Saturday, February 2, 2008

वास्तुशास्त्र, फ़ेंगशुई की अ-वैज्ञानिकता और धंधेबाजी (भाग-4)

Vastushastra Feng-Shui Science & Business
(भाग-3 से आगे जारी… समापन किस्त)

फ़ेंगशुई की लोकप्रियता के कारण-

किसी भी धार्मिक विधि-विधान को पूरी शास्त्रीय पद्धति और सम्पूर्ण सामग्री के साथ किया जाना आवश्यक होता है, लेकिन स्वाभाविक ही इसमें कई व्यावहारिक कठिनाईयाँ आती हैं, जैसे यदि गाँव में कोई पंडित कथा करने जाये और पूजाविधि के लिये किसान से रेशमी वस्त्र, इत्र, चन्दन, बादाम आदि मांगने लगे तो वह बेचारा कहाँ से लायेगा, या फ़िर पूजा के दौरान किसान की पत्नी से संस्कृत के कठिन शब्द “स्मृतिश्रृति”, “फ़लप्राप्त्यर्थम”, “आत्मना” आदि बोलने को कहे तो कैसे चलेगा? इसलिये इस प्रकार की धार्मिक विधियों के लिये भी “तोड़” निकाले गये, सुपारी को मूर्ति मान लिया गया, कोई भी धुला हुआ कपड़ा, धोती मान लिया गया, मिठाई के प्रसाद की बजाय गुड़ ही मान लिया गया…आदि। जाहिर है कि जब शातिर लोग कानून में “पतली गली” ढूँढ निकालते हैं तो धर्म में भी यह तो होना ही था। कालान्तर में यही “तोड़” या टोटके मूल विधि से ज्यादा कारगर माने जाने लगे। वास्तुशास्त्र के हिसाब से यदि बदलाव के लिये घरों में तोड़फ़ोड़ रोकना हो तो इस प्रकार की फ़ेंग-शुई वाली “पतली गलियाँ” बड़े काम की होती हैं।

दक्षिणाभिमुख मकान है, कोई बात नहीं फ़ेंगशुई में दक्षिण दिशा शुभ मानी जाती है, वास्तु की “काट” के तौर पर यह हाजिर है। आग्नेय दिशा भारतीय वास्तु के मुताबिक अग्नि की दिशा मानी जाती है, लेकिन फ़ेंगशुई के मुताबिक यह दिशा सम्पत्ति की होती है और “लकड़ी” उसका प्रतिनिधित्व करती है। कुछ-कुछ टोटके दोनों “शास्त्रों” में समान हैं जैसे, दरवाजे पर घोड़े की नाल लटकाना, टूटा शीशा न वापरना आदि। शादी में कोई अड़चन है, चीनी बतखों की जोड़ी, डबल हैप्पीनेस सिम्बॉल, फ़ीनिक्स पक्षियों की जोड़ी घर में रखो… सन्तानोत्पत्ति में कोई समस्या है तो गोद में बच्चा खिलाने वाला “लॉफ़िंग बुद्धा” रखो… ऐसे कई टोटके प्रचलित हैं। हाँ, ये बात जरूर है कि इनके लिये 200 रुपये से लेकर 500 रुपये तक की कीमत चुकानी पड़ती है (कभी-कभी ज्यादा भी, क्योंकि धंधेबाज, माथा देखकर तिलक लगाता है, ज्यादा बड़ा माथा उतना बड़ा तिलक)

वास्तु के अनुसार कोई बदलाव करना हो तो मूल निर्माण में फ़ेरबदल भी करना पड़ सकता है, लेकिन उसके निवारण के लिये फ़ेंगशुई हाजिर है, अच्छी-बुरी तमाम ऊर्जाओं का संतुलन इसके द्वारा किया जायेगा। मुसीबत में फ़ँसा व्यक्ति “मरता क्या न करता” की तर्ज पर फ़ेंगशुई के टोटके आजमाता चला जाता है और उसकी जेब ढीली होती जाती है। जो होना है वह तो होकर ही रहेगा, ये उपाय करके देखने में क्या हर्ज है…की मानसिकता तब तक ग्राहक की बन चुकी होती है। ज्योतिष की तरह वास्तु भी “गाजर की पुंगी” होती है, बजी तो ठीक नहीं तो खा लेंगे।

आजकल के “फ़ास्ट” युग में व्यक्ति जल्दी बोर हो जाता है, उसे विविधता, नवीनता चाहिये होती है, ग्लैमर सतत बना रहना चाहिये यह बात मार्केटिंग गुरु अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिये जब टेस्ट मैच नीरस होने लगे, वन-डे आये और अब वन-डे के लिये भी समय नहीं बचा तो 20-20 क्रिकेट आ गया। भारतीय वास्तुशास्त्र लोगों को खर्चीला और बोर करने लगा था, उन्हें कोई “शॉर्टकट” चाहिये था, जिसकी पूर्ति के लिये फ़ेंगशुई हाजिर हुआ। ज्योतिषियों ने भी मौका साधा और वास्तुशास्त्र में फ़ेरबदल करके उसे “वास्तुज्योतिष” का एक नया नाम दे दिया। एक ही बात सभी के लिये शुभ या अशुभ कैसे हो सकती है, यदि किसी व्यक्ति की पत्रिका में “वास्तुसुख” ही नहीं है तो वह कितना भी शास्त्रोक्त विधि से मकान बनाये उसे शांति नहीं मिलेगी, यह घोषवाक्य नयेनवेले वास्तुज्योतिषियों ने बनाया। इसीलिये आजकल देखने में आया है कि जिस प्रकार स्टेशनरी के साथ कटलरी, किराने के साथ हार्डवेयर, एसटीडी के साथ झेरॉक्स, खेती के साथ मुर्गीपालन होता है ना… उसी प्रकार ज्योतिषी साथ-साथ वास्तु विशेषज्ञ भी होता ही है।

शिकागो में फ़ेंगशुई का प्रशिक्षण देने की एक संस्था है, जिसकी एक सेमिनार की फ़ीस 300 से 900 डॉलर तक होती है, उसमें “नकली” वास्तु और फ़ेंगशुई विशेषज्ञों से बचने की सलाह दी जाती है… कुल मिलाकर सारा खेल “माँग और आपूर्ति” के सिद्धांत पर टिका होता है। दुर्भाग्य यह है कि देश की अधिसंख्य जनता अंधविश्वासों की चपेट में है। जिस पढ़े-लिखे वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि वह समाज से कुरीतियों और अंधविश्वासों को दूर करेगा, वही रोजाना नकली टीवी चैनलों पर आ रहे नाग-नागिन, भूत-प्रेत-चुड़ैल, पुनर्जन्म, बाबा, ओझा, झाड़-फ़ूँक के “चमत्कारों” को न सिर्फ़ गौर से देखता है, बल्कि उन पर विश्वास भी कर बैठता है।

जबकि जरूरत इस बात की है कि देश की राजधानी में एक गोलाकार इमारत में बैठे 525 गधों की अक्ल को ठिकाने लाने के लिये ही सही, तमाम वास्तुशास्त्री मिलकर एक बड़ा सा “लॉफ़िंग बुद्धा” (Laughing Buddha) वहाँ लगायें, वैसे भी 100 करोड़ से ज्यादा जनता “वीपिंग बुद्धू” (Weeping Buddhu) बनकर रह ही गई है…।


सादर सन्दर्भ : प्रकाश घाटपांडे, महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति, पुणे एवं साधना ट्रस्ट प्रकाशन

, , , , ,, , , , ,, , , , , , , , , , , , , , , ,

3 comments:

Anonymous said...

Hi there,
read some gr8 information on
www.vastuconsultancy.com

do visit

akancha said...

aapka blog padha kaafi rochak hai... blogging ke 1 varsh poore hone par aapko badhai...
meri nazar

We Are Hindu said...



१. विश्वकर्मा
२. वास्तूशास्त्र
३. वास्तुकलेची गरज
४. वास्तूदेवता
५. `वास्तूदेवता' : सतत फिरणारी वास्तूदेवतेची स्पंदने एकत्र येऊन एका ठिकाणी तिची मूर्ती तयार होणे हीच `वास्तूदेवता'
६. मंदिराचे वास्तूशास्त्र
७. वास्तूशास्त्रावरही पाश्चात्त्य संस्कृतीचा पगडा
८. दिशांच्या दृष्टीने वास्तूशास्त्र व आधुनिक तज्ञांची मते
९. गृहप्रवेश व वास्तुशांती
१०. वास्तूदोष दूर करणे
११. वास्तूशुद्धीच्या काही सुलभ पद्धती
१२. लघुचित्रपट
अ. वास्तूशुद्धी व वाहनशुद्धी
आ. दिपपूजन
इ. रांगोळीचे महत्त्व
ई. तोरण बांधण्याचे महत्त्व