी खराब रहती ही है। ऐसे में कोंकण रेल्वे की यह सुविधा व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों और ड्रायवरों के लिये एक वरदान साबित होती है। जाहिर है कि इससे उनके डीजल और टायर खपत में भारी कमी आती है, ड्रायवरों को भी आराम हो जाता है, और सबसे बड़ी बात है कि माल जल्दी से अपने गंतव्य तक पहुँच जाता है। कोंकण रेल्वे को इससे भारी आमदनी होती है। मुम्बई से यदि त्रिवेन्द्रम माल भेजना हो और यदि ट्रक को “रो-रो” सुविधा से भेजा जाये तो लगभग 700 किमी की बचत होती है। सोचिये कि राष्ट्र की बचत के साथ-साथ यह सुविधा पर्यावरण Environment की कितनी रक्षा कर रही है। ट्रक को मुम्बई से सीधे ट्रेन में चढ़ा दिया जाता है और उसे मंगलोर में उतारकर ड्रायवर आगे त्रिवेन्द्रम तक ले जाता है। इसी प्रकार जब वह बंगलोर या हुबली या कोचीन से माल भरता है तो मंगलोर में ट्रक को ट्रेन में चढ़ा देता है जिसे मुम्बई में उतार कर आगे गुजरात की ओर बढ़ा दिया जाता है। कुल मिलाकर यह तकनीक और सुविधा सभी के लिये फ़ायदेमन्द है। कोंकण रेल्वे चूँकि एक सार्वजनिक उपक्रम होते हुए भी पब्लिक लिमिटेड है, इसलिये यहाँ की सुविधायें भी विश्वस्तरीय हैं। इस रेल्वे में साधारण रेल कर्मचारियों को पास की सुविधा हासिल नहीं होती है। यह कोंकण रेल्वे की निर्माण शर्तों में शामिल है कि जब तक कोंकण रेल के निर्माण पर हुआ खर्च नहीं निकल जाता, तब तक सिर्फ़ कुछ उच्च अधिकारियों को ही पास की सुविधा मिलेगी, बाकी रेलकर्मियों की मुफ़्तखोरी नहीं चलेगी। हाल ही में इस रेल्वे रूट के एक स्टेशन “चिपळूण” को वहाँ स्थापित सुविधाओं के लिये ISO 2006 के प्रमाणपत्र से नवाजा गया है।



कोंकण रेल्वे की बात चली है तो जाहिर है कि मधु दण्डवते की बात जरूर होगी। हाल ही में मराठी-गैरमराठी विवाद के दौरान किसी “सज्जन”(?) ने मधु दण्डवते और लालू की तुलना करने की बेवकूफ़ी की थी, उस पर एक सच्ची घटना याद आ गई। कई लोगों को याद होगा कि पहले की ट्रेनों में दरवाजों पर एक तरफ़ Entry (प्रवेश) और दूसरे दरवाजे पर “Exit” (निर्गम) लिखा होता था। एक बार मधु दण्डवते किसी स्टेशन का निरीक्षण करने गये थे, रेल अधिकारी और कार्यकर्ता ट्रेन रुकते ही हार-फ़ूल लेकर अगले दरवाजे की ओर दौड़े, क्योंकि दण्डवते की सीट का नम्बर शायद 4 या 5 था, जाहिर है कि हर कोई सोच रहा था कि वे निकट के दरवाजे से उतरेंगे, जबकि हुआ यह कि दण्डवते साहब अकेले दूसरे दरवाजे Exit पर खड़े थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि चूँकि इधर की ओर Exit लिखा है इसलिये मैं इधर से ही उतरूँगा। ऐसे उसूलों, नियमों और आदर्शों के पक्के थे मधु दण्डवते साहब। ये और बात है कि आजकल लोगों के साले साहब तो अपनी सुविधा के लिये राजधानी एक्सप्रेस का प्लेटफ़ॉर्म तक बदलवा लेते हैं…और भ्रष्टाचार की बात तो छोड़ ही दीजिये। दण्डवते साहब चाहते तो एक ट्रेन अपने “घर” के लिये भी चला सकते थे… जैसी कि गनी खान साहब ने मालदा के लिये या लालू ने अपने ससुराल के लिये चलवाई है। मधु दण्डवते और लालू के बीच तुलना बेकार की बात थी और रहेगी। फ़िलहाल तो भारतीय इंजीनियरों की जय बोलिये…

, , , , , , , , , , , , , ,

3 comments:

भुवनेश शर्मा said...

आश्‍चर्यों से भरपूर है कोंकण रेलवे.

कभी मौका मिला तो हम भी सैर करेंगे.

ये चिपलूण स्‍टेशन जो है क्‍या इससे आपका कोई संबंध है ?

अरुण said...

भुवनेश की अपने चिपलूण कर जी यही के रहने वाले है,:) आप अपनी यात्रा यहा ब्रेक कर चिपलुण कर जी की मेह मान नवाजी और चिपलूण की ख्बसूरती का आनंद उठा सकते है,शायद इस साल मै भी कोकंण रेलवे का आनंद उठा पाऊगा,कई सालो से इच्छा तो बहुत है

Suresh Chiplunkar said...

@ भुवनेश जी -
भाई भुवनेश, किसी जमाने में चिपलूण में हमारे पुरखे रहा करते थे, इसलिये हमारा उपनाम "चिपळूणकर" पड़ा, अब तो वहाँ हमारा कोई रिश्तेदार नहीं रहता। मराठियों में कई लोगों के उपनाम उनके पैतृक गाँव के आधार पर होते हैं, इसमें "कर" का मतलब होता है "वहाँ के निवासी", जैसे मुम्बईकर, इन्दूरकर, ग्वाल्हेरकर, जलगाँवकर आदि। ये और बात है कि उनके दूर के रिश्तेदार भी वहाँ नहीं रहते होंगे… एक बात और वह शब्द "ळ" है "ल" नहीं, लेकिन हिन्दी पट्टी में आने के बाद "ळ" धीरे-धीरे "ल" बन गया, क्योंकि हिन्दी की वर्णमाला में "ळ" शब्द नहीं है।