Sunday, March 16, 2008

कर्ज लेकर चुकाते भी हो - महामूर्ख हो…

Bank Loan Waiver VDIS Chidambaram

हमारे महान वित्तमंत्री, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री और इकोनोमिक्स के विशेषज्ञ माने जाने वाले बाकी के दोनों वीर मोंटेकसिंह अहलूवालिया और मनमोहन सिंह ने किसानों के लिये 60 हजार करोड़ रुपये के कर्जों को माफ़ करने की घोषणा की है। राजकुमार राहुल गाँधी तो एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि ये कर्जमाफ़ी नाकाफ़ी है, और ज्यादा कर्ज माफ़ किये जाना थे (उसकी जेब से क्या जाता है?)। ये घोषणा चुनावी वर्ष में ही क्यों की है, यह सवाल करना बेकार है, लेकिन एकमुश्त कुछ भी बाँट देने की नेताओं की इस आदत ने ईमानदार लोगों के दिलोदिमाग पर गहरा असर किया है।

जनार्दन पुजारी का नाम बहुत लोगों को याद होगा। जिन्हें नहीं मालूम उनके लिये बता दूँ कि अस्सी के दशक में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ये महाशय वित्त राज्यमंत्री थे। इन्हीं महाशय को यह कालजयी काम (लोन बाँटने और उसे खा जाने) का सूत्रधार माना जा सकता है। हमारे यहाँ बड़े-बड़े हिस्ट्रीशीटर को जेलमंत्री और अंगूठाटेक को शिक्षामंत्री बनाये जाने का रिवाज है। पुजारी महाशय ने बैंकों पर दबाव डलवाकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में “लोन मेले” लगवाये थे। इन लोन मेलों की खासियत यह थी कि इनमें से 90% के लोन बैंकों को वापस नहीं मिले। लगभग ऐसी ही योजना है, पीएमआरवाय (PMRY), इसमें भी सरकार ने जमकर लोन बाँटे, उस लोन पर सबसिडी दी, और लोग-बाग करीब-करीब वह पूरा पैसा खा गये। कई बार तो मजाक-मजाक में लोग कहते भी हैं कि यदि पैसों की जरूरत हो तो PMRY से लोन ले लो। (कांग्रेस से घृणा करने के कई कारणों में से एक कारण यह भी है कि आजादी के बाद से इसने कभी सुशासन लाने की कोशिश नहीं की, हमेशा भ्रष्टाचारियों और बेईमानों को संरक्षण दिया)

इन्हीं की राह पर आगे चले चिदम्बरम साहब। नहीं, नहीं, मैं अभी 2007-08 की बात नहीं कर रहा। थोड़ा पीछे जायें सन 1997 में। चिदम्बरम जी एक बड़ी अनोखी(?) योजना लेकर आये थे, जिसे उन्होंने VDIS स्कीम का नाम दिया था, Voluntary Disclosure Income Scheme। इस नायाब योजना के तहत उन्होंने कालाबाजारियों, काला पैसा जमा करने वालों, आयकर चुराने वालों (मतलब बड़े-बड़े डाकुओं) को यह छूट प्रदान की थी कि वे अपनी काली कमाई जाहिर कर दें और उसका तीस प्रतिशत टैक्स के रूप में जमा कर दें तो बाकी की सम्पत्ति को सरकार “सफ़ेद” कमाई मान लेगी। लोगों ने इसका भरपूर फ़ायदा उठाते हुए लगभग 35000 करोड़ रुपये की काली सम्पत्ति जाहिर की और सरकार को 10000 करोड़ से अधिक की आय हो गई, है न मजेदार स्कीम !!! आंध्रप्रदेश के कांग्रेस नेता-पुत्र ने उस वक्त अपनी सम्पत्ति 700 करोड़ जाहिर की थी, यानी 250 करोड़ का टैक्स देकर बाकी की सारी धन-दौलत (जो उसने या उसके बाप ने भ्रष्टाचार, अनैतिकता और साँठगाँठ से ही कमाई थी) पूरी तरह सफ़ेद हो गई, उसका वह जो चाहे उपयोग करे।

कहने का मतलब यह कि हमारी नपुंसक सरकारों ने हमेशा जब-तब यह माना हुआ है कि “भई हमसे तो कुछ नहीं होगा, न तो हम काला पैसा जमा करने वालों के खिलाफ़ कुछ कर पायेंगे, न कभी भी हम बड़े-बड़े सफ़ेदपोश डाकुओं के खिलाफ़ कमर सीधी करके खड़े हो पायेंगे, हमारा काम है सत्ता पाना, भ्रष्टाचार करना और फ़िर चुनाव लड़कर ॠण / आयकर / लोन माफ़ करना…”। कानून का शासन क्या होता है, कांग्रेस कभी जान नहीं पाई न ही कभी उसके इसके लिये गंभीर प्रयास किये। हमेशा नेहरू-नेहरू, गाँधी-गाँधी का ढोल पीटने वाले ये गंदे लोग 1952 के सबसे पहले जीप घोटाले से ही भ्रष्टाचार में सराबोर हैं। इन्हीं की राह पकड़ी भाजपा ने (इसीलिये मैं इसे कांग्रेस की “बी” टीम कहता हूँ)।

मध्यप्रदेश सरकार में सबसे पहले अर्जुनसिंह ने झुग्गी-झोंपड़ियों को पट्टे प्रदान किये थे, यानी जो व्यक्ति जिस जमीन पर फ़िलहाल रहता है, वह उसकी हो गई, यानी सरकार ने मान लिया था, कि हममें तो अतिक्रमण हटाने की हिम्मत नहीं है, इसलिये जो गंद यहाँ-वहाँ बिखरी पड़ी है और भू-माफ़िया (जो हमें चन्दे देता है) चाहे तो सारी जमीन हड़प कर ले। इस महान(?) नीति का फ़ायदा यह हुआ कि रातोंरात लोगों ने हजारों की संख्या में झुग्गियाँ तान दीं, जिसे भू-माफ़िया का संरक्षण हासिल रहा, और बाद में उन्हें वहाँ से भगाकर कालोनियाँ काट दी गईं… अगला नम्बर था भाजपा के सुन्दरलाल पटवा का, सत्ता पाने के लिये उन्होंने सहकारी बैंकों से लिये गये किसानों के दस हजार तक के ॠण माफ़ कर दिये, आज दस साल बाद भी सहकारी बैंक उस झटके से नहीं उबर पाये हैं और यह नवीनतम जोर का झटका भी सबसे ज्यादा सहकारी बैंकों को ही झेलना पड़ेगा। गाँवों में किसान बैंक अधिकारियों से अभी से कहने लगे हैं कि “कैसी वसूली, काहे का पैसा, दिल्ली सरकार ने सब माफ़ कर दिया, वापस भाग जाओ…”। सिर धुन रहा है बेचारा वह किसान जिसने लोकलाज के चलते अपना कर्जा चुका दिया।

सभी जानते हैं कि इस प्रकार की कर्जमाफ़ी या आयकर / कालेधन में छूट का फ़ायदा सिर्फ़ और सिर्फ़ चोरों को ही मिलता है, ईमानदारी से कर्ज चुकाने वाला या आयकर चुकाने वाला इसमें ठगा हुआ महसूस करता है, वह भी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि अब मैं भी क्यों कर्ज चुकाऊँ? क्यों न मैं भी बिजली चोरी करूँ, आखिर अन्त में सरकार को यह सब माफ़ करना ही है। सबसे ज्यादा गुस्सा उस नौकरीपेशा व्यक्ति को आता है, उसका टैक्स तो तनख्वाह में से ही काट लिया जाता है।

इसलिये देश-विदेशों में बसे भाईयों और बहनों… भारत में तमाम सरकारों का संदेश स्पष्ट है, कि “हम नालायक, निकम्मे और नपुंसक हैं, कर चोरी करने वालों के खिलाफ़ हम कुछ नहीं कर पायेंगे तो माफ़ कर देंगे, बिजली चोरी हमसे नहीं रुकेगी तो बिल माफ़ कर देंगे, अतिक्रमण हमसे नहीं रुकेगा तो “सीलिंग एक्ट” के बारे में सर्वोच्च न्यायालय में हम बेशर्म बन जायेंगे, एक लाख से ज्यादा किसानों की आत्महत्या के बाद चुनाव जीतने के लिये कर्जमाफ़ी देंगे, आतंकवाद या नक्सलवाद को रोकना हमारे बस का नहीं है इसलिये हम तो x, y, z सुरक्षा ले लेंगे, तुम मरते फ़िरो सड़कों पर… गरज यह कि हमसे कानून-व्यवस्था के अनुसार कोई काम नहीं होगा… जो भी टैक्स आप चुकाते हैं या जो निवेश आप करते हैं अन्त-पन्त वह किसी न किसी हरामखोर की जेब में ही जायेगा… और यदि आप कर्ज लेकर उसे चुकाते भी हैं तो आप परले दर्जे के महामूर्ख हैं…


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5 comments:

gg1234 said...

Kitna dimaag kharaab ho aur kab tak ho...inn dino to maine news dekhna hi chchod diya hai, awwal to un mahan patrakaron ke amar wakya sahe nahi jaate, upar se is kism ki khabarein dekhne sunne ke baad mera bp chadh jata hai.
Maine duniya mein kul 5 desh dekhein hain Bharatwarsh ko chchod ke aur inn dinon main hong kong mein hoon. HK bhi british colony tha '97 tak aur kya badiya bana hua hai, aisa lagta hi nahi ki asia mein hain, ya India hi shayad aisa desh hai asia mein jo itni kharab haalat mein hai. Rashq hota hai in logon ki wyavastha dekh kar, har kuch itna saleekedaar aur tareeke se kiya hua. Kabhi lagta hai hamare yahan bhi democracy ki jagah aisa hi kuch hota to kya hi baat hoti, phir khayal aata hai ki hamare yahan aisa kuch hota to woh nehru-gandhi pareevar ka hi hota, so dakshini americi deshon ki tarah haalat hoti. Kabhi yun lagta hai ki kaash aazaadi 60 ya 70 ke dashak mein mili hoti, jab gore hamare yahan bhi achchi wyavastha ka nirmaan kar ke jaate. Udaharan ke liye dakshini Mumbai ka bahutera nirmaan goro ka kiya hua hai aur aaj bhi behatar haalat mein hai banisbat ke jo hamari sarkaron ne kiya hai suburbs mein...mujhe ab chup hona chahiye warna aur sochunga aur khoon jalega...

भुवनेश शर्मा said...

आपके इन्‍हीं तेवरों पर तो हम फिदा हैं.....

राज भाटिय़ा said...

सुरेश भाई आप लिखते हे तो ठोक कर लेकिन मेरे भाई थोडा ध्यान ने,जिन सफ़ेद पोशो के बारे मे आप लिखते हे श्याद उन्हे आप के सचाई से भरे लेख ना भाये,भगवान आप की कलम को लम्बी आयु दे, धन्यवाद

अरुण said...

हमने भी लोन लिया था भाइ,पर हमे तो पुरा ही जमा करना पडा,आज ये घाव आपने फ़िर से ह्जरे कर दिये,कोई जुगाड हो तो बताना लोन भी ले ले और वापस ना करना पडे ,आधा आपका..(हमारा कोई जुगाड नेताओ तक नही है ना.:))

Abhishek said...

ज़बरदस्त लिखा सुरेश भाई। लेकिन एक बात बताइए कि आज जब किसानों को लोन माफ़ी मिल रही है तभी सबको यह दिखाई दे रहा है। चिदमबरम साहब ने जब ३ साल पहले कार्पोरेट टैक्स में ढील दी थी तब कोई कुछ नहीं बोला। एक साल में २,४५००० करोड़ का चूना लगा था सरकार को।
लेकिन आपकी बात की तर्ज़ पर एक और उदाहरण: सरकार जब टेलिकॉम लाईसेन्स बाँट रही थी तब जिन लोगों ने इमानदारी से बोली लगाई वे हार गए, और वे जिन्होंने मन मरजी बोली लगाई और जीत गए और जीतने के बाद भी उतना पैसा नहीं दे सके, तो मीडिया ने दबाव डलवा के यह रकम कम करवा दी। पर किसी ने कुछ भी नहीं कहा.
मुझे समझ नहीं आता कि किसानों और उद्योगपतियों के लिए अलग अलग दृष्टिकोण क्यों!
लेकिन बात आपकी सही है, हमारे जैसे जो इमानदारी से टैक्स देते हैं बेवकूफ ही बनते हैं!