Friday, March 28, 2008

क्या सचमुच भारत का मीडिया विदेशी हाथों में पहुँच चुका है?

Foreign Investment Indian Media Groups
भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिक कौन हैं? हाल ही में एक-दो ई-मेल के जरिये इस बात की जानकारी मिली लेकिन नेट पर सर्च करके देखने पर कुछ खास हाथ नहीं लग पाया (हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो मीडिया वाले ही बता सकते हैं) कि भारत के कई मीडिया समूहों के असली मालिक कौन-कौन हैं?

हाल की कुछ घटनाओं के मीडिया कवरेज को देखने पर साफ़ पता चलता है कि कतिपय मीडिया ग्रुप एक पार्टी विशेष (भाजपा) के खिलाफ़ लगातार मोर्चा खोले हुए हैं, गुजरात चुनाव और चुनावों के पूर्व की रिपोर्टिंग इसका बेहतरीन नमूना रहे। इससे शंका उत्पन्न होती है कि कहीं हमारा मीडिया और विख्यात मीडियाकर्मी किन्हीं “खास” हाथों में तो नहीं खेल रहे? भारत में मुख्यतः कई मीडिया और समाचार समूह काम कर रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं – टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू, आनन्दबाजार पत्रिका, ईनाडु, मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, सहारा, भास्कर और दैनिक जागरण समूह। अन्य कई छोटे समाचार पत्र समूह भी हैं। आईये देखें कि अपुष्ट और गुपचुप खबरें क्या कहती हैं…

समाचार चैनलों में एक लोकप्रिय चैनल है NDTV, जिसका आर्थिक फ़ंडिंग स्पेन के “गोस्पेल ऑफ़ चैरिटी” से किया जाता है। यह चैनल भाजपा का खासमखास विरोधी है। इस चैनल में अचानक “पाकिस्तान प्रेम” जाग गया है, क्योंकि मुशर्रफ़ ने इस एकमात्र चैनल को पाकिस्तान में प्रसारण की इजाजत दी। इस चैनल के सीईओ प्रणय रॉय, कम्युनिस्ट पार्टी के कर्ता-धर्ता प्रकाश करात और वृन्दा करात के रिश्तेदार हैं। सुना गया है कि इंडिया टुडे को भी NDTV ने खरीद लिया है, और वह भी अब भाजपा को गरियाने लग पड़ा है। एक और चैनल है CNN-IBN, इसे “सदर्न बैप्टिस्ट चर्च” के द्वारा सौ प्रतिशत की आर्थिक मदद दी जाती है। इस चर्च का मुख्यालय अमेरिका में है और दुनिया में इसके प्रचार हेतु कुल बजट 800 मिलियन डॉलर है। भारत में इसके कर्ताधर्ता राजदीप सरदेसाई और उनकी पत्नी सागरिका घोष हैं। गुजरात चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी और हिन्दुओं को लगातार गाली देने और उनकी छवि बिगाड़ने का काम बड़ी ही “स्वामिभक्ति” से इन चैनलों ने किया। गुजरात के दंगों के दौरान जब राजदीप और बरखा दत्त स्टार टीवी के लिये काम कर रहे थे, तब उन्होंने सिर्फ़ मुसलमानों के जलते घर दिखाये और मुसलमानों पर हुए अत्याचार की कहानियाँ ही सुनाईं, किसी भी हिन्दू परिवार का इंटरव्यू नहीं लिया गया, मानो उन दंगों में हिन्दुओं को कुछ हुआ ही न हो।

टाइम्स समूह “बेनेट कोलमेन” द्वारा संचालित होता है। “वर्ल्ड क्रिश्चियन काउंसिल” इसका 80% खर्चा उठाती है, एक अंग्रेज और एक इतालवी रोबर्टियो मिन्डो इसके 20% शेयरों के मालिक हैं। यह इतालवी व्यक्ति सोनिया गाँधी का नजदीकी भी बताया जाता है। स्टार टीवी तो खैर है ही ऑस्ट्रेलिया के उद्योगपति का और जिसका एक बड़ा आका है सेंट पीटर्स पोंटिफ़िशियल चर्च मेलबोर्न। 125 वर्ष पुराना दक्षिण के एक प्रमुख समाचार समूह “द हिन्दू” को अब जोशुआ सोसायटी, बर्न्स स्विट्जरलैण्ड ने खरीद लिया है। इसके कर्ताधर्ता एन.राम की पत्नी स्विस नागरिक भी हैं। दक्षिण का एक तेलुगु अखबार “आंध्र ज्योति” को हैदराबाद की मुस्लिम पार्टी “एम-आई-एम” और एक कांग्रेसी सांसद ने मिलकर खरीद लिया है। “द स्टेट्समैन” समूह को कम्युनिस्ट पार्टी संचालित करती है, और “कैराल टीवी” को भी। “मातृभूमि” समूह में मुस्लिम लीग के नेताओं का पैसा लगा हुआ है। “एशियन एज” और “डेक्कन क्रॉनिकल” में सऊदी अरब का भारी पैसा लगा हुआ है। जैसा कि मैने पहले भी कहा कि हालांकि ये खबरें सच हैं या नहीं इसका पता करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि जिस देश में सरकार को यह तक पता नहीं लगता कि किसी एनजीओ को कुल कितनी मदद विदेश से मिली, वहाँ किसी समाचार पत्र के असली मालिक या फ़ाइनेन्सर का पता लगाना तो बहुत दूर की बात है। अधिग्रहण, विलय, हिस्सेदारी आदि के जमाने में अन्दर ही अन्दर बड़े समाचार समूहों के लाखों-करोड़ों के लेन-देन हुए हैं। ये खबरें काफ़ी समय से इंटरनेट पर मौजूद हैं, हवा में कानोंकान तैरती रही हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि आपके मुहल्ले का दादा कौन है ये आप जानते हैं लेकिन लोकल थानेदार जानते हुए भी नहीं जानता। अब ये पता लगाना शौकिया लोगों का काम है कि इन खबरों में कितनी सच्चाई है, क्योंकि कोई खोजी पत्रकार तो ये करने से रहा। लेकिन यदि इसमें जरा भी सच्चाई है तो फ़िर ब्लॉग जगत का भविष्य उज्जवल लगता है।

ऐसे में कुल मिलाकर तीन समूह बचते हैं, पहला “ईनाडु” जिसके मालिक हैं रामोजी राव, “भास्कर” समूह जिसके मालिक हैं रमेशचन्द्र अग्रवाल और तीसरा है “जागरण” समूह। ये तीन बड़े समूह ही फ़िलहाल भारतीय हाथों में हैं, लेकिन बदलते वक्त और सरकार की मीडिया क्षेत्र को पूरी तरह से विदेशियों के लिये खोलने की मंशा को देखते हुए, कब तक रहेंगे कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात तो तय है कि जो भी मीडिया का मालिक होता है, वह अपनी राजनैतिक विचारधारा थोपने की पूरी कोशिश करता है, इस हिसाब से भाजपा के लिये आने वाला समय मुश्किलों भरा हो सकता है, क्योंकि उसे समर्थन करने वाले “पाञ्चजन्य” (जो कि खुद संघ का मुखपत्र है) जैसे इक्का-दुक्का अखबार ही बचे हैं, बाकी सब तो विरोध में ही हैं।

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16 comments:

अरुण said...

क्या बात है जी आपको तो किसी खुफ़िया विभाग मे होना था,वाकई मे आप काफ़ी मेहनत करते है लिखने से पहले...:)

mahashakti said...

देशी कुत्‍ते विदेशियों के तो हुऐ,भारत के नमक का न सही विदेशी टट्टूओं के नमक का फर्ज तो ये मीडिया कर ही रहा है।

रही बात भाजपा की तो वह अपने मूल मुद्दे पर आ जाये ये मीडिया भी अपने औकात में आ जायेगी और गुण भी गायेगी चुनाव का परिणाम आने पर।

आप अच्‍छा ज्ञान भरा लेख प्रकाशित किया है बधाई।

संजय बेंगाणी said...

कुछ चीजे महसुस कर के ही समझी जा सकती है. यह भी ऐसा ही मामला है.

PD said...

Achchha HOME WORK kiya hai aapne.. badhaai...

Sanjeet Tripathi said...

पंगेबाज जी के कथन से सहमत हूं!

maithily said...

हिन्दी के क्षेत्रीय अखबार तो अभी बचे हुये ही हैं.
आपकी चिंताये एकदम बाजिब हैं.

संजय तिवारी said...

क्या आप बताएंगे कि आपकी जानकारी का स्रोत क्या है? इस तरह की बातें अगर प्रमाण के साथ न की जाएं तो गाशिप हो जाती हैं. अगर प्रमाण है तो यह विस्फोटक जानकारी है, अगर किसी साईट पर पढ़कर आपने लिख दिया है तो इसे गाशिप ही मानिये.

एफडीआई से जुड़े मसले पर ब्राडकास्टिंग बिल अभी तक सदन में आया नहीं है. आप पहले ही 60 परसेंट अस्सी परसेंट विदेशियों को बांट रहे हैं. स्रोत के बारे में बताएंगे तो अच्छा लगेगा.

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी,बहुत ही खुफ़िया जानकारी हे,लेकिन हे हम सब के लिये,देश के लिये खतरनाक, यह नेता कुछ सिक्को के लिये बिकते हे,इन्ही का काम हे,इन बेब्कुफ़ो कॊ यह नही मलुम अगर देश ही नही अपना रहा तो यह कया करे गे, लेकिन जयंचन्द हर काल मे हुये हे, इस बार जयचन्द कुछ ज्यादा हे,

Suresh Chiplunkar said...

संजय तिवारी जी,
फ़िलहाल तो इसे एक गॉसिप माना जा सकता है, जैसा कि मैने पहले ही अर्ज किया है कि "नेट पर उपलब्ध विभिन्न लिंक्स, ई-मेल और आपसी बातचीत" पर आधारित है यह सारा, जाहिर है कि इसका सबूत लाना तो भगीरथी प्रयास होगा… फ़िर भी एक निगाह इन पर डाल लें… कई फ़ोरमों पर इसकी चर्चा है, लेकिन ठोस किसी के पास कुछ भी नहीं, इसीलिये मैंने पहले ही कहा कि इसका पता करना बेहद मुश्किल है, लेकिन मीडिया की एकतरफ़ा रिपोर्टिंग देखकर कुछ तो शक होता ही है…

http://www.hindustan.net/forums/showthread.php?t=1945

http://forums.sulekha.com/forums/coffeehouse/WHO-OWNS-THE-MEDIA-IN-INDIA-783525.htm

Umesh said...

भारत ने अभी तक स्वतंत्रता नही प्राप्त की है । तथाकथित भारत आजादी के बाद के सभी (सभी) शाषक वस्तुतः अंग्रेजो के दलाल साबित हुए है । आज की स्थिती तो और भी ज्यादा खराब है । NDTV पर इसाइयो के नियंत्रण को मैने वर्षो पहले भाँप लिया था । भारत के वाम्पथियो मे भी उनकी गहरी पैठ है ।

एक बात और, यह इसाई चैनल कोशिस करते रहते है की हिन्दु और मुस्लिम झगड्ते रहे । दक्षेण एसिया के हिन्दु एवम मुसल्मानो के पुर्वज एक है, भाषा एक है तथा संस्कृती भी एक हि है । अगर हमारे बिच दुरी बढाने, वैमनस्व सृजीत करने को भी NDTV जैसे चैनल अपना मिसन समझते है ।

संजय तिवारी said...

ईसाई भारतीय मीडिया में पैसा लगा रहे हैं यह बात शक करने योग्य है. दुनिया में ईसाईयत के प्रसार के लिए जितना पैसा डोलता है उतना किसी और काम के लिए नहीं.
फिलहाल विकास के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह ईसाई माडल आफ इकोनामी ही है फिर पैसा वर्ल्ड बैंक फाईनेन्स करे या कासा अथवा डीएफआईडी. आखिरकार उससे ईसाईयत को ही बल मिलता है. कायदे से तो समाचार मालिकों को इस बात का जवाब देना चाहिए.

दीपक भारतदीप said...

जिस तरह प्रचार का माहौल चल रहा है उसे देखते हुए आपकी इस पोस्ट के कई बातें सही लगती हैं.
दीपक भारतदीप

हर्षवर्धन said...

सुरेशजी,
सनसनीखेज टाइप की रिपोर्टिंग है। अति लग रही है। निश्चित तौर पर ज्यादातर चैनलों में तो बाहरी पैसा लगा ही है। क्योंकि, शेयर के जरिए हिस्सेदार तो आप भी बन सकते हैं। स्वाभाविक है ज्यादा पैसा लगाने वाला बड़ा हिस्सेदार होगा। ऐसी ही खबर एक बार पहले भी आई थी लेकिन, उसका भी कोई स्रोत नहीं बताया गया था। और, जिन समूहों के आप पूरी तरह से भारतीय होने की बात कह रहे हैं। उसमें से जागरण में तो एक विदेशी कंपनी ने अच्छी हिस्सेदारी ली है। दूसरे भी कहीं न कहीं कोई समझौता करके ही बैठे होंगे। लेकिन, हर मीडिया को चर्च से ही संचालित बताने से पहले कृपया कुछ पुख्ता जानकारी दें तो, बेहतर होगा। क्योंकि, अगर ये सच है तो, इससे खतरनाक कुछ नहीं हो सकता। और, एनडीटीवी ने फिलहाल आजतक को नहीं खरीदा है। हां, टीवी टुडे ग्रुप के रेड एफएम में बड़ी हिस्सेदारी जरूर ली है। अनिल अंबानी का जरूर आजतक में बड़ा हिस्सा है। नेटवर्क एटीन और टीवी एटीन में भी है। दूसरे ग्रुप्स के शेयरधारकों के बारे में भी आपको जानकारी सेबी के जरिए मिल सकती है।

हर्षवर्धन said...

सुरेशजी,
आपके दिए लिंक्स पर भी मैं गया। आपने खुद उस पर ये टिप्पणी की है
You have posted a serious matter without giving any proof, any links, any references,
Please do this otherwise its unbelievable...
इसके बाद आपको बिना प्रमाण के इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहिए था। सीएनएन आईबीएन के हिंदी चैनल आईबीएन7 में जागरण की और नेटवर्क एटीन की बड़ी हिस्सेदारी है।

Pankaj Bengani said...

इसमे कोई शक नही कि एनडीटीवी, आइबीएन आदि चैनलों के उपर किसी ना किसी विशेष समूह का बाअ प्रभाव रहता है.

पहले इंडिया टुडे बीजेपी की डपली बजाता है, अब उसकी ही बजाने लगा है.

इन लोगों का कोई ईमान नही होता. पैसा ही सबकुछ है.

पहले मै पत्रकारों को बहुत ईज्जत की नजरों से देखता है और उनके काम को बहुत मुश्किल और सराहनीय मानता था.

अब पिछ्ले कुछ वर्षो मे कई पत्रकारों को मिलने के बाद और ब्लोगिंग के माध्यम से हिन्दी पत्रकारों की सोच और समझ को जानने के बाद इनका असली चेहरा पहचानने लगा हुँ.

हिन्दी मिडीया के तो कई पत्रकार मुझे तो दिमागी तौर पर पैदल ही लगते हैं. ये लोग अपने आकाओं को खुश रखने के लिए अनर्गल बकवास करते रहते हैं. अब इनका कीचड ब्लोगिंग मे भी उछलता है.

Umesh said...

NDTV का जहा तक सवाल है, जहा तक राज्दीप और वर्षा दत का सवाल है, यह बिल्कुल तय है की इनकी रिपोर्टींग हिन्दु विरोधी है । यह भी तय है की यह लोग इसाईयो के लिए काम कर रहे है । यह भी तय है की यह लोग हिन्दु, मुस्लिम घृणा को फैलाने मे विशेष रुची लेते है । यह लोग मुस्लिम समर्थक नही है, बल्की इनकी इच्छा रहती है की यह लोग हिन्दु तथा मुस्लिमो को एक दुसरे के खिलाफ भडकाते रहे ।

रा स संघ को यह लोग प्रमुख हिन्दु संगठन के रुप मे प्रस्तुत करते है । इससे संघ की छाप हिन्दुओ मे अच्छी हुइ है । जबकी संघ एक घिसा पिटा संगठन है । एक कट्टर हिन्दु होने के बावजुद संघ के प्रति मेरी धारणा अच्छी नही है ।