Friday, April 25, 2008

एके-47 की खूबियाँ और कलाश्निकोव के विचार

(भाग-1 से जारी…)
All about AK-47, Kalashnikov
एके-47 चलाने में आसान, निर्माण में सस्ती और रखरखाव में बेहद सुविधाजनक होती है। वजन में बेहद हल्की (भरी हुई होने पर मात्र साढ़े चार किलो), लम्बाई सिर्फ़ 36 इंच (तीन फ़ुट), एक बार में 600 राउंड गोलियाँ दागने में सक्षम, और क्या चाहिये!! दुनिया के किसी भी मौसम में, कैसे भी प्रदेश में इसको चलाने में कोई तकलीफ़ नहीं होती। शुरु में कलाश्निकोव ने इसे उन रूसी सैनिकों के लिये बनाया था, जिन्हें आर्कटिक (Arctic) के बर्फ़ीले प्रदेशों में मोटे-मोटे दस्ताने पहने हुए ही गन चलानी पड़ती थी, और तेज बर्फ़बारी के बावजूद इसे “मेंटेनेन्स” करना पड़ता था। यदि अच्छे इस्पात से बनाई जाये तो लगभग बीस से पच्चीस साल तक इसमें कोई खराबी नहीं आती। सही ढंग से “एडजस्ट” किये जाने के बाद यह लगभग 250 मीटर तक का अचूक निशाना साध सकती है, अर्थात बिना किसी तकनीकी जानकारी या एडजस्टमेंट के भी आँख मूँदकर पास के अचूक निशाने लगाये जा सकते हैं। इसका गोलियों का चेम्बर, बोर और गैस सिलेंडर क्रोमियम का बना होता है, इसलिये जंग लगने का खतरा नहीं, मेंटेनेन्स का झंझट ही नहीं और लाइफ़ भी जोरदार। इसे मात्र एक बटन के जरिये ऑटोमेटिक या सेमी-ऑटोमेटिक में बदला जा सकता है। सेमी-ऑटोमेटिक का मतलब होता है कि चलाने वाले को गोलियां चलाने के लिये बार-बार ट्रिगर दबाना होता है, जबकि इसे ऑटोमेटिक कर देने पर सिर्फ़ एक बार ट्रिगर दबाने से अपने-आप गोलियां तब तक चलती जाती हैं, जब तक कि मैगजीन खाली न हो जाये। ऐसा इसकी गैस चेम्बर (Gas Chamber) और शानदार स्प्रिंग तकनीक के कारण सम्भव होता है। इस गन में सिर्फ़ आठ पुर्जे ऐसे हैं जो “मूविंग” हैं, इसलिये कोई बिना पढ़ा-लिखा सिपाही भी एक बार सिखाने के बाद ही इसे मात्र एक मिनट में पूरी खोल कर फ़िर फ़िट कर सकता है। यही है रूसी रिसर्च और तकनीक का कमाल और अब जिसकी सभी नकल कर रहे हैं।



“द गार्जियन” को दिये एक इंटरव्यू में मिखाइल कलाश्निकोव कहते हैं कि “मुझे अपने बनाये हुए सभी हथियारों से बेहद प्रेम है, और मुझे गर्व है कि मैंने मातृभूमि की सेवा की। इसमें मुझे किसी तरह का अपराध बोध नहीं है कि मेरी बनाई हुई गन से करोड़ों लोग मारे जा चुके हैं। एके-47 मेरे लिये सबसे प्यारे बच्चे की तरह है, मैंने उसका निर्माण किया है, उसे पाला-पोसा और बड़ा किया। एक देशभक्त और तकनीकी व्यक्ति होने के नाते यह मेरा फ़र्ज था। मैंने इस रायफ़ल से लाखों गोलियां दागी हैं और उसी के कारण आज मैं लगभग बहरा हो गया हूँ, लेकिन मुझे कोई शिकायत नहीं है। मैंने इसे इतना आसान बनाया कि फ़ैक्ट्री में औरतें और बच्चे भी इसका निर्माण आसानी से कर लेते हैं”। वे कहते हैं कि “मुझे किसी तरह शर्मिन्दा होने की क्या आवश्यकता है? मैंने इसका निर्माण अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये किया था, अब यह पूरे विश्व में फ़ैल चुकी है तो इसमें मेरा क्या दोष है? यह तो बोतल से निकले एक जिन्न की तरह है, जिस पर अब मेरा कोई नियन्त्रण नहीं है। एक तथ्य आप लोग भूल जाते हैं कि लोग एके-47 या उसके डिजाइनर की वजह से नहीं मरते, वे मरते हैं राजनीति की वजह से…”।

कलाश्निकोव अपने बचपन की यादों में खोते हुए बताते हैं कि “उन दिनों हमारे यहाँ अनाज तो हुआ करता था, लेकिन चक्कियाँ नहीं थीं, मैने आटा बनाने के लिये विशेष डिजाइन की चक्कियों का निर्माण किया। रेल्वे की नौकरी के दौरान मैं एक इंजन बनाना चाहता था, जो कभी खराब ही न हो, लेकिन तकदीर ने मुझसे एके-47 का निर्माण करवाया, और उसमें भी मैंने अपना सर्वोत्कृष्ट दिया। है न मजेदार!!! रह-रहकर मन में एक सवाल उठता है कि भारत में इस तरह के आविष्कारकों को सरकार की तरफ़ से कितने सम्मान मिले हैं? हमारे यहाँ भी गाँव-गाँव में कलाश्निकोव जैसी प्रतिभायें बिखरी पड़ी हैं, जो पानी में चलने वाली सायकल, मिट्टी और राख से बनी मजबूत ईंटें, हीरो-होंडा के इंजन से सिंचाई के लिये लम्बी चलने वाली मोटर, पानी साफ़ करने वाला तीन परतों वाला मटका, जैसे सफ़ल स्थानीय और देशी प्रयोग करते हैं, उन्हें क्यों नहीं बढ़ावा दिया जाता? लालफ़ीताशाही और मानसिक गुलामी में हम इतने डूब चुके हैं कि हमें हमारे आसपास के हीरे तक नजर नहीं आते… सचमुच विडम्बना है।

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4 comments:

मिहिरभोज said...

बीच मै आपने ब्लोग लेखन बंद करने की बात की तो मुझे बङा दुख हुआ लिखते रहैं बहुत अच्छा लागा

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी हमारे यहां बहुत हीरे हे, लेकिन आप की बात सही हे*लालफ़ीताशाही और मानसिक गुलामी में हम इतने डूब चुके हैं कि हमें हमारे आसपास के हीरे तक नजर नहीं आते… सचमुच विडम्बना है।

sanjay patel said...

सुरेश भाई अपने देश में देश भक्त कम नहीं हैं लेकिन एक विचित्र तरह की प्रतिबध्दता दीगर देशों में नज़र आती है जो हमारे यहाँ गुम सी रहती है. भ्रष्टाचार का विकराल राक्षस कुछ यूँ चमत्कार दिखाता है कि हमारे सारे दमकते हीरे फ़ुस्स नज़र आने लगते हैं ...अब आप ही बताइये बोफ़ोर्स को कितने बरस बीत गए लेकिन देश आजतक हक़ीकत जान नहीं पाया...निश्चित रूप से हमारी यानी हम भारत अवाम की एकमात्र आस सेना ही है लेकिन दिन ब दिन उसके प्रति भी आम आदमी की आस्था टूटती जा रही है जो ठीक नहीं है...पर हम बतियाने के अलावा कर ही क्या सकते हैं.राज भाटियाजी ने ठीक फ़रमाया की लाल-फ़ीताशाही और मानसिक ग़ुलामी के चलते हम भारत को भारत महान नहीं बना पा रहे हैं ...और आखिरी बात...नई पीढ़ी के लिये देश पर जान लुटाने वाले आदर्श भी नहीं बचे हैं

संजय बेंगाणी said...

अच्छा लेख