Wednesday, April 23, 2008

आप एके-47 के बारे में कितना जानते हैं?

AK-47, Mikhael Kalashnikov, Russia
परमाणु बम के बाद सबसे घातक हथियार कौन सा है? इसका सीधा सा जवाब होना चाहिये, एके-47। गत सत्तर वर्षों में इस रायफ़ल से लाखों लोगों की जान गई है। हरेक व्यक्ति की हथियार के रूप में सबसे पहली पसन्द होती है एके-47। आखिर ऐसा क्या खास है इसमें? क्यों यह इतनी लोकप्रिय है, और इसके जनक मिखाइल कलाश्निकोव (Kalashnikov) के बारे में आप कितना जानते हैं? आइये देखें -

कलाश्निकोव की ऑटोमेटिक मशीनगन की सफ़लता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगभग 100 से भी अधिक देशों की सेनायें इस रायफ़ल (Rifle) का उपयोग कर रही हैं। कई देशों के “प्रतीक चिन्हों” में एके-47 का चित्र शामिल किया गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार 1990 तक लगभग 7 करोड़ एके-47 रायफ़लें पूरे विश्व में उपलब्ध थीं, जिनकी संख्या आज की तारीख में बीस करोड़ से ऊपर है। सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि आज तक कलाश्निकोव ने इसका पेटेंट नहीं करवाया, इसके कारण इस गन में हरेक देश ने अपनी जरूरतों के मुताबिक विभिन्न बदलाव किये, पाकिस्तान के सीमान्त प्रांत (Frontier) में तो इसका निर्माण एक “कुटीर उद्योग” की तरह किया जाता है। हर सेना और हर आतंकवादी संगठन इसे पाने के लिये लालायित रह्ता है।



मिखाइल कलाश्निकोव का जन्म 10 नवम्बर 1919 को रूस (USSR) में अटलाई प्रांत के कुर्या गाँव में एक बड़े परिवार में हुआ था। सेकण्डरी स्कूल से नौंवी पास करने के बाद कलाश्निकोव ने पास के मताई डिपो में बतौर अप्रेन्टिस नौकरी की शुरुआत की, और धीरे-धीरे तुर्किस्तान-सर्बियन रेल्वे में “टेक्निकल क्लर्क” के पद पर पहुँच गये। 1938 में विश्व युद्ध की आशंका के चलते उन्हें “लाल-सेना” से बुलावा आ गया, और कीयेव के टैंक मेकेनिकल स्कूल में उन्होंने काम किया। इसी दौरान उनका तकनीकी कौशल उभरने लगा था, टैंक की इस यूनिट में नौकरी के दौरान ही टैंको द्वारा दागे गये गोलों की संख्या गिनने के लिये “काऊंटर” बना लिया और उसे टैंकों में फ़िट किया। सेना के उच्चाधिकारियों की निगाह तभी इस प्रतिभाशाली युवक पर पड़ गई थी। अक्टूबर 1941 में एक भीषण युद्ध के दौरान कलाश्निकोव बुरी तरह घायल हुए और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उस वक्त मशीनगन पर काम कर रहे उनके अधिकारी मिखाइल टिमोफ़ीविच ने उन्हें इस पर आगे काम करने को कहा। अस्पताल के बिस्तर पर बिताये छः महीनों में कलाश्निकोव ने अपने दिमाग में एक सब-मशीनगन का रफ़ डिजाइन तैयार कर लिया था। वह वापस अपने डिपो में लौटे और उन्होंने उसे अपने नेताओं और कामरेडों की मदद से मूर्तरूप दिया। जून 1942 में कलाश्निकोव की सब-मशीनगन वर्कशॉप में तैयार हो चुकी थी, इस डिजाइन को रक्षा अकादमी में भेजा गया। वहाँ सेना के अधिकारियों और प्रसिद्ध सेना वैज्ञानिक एए ब्लागोन्रारोव ने उनके प्रोजेक्ट में रुचि दिखाई। हालांकि इतनी आसानी से तकनीकी लोगों और वैज्ञानिकों ने कलाश्निकोव पर भरोसा नहीं किया और सन 1942 के अंत तक वे सेंट्रल रिसर्च ऑर्डिनेंस डिरेक्टोरेट में ही काम पर लगे रहे। 1944 में कलाश्निकोव ने एक “सेल्फ़ लोडिंग कार्बाइन” का डिजाइन तैयार किया, 1946 में इसके विभिन्न टेस्ट किये गये और अन्ततः 1949 में इसे सेना में शामिल कर लिया गया। इस आविष्कार के लिये कलाश्निकोव को प्रथम श्रेणी का स्टालिन पुरस्कार दिया गया। रूसी सरकार ने कलाश्निकोव का बहुत सम्मान किया है, उन्हें दो बार 1958 और 1976 में “हीरो ऑफ़ सोशलिस्ट लेबर”, 1949 में “स्टालिन पुरस्कार”, 1964 में “लेनिन पुरस्कार” आदि। 1969 में उन्हें सेना में “कर्नल” का रैंक दिया गया और 1971 में “डॉक्टर ऑफ़ इंजीनियरिंग” की मानद उपाधि भी दी गई। 1980 से उन्हें कुर्या गाँव का “प्रथम नागरिक” मान लिया गया और 1987 में इझ्वेस्क प्रान्त के मानद नागरिक का सम्मान उन्हें दिया गया। खुद रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने अपने हाथों से “मातृभूमि की विशेष सेवा के लिये” उन्हें रूसी ऑर्डर से सम्मानित किया और 75 वीं सालगिरह के मौके पर उन्हें मानद “मेजर जनरल” (Major General) की उपाधि भी दी गई।

अगले भाग में हम एके-47 की खूबियों और इसके बारे में खुद कलाश्निकोव के विचार जानेंगे (जारी भाग-2 में…)

, , , , , , , , , ,

2 comments:

अरुण said...

हमे तो जी अब लेजर गन से नीचे कुछ खरीदना ही नही है,हमने सुना है कि लेजर बीम ई मेल से भी चली जाती है आप उसके बरे मे बताओ जी अब तो :)

भुवनेश शर्मा said...

क्‍लाश्निकोव के कारण धरती पर कितने मरे इसे काउंट करने की भी उन्‍होंने कोई मशीन बनाई है क्‍या ?
अरुणजी वाली बंदूक तो हमें भी चाहिए.