Saturday, April 5, 2008

एक-दूसरे की पीठ खुजाकर धीरे-धीरे आगे बढ़ता हिन्दी ब्लॉग जगत…

Hindi Blogging, Blog History Hindi Typing
हिन्दी ब्लॉग जगत हालांकि अभी शैशव अवस्था में ही कहा जा सकता है (भले ही चिठ्ठों की संख्या तीन हजार से ऊपर हो गई हो)। वैसे तो अंग्रेजी ब्लॉग जगत से इसकी तुलना ही गैर-बराबरी वाली और गलत है, लेकिन फ़िर भी यदि किया जाये तो साफ़ तौर पर हमें हिन्दी में उत्कृष्ट “कण्टेण्ट” की कमी खलती है। “कंटेंट” शब्द को यदि और विस्तार दिया जाये तो हिन्दी ब्लॉग जगत फ़िलहाल तात्कालिक विषयों, कथा, कविता, फ़िल्मी बातें, राजनीति तक ही सीमित है। “सीमित” इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि अधिकतर हिन्दी ब्लॉग तत्कालीन विषयों, घटनाक्रमों और न्यूज चैनलों (इंडिया टीवी और आज तक को न्यूज चैनल कहना एक शर्म की बात है) द्वारा परोसे गये विवादों पर आधारित होते हैं। विषय आधारित ब्लॉग या कथा-कविता आधारित ब्लॉग काफ़ी कम हैं अभी।

यह देखा गया है कि अधिक संख्या में हिन्दी में ब्लॉग उन लेखकों के पढ़े जाते हैं, जो खुद दूसरों के ब्लॉग पर जाकर अधिक से अधिक टिप्पणियाँ करते हैं, यह मामला लगभग “तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी खुजाता हूँ…” जैसा ही होता है। दो-चार टिप्पणियों के बाद सामने वाला भी संकोचवश ही सही आपके ब्लॉग की ओर रुख करता है, और उसे पढ़कर टिप्पणी ठेल देता है। ध्यान रखें कि वह पाठक या टिप्पणी करने वाला सिर्फ़ सौजन्यतावश आया हुआ होता है, आपके लिखे “कंटेण्ट” की वजह से नहीं। ब्लॉग जगत के बाहर से आये हुए पाठक, या कहीं से नेट पर घूमते-फ़िरते आये हुए पाठक, या गूगल सर्च से आपके ब्लॉग-द्वारे आये हुए पाठक काफ़ी-काफ़ी कम होते हैं। ले-देकर जो सौ-डेढ़ सौ हिट्स एक लेख को मिलती हैं वह अधिकतर इन तीन हजार लेखकों में से ही होती हैं। फ़िर अगली समस्या यह है कि हिन्दी में ब्लॉग शुरु करने वाले ज्यादातर लेखक (मैं भी) शुरु से ही खुद को कालिदास या रहीम ना सही लेकिन प्रेमचन्द या निराला के स्तर का समझने लगते हैं। अक्सर दूसरों का लेखन “कचरा” और खुद का लिखा हुआ “नोबेल” के लायक लगता है।



पाठकों की कमी (बल्कि “सूखा”) से जूझ रहे हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ “हिटलर” ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने ब्लॉग पर “एग्रीगेशन” नाम की “तारों की बाड़” अलग लगा रखी है, न जाने कैसे-कैसे अक्षर टाइप करने के बाद ही आप उस के चिठ्ठे पर टिप्पणी कर पाते हैं, उस पर भी तुर्रा यह कि “मुझे टिप्पणी पसन्द आयेगी तो रखूँगा, नहीं तो हटा दूँगा…”, भला ऐसे में कौन आपका चिठ्ठा पढ़ेगा? जहाँ तक “बेनामी” टिप्पणी का सवाल है, उसका तो मैं भी विरोधी हूँ और उसे मैंने अपने चिठ्ठे पर अनुमति नहीं दी है, और यह अनुमति भी तभी रोकी गई, जब मेरे चिठ्ठे पर और ई-मेल पर गालीगलौज की इन्तेहा हो गई। हाँ… लेकिन अपना नाम घोषित करके जो चाहे मेरे चिठ्ठे पर गाली दे सकता है (जैसी भी टिप्पणी होगी उसे प्रकाशित किया जायेगा), और मैं उसका उसी भाषा में जवाब देने में भी सक्षम हूँ (भोपाल में कुछ वर्ष बिताने का कुछ तो असर होना चाहिये ना…)। कुछ लोगों ने अपने चिठ्ठे पर “Google Write Box” लगा रखा है, जिससे पाठकों को हिन्दी टाइप करने में आसानी हो, लेकिन कभी-कभी यह बहुत दुःखदायी साबित होता है, क्योंकि शायद इसमें कुछ ऐसी तकनीक है कि जब भी वह ब्लॉग खोला जाता है, सीधे “राइट बॉक्स” में ले जाकर छोड़ता है, अब आप वहाँ से हटकर ऊपर शीर्षक की ओर यात्रा कीजिये…

हिन्दी ब्लॉग के वर्तमान परिदृश्य का एक और दुखदायी पहलू हैं स्वनामधन्य - स्वयंभू “पत्रकार”। काफ़ी सारे पत्रकार ब्लॉग जगत में कूदे हुए हैं, क्योंकि वे जहाँ की नौकरी करते हैं, वहाँ उन्हें घुटन भरे माहौल में सम्पादक की चाकरी करना पड़ती है, वे अपने मन की नहीं लिख पाते या कर पाते। ऐसे पत्रकारों से बहुत उम्मीद थी कि शायद ये लोग अपने संसाधनों की मदद से भ्रष्टाचार, अनैतिकता, लूट-खसोट के खिलाफ़ कुछ नया और विस्फ़ोटक करेंगे, लेकिन अभी तक तो इन लोगों ने हिन्दी ब्लॉग जगत में निराश ही किया है। यहाँ भी पत्रकारों ने अपने-अपने गुट बना लिये हैं। वैसे भी ये कौम अपने-आपको जमीन से दो इंच ऊपर ही समझती है, इनका यही रवैया ब्लॉग में भी दिखाई देता है। अपने आपको वरिष्ठ(?) और फ़ेमस(?) मानने वाले ये लोग अव्वल तो किसी ऐरे-गैरे के ब्लॉग पर जायेंगे नहीं, जायेंगे तो टिप्पणी नहीं करेंगे, टिप्पणी करेंगे तो ऐसा दर्शायेंगे कि इनसे ज्ञानी तो इस कुल-जहान में पैदा ही नहीं हुआ है। ये पत्रकार बिरादरी धर्म-जाति-मजहब-स्त्री-दलित के नाम पर रोज-ब-रोज नये-नये विवाद खड़े करती है, फ़िर अपने ही लोगों से टिप्पणियाँ करवाते है, उस पर झगड़े-टंटे करवाते हैं, ताकि उनका ब्लॉग प्रसिद्ध(?) हो सके। मजे की बात तो यह कि जब भी प्रिंट मीडिया में किसी ब्लॉग की समीक्षा प्रकाशित होती है (या करवाई जाती है !!) तो उसमें भी पत्रकारों को ही मुख्य स्थान मिलता है, जाहिर है कि लिखने वाला भी उन्हीं की बिरादरी का। किसी आम ब्लॉग को चाहे वह कितना भी अच्छा लिखे, “इन लोगों द्वारा” तारीफ़ किया जाना मुश्किल ही है। खैर… फ़िर भी लिखने वाले बढ़ते जा रहे हैं, अपने मन की लिख रहे हैं, मन का पढ़ रहे हैं।

हिन्दी में ब्लॉग लिखने, उसे पढ़ने वाले और उसके “इम्पैक्ट” (असर) का असली मकसद अभी बहुत दूर की कौड़ी कही जा सकती है। जाहिर है कि हिन्दी ब्लॉग जगत के सामने अभी बहुतेरी चुनौतियाँ हैं, जिनमें सबसे पहली और मुख्य कही जा सकती है, कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइप तकनीकी जानने वालों की बेहद कमी, हिन्दी टायपिंग के प्रति जागरूकता का अभाव और यदि जानकारी मिल भी जाये तो फ़िर हिन्दी टाइप करने में आलस। जब तक ये समस्यायें आरम्भिक तौर पर दूर नहीं होंगी, हिन्दी ब्लॉग़ जगत तेजी से आगे नहीं बढ़ेगा। फ़िर हिन्दी में “सर्च” इंजनों की कमी, चिठ्ठों में हिन्दी शब्दों के “टैग्स” लगाने पर “सर्च रैंक” सुधरने की बाधायें जैसी कई तकनीकी तकलीफ़ें हैं जिस कारण विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक हिन्दी के ब्लॉग की पहचान स्थापित नहीं हो पा रही है।

एक और बाधा “मानसिक गुलामी” की भी है, अभी हिन्दी ब्लॉग इतने सशक्त नहीं हुए कि इलेक्ट्रानिक या प्रिंट मीडिया में उनकी चर्चा की जाये, या उनका कोई सामाजिक / राजनैतिक “असर” हो। आश्चर्यजनक रूप से प्रतिक्रियाओं के एकदम दो विपरीत छोर भी हैं, जैसे “क्या…? हिन्दी में ब्लॉग होता है?” से लेकर कई बार तो “ऊंह… हिन्दी में ब्लॉग?” जैसी प्रतिक्रियाएं भी सुनने को मिल जाती है। अंग्रेजी को लेकर भारत में जिस प्रकार की मानसिकता है, उसका भी प्रतिनिधित्व करने वाले हिन्दी ब्लॉग़ जगत में मिल जाते हैं। बहरहाल… निरन्तर संघर्षों, कई-कई निस्वार्थ हिन्दी सेवियों और तकनीकी लोगों की मदद से हिन्दी ब्लॉग जगत धीरे-धीरे ही सही, लेकिन निश्चित दिशा में आगे बढ़ रहा है, और इसका भविष्य उज्जवल है। धैर्य रखिये, बादल छँटेंगे, चमकीली धूप निकलेगी, काई हटेगी, साफ़ पानी मयस्सर होगा… बस जरूरत है लगातार ठोस, तार्किक, और चेतना युक्त लेखन की… सभी “हिन्दी” ब्लॉगरों को दिली शुभकामनायें।

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12 comments:

Udan Tashtari said...

दिल की बात काफी विस्तार से लिखी. आपको भी बहुत बहुत शुभकामनायें. कभी आईये न उस तरफ :)

दीपक भारतदीप said...

सुरेश जी

क्या जोरदार आलेख है.आपने आज जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है वह सराहनीय है और जो आशावाद अपनाया है उसके तो हम भी समर्थक हैं.
दीपक भारतदीप

mahendra mishra said...

Bahut badhiya

Sanjeet Tripathi said...

चलिए आप कह रहे हैं तो सौजन्यतावश ही टिपिया देता हूं कि बहुत सही लिखा है आपने!!:)

sanjay patel said...

दादा ये लेख तो किसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका या अख़बार में छपना चाहिये.क्योंकि बलॉग्स के बारे में जो कुछ छप रहा है उसमें आप जैसे लगनशील लेखक का शुमार नहीं किया जा रहा है.निश्चित रूप से हर क्षेत्र में होने वाली लॉबिंग अब अब ब्लॉगिंग में भी घुसपैठ कर रही है.अल्ला मालिक !

PD said...

आप मेरे चिट्ठे पर आयें या ना आयें पर मैं तो फ़िर भी टिपिया कर जा रहा हूं.. आपकी इस बात से सहमत हूं कि जो भी अखबारों में छपता है उसमें 1-2 अपवादों को छोड़कर शायद ही किसी गैर पत्रकारों के ब्लौग बारे में छपता है..

काकेश said...

चलिये आप कह रहे हैं तो टिपिया देता हूँ. ताकि कभी ...वैसे बहुत अच्छा और बेबाक रपट.

Gyandutt Pandey said...
This comment has been removed by the author.
अरुण said...

सुरेश भाई काफी दिनओ से ब्लोगिया रहा हू ,पहले मामला पुरुस्कारो का था,तो हमने पिछले दिनो पुरी लगन से उस क्षेत्र मे आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है ,अपने भी देखा होगा हमे कई पुरुस्कारो से नवाजा गया था,भाई नवाजा गयाकहना पडता है बाकी तो जुगाड थे बाकी लोग मानते नही है कि जुगाडे थे हम मानते है..:) लेकिन ये मिडिया वाला खर्चा जरा बडा है फिर भी कोशिश करेगे कि किसी एक आधे को पटा कर हम भी अखबारो मे आ सके,..:) वैसे आपने आज तगडी सुना दी है स्वांत सुखाय वालो को..:)

Gyandutt Pandey said...

वाह, यह मालूम न था कि आपने इतना अच्छा लिखा है। अन्यथा मुझे यह लिखने की बजाय आपके लेख का लिंक दे कर ही काम चल जाता।

अजित वडनेरकर said...

सुरेश भाई , आपकी तेज-चुटीली लेखनी लेखनी और साफगोई का कायल रहा हूं। बहुत सही कहा है। पूरी पारदर्शिता से आपने ब्लाग परिदृश्य को सामने रखा है और उसका ईमानदार विश्लेषण भी किया है। कई दिनों की उमड़-घुमड़ और मंथन के बाद ये लिखा गया है।

jayaka said...

हिन्दी ब्लॉगिंग को ले कर मन में पैदा हुई निराशा; आप का यह लेख पढ कर कुछ हद तक तो दूर हो ही गई है!...धन्यवाद!