Wednesday, February 6, 2008

राज ठाकरे की चिंतायें जायज हैं, तरीका गलत है…

Raj Thakre, UP Bihari Migration & Mumbai

“नीम का पत्ता कड़वा है, राज ठाकरे भड़वा है” (सपा की एक सभा में यह कहा गया और इसी के बाद यह सारा नाटक शुरु हुआ) यह नारा मीडिया को दिखाई नहीं दिया, लेकिन अमरसिंह को “मेंढक” कहना और अमिताभ पर शाब्दिक हमला दिखाई दे गया (मीडिया हमेशा इन दोनों शख्सों को हाथोंहाथ लेता रहा है)। अबू आजमी जैसे संदिग्ध चरित्र वाले व्यक्ति द्वारा “मराठी लोगों के खिलाफ़ जेहाद छेड़ा जायेगा, जरूरत पड़ी तो मुजफ़्फ़रपुर से बीस हजार लाठी वाले आदमी लाकर रातोंरात मराठी और यह समस्या खत्म कर दूँगा” एक सभा में दिया गया यह वक्तव्य भी मीडिया को नहीं दिखा। (इसी के जवाब में राज ठाकरे ने तलवार की भाषा की थी), लेकिन मीडिया को दिखाई दिया बड़े-बड़े अक्षरों में “अमिताभ के बंगले पर हमला…” जबकि हकीकत में उस रात अमिताभ के बंगले पर एक कुत्ता भी टांग ऊँची करने नहीं गया था। लेकिन बगैर किसी जिम्मेदारी के बात का बतंगड़ बनाना मीडिया का शगल हो गया है। अमिताभ यदि उत्तरप्रदेश की बात करें तो वह “मातृप्रेम,” “मिट्टी का लाल”, लेकिन यदि राज ठाकरे महाराष्ट्र की बात करें तो वह सांप्रदायिक और संकीर्ण… है ना मजेदार!!! मैं मध्यप्रदेश में रहता हूँ और मुझे मुम्बई से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन मीडिया, सपा और फ़िर बिहारियों के एक गुट ने इस मामले को जैसा रंग देने की कोशिश की है, वह निंदनीय है। समस्या को बढ़ाने, उसे च्यूइंगम की तरह चबाने और फ़िर वक्त निकल जाने पर थूक देने में मीडिया का कोई सानी नहीं है।


सबसे पहले आते हैं इस बात पर कि “राज ठाकरे ने यह बात क्यों कही?” इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जबसे (अर्थात गत बीस वर्षों से) दूसरे प्रदेशों के लोग मुम्बई में आने लगे और वहाँ की जनसंख्या बेकाबू होने लगी तभी से महानगर की सारी मूलभूत जरूरतें (सड़क, पानी, बिजली आदि) प्रभावित होने लगीं, जमीनों के भाव अनाप-शनाप बढ़े जिस पर धनपतियों ने कब्जा कर लिया। यह समस्या तो नागरिक प्रशासन की असफ़लता थी, लेकिन जब मराठी लोगों की नौकरी पर आ पड़ी (आमतौर पर मराठी व्यक्ति शांतिप्रिय और नौकरीपेशा ही होता है) तब उसकी नींद खुली। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वक्त के मुताबिक खुद को जल्दी से न ढाल पाने की बहुत बड़ी कीमत चुकाई स्थानीय मराठी लोगों ने, उत्तरप्रदेश और बिहार से जनसैलाब मुम्बई आता रहा और यहीं का होकर रह गया। तब सबसे पहला सवाल उठता है कि उत्तरप्रदेश और बिहार से लोग पलायन क्यों करते हैं? इन प्रदेशों से पलायन अधिक संख्या में क्यों होता है दूसरे राज्यों की अपेक्षा? मोटे तौर पर साफ़-साफ़ सभी को दिखाई देता है कि इन राज्यों में अशिक्षा, रोजगार उद्योग की कमी और बढ़ते अपराध मुख्य समस्या है, जिसके कारण आम सीधा-सादा बिहारी यहाँ से पलायन करता है और दूसरे राज्यों में पनाह लेता है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उत्तरप्रदेश और बिहार से आये हुए लोग बेहद मेहनती और कर्मठ होते हैं (हालांकि यह बात लगभग सभी प्रवासी लोगों के लिये कही जा सकती है, चाहे वह केरल से अरब देशों में जाने वाले हों या महाराष्ट्र से सिलिकॉन वैली में जाने वाले)। ये लोग कम से कम संसाधनों और अभावों में भी मुम्बई में जीवन-यापन करते हैं, लेकिन वे इस बात को जानते हैं कि यदि वे वापस बिहार चले गये तो जो दो रोटी यहाँ मुम्बई में मिल रही है, वहाँ वह भी नहीं मिलेगी। इस सब में दोष किसका है? जाहिर है गत पच्चीस वर्षों में जिन्होंने इस देश और इन दोनो प्रदेशों पर राज्य किया? यानी कांग्रेस को छोड़कर लगभग सभी पार्टियाँ। सवाल उठता है कि मुलायम, मायावती, लालू जैसे संकीर्ण सोच वाले नेताओं को उप्र-बिहार के लोगों ने जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया? क्यों नहीं इन लोगों से जवाब-तलब हुए कि तुम्हारी घटिया नीतियों और लचर प्रशासन की वजह से हमें मुंबई क्यों पलायन करना पड़ता है? क्यों नहीं इन नेताओं का विकल्प तलाशा गया? क्या इसके लिये राज ठाकरे जिम्मेदार हैं? आज उत्तरप्रदेश और बिहार पिछड़े हैं, गरीब हैं, वहाँ विकास नहीं हो रहा तो इसमें किसकी गलती है? क्या कभी यह सोचने की और जिम्मेदारी तय करने की बात की गई? उलटा हो यह रहा है कि इन्हीं अकर्मण्य नेताओं के सम्मेलन मुम्बई में आयोजित हो रहे हैं, उन्हीं की चरण वन्दना की जा रही है जिनके कारण पहले उप्र-बिहार और अब मुम्बई की आज यह हालत हो रही है। उत्तरप्रदेश का स्थापना दिवस मुम्बई में मनाने का तो कोई औचित्य ही समझ में नहीं आता? क्या महाराष्ट्र का स्थापना दिवस कभी लखनऊ में मनाया गया है? लेकिन अमरसिंह जैसे धूर्त और संदिग्ध उद्योगपति कुछ भी कर सकते हैं और फ़िर भी मीडिया के लाड़ले (?) बने रह सकते हैं। मुम्बई की एक और बात मराठियों के खिलाफ़ जाती है, वह है भाषा अवरोध न होना। मुम्बई में मराठी जाने बिना कोई भी दूसरे प्रांत का व्यक्ति कितने भी समय रह सकता है, यह स्थिति दक्षिण के शहरों में नहीं है, वहाँ जाने वाले को मजबूरन वहाँ की भाषा, संस्कृति से तालमेल बिठाना पड़ता है।

कुल मिलाकर सारी बात, घटती नौकरियों पर आ टिकती है, महाराष्ट्र के रेल्वे भर्ती बोर्ड का विज्ञापन बिहार के अखबारों में छपवाने की क्या तुक है? एक तो वैसे ही पिछले साठ सालों में से चालीस साल बिहार के ही नेता रेलमंत्री रहे हैं, रेलें बिहारियों की बपौती बन कर रह गई हैं (जैसे अमिताभ सपा की बपौती हैं) मनचाहे फ़्लैग स्टेशन बनवा देना, आरक्षित सीटों पर दादागिरी से बैठ जाना आदि वहाँ मामूली(?) बात समझी जाती है, हालांकि यह बहस का एक अलग विषय है, लेकिन फ़िर भी यह उल्लेखनीय है कि बिहार में प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं, रेल तो उनके “घर” की ही बात है, लोग भी कर्मठ और मेहनती हैं, फ़िर क्यों इतनी गरीबी है और पलायन की नौबत आती है, समझ नहीं आता? और इतने स्वाभिमानी लोगों के होते हुए बिहार पर राज कौन कर रहा है, शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, तस्लीमुद्दीन, आनन्द मोहन आदि, ऐसा क्यों? एक समय था जब दक्षिण भारत से भी पलायन करके लोग मुम्बई आते थे, लेकिन उधर विकास की ऐसी धारा बही कि अब लोग दक्षिण में बसने को जा रहे हैं, ऐसा बिहार में क्यों नहीं हो सकता?

समस्या को दूसरी तरीके से समझने की कोशिश कीजिये… यहाँ से भारतीय लोग विदेशों में नौकरी करने जाते हैं, वहाँ के स्थानीय लोग उन्हें अपना दुश्मन मानते हैं, हमारी नौकरियाँ छीनने आये हैं ऐसा मानते हैं। यहाँ से गये हुए भारतीय बरसों वहाँ रहने के बावजूद भारत में पैसा भेजते हैं, वहाँ रहकर मंदिर बनवाते हैं, हिन्दी कार्यक्रम आयोजित करते हैं, स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, जब भी उन पर कोई समस्या आती है वे भारत के नेताओं का मुँह ताकने लगते हैं, जबकि इन्हीं नेताओं के निकम्मेपन और घटिया राजनीति की वजह से लोगों को भारत में उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं मिल सकी थी, यहाँ तक कि जब भारत की क्रिकेट टीम वहाँ खेलने जाती है तो वे जिस देश के नागरिक हैं उस टीम का समर्थन न करके भारत का समर्थन करते हैं, वे लोग वहाँ के जनजीवन में घुलमिल नहीं पाते, वहाँ की संस्कृति को अपनाते नहीं हैं, क्या आपको यह व्यवहार अजीब नहीं लगता? ऐसे में स्थानीय लोग उनके खिलाफ़ हो जाते हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा? हमारे सामने फ़िजी, मलेशिया, जर्मनी आदि कई उदाहरण हैं, जब भी कोई समुदाय अपनी रोजी-रोटी पर कोई संकट आते देखता है तो वह गोलबन्द होने लगता है, यह एक सामान्य मानव स्वभाव है। फ़िर से रह-रहकर सवाल उठता है कि उप्र-बिहार से पलायन होना ही क्यों चाहिये? इतने बड़े-बड़े आंदोलनों का अगुआ रहा बिहार इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ़ आंदोलन खड़ा करके बिहार को खुशहाल क्यों नहीं बना सकता?

खैर… राज ठाकरे ने हमेशा की तरह “आग” उगली है और कई लोगों को इसमें झुलसाने की कोशिश की है। हालांकि इसे विशुद्ध राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है और जैसा कि तमाम यूपी-बिहार वालों ने अपने लेखों और ब्लॉग के जरिये सामूहिक एकपक्षीय हमला बोला है उसे देखते हुए दूसरा पक्ष सामने रखना आवश्यक था। यह लेख राज ठाकरे की तारीफ़ न समझा जाये, बल्कि यह समस्या का दूसरा पहलू (बल्कि मुख्य पहलू कहना उचित होगा) देखने की कोशिश है।


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21 comments:

mamta said...

वैसे उत्तर प्रदेश मे बहुत सालों तक कांग्रेस भी राज कर चुकी है।

और सबसे बड़ी बात क्या इस तरह से समस्या हल हो जायेगी।

दीपक भारतदीप said...

आपके सटीक और निष्पक्ष विश्लेषण को कोई चुनौती नहीं दे सकता पर इस मामले ने छठपूजा पर जो प्रतिकूल टिप्पणियाँ हुईं उसकी वजह से यह मामला अधिक बिगडा. टेक्सी और रेहडी वालों पर इस तरह हमला तो किसी भी हालत में जायज नहीं माना जा सकता. फिर आप पूरे महाराष्ट्र की नहीं मुंबई की बात कर रहे हैं तो अगर बाहर से लोग वहाँ नहीं आते तो क्या वह इतना बृहद रूप ले सकता था, और क्या वह भारत की आर्थिक राजधानी बन सकता था?जवाब भी मैं देता हूँ कभी नहीं! यह भी विचारणीय प्रश्न है. इसके बावजूद आपने कुछ जोरदार मुद्दे उठाये हैं इसमें संशय नहीं है. आपके लेख प्रभावित करते हैं.

चैतन्य मनोजय said...

आपने जो कुछ लिखा है पुरी तरह से सही लिखा है. धन्यवाद

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी आप ने आईने का दुसरा ओर सही रुख दिखाया हे,मुझे भारत की राजनीति के बारे पुरा ग्याण नही हे,लेकिन जो हो रहा हे उस से दिल बहुत दुखी होता हे,हमारे देश की जनता थोडी जगरुक हो, ओर सभी ( गरीब ओर अमीर )अपने वोट का इस्तेमाल करे, तो शायद ऎसी घटानये ना ही हो, आप ने लिखा सही हे देखे ओर भी ऎसा ही सोचते हे या नही.

Gyandutt Pandey said...

सोचने की ओर ठेलती है आपकी यह उत्कृष्ट पोस्ट। यद्यपि राजनैतिक दलदल और क्षेत्रीयवाद ऐसा मुद्दा है कि दूर ही रहने को मन करता है।

अरुण said...

सुरेश भाइ नेताओ ते तजो बैर ओ प्रीत
काटे चाटे स्वान के दूह भाति विपरीत"

संजय बेंगाणी said...

कुछ ऐसे ही विचार मन में उठे थे, मगर पोस्ट नहीं कर पाया, आपका लेख देख कर कुछ राहत मिली और न लिख पाने का अफ़्सोस नहीं रहा.

बहुत सही लिखा है. बधाई. यही मेरे विचार है.

आलोक कुमार said...

मुंबई में क्या केवल गैर मराठी ही घुसे? पुणे, नासिक, नान्देड, कोल्हापुर, शोलापुर से कोई नहीं आया? गुजरात से नहीं आया? बिहार के लोगों पर ही गुस्सा क्यों? और, घुलने मिलने पर इतनी तवज्जो क्यों?

उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग पलायन क्यों करते हैं, और घुलते मिलते क्यों नहीं हैं, यह दोनो ही प्रश्न इस संदर्भ में अप्रासंगिक हैं।

मैं तो चाहूँगा कि मेरे शहर में मराठी, मलयाली आ के बसें, वह भी बिना घुले मिले। तभी मेरे शहर का हृदय विशाल होगा।

घर आया मेरा परदेशी said...

राज ठाकरे की खुजली यह है उसको कोई कुत्ता भी नही पूछ रहा है तो लाइमलाइट मे आना है. वैसे ये युप्पी बिहार वाले दूध के धूले नही है. और इनके ये जो दल्ले नेता है वे भी.

दहाड़ said...

राज ठाकरे ठीक कर रहे हैं,जातिवाद,तुष्टिकरण की राजनीति के जन्मदाताओं को उन्हीं की भाषा में दिया गया सही जवाब.
अमर सिंह,माया,मुलायम करें तो वोट बैंक पका रहे हैं, और ठाकरे करें तो राष्ट्र के लिये घातक..नियम सबके लिये एक से होने चाहिये

दहाड़ said...

राज ठाकरे ठीक कर रहे हैं,जातिवाद,तुष्टिकरण की राजनीति के जन्मदाताओं को उन्हीं की भाषा में दिया गया सही जवाब.
अमर सिंह,माया,मुलायम करें तो वोट बैंक पका रहे हैं, और ठाकरे करें तो राष्ट्र के लिये घातक..नियम सबके लिये एक से होने चाहिये

Sanjay Sharma said...

सुरेश जी , रोष मे आप भी संयमित भाषा नही ला पाए , मिडिया और नेताओ का रोष आपके भड़ास को सही दिशा देती हुई सही टाइम पर नही कहा जा सकता . सवाल कुछ ऐसा ही है क्या मुम्बई को सजाने वाले को ही सजा दिया जाए ? क्या अकेले ठाकरे परिवार को ही उ.प्र. और बिहार से परेशानी है ? क्या जो लाठी माँगा या बाटने को बोला वो भी सरे आम पिटा जायेगा ? नही न ? फ़िर महाराष्ट्र और बिहार मे सिर्फ़ रोजगार के अलावा कोई फर्क नही है .
रेलवे बिहार की बपौती ? क्या हो गया आपको ? शरद पवार जी क्या कर गए है किसान के लिए ? और श्रीमान जी , कुता तो मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे चर्च की उच्ची दीवारों पर भी अपनी टांग उच्ची कर जाता है .

राज का राज क्या है ? सब जानते हैं , सहमत है हम ,आप केवल मजदूर ही नही निर्माता भी साथ साथ खदेडे .
इतना तो विश्वास करिये ही बिहार ,झाड़खंड के किसी भी शहर से कोई भी मुम्बईकार भगाया नही जायेगा .नया सवेरा बिहार सरकार भी चाह रहा है . राज को राज ही रखिये एक साथ चार चार राज्य का नव निर्माण अपने हाथ मे लेने वाले नेता को रेल मंत्रालय क्या प्रधान मंत्रालय दिलवाया जाए .

Anonymous said...

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Gaurav said...

The main issue here is that of migration of one social group to another and conflicts which arise out of it.
http://gasharma.blogspot.com/2007/03/shiv-sena-politics-and-anatomy-of.html

But you have got many facts wrong. Fist of all, we are not talking about migration of pepole from
one country to another. We are talking about migration of people to a city which is a business
hub of India. It is a city which was created by migrants long before Maharashtra state existed.So you need to ask who is a local?

Secondly, Mumbai never had any Marathi culture to begin with. It always had a reflection of cluture that India is, a mosiac of many diverse identities and languages. It was Shiv Sena who forced a Marathi hue to Mumbai and MNS wants to go even further. Leave emotions aside. What would we get if we convert Mumbai into a marathi bastion? If we force every migrant to speak in Marathi? Why should we kill Mumbai and make it into another Chennai? If migrants are celebrating UP divas in Mumbai what is wrong with that? Indians celebrate India's republic day in US. Oh come on, now, if we start thinking like this, we will soon
have 26 countries in India. If we start accusing communities like Biharis then somebody can point fingers towards Marathis also. A UP wala might say that Marathis, are very lazy and sometime too proud to do work which others come and do better. You see, there would not be any stopping and we wil have a civil war.

Also, you seem to indicate that migrants have created problems in Mumbai. That is utter nonsense.
Real estate prices are function of market forces. Todaay many prosperous Mharastrians are buying
land in Goa and other parts of country, so is it wrong?

Vivek said...

I think if educated person like you will fall in the trap of dirty leaders like Raj then what can be said about common marathi man. He should be Hero for common Marathi as he is trying to protect his interest? But is it true? If your remove outsiders from here then will it remain the same? Any country, state, city, organization succeeds if there is competitive environment and it selects the best irrespective of caste, creed, colour,region or nationality of the person. Nobody succeeds in the protectionist environment. If you remove outsiders then probably Mumbai will become just like any other city in India. Mulayam, Lalu, Mayawati are worst leaders in the country who always divide people on the lines of caste/religion and Raj is also not better than them as he is dividing people on the lines of regionalism. Ask yourself, how will you feel if somone came to you and say that MP is for Hindi speaking people only you should go back to maharashtra, even after spending so much time there. Definitely it will hurt you and you will be able to understand the pain of north indian living in Mumbai. You cannot compare immigration to other country with people moving within the same country. Govt organizations failed because they see person's caste/religion/region before his talent whereas other organizations suceeds because they see your talent only so if you are favoring jobs for locals first then you cannot oppose reservation on other criteria as well and see the result yourself. See the histroy of Mumbai. It was always a cosmopolitan city where any hard working person has opportunity to succeed and we should leave it like that irrespective of what Raj, Amar etc say.

Anonymous said...

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों मादरचोद हैं वोट के लिए यह लोग अपनी माँ बहन को भी खुद ही चोद्द डालेंगे

Anonymous said...

सब कुछ वोट की खातिर वोट के लिए आज के हमारे नेता कुछ भी कर शकते हैं कोई भी मेहनत करके कमाने वाला लड़ाई झगडा कभी नहीं चाहता मेहनत करके कमाने वाले उधार का नसीब लेकर कभी पैदा नहीं होता जो लोग यह सब कर रहे हैं वोह करते क्या हैं गुंडागर्दी के सिवाए खाली दिमाग सैतान का घर एषे लोगों को तो खुले आम फांशी पे लटका देना चाहिए

Anonymous said...

राज ठाकरे ने पिछले ४० वर्षों में क्या किया है महारास्त्र के लिए सिवाए महारास्त्र में मुतने के मादरचोद हिजरा रंडी का औलाद साला

First all of us human also Indian ....help to all if anybody need your help...not to kill....

Jai Hind

Anonymous said...

Lund hai nahi aur chodne nikal pada hai motherfucker raj thakare

Cha said...

राज ठाकरे को थप्पड़ मारने पर इनाम !
वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के एक प्रोफेसर ने उत्तर भारतीयों का अपमान करने और उन पर हमला करवाने वाले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राज ठाकरे को सार्वजनिक तौर पर थप्पड़ मार कर उन्हें अपमानित करने वाले किसी भी व्यक्ति को एक करोड़ रुपये का इनाम देने की घोषणा की है।

एक विज्ञप्ति जारी कर यहां मराठी एवं उत्तर भारतीय एकता के नेता प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र ने राज ठाकरे के हाल के उत्तर भारतीय विरोधी बयानों की कड़ी भ‌र्त्सना की है और आम लोगों से उनके इन बयानों एवं उत्तर भारतीयों पर मुंबई एवं अन्य स्थानों पर हुए हमलों के खिलाफ सड़कों पर आने की अपील की है।

उन्होंने घोषणा की कि राज ठाकरे के देश को तोड़ने वाले इन कदमों के खिलाफ उन्हें सार्वजनिक तौर पर थप्पड़ मार कर उनका अपमान करने वाले को वह और उनका संगठन एक करोड़ रुपये का ईनाम देंगे। इस संगठन के दूसरे प्रमुख नेता अशोक पांडेय ने कहा कि राज ठाकरे ने जिस तरह अपने अनाप-शनाप बयानों से एक मराठी एवं उत्तर भारतीयों की मुंबई में हत्या करवाई है वह जघन्य अपराध है और ऐसा उन्होंने सिर्फ अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए किया है, लिहाजा वह सार्वजनिक तौर पर अपमान के योग्य हैं। उन्होंने कहा कि देश की एकता तोड़ने का प्रयास जघन्य अपराध है और इसे तोड़ने की किसी को भी इजाजत नहीं दी जा सकती। नेताद्वय ने कहा कि देश की एकता के लिए वह कुछ भी करने को तैयार हैं।

sd said...

You have tried to justify the action of Raj T. There may be lot of things done by lot of netas but tring to divide on the bases of language or region is exactly what Britisher did to us and we did not learn it seems. When Indians go abroad and treated like second class, we do not like it but we do the same thing ourselves within our country. If non marathius migrated to Bombay is a problem, then lot of marathis also moved to diff parts of India and should be considered as burden. But the fact is all this migration contributes to the economy of that region. Delhi has the same problem but no agitation like Bombay. Raj T is stupid and do not have any sence of reality. All he wants is publicity and thanks to media he is getting it. I think he should be ignored by everyone who beleives in Bharat and lets for a change give priority to Bharat rather than Marathi, Panjabi etc.