Monday, March 24, 2008

गंगाजल से मध्यान्ह भोजन “अपवित्र” हो जाता है?

Mid Day Meal Scheme ISKCON Ujjain
केन्द्र और राज्य सरकारों की मिलीजुली महती योजना है मध्यान्ह भोजन योजना। जैसा कि सभी जानते हैं कि इस योजना के तहत सरकारी प्राथमिक शालाओं में बच्चों को मध्यान्ह भोजन दिया जाता है, ताकि गरीब बच्चे पढ़ाई की ओर आकर्षित हों और उनके मजदूर / मेहनतकश/ ठेले-रेहड़ी वाले/ अन्य छोटे धंधों आदि में लगे माँ-बाप उनके दोपहर के भोजन की चिंता से मुक्त हो सकें। इस योजना के गुणदोषों पर अलग से चर्चा की जा सकती है क्योंकि इस योजना में कई तरह का भ्रष्टाचार और अनियमिततायें हैं, जैसी कि भारत की हर योजना में हैं। फ़िलहाल बात दूसरी है…

जाहिर है कि उज्जैन में भी यह योजना चल रही है। यहाँ इस सम्पूर्ण जिले का मध्यान्ह भोजन का ठेका “इस्कॉन” को दिया गया है। “इस्कॉन” यानी अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ को जिले के सभी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन (रोटी-सब्जी-दाल) बनाने और पहुँचाने का काम दिया गया है। इसके अनुसार इस्कॉन सुबह अपनी गाड़ियों से शासकीय स्कूलों में खाना पहुँचाता है, जिसे बच्चे खाते हैं। चूँकि काम काफ़ी बड़ा है इसलिये इस हेतु जर्मनी से उन्होंने रोटी बनाने की विशेष मशीन बुलवाई है, जो एक घंटे में 10,000 रोटियाँ बना सकती है। (फ़िलहाल इस मशीन से 170 स्कूलों हेतु 28,000 बच्चों का भोजन बनाया जा रहा है) (देखें चित्र)

जबसे इस मध्यान्ह भोजन योजना को इस्कॉन को सौंपा गया है, तभी से स्थानीय नेताओं, सरपंचों और स्कूलों के पालक-शिक्षक संघ के कई चमचेनुमा नेताओं की भौंहें तनी हुई हैं, उन्हें यह बिलकुल पसन्द नहीं आया है कि इस काम में उन्हें “कुछ भी नहीं” मिल रहा। इस काम को खुले ठेके के जरिये दिया गया था जिसमें जाहिर है कि “इस्कॉन” का भाव सबसे कम था (दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चा)। हालांकि इस्कॉन वाले इतने सक्षम हैं और उनके पास इतना विदेशी चन्दा आता है कि ये काम वे मुफ़्त में भी कर सकते थे (इस्कॉन की चालबाजियों और अनियमितताओं पर एक लेख बाद में दूँगा)। अब यदि मान लिया जाये कि दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चे के भाव पर इस्कॉन जिले भर के शासकीय स्कूलों में रोटी-सब्जी “नो प्रॉफ़िट-नो लॉस” के स्तर पर भी देता है (हालांकि इस महंगाई के जमाने में यह बात मानने लायक नहीं है), तो विचार कीजिये कि बाकी के जिलों और तहसीलों में चलने वाली इस मध्यान्ह भोजन योजना में ठेकेदार (जो कि प्रति बच्चा चार-पाँच रुपये के भाव से ठेका लेता है) कितना कमाता होगा? कमाता तो होगा ही, तभी वह यह काम करने में “इंटरेस्टेड” है, और उसे यह कमाई तब करनी है, जबकि इस ठेके को लेने के लिये उसे जिला पंचायत, सरपंच, स्कूलों के प्रधानाध्यापक, पालक-शिक्षक संघ के अध्यक्ष और यदि बड़े स्तर का ठेका हुआ तो जिला शिक्षा अधिकारी तक को पैसा खिलाना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि इस्कॉन को यह ठेका मिलने से कईयों के “पेट पर लात” पड़ गई है (हालांकि सबसे निरीह प्राणी यानी पढ़ाने वाले शिक्षक इससे बहुत खुश हैं, क्योंकि उनकी मगजमारी खत्म हो गई है), और इसीलिये इस योजना में शुरु से ही “टाँग अड़ाने” वाले कई तत्व पनपे हैं। मामले को ठीक से समझने के लिये लेख का यह विस्तार जरूरी था।

“टाँग अड़ाना”, “टाँग खींचना” आदि भारत के राष्ट्रीय “गुण” हैं। उज्जैन की इस मध्यान्ह भोजन योजना में सबसे पहले आरोप लगाया गया कि इस्कॉन इस योजना को चलाने में सक्षम नहीं है, फ़िर जब इस्कॉन ने इस काम के लिये एक स्थान तय किया और वहाँ शेड लगाकर काम शुरु किया तो जमीन के स्वामित्व और शासन द्वारा सही/गलत भूमि दिये जाने को लेकर बवाल मचा दिया गया। जैसे-तैसे इससे निपट कर इस्कॉन ने काम शुरु किया, 10000 रोटियाँ प्रति घंटे बनाने की मशीन मंगवाई तो “भाई लोगों” ने रोटी की गुणवत्ता पर तमाम सवाल उठाये। बयानबाजियाँ हुई, अखबार रंगे गये, कहा गया कि रोटियाँ मोटी हैं, अधपकी हैं, बच्चे इसे खा नहीं सकते, बीमार पड़ जायेंगे आदि-आदि। अन्ततः कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी को खुद वहाँ जाकर रोटियों की गुणवत्ता की जाँच करनी पड़ी, न कुछ गड़बड़ी निकलना थी, न ही निकली (इस्कॉन वालों की सेटिंग भी काफ़ी तगड़ी है, और काफ़ी ऊपर तक है, ये छुटभैये नेता कहाँ लगते उसके आगे)। लेकिन ताजा आरोप (वैसे तो आरोप काफ़ी पुराना है) ज्यादा गंभीर रूप लिये हुए है, क्योंकि इसमें “धर्म” का घालमेल भी कर दिया गया है।

असल में शुरु से ही शासकीय मदद प्राप्त मदरसों ने मध्यान्ह भोजन योजना से भोजन लेने से मना कर दिया था। “उनके दिमाग में किसी ने यह भर दिया था” कि इस्कॉन में बनने वाले रोटी-सब्जी में गंगाजल और गोमूत्र मिलाया जाता है और फ़िर उस भोजन को भगवान को भोग लगाकर सभी दूर भिजवाया जाता है। काजियों और मुल्लाओं द्वारा विरोध करने के लिये “गोमूत्र” और “भगवान को भोग” नाम के दो शब्द ही काफ़ी थे, उन्होंने “धर्म भ्रष्ट होने” का आरोप लगाते हुए मध्यान्ह भोजन का बहिष्कार कर रखा था। इससे मदरसों में पढ़ने वाले गरीब बच्चे उस स्वादिष्ट भोजन से महरूम हो गये थे। कहा गया कि मन्दिर में पका हुआ और गंगाजल मिलाया हुआ भोजन अपवित्र होता है, इसलिये मदरसों में मुसलमानों को यह भोजन नहीं दिया जा सकता (जानता हूँ कि कई पाठक मन ही मन गालियाँ निकाल रहे होंगे)। कलेक्टर और इस्कॉन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने मदरसों में जाकर स्थिति स्पष्ट करने की असफ़ल कोशिश भी की, लेकिन वे नहीं माने। इस तथाकथित अपवित्र भोजन की शिकायत सीधे मानव संसाधन मंत्रालय को कर दी गई। तुरत-फ़ुरत अर्जुनसिंह साहब ने एक विशेष अधिकारी “श्री हलीम खान” को उज्जैन भेजा ताकि वे इस्कॉन में बनते हुए भोजन को खुद बनते हुए देखें, उसे चखें और शहर काजी तथा मदरसों के संचालकों को “शुद्ध उर्दू में” समझायें कि यह भोजन “ऐसा-वैसा” नहीं है, न ही इसमें गंगाजल मिला हुआ है, न ही गोमूत्र, रही बात भगवान को भोग लगाने की तो उससे धर्म भ्रष्ट नहीं होता और सिर्फ़ इस कारण से बेचारे गरीब मुसलमान बच्चों को इससे दूर न रखा जाये। काजी साहब ने कहा है कि वे एक विशेषाधिकार समिति के सामने यह मामला रखेंगे (जबकि भोजन निरीक्षण के दौरान वे खुद भी मौजूद थे) और फ़िर सोचकर बतायेंगे कि यह भोजन मदरसे में लिया जाये कि नहीं। वैसे इस योजना की सफ़लता और भोजन के स्वाद को देखते हुए पास के देवास जिले ने भी इस्कॉन से आग्रह किया है कि अगले वर्ष से उस जिले को भी इसमें शामिल किया जाये।

वैसे तो सारा मामला खुद ही अपनी दास्तान बयाँ करता है, इस पर मुझे अलग से कोई कड़ी टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन फ़िर भी यदि मध्यान्ह भोजन योजना में हो रहे भ्रष्टाचार और इसके विरोध हेतु धर्म का सहारा लेने पर यदि आपको कुछ कहना हो तो कहें…


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14 comments:

संजय बेंगाणी said...

भैये क्या कहें? ऐसा है तो गंगा तट पर बसे सारे मुसलमान यमुना किनारे बस जाये, धर्म भ्रष्ट करने से यही अच्छा है.

अरुण said...

भैये मुझे लगता है ये मामला तो बाद मे देखेगे पहले ये गुजरात के मोदी और संजय बैंगाणी के उपर ही दो चार लेख ठेलने पडेगे,ये गंगा के किनारे से मुसलमानो को हटने को कैसे कह सकते है ,मेरी मोहल्ले वालो से भी बात चल रही है इन्हे हम ऐसे कैसे छोड सकते है जी..:)

दीपक भारतदीप said...

आपके लेख हतप्रभ कर देते हैं

anitakumar said...

भगवान इन समाज के ठेकेदारों को सदबुद्धी दे।

भुवनेश शर्मा said...

चलिए इस्‍कॉन के बहाने ही सही बच्‍चों के पेट में कुछ पहुंच तो रहा है....

इस्‍कॉन की कारस्‍तानियों वाला लेख जल्‍दी लिखिए

सुनीता शानू said...

बहुत अच्छा मुद्दा है सुरेश जी...बहुत दिनो से आपको पढ़ा ही नही था...यह क्या दौसो एक वीं पोस्ट है...:)

mahashakti said...

बहुत ही सार्थक था जो यह दर्शता है कि आज के समाज किस तरह के लोग रहते है अगर गंगा जल से धर्म भ्रष्‍ट होता है तो देश के 50 फीसदी मुसलमान अब मुसलमान नही रह गये है क्‍योकि प्रशासन उन्‍हे गंगा जल ही पीने को देता है।

अभी बीमा के सम्‍बन्‍ध में भी फतवा पढ़ने को मिला, यह नाजायज है कि भारत में जायज है :)

neha said...

hello, sir this is neha upadhyay.from ujjain.as expeced ur blogs are superb.it's always been a pleasure to read u.


my regards....
happy holi..

Ari Daman said...

anything grown and cooked in India is haram for them, because India is 'darul harab' , India is not under sharia law

annu said...

A bhai! yeh sab kya baval macha rakha hai? Agar musalman gangajal me paka bhojan nahi lete to kya bura hai. Isi bahane kuch bachega. Kya sab hindu bacchon ka pet bahr gaya hai. Unki fikar karne ko bahot log hain. Kuch apno ke bare main socho.
Anagh Agarwal

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

भाई बाकी सबके बारे मैं तो कुछ बोल नहीं सकता, लेकिन एक बात मैं जजुर बोल सकता हूँ की गुणवत्ता के आधार पे ISKCON का भोजन बहुत ही अच्छा है | जैसा की हम सब जानते ही हैं कोई भी हिन्दू संस्था कितना भी अच्छा कर ले हमारे सेकुलर हिन्दू भाई, मुस्लिम भाई इसको बुरा ही बोलेंगे |

सुरेश जी किसी पे (ISKCON ) पे लांचन लगाने से पहले खूब सोच-विचार लें| और सत्य को जाने बिना बस एक-दो छुट-भाइयों के बोलने भर से अपने ब्लॉग पे इस तरह मत लिखिए, इससे आपकी विश्वस्तता के साथ-साथ हजारों हिन्दुओं की भावना को भी ठेंस पहुँचती है | हो सकता है की आपके इसी लेख को पढ़ कर कई लोग ISKCON को गलत समझने लगे और मंदिर जाना हे छोड़ दे, क्या ये पाप आप लेने को तैयार हैं ?

आशा है आप हम जैसे हिन्दुओं की भावना को समझेंगे और जहाँ कहीं भूल हुई है उसको सुधरने का प्रयाद करेंगे |

चाष्‍टा said...

नीचे दिये गये लिंकों को पब्‍ने पर इसका सही पता लग पाता है

http://www.pressnote.in/Udaipur-News_143044.html

http://www.chauthiduniya.com/2010/02/baccho-ki-aad-me-luctkhasot-bacche-jamin-ghotala-our-vasundhra.html

akram ahamad said...

sabko namskar mera naam ikraam ahmad hai mai achnak kuchh search kar raha tha tabhi mujhe yah blog mila mane jahan bhi isme padha hai isme muslimo aur isaaiyo ke bare mai likha gya hai ....ganga yamuna saraswati ka paani ap log pavitra aur balki bhgawan ka darja dete hain lekin muslim nahi dete yahi khatak hai...koi baat nahi ganga komata kyon kahte ho kyonki wah pyaso ko paani milati hai...to samudra ko bap kyon nahi kahte....

gaay ko mata kahte ho kyonki gaay doodh deti hai ..
bhans ko baap kyon nahi kahte wah bhi to dhoodh deti hai ...dharti ko mata kahte ho to sari duniya ki jameen mata hui ya sirf bharat ka naksha jahan tak hai wahi tak..
mujhe iska jawab do?...
achha aisi koi mata hogi jo apne bachhe se pyar nahi karti usko mar daale aisi koi mata hogi.......?
to jab bhookamp aati hai to log usme ..dharti ke andar om namah shiway ho jaate hai ...aap aisi mata ko kya kahege..........?

Anonymous said...

"BANDAR KYA JANE ADARAK KAA SWAAD"