Phonetics, Language, Alphabets in Hindi
(भाग-१, भाग-२, भाग-३ और भाग-४ से आगे जारी...)
अब तक पिछले चार भागों में हम उच्चारण के मूलभूत सिद्धांत, विभिन्न उच्चारक, उनकी स्थितियाँ, व्यंजन और अनेक परिभाषाओं के बारे में जान चुके हैं। इस भाग में हम जानेंगे स्वरों के बारे में।
पहले भाग में मैंने स्वरों की जो सूची दी थी, उसमें अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ और लृ को स्थान दिया था। इस पर कुछ पाठकों ने शंका व्यक्त की थी कि ‘अं’ और ‘अः’ को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया है। इसका कारण समझने की कोशिश करें–
हमारी स्वर-व्यंजन और वाणी उच्चार शास्त्र में ‘स्वर’ की परिभाषा है ‘स्वयं राजते इति स्वराः’ अर्थात जिस वर्ण का स्वयं का (बिना किसी दूसरे वर्ण की मदद के) पूर्ण उच्चार होता है उसे ‘स्वर’ कहते हैं, या कहें कि ‘स्वयं प्रकाशमान’, जबकि व्यंजन में कोई ना कोई स्वर मिला हुआ होता है। यदि सिर्फ़ व्यंजन लिखना हो तो उसमें हलन्त लगाना आवश्यक है जैसे ‘क्’ जबकि ‘क’ में ‘अ’ का मिश्रण हो जाता है। स्कूल में हमें पढ़ाया जा चुका है कि “जब किसी वर्ण का उच्चार लम्बा खींचा जाता है और यदि उस वर्ण का उच्चार अन्त तक वैसा ही रहता है तो तय होता है कि वह स्वर है या व्यंजन। अर्थात ‘अ’ या ‘आ’ को लम्बा खींचें तो ‘अ~~~~~अ’ ही रहता है, जबकि ‘क’ को खींचने पर अन्त में ‘अ’ सुनाई देता है (हालांकि इस व्याख्या के अनुसार ‘ऐ’ और ‘औ’ भी फ़िट नहीं बैठते, क्योंकि ऐ के उच्चार में भी ‘अ-इ-इ-इ-इ’ और औ में ‘अ-उ-उ-उ-उ’ होता है, लेकिन इसका कोई स्पष्टीकरण मुझे नहीं मिल सका)।
तीसरी व्याख्या के अनुसार, जैसा कि हमने पहले व्यंजनों के समय देखा था कि व्यंजन का उच्चार करने के लिये वाणी तन्त्र के दो उच्चारकों का पास आना आवश्यक होता है, मतलब व्यंजनों के बोले जाते समय भीतर से आने वाली हवा को थोड़े से प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है, जबकि स्वरों के मामले में ऐसा नहीं होता, सिर्फ़ ‘उ’ के उच्चारण में होंठ थोड़े से गोल होकर पास आते हैं, लेकिन फ़िर भी ‘प’, ‘फ़’ जितने नहीं। इस व्यवस्था के अनुसार हमें निम्न बातें ध्यान में आती हैं-
(१) व्यंजनों के समय उच्चारक एकदम पास आते हैं, स्वरों के समय नहीं और अर्धस्वरों के समय उनके बीच की दूरी स्वरों से ज्यादा लेकिन व्यंजनों से कम होती है।
(२) ‘अं’ और ‘अः’ इन सारी परिभाषाओं में से किसी में भी सही नहीं बैठते। ‘अं’ मे अनुस्वार जबकि ‘अः’ में विसर्ग कि मिलावट आवश्यक ही है। इसलिये ‘अं’ और ‘अः’ को स्वर मानना उचित नहीं है।
(३) ऋ और लृ का का उच्चार आजकल हम लोग भ्रष्ट रूप में ‘रु’ और ‘ल्रु’ करने लगे हैं, लेकिन शास्त्रों में इनका उल्लेख स्वरों के रूप में ही है, इसका अर्थ यह हो सकता है कि ‘र’ बोलते समय हमारी जीभ जो ऊपर तालू को स्पर्श करती है, उसे बिना उपर स्पर्श किये ‘रु’ बोलकर देखें तो हमें पता चलता है कि ‘ऋ’ और ‘लृ’ का उच्चारण ग्रंथों में कुछ अलग तरह से किया जाता था।
इस प्रकार से स्वर हुए – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, ऋ और लृ।
व्यंजनों सम्बन्धी लेख में हमने स्पर्श, ईशत्स्पर्श और ईशद्विवृत्त नामक तीन प्रयत्नों के बारे में जाना था, अब स्वरों के बारे में विचार करते समय निम्न प्रयत्नों को देखेंगे-
१. विवृत्त – इसका अर्थ है उच्चारकों का एक दूसरे से बिलकुल स्पर्श ना होना। इसमें ‘अ’ छोड़कर सभी स्वर आते हैं।
२. संवृत्त – ‘अ’ स्वर बाकी स्वरों की तरह एकदम खुले गले से नहीं आता, हमारी जीभ का पिछला हिस्सा थोड़ा सा कंठ ढँक जाता है, इसीलिये इसे ‘संवृत्त’ कहते हैं।
स्वरों का एक और वर्गीकरण उनके बोले जाने के समय के अनुसार किया जा सकता है, जिसे र्हस्व, दीर्घ और प्लुत कहते हैं। र्ह्स्व स्वर के लिये एक मात्रा, दीर्घ स्वरों के लिये दो मात्रा और प्लुत स्वर के लिये तीन मात्रा का समय लगता है। ‘एक मात्रा’ का मतलब कितना समय? यह तय करने के लिये प्राचीन उच्चारविज्ञानियों ने पक्षियों की आवाज के मुताबिक समय तय किया है, यह क्रिया उच्चारण करके ही अनुभव की जा सकती है, र्ह्स्व और दीर्घ स्वरों का अन्तर तो स्पष्ट है ही, दीर्घ स्वर को और कुछ समय लम्बा खींचें तो वह प्लुत बन जाता है। इसका वर्गीकरण ऐसा किया जा सकता है–
(अ) र्हस्व – अ, इ, उ, ऋ, लृ
(ब) दीर्घ – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
(स) प्लुत – आ३, ई३, ऊ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३
इसमें ३ का चिन्ह ३ मात्रा या वह समय प्रदर्शित करता है। ‘ओम्’ को भी लिखते समय हम ‘ओ३म्’ ऐसा लिखते हैं, जिसमें ‘ओ’ प्लुत है, जिसे ३ मात्राओं तक खींचा जाना है।
इस प्रकार अब वर्णमाला के सभी वर्ण और उनकी परिभाषायें इस प्रकार समायोजित की जा सकती हैं-
स्वर-
१) संवृत्त, ऱ्हस्व-अ
२) विवृत्त, ह्रस्व - इ, उ, ऋ, ऌ
३) दीर्घ- आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ
४) प्लुत- आ३, ई३, ऊ३, ॠ३,ॡ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३
व्यंजन -
१) स्पृष्ट- क् से म्
२) ईषद्विवृत्त- श्, ष्, स्, ह्
३) ळ्
अर्धस्वर-
१) ईषत्स्पृष्ट-य्, र्, ल्, व्
अब कुछ बातें वर्णमाला के बाहर भी मौजूद कुछ उच्चारों के बारे में। आमतौर पर जो वर्णमाला हमारे सामने है वह संस्कृत और हिन्दी में पाई जाती है, लेकिन इनके अलावा भी कुछ उच्चार होते हैं और उनके लिये अक्षरचिन्ह भी अलग हैं। पाश्चात्य साहित्य के अनुसार इन्हें चार भागों में बाँटा जा सकता है-
Affricates - च़, ज़, झ़,
Flaps – ड़, ढ़,
महाप्राण – न्ह, म्ह, व्ह, ल्ह, ण्ह, र्ह्, और
पराश्रित- अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय
(१) Affricates - 'च्, ज्, झ्' हा गुट और 'च़, ज़, झ़' हा गुट के बीच का अन्तर बोलते समय स्पष्ट हो जाता है, उदाहरण – वजन और वज़न, खाक और ख़ाक, जंग और ज़ंग आदि,
(२) Flaps – इनका अन्तर समझने के लिये उच्चारण ही करके देखना पड़ेगा, उदाहरण के तौर पर – डमरू और गाड़ना, ढोंग और चढ़ाई। ड्, ढ् और ड़ और ढ़ का उपयोग कैसे और कहाँ किया गया है इसका विचार करने पर पता चलता है कि ड् और ढ् अधिकतर शुरुआत में ही आते हैं जैसे, डमरू, डिगाना, डामर या ढोल, ढोकला, ढाल आदि, लेकिन जब यही वर्ण शब्द के अन्त में आता है तो वह Flap बन जाता है, जैसे – ताड़, झाड़, लाड़, या दाढ़, कढ़ी, बाढ़ आदि, लेकिन यदि ड् और ढ् के पहले कोई अनुनासिक आ जाता है तो फ़िर वह अपने मूल स्वरूप में ही रहता है, जैसे- सूंड, ठंडा, खंड, षंढ, पंढरपुर, आदि।
(३) महाप्राण – इन शब्दों का उपयोग अधिकतर संस्कृत या मराठी में होता है। महाप्राण मतलब हैं तो यह संयुक्ताक्षर लेकिन इन्हें एक ही वर्ण माना जाता है, जैसे- गुन्हा, कर्हाड (इसमें ‘र’ आधा है), व्हाट आदि।
(४) पराश्रित – पराश्रित का सीधा सा अर्थ है, “दूसरे का सहारा लेने वाले शब्द”, ऐसे शब्द जो अकेले आ ही नहीं सकते, इन्हें उच्चार करने के लिये दूसरे वर्ण का आधार चाहिये ही होगा। स्वर, व्यंजन और अर्धस्वर ‘स्वयंभू’ होते हैं, बाकी बचे वर्ण अनुस्वार, विसर्ग, उपध्मानीय और जिव्हामूलीय सभी पराश्रित होते हैं। जैसे कि विसर्ग हमेशा स्वरों के बाद ही लगता है, अन्त में आने वाला स्वर विसर्ग में समाहित हो जाता है और उसका उच्चारण ‘ह्’ हो जाता है, जैसे- देवः = देवह्, जनाः = जनाह्, कविः= कविहि या भानुः=भानुहु आदि, जबकि ‘ऐ’ और ‘औ’ के बाद आने वाले विसर्ग का उच्चार देवैः= देवैहि, गौः= गौहु (सन्दर्भ – सुगम संस्कृत व्याकरण)।
इस प्रकार हमने देखा कि वर्णमाला के बाहर भी विविध वर्ण हैं जिन्हें मैंने अपनी लेखमाला में स्थान देने की कोशिश की है, क्योंकि यह हमारे रोजमर्रा के उपयोग के वर्ण हैं खासकर उर्दू शब्दों में इनका समावेश आमतौर पर होता है जैसे- ख़ादिम, क़ज़ा, ग़ज़ल आदि। इसलिये इन्हें छोड़ने या भाषा में इनका योगदान निश्चित ही बहुत है।
धन्यवाद। इस लेखमाला को फ़िलहाल यहीं समाप्त करता हूँ, ताकि कुछ दूसरे विषयों पर भी ध्यान दे सकूँ। इस लेखमाला का अध्ययन, लेखन, अनुवाद और वाचन काफ़ी थकाने वाला रहा, साथ ही पाठकों की ठंडी प्रतिक्रिया ने भी मुझे इन लेखों को जल्दी समेटने के लिये प्रेरित किया, ताकि कहीं पाठक अधिक बोर न हो जायें (यदि फ़िर कभी समय मिला और रुचि हुई तो विभिन्न ‘व्यंजनों’ की अलग-अलग विस्तारित परिभाषायें, उनके गूढ़ार्थ और उपयोग के बारे में लिखूँगा, लेकिन अभी बस यहीं तक)।
बहरहाल, यह एक प्रयास था जिसके द्वारा हमारी महान भाषा की वर्णमाला और उच्चारण का वैज्ञानिक शोध और प्राचीन उच्चार परम्परा के बारे में जो कुछ भी मैं बटोर सका, वह अपने पाठकों तक पहुँचाऊँ, और जैसा कि मैने पहले भी कहा कि यदि इन लेखों को पढ़कर दो-चार लोगों की भी हिन्दी या लेखन या उच्चारण सुधर जाता है तो भी मैं अपने को सफ़ल मानूँगा...
कुछ सन्दर्भों के बारे में एक बार फ़िर से – मराठी “उपक्रम”, सुश्री राधिका (मुम्बई विश्वविद्यालय), An Introduction to Sanskrit Lingustics – Murti, सुगम संस्कृत व्याकरण- प्र.शं.जोशी, राजस्थान पत्रिका विशेषांक.... तथा कुछ ऐसे सन्दर्भ जिनके सिर्फ़ नाम और उल्लेख ही मिले, वे हैं – Sanskrit Phonetics – विधाता मिश्रा और Phonetics in Ancient India- W.S. All)..... समाप्त।
पढ़ने के लिये बहुत धन्यवाद....
Hindi Language, Vowels, Vocal, Phonetics, Alphabets, Learn Hindi, Vocabulary, Linguistic Science, Phonetic Science, उच्चारण, स्वर, व्यंजन,उच्चार क्रिया, वर्णमाला, भाषा विज्ञान, हिन्दी सीखें, हिन्दी शब्द, व्याकरण,
