Sunday, February 17, 2008

महारानी सोनिया सिर्फ़ जीतती हैं, हारती कभी नहीं

Sonia Gandhi Only Wins Never Loses

आखिरकार लम्बी उहापोह के बाद पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ाये गये। सुनते-सुनते कान पक गये थे कि अब भाव बढ़ेंगे, फ़िर कहा जाता कि नहीं बढ़ेंगे, फ़िर मंत्रिमंडल विचार कर रहा है, फ़िर कैबिनेट की समिति के सामने मामला रखा गया आदि-आदि। इस सारे खेल-तमाशे में कांग्रेस के चारण-भाट-चमचों-भांडों ने इसमें भी अपनी महारानी के गुणगान करने और उनकी छवि चमकाने में कसर बाकी नहीं रखी। जब पेट्रोल के भाव बढ़े तो “बबुआ” प्रधानमंत्री को आगे कर दिया जाता है वामपंथियों का गुस्सा झेलने के लिये, लेकिन जब भाव नहीं बढ़ाये जाते तो वह सोनिया की गरीब समर्थक (?) नीतियों के कारण, यदि पेट्रोल के भाव अब तक नहीं बढ़े थे तो सिर्फ़ इसलिये कि सोनिया ने इसकी इजाजत नहीं दी थी, इसे कहते हैं छवि चमकाने की चमचागिरी। ये तो उनका हम पर अहसान भी है कि पहले वे पेट्रोल का भाव चार रुपये बढ़ातीं और फ़िर जनभावना(?) की कद्र करते हुए एक रुपया कम कर देतीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, अब वामपंथी तोपों के आगे मनमोहन सिंह को खड़ा कर दिया गया है।

महारानी कभी पत्रकार वार्ता नहीं आयोजित करतीं, सिर्फ़ अपने महल (10 जनपथ) से एक बयान जारी करती हैं, जिसे पत्रकारों पर अहसान माना जाना चाहिये। महारानी जी कभी किसी पत्रकार को व्यक्तिगत इंटरव्यू भी नहीं देतीं, यदि देती भी हैं तो ऐसे, जैसे “टुकड़ा” डाला जाता है, लेकिन मजे की बात तो यह है कि फ़िर भी वे मीडिया की प्रिय बनी हुई हैं, ऐसा क्यों? यह एक रहस्य है। जरा याद कीजिये हाल ही में सम्पन्न गुजरात चुनावों को… किसी भी चुनाव में दो मुख्य पार्टियाँ होती हैं और गुजरात में कांग्रेस-भाजपा का मुकाबला नहीं था, असली और सीधा मुकाबला था मोदी और सोनिया का। सोनिया गाँधी ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया, उनके लाड़ले ने कथित “रोड शो” किये, साम्प्रदायिकता का कार्ड खेला, लेकिन सब कुछ बेकार। गुजरात में कांग्रेस ने जमकर जूते खा लिये।

यहाँ तक तो चलो ठीक है कोई हारे, कोई जीते, लेकिन अब आगे देखिये, हमारे बिके हुए और धर्मनिरपेक्ष(?) मीडिया ने जीत का विश्लेषण इस बात से करना शुरु किया कि गुजरात चुनावों में मोदी जीते, कि केशुभाई हारे, राजनाथ सिंह का कद छोटा हुआ कि मोदी का कद बड़ा हुआ, आडवाणी जीते या वाजपेयी आदि-आदि बकवास, यानी महारानी सीधे “पिक्चर” से ही गायब। जब भी कोई टीम हारती है तो कप्तान आगे आकर जिम्मेदारी लेता है और प्रेस का सामना करता है, लेकिन गुजरात चुनाव के नतीजों के बाद सात रेसकोर्स पर सन्नाटा छा गया था, राहुल बाबा अपने दोस्तों के साथ अदृश्य हो गये थे, कांग्रेस कार्यालय पर कौवे उड़ रहे थे, सोनिया-राहुल कोई भी उस दिन कांग्रेस कार्यालय नहीं गया, पत्रकारों को यहाँ-वहाँ भगाया जा रहा था।

एक-दो दिन के बाद कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी को एक “बलि का बकरा” मिला, वह थे गुजरात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हरिप्रसाद सोलंकी!! बेचारे सोलंकी ने मिमियाते हुए प्रेस से कहा कि वे गुजरात की हार की जिम्मेदारी लेते हैं, साथ ही एक ज्ञान की बात भी उन्होंने बताई कि चूँकि गुजरात में भाजपा की सीटें पिछले चुनाव से कम हुई हैं इसलिये यह जीत भाजपा की नही, मोदी की है। जबकि सोनिया गाँधी ने जिन 13 विधानसभा क्षेत्रों में विशाल(?) आमसभायें की थीं उनमें से 8में कांग्रेस हार गई, लेकिन भला कोई फ़ड़तूस सा पत्रकार भी महारानी से इस सम्बन्ध में सवाल-जवाब कर सकता है? नहीं। अब यदि एक मिनट के लिये मान लें कि कांग्रेस गुजरात में जीत जाती तो क्या होता, अरे साहब मत पूछिये, सोनिया की वो जयजयकार होती कि आसमान छोटा पड़ जाता, उस हो-हल्ले में हरिप्रसाद सोलंकी नाम के जीव को सोनिया के पास तो क्या मंच पर भी जगह नहीं मिलती। धर्मनिरपेक्षता (?) की जीत का ऐसा डंका बजाया जाता कि आपकी कनपटी सुन्न हो जाती।

सोनिया हरेक योजना के मुख्य पृष्ठ पर होती हैं, हरेक कार्यक्रम वही शुरु करती हैं, चीन, जर्मनी के शासनाध्यक्षों से वही मिलती हैं, लेकिन भाजपा मनमोहन को “बबुआ प्रधानमंत्री” कहे तो उन्हें बुरा लगता है… तो एक बात आप सब लोग कान खोलकर, आँखे फ़ाड़कर स्वीकार कर लीजिये, कि इस देश में जो भी अच्छा काम हो रहा है, चाहे वह ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना हो या सूचना का अधिकार सभी सोनिया की मेहरबानी से मिल रहा है, और जो महंगाई और आतंकवाद बढ़ रहा है उसके जिम्मेदार मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल (नाम सुना हुआ सा लगता है ना) नाम के गृहमन्त्री हैं, जाहिर है कि महारानी को सिर्फ़ जीतने की आदत है, हारने की नहीं… चारण-भाट-भांड-चमचे-ढोल-मंजीरे जिन्दाबाद !!!


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7 comments:

mahashakti said...

पढ़ते पढ़ते हंसी आ गई, वास्‍तव में आपने बहुत अच्‍छा लिखा है। सच्‍चाई यही है। कि भाजपा लोक सभा में 138 सीट जीत कर हार जाती है और कांग्रेस 144 सीट जीत कर सरकार बना लेती है।

गांधीवाद से बाहन न निकली तो काग्रेस का पतन निश्चित है। लेख के लिये साधुवाद

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी भाई आप की कलम के हम कायल होगये. पहले मे पजांब केसरी के अशिबनी कुमार जी का लेख बहुत प्यार से बिना नगा पढता था, ओर यहां दोस्तो को भेजता था,सच मे अब आप के लेख का इन्त्जार करता हु
धन्यवाद

Gyandutt Pandey said...

महारनी सोनिया जिन्दाबाद!

अरुण said...

देखियेगा ! महारनी विकटोरिया के नाम पर ब्रिटेन से सरकार चलती थी,और आप है की एहसान ही नही मानते की महारानी इटली के बजाय यही आप के देश मे रहने आ गयी है..

संजय बेंगाणी said...

ऐसी महारानीयाँ बड़े भाग्य से मिलती है. भारत तो इस मामले में सदा भाग्यशाली रहा है, उसे शासक पैदा ही नहीं करने पड़ते, आयातीत मिल जाते है. वे भी महान प्रेमी और धर्मनिरपेक्ष.

भुवनेश शर्मा said...

श्‍श्‍श्‍श.......ऐसी बातें जोर से नहीं कहा करते.

anitakumar said...

सुरेश जी आप के लेख क हमें भी रोज इंतजार रहता है, बहुत खूब विश्लेशन है , मजा आ गया, धन्यवाद