Friday, March 7, 2008

अनचाहे टेलीफ़ोन “कॉल्स” से बचने के कुछ और नुस्खे…

Unwanted Telephone Calls Telemarketing

उज्जैन एक कस्बेनुमा बड़ा शहर है, बड़ा शहर है इसलिये इसे अपने पड़ोसी इन्दौर जैसा महानगर बनने की “फ़ुल्टू” चाह है, इन्दौर जो कि “मिनी मुम्बई” कहलाता है, फ़ुल्ल मुम्बई बनना चाहता है और मुम्बई को मनमोहन सिंह साहब शंघाई बनाने पर तुले हुए हैं… (अबे कहाँ से कहाँ पहुँच गया बहकते-बहकते… टेलीफ़ोन की बात कर रहा था न !!!)…

हाँ तो बात हो रही थी, अनचाहे फ़ोन कॉल्स की। कस्बे से नगर और फ़िर शहर बनने की प्रक्रिया में कुछ विकृतियाँ हमें झेलनी ही पड़ती हैं, जैसे कारों की बढ़ती जनसंख्या, तेजी से बाइक दौड़ाते रईसजादे, जींस और टॉप के बीच में एक इंच से अधिक का गैप दिये हुए लड़कियाँ आदि-आदि, इन्हीं में से एक बीमारी है प्रायवेट कम्पनियों द्वारा मौके-बेमौके किये जाने वाले कॉल्स। हर निजी बीमा, बैंक, फ़ायनेंस, शेयर दलाल कम्पनी को लगता है कि हर व्यक्ति उसका ग्राहक है, उठाया फ़ोन और घुमा दिया।

एक बार बजाज अलायंज वालों का बारहवीं बार फ़ोन आया। जाहिर है कि उधर से लड़की की मीठी आवाज सुनाई दी, “नमस्कार, हमारी कम्पनी ने आपको एक “लकी विनर” के तौर पर चुना है, क्या आप आज दोपहर में 4 बजे अपनी पत्नी के साथ हमारे दफ़्तर में आ सकते हैं?”
इसके पहले ग्यारह बार मैं उसे “नहीं, आज बिजी हूँ”, “आज बाहर जा रहा हूँ”, “आज बीमार हूँ…”, “साहब घर पर नहीं हैं…”, “पिताजी से पूछ कर बताऊँगा…”, आदि कहकर टाल चुका था, लेकिन फ़िर भी डायरेक्ट्री उठाकर पता नहीं क्यों वह मेरा ही नम्बर घुमाये जाती थी (या शायद यह मेरी मीठी गलतफ़हमी थी)। आखिर में मुझे शराफ़त छोड़कर “अपनी वाली” पर आना ही पड़ा…

मैंने उससे पूछा, “पहले तू (जी हाँ “तू” ही कहा) ये बता कि तुझे यह नम्बर कहाँ से मिला?”
“जी सर, यह तो हम ‘रैण्डमली सिलेक्ट’ करते हैं और लकी विनर को कम्पनी ऑफ़िस बुलाकर गिफ़्ट देते हैं…”
“क्यों ऑफ़िस बुलाकर क्यों? घर आकर गिफ़्ट दे दे…”
“सर, बात यह है कि हमारे मार्केटिंग मैनेजर आपको एक सेमिनार भी देंगे…”
“यानी मुफ़्त में कुछ नहीं मिलेगा ना? फ़िर क्यों बुला रहे हो?…”
“नहीं सर हमारी कम्पनी जीवन बीमा के साथ-साथ एक अनोखी निवेश योजना लाई है (अब वो भी अपनी वाली पर आ गई थी)… उसके बारे में आपको समझाना था…”
“तो घर आकर समझा दे ना (तुझे देख भी लूँगा)…”
“सर यहाँ ऑफ़िस में एक साथ सभी को समझा सकते हैं ना इसलिये… (यानी कि मेरे जैसे और कई वहाँ बुलाये जाने वाले थे (बीस बकरे बुलाये और उसमें से दो भी हलाल हो गये तो आज की तनख्वाह तो निकली, यह मंशा होगी शायद…)…”
अब तक मेरा धैर्य जवाब दे चुका था, मैंने कहा “फ़ोन रख…”
“जी”, वह बुरी तरह चौंकी (किसी मधुर आवाज में बात करने वाली बाला को यह लफ़्ज सुनने की आदत नहीं होती), “हाँ… मैने कहा फ़ोन रख, और यह नम्बर जो डायल किया है अच्छी तरह से नोट कर ले… यदि गलती से भी तेरे ऑफ़िस से किसी ने इस नम्बर पर तेरहवीं बार फ़ोन कर दिया, तो न वह फ़ोन रहेगा, न वह काँच रहेगा जिसके पीछे तू बैठी है…”
“बड़ी गलत बात करते हैं आप तो, आप धमकी दे रहे हैं हमें…”
“हाँ दे रहा हूँ…”
बस वह दिन है और आज का दिन है कोई फ़ोन नहीं आया कि बीमा करवा लो।

आईसीआईसीआई वालों ने भी क्रेडिट कार्ड दिलवाने के लिये फ़ोन किया था, “नमस्कार, मैं ICICI Bank से बोल रही हूँ, सुरेश जी हैं क्या?” (इतना सुनते ही कान तो खड़े हो ही गये थे…)
मैंने कहा, “जी नहीं, सुरेश जी तेल लेने गये हैं…”
ICICI वाली लड़की समझदार थी, पहली बार में ही माजरा समझ गई कि “तेल लेने गये हैं” का क्या मतलब होता है, और फ़िर कभी उसका फ़ोन नहीं आया।

रिलायंस मनी वाले डीमैट खाता खुलवाने के पीछे पड़े थे, “सर नमस्कार, क्या आपको मालूम है कि रिलायंस पावर का शेयर मार्केट में आने वाला है?”
“नहीं मुझे तो नहीं मालूम…”
“सर टीवी पर ऐड तो दिखा रहे हैं”
“मेरे यहाँ टीवी नहीं है…”
“सर रिलायंस मनी में आप शेयर खाता खुलवा सकते हैं बिलकुल मुफ़्त में…”
“शेयर खाता क्या होता है?”
“यह एक खाता होता है जिसे डीमैट कहते हैं, इससे आप शेयर खरीद और बेच सकते हैं”
“लेकिन मैं तो सट्टेबाजी नहीं करता…”
“नहीं-नहीं सर, शेयर बाजार कोई सट्टा नहीं है, यह तो बिजनेस है आपके फ़ायदे का…”
“लेकिन मैं तो नगर निगम में सफ़ाई-कर्मचारी हूँ… मुझे बिजनेस क्यों करना चाहिये?”
“अच्छा सर नमस्कार, मैं आपको बाद में फ़ोन करती हूँ…” (यदि मैं उसे बता देता कि मैं LIC एजेंट हूँ और चार साल से शेयर में ट्रेडिंग कर रहा हूँ, तो उस नाजनीन का दिल टूट जाता न !!! हो सकता है कि सदमे से वह आत्महत्या भी कर लेती…)

लेकिन जिस तरह से ये लोग मेहनत कर रहे हैं उससे लगता है कि उज्जैन की दस प्रतिशत समझदार जनता (यानी मेरे जैसी) को छोड़कर, बाकी सब या तो लोन ले लेंगे, या बीमा करवा लेंगे, या क्रेडिट कार्ड बनवा लेंगे, या डीमैट खाता खुलवा लेंगे। भाईयों और बहनों, मैं तो कभी “येड़ा” बनकर, कभी “शाणा” बनकर, कभी “भाई” बनकर तो कभी “झूठों का सरताज” बनकर फ़िलहाल तो गला कटवाने से बचा हुआ हूँ, लेकिन नये-नये फ़ोन, नई-नई आवाजों में आने अभी बन्द नहीं हुए हैं…

यदि किसी को ऐसी तकनीक मालूम हो कि घर बैठे ही फ़ोन पर सामने वाले के कान के नीचे एक जोरदार आवाज निकाली जा सके, तो मुझे बतायें…

, , , , , , , , , ,

11 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप लोगों को उन तक पहुँच कर मार्केटिंग करते हैं और वे गिफ्ट का लालच दे कर बुला कर। आप को तो अनुभव होगा कि लोग प्रत्यक्ष में कैसे आप से पीछा छुड़ाते हैं। आप की इस तरह की पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी। एक सफल एलआईसी एजेण्ट मेरे सानिध्य में सफल वकील हो चुका है। फिर भी आप की पोस्ट न आने पर आप से उज्जैन में ही मिल कर पूछना पड़ेगा।

अरुण said...

भैया हम तो बस यही बताते है कि हम बेरोजगार ग्रेजुएट है,नौकरी दिलवा दो क्रेडिट कार्ड बाद मे हम जरूर ले लेगे,और अब तक दो ने काल सेंटर मे इंटर्वियू के लिये बुलवा दिया है हम भी हो आये काफ़ी पी आये और इंटर्वियू लेकर (देकर नही) बता आये हमारे यहा ज्वाईन करलो यहा से अच्छी सेलरी देगे.. एक ने कर भी लिया, फ़ोटो हमने ब्लोग पर छाप दी थी ,आपने भी देखॊ होगी वही रसिक बलमा वाली लेकिन खबरदार जो उसे तॊडने केचक्कर मे हमारे आफ़िस मे पधारे तो...:)

भुवनेश शर्मा said...

आप ऐसी बालाओं को हमारा नं क्‍यों नहीं पकड़ा देते.

वैसे भी अपन ठन-ठन गोपाल हैं तो कोई ले तो कुछ सकता नहीं.

उल्‍टे कोई बाला हमसे बात करे तो क्‍या बुरा है

जोगलिखी संजय पटेल की said...

सुरेशभाई मैने अपने सहयोगियों को सिखा रखा है कि जैसे ही फ़ोन के दूसरे सिरे पर नारी स्वर सुनाई दे ...पूछ लीजिये क्या ये टेली मार्केटिंग कॉल है ? यदि वह कहे हाँ तो सिम्पल सॉरी कह कर पीछा छुड़ा लीजिये...यदि मैं फ़ोन उठाता हूँ और दूसरी ओर से सुनाई देता है कि मै फ़लाना इंश्योरेंस या क्रेडिट कार्ड से बोल रही हूँ तो मैं कह देता हूँ मैडम आप अपना समय नष्ट कर रहीं हैं ! हमें इन कॉलर्स के प्रति तो थोड़ा मानवीय रूख़ अपनाना ही पड़ता है क्योंकि वह किसी अपने एम्पलॉयर की नौकरी बजा रही है और ये काम करने में उसकी कुछ अपनी विवशताएँ हो सकतीं हैं ...कभी बेरहम संवाद मन को सालता है.

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

आपने जिस बैक का नाम लिया है उससे जुडा एक किस्सा है। हमारे एक मित्र को जब बहुत फोन आने लगे इस बैक से वक्त-बेवक्त तो उन्होने ठान लिया कि रोज दस लोगो को रोकेंगे इसका सदस्य बनने से। पहले इसे मजाक समझा गया पर फिर जब उन्होने हजार का आँकडा पार कर लिया और बैक तक बात पहुची तो मान-मनौव्वल शुरु हुयी। तब जाकर वे माने। मुझे लगता है ऐसी कम्पनियो की करतूतो को सामने लाने ऐसे कदम उठाये तो मजाल है कि वे यह दुस्साहस करे। वैसे इस तरह के फोन पर आप एक कम्यूनिटी ब्लाग शुरु करे जिसमे हम सब इन्हे खुलेआम विरोध जताये। हम आप जैसे बहुत लोग है सताये हुये। हम इस ब्लाग मे आम लोगो से अपील करेंगे कि इस तरह की घटिया मार्केटिंग करने वालो के उत्पाद न खरीदे। तो चलिये शुरुआत करे।

Akhil Gokhale said...

As mentioned by Sanjay Bhai, I too believe, we should be polite with such marketing call. After all those folks are doing their job and we have option to gracefully cut the phone. If you are really annoyed, without speaking anything just reject the call. Call end switch is in your hand.

-Akhil Gokhale

Ojha said...

मैं तो बहुत मजे में बात करता हूँ, बस सामने वाली आवाज़ किसी लड़की की होनी चाहिए... कई बार काफ़ी पर बुलाया... अभी तक बात नहीं बनी.. ऐसे काल करने वालियों को हमारा नम्बर दे दिया कीजिये :-)

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी मजा आ गया आप का लेख पढ कर, ओर वो तेल लेने वाली बात

राजीव जैन Rajeev Jain said...

दिल की बात कह दी आपने
लगभग हर तीसरे दिन ऐसे फोन आ ही जाते हैं। अपन तो इस पर कुछ लिखने की सोच ही रहे थे कि आपने बाजी मार ली।

anitakumar said...

हा हा बहुत बड़िया लिखा है। बम्बई वासी होन क नाते हमारी भी रोज की त्रासदी है। तेल लेने गये है वाला जवाब हमें भी पसंद आया , आजमां कर देखेगें। येड़ा बनने का आइडिया भी हमारे लिए एक्दम नया है बिड़ू

Abel said...

सुरेशभाई

आपकी जानकारी के लिये तकरीबन हर मोबाईल सर्विस कंपनी की वबसाईट पर अपना नंबर 'डू नॉट डिस्टर्ब' के लिये रजिस्टर कर सकते हैं. मेरा अपना अनुभव यह है कि नंबर रजिस्टर करवाने के बाद से पिछले एक वर्ष में मुझे एक भी मार्केटिंग कॉल नहीं आया.