Wednesday, April 9, 2008

केन्द्र सरकार को भूटिया ने जमाई “किक” और किरण बेदी ने जड़ा “तमाचा”…

China Tibet Human Rights India Coca Cola
ओलम्पिक मशाल भारत आने वाली है, ऐसी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की जा रही है, मानो हजारों आतंकवादी देश में घुस आये हों और नेताओं को बस मारने ही वाले हों। प्रणव मुखर्जी साहब दलाई लामा को सरेआम धमका रहे हैं कि “वे राजनीति नहीं करें” (हुर्रियत नेता चाहे जो बकवास करें, दलाई लामा कुछ नहीं बोल सकते, है ना मजेदार!! )। गरज कि चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री का माहौल बना हुआ है। इस माहौल में देश की पहली महिला आईपीएस अफ़सर किरण बेदी ने ओलम्पिक मशाल थामने से इंकार कर दिया है। उन्होंने कहा है कि “पिंजरे में बन्द कैदी की तरह मशाल लेकर दौड़ने का कोई मतलब नहीं है…”। असल में सरकार तिब्बती प्रदर्शनकारियों से इतना डर गई है कि उसने दौड़ मार्ग को जालियों से ढाँक दिया है, चप्पे-चप्पे पर पुलिस और सेना के जवान तैनात हैं। बेदी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इस “घुटन” भरे माहौल में वे ओलम्पिक मशाल लेकर नहीं दौड़ सकतीं। इसके पहले फ़ुटबॉल खिलाड़ी बाइचुंग भूटिया पहले “मर्द” रहे जिन्होंने खुलेआम चीन की आलोचना करते हुए तिब्बत के समर्थन में मशाल लेने से इनकार किया। हालांकि किरण बेदी का तर्क भूटिया से कुछ अलग है, लेकिन मकसद वही है कि “तिब्बत में मानवाधिकारों की रक्षा होनी चाहिये, चीन तिब्बत के नेताओं से बात करे और भारत सरकार चीन से न दबे।

जो बात एक आम आदमी की समझ में आ रही है वह सरकार को समझ नहीं आ रही। सारी दुनिया में चीन का विरोध शुरु हो गया है, हर जगह ओलम्पिक मशाल को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। बुश, पुतिन और फ़्रांस-जर्मनी आदि के नेता चीन के नेताओं को फ़ोन करके दलाई लामा से बात करने को कह रहे हैं। लेकिन हम क्या कर रहे हैं? कुछ नहीं सिवाय प्रदर्शनकारियों को धमकाने के। मानो चीन-तिब्बत मसले से हमें कुछ लेना-देना न हो। सदा-सर्वदा मानवाधिकार और गाँधीवाद की दुहाई देने और गीत गाने वाले लोग चीन सरकार के सुर में सुर मिला रहे हैं, बर्मा के फ़ौजी शासकों से चर्चायें कर रहे हैं (पाकिस्तान के फ़ौजी शासकों से बात करना तो मजबूरी है)। .चीन सरेआम अपना घटिया माल भारत में चेप रहा है, बाजार का सन्तुलन बिगाड़ रहा है, अरुणाचल में दिनदहाड़े हमें आँखें दिखा रहा है, हमारी सीमा पर अतिक्रमण कर रहा है, पाकिस्तान से उसका प्रेम जगजाहिर है, वह आधी रात को हमारे राजदूत को बुलाकर डाँट रहा है… लेकिन हमारे वामपंथी नेताओं की “बन्दर घुड़की” के आगे सरकार बेबस नजर आ रही है। चीन ने भारत सरकार को झुकने को कहा तो सरकार लेट ही गई। सबसे अफ़सोसनाक रवैया तथाकथित मानवाधिकारवादियों का रहा, जिन्हें “गाजा पट्टी” की ज्यादा चिंता है, पड़ोसी तिब्बत की नहीं (जाहिर है कि तिब्बती वोट नहीं डालते)


असल में सरकार ने चीन की आँख में उंगली करने का एक शानदार और सुनहरा मौका गँवा दिया। जब चीन हमें सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट दिलवाने में हमारी कोई मदद नहीं करने वाला, व्यापार सन्तुलन भी आने वाले वर्षों में उसके ही पक्ष में ही रहने वाला है, गाहे-बगाहे पाकिस्तान को हथियार और परमाणु सामग्री बेचता रहेगा, तो फ़िर हम क्यों और कब तक उसके लिये कालीन बिछाते रहें? लेकिन सरकार कुछ खास पूंजीपतियों (जिनके चीन के साथ व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं और जिन्हें आने वाले समय में चीन में कमाई के अवसर दिख रहे हैं) तथा वामपंथियों के आगे पूरी तरह नतमस्तक हो गई है।

बाजारवाद की आँधी में सरकार ने विदेश में अपनी ही खिल्ली उड़वा ली है। इस पूरे विवाद में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बहुत बड़ा रोल है। ओलम्पिक का मतलब है अरबों डॉलर की कमाई, कोकाकोला और रीबॉक जैसी कम्पनियों ने आमिर खान और सचिन तेंडुलकर पर व्यावसायिक दबाव बनाकर मशाल दौड़ के लिये उन्हें राजी कर लिया। यह खेल सिर्फ़ खेल नहीं हैं, बल्कि इन कम्पनियों के लिये भविष्य के बाजार की रणनीति का प्रचार भी होते हैं। सारे विश्व में इन कम्पनियों ने मोटी रकम दे-देकर नामचीन खिलाड़ियों को खरीदा है और “खेल भावना” के नाम पर उन्हें दौड़ाया है, अब आने वाले छः महीनों तक विज्ञापनों में ये लोग मशाल लिये कम्पनियों का माल बेचते नजर आयेंगे। लेकिन भूटिया और किरण बेदी की अंतरात्मा को वे नहीं खरीद सकीं। इन लोगों ने अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर विरोध का दामन थाम लिया है।

हम क्षेत्रीय महाशक्ति होने का दम भरते हैं, किस बिना पर? क्षेत्रीय महाशक्ति ऐसी पिलपिलाये हुए मेमने की तरह नहीं बोला करतीं, और एक बात तो तय है कि यदि भारत सरकार गाँधीवाद और मानवाधिकार की बातें करती है तो भी, और यदि महाशक्ति बनने का ढोंग करती हो तब भी…दोनों परिस्थितियों में उसे तिब्बत के लिये बोलना जरूरी है, लेकिन वह ऐसा नहीं कर रही। पिछले लगभग बीस वर्षों के आर्थिक उदारीकरण के बाद भी हम मतिभ्रम में फ़ँसे हुए हैं कि हमें क्या होना चाहिये, पूर्ण बाजारवादी, गाँधीवादी या सैनिक/आर्थिक महाशक्ति, और इस चक्कर में हम कुछ भी नहीं बन पाये हैं…

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5 comments:

गुस्ताखी माफ said...

आवाज उठाना जारी रखिये.

mahashakti said...

इस सरकार से कोई अच्छी बात की अपेक्षा रखना मूर्खता होगा, जब फांस कानाडा आदि चीन को नही सरसेट रहे है तो भारत चीन की गुलामी बजा रहा है।

भारत यह ध्‍यान रखे कि कब चीन कश्‍मीर पर भारत का पक्ष रखा है तो आज तिब्‍बत पर चीन का सर्मथन हो रहा है।

बेद और भूटिया बधाई के पात्र है, और भी लोगों को इसा बहिस्‍कार करना चा‍हिऐं।

अरुण said...

माफ़ कीजीये गा हम आपसे इत्तीफ़ाक नही रखते,लगता है आपको पता नही सरकार चलाना जरूरी है .देश तो अपने आप चलता है ,क्या आप चाहते है कि लेफ़्ट हाथ मे आये चीन सहायता अभियान को सरकार को रोकने देगा,ये बेचारे तो हमेशा से देश से ज्यादा चीन के पक्ष मे रहे है,अब आप आज इनको जानते हुये भी देश द्रोही नही कह सकते,अपनी अपनी सोच है जी जैसे एक पत्रकार को जोश चडा है वो दूध से लेकर दवाईया स्ब्जी से लेकर मिठाईयो तक मे जात ढूढता रहता है उसके दोस्त गांजा गांजा चिल्लाते रहते है,कभी आतंकवादियो के मानवाधिकार के लिये लडते है,उन्हे भी तिब्बत से कोई सरोकार नही है अगर तिब्बत मुस्लिम क्म्यूनिटी होता तो शायद थोडा सा शोर जरूर मचाते लेकिन चीन के विरुध नही बोल सकये भाई यही तो नेहरू विश्वविद्यालय मे उन्हे घुट्टि पिलाई गई है..:)

भुवनेश शर्मा said...

शर्म आती है मनमोहन जैसे मूर्ख प्रधानमंत्री को पाकर.
क्‍या अंतर है इनमें और एक श्‍वान में.
इस करात और बर्धन को तो सरेआम इंडिया गेट पर फांसी देनी चाहिए....

mayank said...

अक्सर लोग कटाक्ष करते हैं "पढ़ा-लिखा मूर्ख". आमतौर पर "पढ़ा-लिखा" का मतलब "स्नातक" (graduate) होता. मनमोहन सिंह जी की education के हिसाब से (जो डिग्रियाँ उनके पास हैं) उपरोक्त कटाक्ष उपयुक्त नहीं है. किसी भाई-बन्धु के पास अगर कोई सुंदर कटाक्ष उपलब्ध हो तो कृपया उसका नि:संकोच "सदुपयोग" करें ताकि मनमोहन सिंह जी की personality में चार चाँद लग जाएं.