Saturday, March 8, 2008

ऐसे मनी महाशिवरात्रि उज्जैन में…

Mahakaleshwar Temple Ujjain

उज्जैन का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान है, बारह ज्योतिर्लिंगों में से इस पिंडी का आकार सबसे बड़ा है। इस महाशिवरात्रि (6 मार्च) के दिन उज्जैन में मन्दिर के सभी शिखरों को स्वर्ण-मंडित करने का काम पूरा हुआ। कुल 118छोटे-बड़े शिखर हैं जिन पर 16 किलो सोने के पत्तर से कलश चढ़ाने का संकल्प पूरा किया गया।

हर छोटे-बड़े मन्दिर में अनियमिततायें, भ्रष्टाचार, मनमानी, भाई-भतीजावाद और पक्षपात चलता रहता है, महाकालेश्वर मन्दिर भी इसका अपवाद नहीं है (पढ़ें यह दो लेख - महाकालेश्वर मंदिर में धर्म के नाम पर और महाकालेश्वर मन्दिर से लाखों की तांबे की पट्टियाँ गायब)। जैसा कि हर शिवरात्रि को यहाँ होता है, मन्दिर समिति, प्रशासन और नागरिकों की बैठक में लिये गये निर्णयों पर ईमानदारी से अमल नहीं होता। इस बार भी मंदिर में कई स्थानों पर भक्तों के लिये लाइन में खड़े होने हेतु शामियाने (टेंट) और गर्मी से पैरों को बचाने के लिये मैटिंग की व्यवस्था कई जगह नहीं थी, इस कारण महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों को काफ़ी तकलीफ़ उठानी पड़ी।

रही-सही कसर तीन “P” ने पूरी कर दी, तीन “P” अर्थात प्रशासन, पुलिस और पंडे-पुजारी। जहाँ आम जनता धूप में बगैर पानी पिये तीन-तीन घंटे लाइन में खड़े होकर किसी तरह गर्भगृह के सामने पहुँच पा रही थी, दूसरी ओर वीआईपी लोग, उनके चमचे, उनके लगुए-भगुए, उनके चाचे-भतीजे सबके सब “विशेष दर्शन गेट” से (जिसमें 200/- रुपये का शुल्क देकर पिछले दरवाजे से प्रवेश करवाया जाता है) अन्दर सीधे नन्दीगृह में आसन जमाकर बैठ गये थे (व्यवस्था कुछ ऐसी है कि, गर्भगृह के सामने बड़ा द्वार है, उसके सामने नंदी विराजमान होते हैं वहाँ एक हॉलनुमा स्थान है और उसके बाद स्टेडियमनुमा सीढ़ियाँ बना दी गई हैं जिससे दर्शनार्थी दूर से भी दर्शन कर सके)।

विशेष मौकों, जैसे महाशिवरात्रि, श्रावण के सभी सोमवार, नागपंचमी, सोमवती-शनीचरी अमावस्या आदि के मौके पर आम जनता का गर्भगृह में प्रवेश प्रतिबन्धित होता है। लेकिन आलम यह था कि गर्भगृह में तो पंडे-पुजारियों ने कब्जा जमा रखा था, नंदीहॉल में सब वीआईपी पसर गये थे, आम जनता जो कि हजारों की संख्या में थी और जिन्हें पुलिस के जवान सतत धकिया रहे थे, दूर से सीढ़ियों से भी ठीक से दर्शन नहीं कर पा रहे थे।

महाशिवरात्रि के अगले दिन साल में एक बार दोपहर को भस्मारती की जाती है, जिसमें प्रशासन और सिंधिया राजवंश की ओर से पूजा की जाती है (बाकी वर्ष भर भस्मारती का समय तड़के तीन बजे का होता है) को भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया था। उज्जैन के कलेक्टर को नाराज होकर गर्भगृह से निकल जाना पड़ा, क्योंकि वह भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थे। खुद ही सोचिये, कमिश्नर, आईजी, डीआईजी की पत्नियों, सालों और भतीजों के सामने एक कलेक्टर की क्या हैसियत है? उस दिन (7 मार्च) भी जनता को दो घंटे तक बाहर धूप में खड़ा रखा गया और शासन की विशेष पूजा सम्पन्न हुई।

बहरहाल, उस दिन उज्जैन में भांग घोटे वालों ने जमकर कमाया, जो भांग आमतौर पर बिकती है उससे दोगुनी बिक्री हुई, लोगों ने जमकर रगड़े छाने, ठंडाई पी (मिलावटी ही सही) और बमभोले का नाम लिया। तमाम बुरी बातों में से एक अच्छी बात निकलकर सामने आई, वह यह कि जिन 118 स्वर्ण कलशों के लिये प्रत्येक दानदाता से 1 लाख 51 हजार की राशि ली जा रही है, उसमें से एक कलश के लिये दान देने वाली एक गरीब महिला है, जो कि मिल में काम करती थी, विधवा हो जाने, पुत्रों के दुत्कार दिये जाने और बुढ़ापे का कोई अन्य कमाई का साधन न होने के बावजूद उसने अपनी जीवन भर की सारी कमाई 1 लाख 51 हजार रुपये, मंदिर को दान कर दिये और अब आज की तारीख में उसका बैंक बैलेंस मात्र 400 रुपये है।

बाकी के 100 से ज्यादा कलश के लिये दान देने वालों में, अतिक्रमणकर्ता, गौशाला का चन्दा खाने वाले, शिक्षा माफ़िया, रिटायर होने के बाद “अचानक” ईमानदार बने हुए आईएएस अधिकारी, गरीबों का शोषण करने और सरकार को चूना लगाने वाले उद्योगपति, मध्यप्रदेश की बदहाल सड़कों के लिये जिम्मेदार बड़े-बड़े ठेकेदार और इंजीनियर जैसे लोग हैं, जो चाहें तो अकेले ही 16 किलो का सोना दान कर सकते हैं। लेकिन धन्य है वह गरीब महिला, जिसके कारण वह तमाम स्वर्ण कलश पवित्र हो गये। तो ऐसे मनी महाशिवरात्रि उज्जैन में...
(यह लेख अखबारी रिपोर्टों और चश्मदीद गवाहों के बयान पर लिखा गया है, क्योंकि मैं तो पिछले काफ़ी समय से महाकाल मन्दिर नहीं गया)…

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6 comments:

दीपक भारतदीप said...

आपका लेख पढा. इस बार महाशिवरात्रि पर उज्जैन आने का था पर नहीं आ सके. अगली बार जब आयेंगे तब महाकालेक्श्वर मंदिर जरूर जायेंगे और आपको भी साथ ले चलेंगे. वैसे वह तो सब जगह हैं और आपके और मेरे मन में भी बसते हैं. महाशिवरात्रि की आपको शुभ कामनाएं.
दीपक भारतदीप

भुवनेश शर्मा said...

मैं अपनी समझ से बस यही कहना चाहूंगा कि क्‍या आवश्‍यकता है ऐसे मंदिरों की ? क्‍या मंदिरों में स्‍वर्ण कलश चढ़ाने, धूप में खड़े होकर दर्शन के इंतजार करने, पूजा का ढोंग करने से हमारे या किसी के भी जीवन में कोई परिवर्तन आने वाला है ? पर विडंबना यही है कि हम फिर भी इस ढोंग में लगे हुए हैं.
एक बात और समझ में नहीं आती कि लोगों को नेताओं और राजनीति की गंदगी तो साफ नजर आती है पर धर्म में व्‍याप्‍त बुराईयां कभी नहीं. और जिन चीजों की ओर से हम आंखें मूंद लेंगे उसमें कुछ भी अच्‍छा शेष रहे इसमें शक है.

mahashakti said...

भुवनेश जी, समाज, राजनीति और धर्म से ज्‍यादा गंदगी आप और हममे है, क्‍योकि इसे फैलाने वाले हम ही है। आप आपको खत्‍म कर लेना उचित होगा ?

दिनेशराय द्विवेदी said...

भुवनेश जी। उज्जेन तो हम भी अक्सर आते रहते हैं। पर इस पोस्ट में आप की नजर ने बहुत कुछ देखा है। हमें भी दिखाया है। उस वृद्ध महिला को प्रणाम। मन्दिर में सब से पहली पूजा का अधिकार उसी का है। स्थानीय नौकरशाहों-नेताओं और दर्शनार्थियों की विशेष श्रेणी का तो विशेष पर्वों पर मन्दि प्रवेश बिलकुल बन्द होना चाहिए। जिस से जनता को दर्शनों में परेशानी नहीं हो।

अरुण said...

भैया अपन तो इन दिनो मंदिरो से काफ़ी दूर होकर निकलते है.हमारे यहा भी लोग जल चढाने के लिये घंटो लाईन मे लगे रहते है ,यहा तो श्रावण मास मे गजियाबाद से हरिद्वार तक का मुख्य रास्ता ही बंद रहता है ,और शिवजी के तमाम बराती उनके नाम पर भंग अफ़ीम चरस लगा कर अभद्रता के नये आयाम स्थापित करने मे कोई सीमा नही छोडते..:) अब अपन तो यही मानते है"मन चंगा तो कठौती मे गंगा "
वैसे एक बार अपन भी आपके उज्जैन मे महाकाल के दर्शन (परची कटवा कर) वी आई पी कोटे से कर आये है..:)

Udan Tashtari said...

हम तो खुद ही वी आई पी कोटे में दार्शन किये है..तो मूँह छिपाये बैठे हैं..क्या कहें.