Saturday, April 19, 2008

कोंकण रेल्वे का विश्वस्तरीय रेल टक्कररोधी उपकरण

Konkan Railway ACD Network Rajaram
कोंकण रेल्वे अर्थात इंजीनियरिंग की दुनिया का एक आश्चर्य, एक बेहतरीन कारीगरी का नमूना है। मधु दण्डवते के अथक प्रयासों के कारण ही यह रेल्वे ट्रेक मूर्तरूप (Executed) ले सका है। ब्रिटेन की एक सर्वे एजेंसी ने इस रूट पर रेल्वे का निर्माण “असम्भव” है यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था, लेकिन मधु दण्डवते की जिद ने और दिल्ली मेट्रो के वर्तमान अध्यक्ष और देश के महान इंजीनियर ई. श्रीधरन के तकनीकी प्रयासों की वजह से यह ट्रेन रूट देश की सेवा में आया और अब तक इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष (ट्रकों के डीजल बचत, मुम्बई-मंगलोर के बीच की दूरी कम होने आदि) रूप से देश को अरबों का फ़ायदा हुआ है। ब्रिटेन की सर्वे टीम के मना करने के बावजूद श्रीधरन और होनहार भारतीय इंजीनियरों ने हार नहीं मानी और यह कारनामा (Miracle) कर दिखाया। “कारनामा” मैं इसलिये कह रहा हूँ, क्योंकि इस पहाड़ी इलाके (जहाँ हमेशा चट्टाने खिसकने का डर बना रहता है) में कुल 760 किमी के रूट में 150 से अधिक पुल तथा 93 सुरंगों का निर्माण किया गया है। जिसमें से एक सुरंग लगभग 6 किमी लम्बी है तथा एक पुल की जमीन तल से ऊँचाई कुतुबमीनार के बराबर है। है ना इंजीनियरिंग का कमाल और यह कर दिखाया है भारतीय इंजीनियरों ने ही, और अब यह टक्कररोधी ACD तकनीक जिसे शीघ्र ही अंतर्राष्ट्रीय ऑर्डर मिलने वाले हैं। (चित्र में भारत के पश्चिमी घाट में स्थित कोंकण रेल्वे का रुट दिखाया गया है)



एण्टी-कोलीजन डिवाइस (ACD) नेटवर्क-
यह उपकरण ट्रेनों की आमने-सामने होने वाली टक्कर से बचाव का एक साधन है। इस उपकरण को कोंकण रेल्वे कार्पोरेशन लिमिटेड ने “रक्षा कवच” नाम से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पेटेण्ट करवा लिया है। इस क्रांतिकारी उपकरण के जनक हैं एक अत्यंत प्रतिभाशाली इंजीनियर श्री बी. राजाराम। इन्होंने अब तक भारत सरकार को 17 अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट (Patent) दिलवाये हैं, जिसके द्वारा सरकार को आने वाले दस वर्षों में लगभग 30,000 करोड़ रुपये की आमदनी होने की सम्भावना है। (इसके वीडियो को यहाँ पर देखा जा सकता है और यहाँ भी)
(चित्र में राजाराम जी दिखाई दे रहे हैं,नेशनल ज्योग्राफ़िक चैनल के एक फ़ोटो में)

कोंकण रेल्वे, जैसा कि सभी जानते हैं, रेल मंत्रालय के अधीन एक पब्लिक सेक्टर अर्धशासकीय कम्पनी की तरह कार्य करती है। ACD नाम का यह उपकरण जीपीएस सेटेलाइट सिस्टम की मदद से काम करता है। इस तकनीक से दो ट्रेनों की स्थिति पर लगातार उपग्रह से ऑटोमेटिक नजर रखी जाती है। दोनो उपकरण (मतलब दो ट्रेनों के इंजनों में लगे हुए दो विभिन्न उपकरण) आपस में एक “मोडम” से अपना-अपना “सूचनायें साझा” (Data Share) करते चलते हैं। इससे किसी भी क्षण यदि आमने-सामने की टक्कर की स्थिति बन रही हो तो अपने-आप ट्रेन में ब्रेक लग जाते हैं। इन उपकरणों को दो-दो के सेट में हरेक ट्रेन में लगाया जाता है (एक इंजन में और एक गार्ड के डिब्बे में – ताकि पीछे की टक्कर से भी बचाव हो)। ये उपकरण कूट-भाषा में एक दूसरे के सतत सम्पर्क में रहते हैं और ट्रेनों के एक ही ट्रेक पर आने पर एक निश्चित दूरी से स्वतः ब्रेक लगाना शुरु कर देते हैं। यह उपकरण उस दशा में भी काम करता है यदि कोई ट्रेन पहाड़ी इलाके में चट्टानें खिसकने आदि से बीच में ही फ़ँस गई हो, या पटरी से उतरकर कुछ डिब्बे दूसरी पटरी पर गिरे पड़े हों, तब यह उपकरण दूसरी तरफ़ से (दूसरे ट्रेक से) आने वाली ट्रेनों की स्पीड भी घटाकर 15 किमी प्रतिघंटा कर देता है, जिससे कि अन्य दुर्घटना से बचा जा सके। इस उपकरण के काम करने की सीमा (Range) तीन किलोमीटर की होती है, और इतने समय में कितनी भी तेज गति की ट्रेन को आसानी से रोका जा सकता है। इस सम्पूर्ण प्रोजेक्ट को कोंकण रेल्वे में तो काफ़ी पहले से लागू कर ही दिया गया है, उत्तर-पूर्व रेल्वे के 1736 किमी के खण्ड में भी इसका सफ़लतापूर्वक परीक्षण किया जा चुका है। हाल ही में रेल मंत्रालय ने घोषणा की है कि सन 2013 तक समूचे भारतीय रेलवे में हर ट्रेन में इसका उपयोग प्रारम्भ कर दिया जायेगा, जिससे निश्चित रूप से दुर्घटनाओं में कमी आयेगी।

अगले भाग में हम जानेंगे कोंकण रेल्वे की एक और खास सुविधा के बारे में तथा मधु दण्डवते का एक सच्चा किस्सा… (भाग-2 में जारी)

, , , , , , , , , , , , , ,

7 comments:

दीपक भारतदीप said...

यह आपने संग्रहनीय जानकारी प्रस्तुत की है,

दीपक भारतदीप

surabesura said...

सुरेशजी , कोंकण रेल की एक और अत्यन्त आकर्षक एवं अनुकरणीय बात -
हर स्टेशन पर पीने के पानी के नल के साथ हिन्दी , मराठी और अंग्रेजी में यह सूचना लगी है-"कोंकण रेलवे का पानी विश्वस्तरीय जाँच से गुजरा है,आपको पीने का पानी खरीदने की जरूरत नहीं है ।"
यादि पूरे देश में स्टेशनों पर इसका अनुकरण हो जाए तो १२०० करोड़ रुपए का बोतलबन्द पानी उद्योग औकात पर आ जाएगा ।
- अफ़लातून.

भुवनेश शर्मा said...

ई. श्रीधरन और बी. राजाराम जैसे महान इंजीनियरों को देखकर बेहद गर्व का अनुभव होता है.
वरना तो रेलवे की हालत देखकर उस पर रोने का मन करता है.
अफलातूनजी ने बहुत काम की बात बताई इसके लिए उन्‍हें शुक्रिया.

mahashakti said...

बेहद जानकारी भरा लेख, हम अपने भारत के बारे में बहुत कुछ नही जानते है। जिसे हम अपना भारत कहते हे। आपका यह जानकारी भरा लेख बहुत अच्‍छा लगा।

Gyandutt Pandey said...

यह जानकारी ब्लॉगजाहिर करने के लिये धन्यवाद।

अरुण said...

काश हम और क्षेत्रो मे भी भारतीय ज्ञान का इस्तेमाल कर सकते ,हम किसी क्षेत्र मे कम नही पर हमारे राजनीतीज्ञो को फ़ुरसत कहा अपनी घटिया सोच से उबर कर देश के बारे मे सोचने का,ऐसा ही एक प्रोजेक्ट है कश्मीर मे रेल का

उन्मुक्त said...

पढ़ कर अच्छा लगा।