Tuesday, March 25, 2008

राहुल गाँधी के रहस्यमयी “स्टंट” और गंभीर सुरक्षा खतरे…

Rahul Gandhi Orissa Visit Security Threat
“राजकुमार” आजकल भारत खोज अभियान पर निकले हुए हैं, उन्हें असली भारत खोजना है (शायद उन्होंने अपने परनाना की पुस्तक नहीं पढ़ी होगी)। चुनावी वर्ष में इस भारत को खोजने की शुरुआत उन्होंने उड़ीसा के कालाहांडी से की है। अब दिल्ली में बैठकर उन्हें कालाहांडी के बारे में कैसे पता चलता, न तो उनके पास संचार की कोई व्यवस्था है, न ही कांग्रेस के कार्यकर्ता, न ही पुस्तकें, न ही पत्रकार… सो राहुल बाबा ने उड़ीसा सरकार के लाखों रुपये खर्च करवाने की ठान ही ली। जैसा “स्टंट” उन्होंने बुंदेलखंड में एक दलित के यहाँ खाना खाकर और रात बिताकर किया था, कुछ-कुछ वैसा ही “स्टंट” उन्होंने उड़ीसा की यात्रा के दौरान भी करने की कोशिश की, ये और बात है कि उनके इस स्टंट की देश को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती थी। राहुल गाँधी की इस कलरफ़ुल यात्रा का अन्त एकदम रंगहीन रहा, न तो उन्होंने इन जिलों के बारे में कोई ठोस योजना पेश की, न ही उनके श्रीमुख से कोई खास उदगार फ़ूटे, हाँ लेकिन अपनी खास हरकतों से उन्होंने सुरक्षा अधिकारियों और केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियों की नींद जरूर उड़ा दी थी (और ऐसा उन्होंने पहली बार नहीं किया है)।

उड़ीसा की यात्रा के दौरान राहुल ने स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा अधिकारियों को खासा परेशान रखा। राहुल गाँधी एक बार देर रात को अज्ञात स्थान पर भी गये और उन्होंने स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना तक नहीं दी। अपनी बहरामपुर यात्रा के दौरान राहुल कंकिया नाम के गाँव गये, जो कि गोपालपुर कस्बे से 30 किमी दूर है। उनके साथ एक मिशनरी एनजीओ अधिकारी और सिर्फ़ दो सुरक्षा गार्ड थे। वह उस एनजीओ के दफ़्तर में लगभग रात 10 बजे गये और कुछ घंटे उन्होंने वहाँ बिताये। उसके बाद वे पास ही के एक रहवासी स्कूल में भी गये और वहाँ उन्होंने कुछ चॉकलेट बाँटे। वह एनजीओ एक प्रसिद्ध ईसाई मिशनरी का हिस्सा है और वह सक्रिय रूप से उड़ीसा के दक्षिणी जिलों में खुलकर धर्मान्तरण में लगा हुआ है। राहुल गाँधी ने उस एनजीओ को जितना वक्त दिया उतना वक्त तो उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भी नहीं दिया। राहुल गाँधी अलसुबह अपने कैम्प में लौटे, जब उनके कार्यकर्ता उन्हें खोजने निकल पड़े थे।

गायब होने का कुछ ऐसा ही स्टंट उन्होंने कोरापुट जिले के दौरे में भी किया, जहाँ उनका स्वागत एक धार्मिक संस्था (जाहिर है कि ईसाई) ने बड़े जोरशोर से किया। यहाँ भी वे सिर्फ़ चार सुरक्षाकर्मियों को साथ लेकर उस संस्था में गये, और स्थानीय प्रशासन को खबर तक नहीं की। राहुल गाँधी ने स्थानीय पुलिस का पायलट वाहन लेने से भी इंकार कर दिया और यहाँ तक कि उन्होंने कोरापुट के एसपी को भी अपने पीछे आने से मना कर दिया, जबकि वे जानते थे कि यह एक खतरनाक नक्सली इलाका है। बेहरामपुर की घटना के बारे में गंजम जिले के एसपी ने स्वीकार किया कि राहुल अपने तय कार्यक्रम से हटकर किसी अज्ञात स्थान पर गये थे, लेकिन इसके बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया।

इस घटना का उल्लेख विधानसभा में बीजद के विधायक कल्पतरु दास ने 11 मार्च को विशेष नोटिस के जरिये उठाया, उन्होंने आरोप लगाया राहुल गाँधी की यह आधी रात की यात्रा पहले से तय थी, एक रिटायर्ड आईपीएस पंकज कुमार गुप्ता, जो कि राजीव गाँधी फ़ाउंडेशन का काम भी देखते हैं, वह राहुल को कहीं ले गये थे और जानबूझकर स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी गई। उनका यह भी कहना है कि राहुल गाँधी अपनी माँ के कहने पर ही उस खास मिशनरी में गुप्त रूप से गये और धर्मांतरण के काम की जानकारी ली। चलो मान भी लिया जाये कि ये बाद वाला आरोप सिर्फ़ राजनैतिक आरोप है, लेकिन यह सच्चाई तो फ़िर भी अपनी जगह है कि घने जंगलों वाले इस इलाके में नक्सली बेहद सक्रिय हैं। नक्सलियों का आंतरिक नेटवर्क भी काफ़ी मजबूत है, यदि राहुल गाँधी की इस कथित गुप्त यात्रा की खबर उन्हें लग जाती और वे कोई अनर्थ कर बैठते, या तो बारूदी सुरंग बिछाते या अपहरण कर लेते, तो क्या होता? क्या तब राज्य की बीजद-भाजपा सरकार के माथे पर ठीकरा नहीं फ़ोड़ा जाता? कि उन्होंने राजकुमार की सुरक्षा ठीक से नहीं की। क्या 39 वर्ष की आयु में भी वे इतने अनजान हैं कि यदि उनकी हत्या हो जाती है तो इसके देश की जनता पर क्या तात्कालिक परिणाम हो सकते हैं? वह इतनी गैरजिम्मेदाराना हरकत कैसे कर सकते हैं, जिससे खुद उनको तो खतरा हो ही सकता है, लेकिन अन्य कई लोगों की नौकरी भी खतरे में पड़ सकती है।

राहुल गाँधी का कहना है कि वे इन आदिवासी क्षेत्रों की जमीनी हकीकत जानने के लिये उत्सुक हैं और वे इन क्षेत्रों का दौरा करके कुछ वनवासियों के जीवन को नजदीक से देखकर “प्रैक्टिकल नॉलेज” ग्रहण करना चाहते हैं। कितनी हास्यास्पद बात है ना !! कोरापुट-बोलांगीर-कालाहांडी के बारे में मैं राहुल गाँधी से ज्यादा जानता हूँ, जबकि मैं कभी उड़ीसा नहीं गया। राहुल बाबा शायद नही जानते कि आजादी के बाद उड़ीसा में कांग्रेस ने चालीस साल तक राज किया ? वे नहीं जानते कि ये तीन जिले राज्य के कुल भूभाग का 20 प्रतिशत हैं ? वे यह भी नहीं जानते कि घने जंगलों, प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर, बेशकीमती खनिजों से भरपूर इन तीन जिलों में राज्य के कुल 24 प्रतिशत गरीब रहते हैं? वे नहीं जानते कि विश्व मीडिया में भुखमरी का उदाहरण देने की शुरुआत कालाहांडी से ही होती है? आखिर राजकुमार क्या जानना चाहते हैं? चार साल के अपने कार्यकाल में संसद में सिर्फ़ दो बार मुँह खोलने वाले राहुल बाबा चमचों से बचने के लिये क्या करने वाले हैं? सिर्फ़ संसद में मम्मी के पीछे बैठने से कुछ नहीं होगा। वे अपना दृष्टिकोण और विचार भी तो मीडिया को स्पष्ट करें। जिस तरह से उनकी मम्मी मीडिया को एक “पैरपोंछ” समझती हैं, कहीं वे भी तो उसी मानसिकता से ग्रस्त नहीं हैं?

यदि धर्मान्तरण के आरोपों को एक तरफ़ रख भी दिया जाये, तो भी राहुल गाँधी का इस प्रकार सुरक्षा व्यवस्था को धोखा देकर गायब हो जाना, मनचाहे “स्टंट” दिखाना, गुपचुप मुलाकातें करना, क्या दर्शाता है? हीरोगिरी, अपरिपक्वता, गैरजिम्मेदाराना हरकत, लापरवाही या सामंती मानसिकता? आप बतायें…


, , , , , , , , , , , , , ,

सन्दर्भ : देबाशीष त्रिपाठी, ऑर्गेनाइजर (भुवनेश्वर)

7 comments:

mahashakti said...

राहुल बाबा को कुछ होगा तो उसका फायदा तो कांग्रेस को ही मिलेगा। यही कारण है कि कांग्रेस भी राहुल को बंदरों को तरह उछलने दे रही है ताकि कुछ अन्‍होनी होगी तो शायद सद्भावना ही मिल जायें।

हरिमोहन सिंह said...

अरे भाई निकलने दो बाहर । जरा देखने दो हमारे राजकुमार को दुनिया । एक सिद्वार्थ राजकुमार था अब एक हमारे राहुल बाबा है

हरिमोहन सिंह said...

अरे भाई निकलने दो बाहर । जरा देखने दो हमारे राजकुमार को दुनिया । एक सिद्वार्थ राजकुमार था अब एक हमारे राहुल बाबा है

संजय बेंगाणी said...

साहब को घुमने दो भाई...ज्ञान बढ़ेगा.

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

राजकुमार...'युवराज' कहिये 'युवराज...

राज भाटिय़ा said...

:)

Debashish said...

आपका नपातुला लेखन पसंद आता है। धर्मांतरण की बात पर इतना ही कहुंगा की सोनिया, जो एक ईसाई भी हैं, के बेटे होने मात्र से राहुल पर अभियोग लगाने की बात नहीं जंचती।

राजकुमार पर कसे तंज से मुझे अपनी पुरानी पोस्टें याद आ गईं, कोई कहे कहता रहे और सत्ता का भोग, समय मिले तो पढ़ियेगा।