Tuesday, January 29, 2008

वास्तुशास्त्र, फ़ेंगशुई की अ-वैज्ञानिकता और धंधेबाजी (भाग-1)

Vastushastra Feng-Shui Science & Business

विगत लगभग 15-20 वर्षों से यह देखने में आया है कि हमारे समाज के कथित “एलीट” वर्ग और साथ ही बहुत से तथाकथित “बुद्धिजीवी” भी “वास्तुशास्त्र” नामक आँधी की चपेट में हैं। लगातार मीडिया, टीवी और चिकनी पत्रिकाओं द्वारा लोगों को समझाया जा रहा है कि “वास्तुशास्त्र” स्थापत्य और वास्तु का एक बहुत प्राचीन “विज्ञान”(?) है, जो सदियों पहले भारत में ही उदय हुआ था, और जो बीच के कई दशकों तक गायब रहा, अब अचानक 80 के दशक के बाद इस “विज्ञान” की धमाकेदार पुनर्वापसी हुई है। बताया जाता है कि इससे लोगों का भला होगा, उनके मन में शांति आयेगी, घर में सुख-समृद्धि आयेगी… आदि-आदि। जबकि असल में जिन दशकों में यह कथित विज्ञान “वास्तुशास्त्र” गायब हो गया था, उसी कालखंड में मनुष्य ने विज्ञान के सहारे विभिन्न खोजें करके जीवन को आसान, सुखमय बनाया है और तरक्की की। वास्तुशास्त्र के गायब रहने के दौर में ही विज्ञान ने सामाजिक जीवन को भी काफ़ी सरल बनाया, बच्चों के टीके विकसित करके उन्हें अकाल मृत्यु से बचाया, बीमारियों के इलाज खोजे गये… कहने का मतलब यह कि जब वास्तुशास्त्र नामक विज्ञान नहीं था तब भी दुनिया अपनी गति से ही चल रही थी, लेकिन 80 के दशक से “वास्तु” नामक जो धारा चली, उसमें कई पढ़े-लिखे भी बह गये, बगैर सोचे-समझे, बगैर कोई तर्क, वाद-विवाद किये।


“यह शास्त्र हमारे पुराणों में वर्णित है और पूरी तरह से वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है”, यह घोषवाक्य ज्योतिष के समर्थन में भी लगातार कहा जाता है, वास्तु के समर्थन में भी, क्योंकि इस घोषवाक्य के बिना पढ़े-लिखे वर्ग का समर्थन, उससे हासिल बाजार और तगड़े नोट हासिल करना मुश्किल है। इस लेख में कोशिश की गई है कि वास्तुशास्त्र के विज्ञान होने सम्बन्धी दावों की पड़ताल की जाये। जैसा कि ज्योतिष सम्बन्धी लेखमाला (देखें ब्लॉग का साइड बार) में भी लिखा जा चुका है कि विज्ञान की परिभाषा ऑक्सफ़ोर्ड के एक शब्दकोष के अनुसार – “ज्ञान की एक शाखा, विशेषकर वह जो वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हो, एक संगठित संस्था द्वारा एकत्रित प्रयोग आधारित जानकारी पर आधारित सूचनाओं का भंडार”। विज्ञान की इस परिभाषा को “वास्तुशास्त्र” पर लागू करके देखते हैं कि इनमें से कोई भी सिद्धांत इस कथित शास्त्र पर लागू होता है या नहीं? विज्ञान में जब कोई प्रयोग होता है तो उसके विभिन्न चरण होते हैं, निरीक्षण या अवलोकन, खोज, प्रयोग, निष्कर्ष और अन्तिम निष्कर्ष। इसी तरीके से किसी भी ज्ञान को पुख्ता तौर पर साबित किया जा सकता है। किसी भी शास्त्र को “वैज्ञानिक” बताने या उसे ऐसा प्रचारित करने के लिये जाहिर है कि उसे विज्ञान की कसौटी पर कसा जाना ही होगा, क्योंकि ऐसा तो हो नहीं सकता कि एक तरफ़ तो किसी बात को विज्ञान कहा जाये और उसी बात को विज्ञान की सीमाओं से परे बताया जाये??

वास्तुशास्त्र को मानना अथवा न मानना एक व्यक्तिगत मामला हो सकता है ठीक ज्योतिष की तरह, लेकिन जब इसे विज्ञान कहा जाता है तब इसका स्वरूप व्यक्तिगत नहीं रह जाता, ठीक ज्योतिष की तरह ही। आज की तारीख में विज्ञान की उपलब्धियों से कोई भी इंकार नहीं कर सकता, इसलिये वास्तुशास्त्र विज्ञान है या नहीं यह परखने में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिये।

सृष्टि के प्रारम्भ से ही प्रत्येक जीव अपने-अपने रहने के लिये भिन्न-भिन्न तरीके और अलग-अलग प्रकार के निवास की व्यवस्था रखता रहा। चिड़ियों ने घोंसला बनाया, जानवरों ने गुफ़ायें चुनीं, चींटियों ने बिल बनाये, आदि। इस प्रकार हरेक ने अपना “घर” बनाया और सदियों तक इसमें कोई विशेष बदलाव नहीं किये। मानव चूँकि सबसे ज्यादा बुद्धिसहित और चतुर प्राणी रहा इसलिये उसने अपनी जरूरतों और वक्त के मुताबिक अपने “घर” निर्माण में प्रगति और बदलाव किये। “वास्तुशास्त्र” अर्थात “गृहनिर्माण विज्ञान”, अक्सर कहा जाता है कि वास्तुविज्ञान एक “नैसर्गिक-प्राकृतिक विज्ञान” है, वास्तुशास्त्र मुख्य तौर पर पाँच मूलभूत तत्वों धरती, आकाश, हवा, अग्नि और जल, को ध्यान में रखकर बनाया गया है, लेकिन सिर्फ़ इसी से तो यह “वैज्ञानिक” सिद्ध नहीं हो जाता? वास्तु समर्थक अक्सर तर्क देते हैं कि इसका उदगम वैदिक काल में हुआ, और इसके सन्दर्भ ॠग्वेद में भी मिलते हैं। वास्तु समर्थक ॠषि भृगु द्वारा रचे गये संस्कृत श्लोकों को इसका आधार बताते हैं, वे कहते हैं कि वैदिक काल में चौड़ी सड़कें, हवाई जहाज, बड़ी भव्य अट्टालिकायें आदि हुआ करती थीं, और पश्चिम में आज जो भी शोध हो रहे हैं, सभी खोजें आविष्कार आदि चरक संहिता, सुश्रृत संहिता और वेदों में पहले से ही हैं, लेकिन उस वैदिक काल में साइकल जैसी मामूली चीज थी या नहीं इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता? प्राचीन ज्ञान की एक शाखा आयुर्वेद आज तक बची हुई है सिर्फ़ सतत प्रयोगों, समयानुकूल बदलावों और उसके जनउपयोगों के कारण। ठीक यही बात यदि वास्तुशास्त्र और ज्योतिष शास्त्र भी करते तो आज की तारीख में इन पर इतना अविश्वास करने का कोई कारण नहीं था, लेकिन वास्तुशास्त्र को एक प्राचीन ज्ञान या साहित्य मानकर उसे “जैसा का तैसा” सच मान लिया गया। वास्तुशास्त्र को जनसामान्य में लोकप्रिय बनाने के लिये और शिक्षित वर्ग को भी उसमें शामिल करने के लिये विज्ञान की कुछ मूलभूत बातों को इसमें शामिल किया गया, जैसे हवा की दिशा और गति, सूर्य की दिशा, आठों दिशायें, गुरुत्वाकर्षण आदि, इन्हीं सब बातों से यह तय किया जाता है कि कोई घर, वास्तु या कार्य पवित्र है या नहीं, धन-सम्पत्ति आयेगी या नहीं, खुशी और सुख का माहौल रहेगा या नहीं, सफ़लता मिलेगी या नहीं… आदि-आदि। लेकिन हकीकत में विज्ञान की कसौटी पर इसे नहीं कसा गया, न ही इसके परिणामों पर कोई विवाद, बहस या चर्चा की गई। अधिकतर तर्कों को भगवान, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य जैसी बातों के आधार पर खारिज कर दिया गया।

वास्तुशास्त्र में गृह निर्माण के समय “दिशाओं” पर सर्वाधिक महत्व और जोर दिया जाता है, ताकि वातावरण और भूगोल के हिसाब से प्रकृति का अधिक से अधिक लाभ लिया जा सके। प्राचीन वास्तुशास्त्र “मायामत” में पृथ्वी के चुम्बकीय प्रभाव और उसकी शक्ति को लेकर कहीं नहीं कहा गया है कि इससे किसी व्यक्ति की तरक्की रुक सकती है या इस प्रभाव के कारण उसकी समृद्धि पर कोई असर पड़ता है। लेकिन आधुनिक(?) वास्तुशास्त्र हमें बताता है कि यदि तूने यह नहीं किया तो तेरे बच्चे की मौत हो जायेगी, तूने वह नहीं किया तो तुझे धंधे में भारी नुकसान हो सकता है, आदि। “मायामत” वास्तुशास्त्र का प्रादुर्भाव दक्षिण में स्थित केरल में हुआ, जबकि “विश्वकर्मा प्रकाश” का उत्तर में। इन दोनों शास्त्रों को विज्ञान की कसौटी पर कसा जाये तो एकदम विरोधाभासी नतीजे मिलेंगे। भिन्न-भिन्न शास्त्र(?) दिशाओं के हिसाब से अलग-अलग जातियों और धर्मों पर भी प्रभाव बताते मिल जायेंगे, देवताओं के भी स्थान और घर निश्चित कर दिये गये हैं। जबकि विज्ञान इस प्रकार का भेदभाव किसी के साथ नहीं करता, न ही जाति, न धर्म, न देवताओं के स्थान आदि को लेकर। यदि कोई बात वैज्ञानिक है तो उसका प्रभाव प्रत्येक मनुष्य पर सर्वव्यापी और देशों की सीमाओं से परे होना चाहिये, यह पहली बात ही वास्तुविज्ञान(?) पर लागू नहीं होती। अगले भाग में कुछ वास्तु के बारे में और थोड़ा फ़ेंग-शुई के ढकोसले के बारे में…

तब तक इस बात पर विचार कीजिये कि, यदि भारत सरकार विदर्भ के किसानों को अरबों रुपये का पैकेज देने की बजाय उनके झोंपड़ों को “वास्तुशास्त्र”(?) के हिसाब से डिजाईन करवा देती, तो न वे आत्महत्या करते, न ही उनका जीवन इतना दुष्कर होता…

एक बात और, एक प्रसिद्ध फ़ैक्ट्री में श्रमिक समस्या हल करने के लिये “वास्तुशास्त्र” का सहारा लिया गया, वास्तुविद जो कि ज्योतिषी भी था (यानी डबल-डोज) ने बताया कि फ़ैक्ट्री की खुशहाली के लिये पश्चिमी दिशा में स्थित आठ पेड़ों को काटा जाना जरूरी है, पेड़ काटने के बाद बीमार फ़ैक्ट्री बन्द हो गई, पेड़ भी कटे और मजदूरों की नौकरी भी गई… फ़िलहाल इतना ही, बाकी अगले भाग में…

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7 comments:

Neeraj Rohilla said...

ये पोस्ट तो बहुत पसन्द आयी, आगे की किस्त का इंतजार रहेगा ।

आप साईकल की बात करते हैं, कुछ लोगों की माने तो परमाणु बम बनाने का तरीका भी है वेदों पर बस देखने वाली नजर चाहिये :-)

Chetan said...

Vastu Shastra i have been believin since i myself experienced.

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mamta said...

गृह-निर्माण के लिए तो हमेशा लोग दिशाओ का ध्यान रखते है।हमने अपने घर मे हमेशा सुना है की घर का मुँह पूरब दिशा की और होना चाहिऐ।

अगली कड़ी का इंतजार रहेगा।

संजय बेंगाणी said...

उम्मदा.

किसने कहा पढ़ा लिखा ज्यादा वैज्ञानिक तरिके से सोचता है. किसी चीज को भी विज्ञान कह दो बेवकुफ बनाने के लिए.

अरुण said...

पोस्ट बहुत हिट जा रही है पहले ये बताओ दुकान के किस कोने मे बैठ कर लिखा है,पानी किधर था ,हीटर किधर की तरफ़ मुह किये और कहा पर रखा था.हम भी ट्राई करेगे..फ़ैगशुई का ये फ़ंडा..

manofdesire said...

Vastu and Astrology are based on calculation.some times science is not correct like weather forecasting.but astrology tells right about it.Astrology and Vastu are parts of our hindu mythology.so we should respect it.i suggest you to study it and when you are in trouble,use with trust and you will come out from the problem,one more thing if you know what will happen with you after 10 to 20 years using your science pls let me know.....

Asir Bharti said...

I can observe that you are a good writer. But please don't write on those subjects (e.g.Vastu shastra)which you have not thoroughly read and understood. This way you may loose credibility.