Tuesday, October 30, 2007

अंधविश्वासों की लहरें और पढ़ा-लिखा तबका

Superstitions, Education and Urban Community

मध्यप्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल में इन दिनों “हरे काँच की चूड़ियाँ पहनो” नामक अंधविश्वास चल रहा है। एक अफ़वाह के अनुसार यदि महिलायें हाथों में हरे काँच की चूड़ियाँ पहनेंगी तो उनके सुहाग, बच्चे और घर-द्वार सुरक्षित रहेगा। यदि किसी महिला ने यह नहीं पहनीं तो भारी अनिष्ट हो जायेगा। मजे की बात तो यह है कि गाँवों की अनपढ़ महिलाओं के साथ-साथ पढ़ी-लिखी, शहरी और कम्प्यूटर का उपयोग करने वाली मूर्ख महिलायें भी इस अंधविश्वास के चक्कर में पड़ रही हैं। “नारी शक्ति” और अबला-सबला आंदोलन चलाने वाली, सिन्दूर और मंगलसूत्र को गुलामी की निशानी मानने वाली कई महिलायें भी इसकी चपेट में हैं। चूड़ी निर्माता और विक्रेता जमकर माल कूट रहे हैं।

इसी प्रकार कुछ माह पहले इसी अंचल में “जलेबी” नामक अंधविश्वास चला था, जिसके अनुसार ढाई सौ ग्राम जलेबी को पूजा करके नर्मदा में विसर्जित करना था, जिससे कि महिलाओं/लड़कियों के भाईयों के जीवन पर आया संकट टल जाये। हालत यह हो गई थी कि नर्मदा नदी में जलेबी की चाशनी और मैदे की लुगदी के कारण घोर प्रदूषण के चलते प्रशासन को अन्त में यह चेतावनी देना पड़ी कि इस प्रकार की “जलेबी विसर्जन” ना किया जाये अन्यथा कड़ी कार्रवाई की जायेगी। भाई लोगों ने जमी-जमाई दुकानदारी छोड़कर नर्मदा किनारे जलेबी की दुकानें खोल ली थीं, अफ़वाह चलाई, महिलाओं को बेवकूफ़ बनाया, और अच्छा कमाया। नर्मदा नदी प्रदूषित होती है तो होती रहे, उनकी बला से, यूँ भी साल में दो बार गणेश और दुर्गा पूजा की लाखों मूर्तियाँ प्रवाहित करके पानी गन्दा करते ही हैं।

इसी प्रकार उज्जैन या आसपास के नगरों में धर्मप्राण(?) जनता को मूक प्राणियों, गाय-ढोर को चारा खिलाने का शौक होता है, उनका मानना है कि इससे पुण्य(?) मिलता है। अब यहाँ गणित यह खेला जाता है कि आवारा पशु, गाय-बैल आदि सड़क पर छोड़ दिये जाते हैं, फ़िर वही व्यक्ति खुद एक ठेला लेकर घास बेचने बैठ जाता है, घास बेच कर भी कमा लेता है, और अपने आवारा पशु को फ़ोकट में चारा भी खिलवा लेता है, सड़क पर गाय-बैल गोबर करते रहें, लोग टकरा-टकरा कर गिरते रहें, न प्रशासन को कोई मतलब होता है, ना ही धर्मालुओं(?) को, आखिर “धर्म” का मामला जो ठहरा। एक बात तो सिद्ध है, कि शिक्षा प्रसार का अंधविश्वास से कोई लेना-देना नहीं होता। हमारे एक पड़ोसी जो Ph.D. वाले डॉक्टर हैं, मुहूर्त देखकर घर से निकलते हैं, इसी प्रकार एक और MD डॉक्टर हैं जो पंचांग देखकर महत्वपूर्ण ऑपरेशन करते हैं, अब इसे क्या कहा जाये?

इस लगातार जारी मूर्खता का एक और प्रमाण हैं इंटरनेट पर सतत जारी ई-मेल अंधविश्वास अभियान, जिसमें आपसे कहा जाता है कि यह मेल जादू और चमत्कार भरी है, इसे आप बीस लोगों को Forward करेंगे तो आपको खजाना और सुख-समृद्धि प्राप्त होगी, पढ़े-लिखे लोग बगैर सोचे-समझे इसे Forward कर भी देते हैं। मेरे पास जब ऐसी कोई मेल आती है तो सबसे पहले उसे “कचरा पेटी” (Delete) का रास्ता दिखाता हूँ (वह भी Shift दबाकर)| लेकिन सिवाय माथा पीटने के या फ़िर हँसने के और क्या चारा रह जाता है? जब शिक्षित होकर भी लोगबाग इस तरह की हरकतें करते हैं तो गुस्सा भी आता है, शर्म भी आती है, और कभी-कभी लगता है कि क्यों हम खामख्वाह गाँव वालों और अनपढ़ों के पीछे पड़े रहते हैं, पहले शहरों में तो लोग छींकने और बिल्ली के रास्ता काटने जैसे घटियातम अंधविश्वासों से बाहर निकलें। लेकिन इसका कोई इलाज नहीं है।

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Monday, October 29, 2007

ज्योतिषियों को चुनौती और अनसुलझे जवाब

Challenge Astrology Unanswered Astro Questions

ज्योतिष के सिद्धांतों और उनकी अप्रासंगिकता तथा अवैज्ञानिकता को लेकर पिछले दो लेखों के अभी तक मुझे सन्तोषजनक जवाब प्राप्त नहीं हुए हैं। संतोषजनक मतलब तार्किक और वैज्ञानिक जवाब। जो प्रतिक्रियायें अभी तक मुझे मिली हैं, उनमें से अधिकतर का सार यही हैं कि “ज्योतिष तो एक महान शास्त्र है”, “हमारे पूर्वजों और ऋषि-मुनियों ने जिस पद्धति को विकसित किया, वह जरूर अच्छी ही होगी”, “जानकारी तो नहीं है, लेकिन ज्योतिष सत्य ही होगा”... आदि... तात्पर्य यह कि मेरे प्रश्नों का सोच-विचार कर तर्कसम्मत जवाब देने की बजाय अधिकतर लोगों ने “ज्योतिष तो सच ही है, हमारा विश्वास (या अंधविश्वास?) है, हमारे बुजुर्ग कभी गलत नहीं होते....” आदि-आदि की टेक ही लगाये रखी। एक ज्योतिषी महोदय ने समस्त ज्योतिष विरोधियों को नास्तिक ठहराते हुए तमाम चुनौतियाँ ही दे डालीं.... अस्तु। अब पुनः एक बार विद्वान ज्योतिषियों की सुविधा (या असुविधा?) के लिये मैं अपने सवाल दोहरा देता हूँ-

प्रश्न १ – यदि दूरस्थ ग्रहों का प्रभाव मानव पर पड़ता है, तो कैसे पड़ता है? क्या इस सम्बन्ध में ज्योतिषियों ने कोई अध्ययन किये हैं, यदि हाँ तो इन्हें किस जर्नल में प्रकाशित किया है? किस ग्रह का असर कितना होता है, क्या यह विस्तार से बताया गया है?

प्रश्न २ – क्या राहु-केतु नामक ग्रह होते हैं? या यह काल्पनिक हैं? यदि होते हैं, तो सौरमंडल में उनकी सही स्थिति और कोण आदि क्या है? और यदि काल्पनिक हैं, तो उनका असर कुंडलियों और जीवन पर कैसे पड़ता है? क्यों राहु और केतु का दशा काल 18 और 7 वर्ष रखा गया है? कोई अध्ययन या वैज्ञानिक ग्रन्थ हो तो “रेफ़रेन्स” दें।

प्रश्न ३ – एक ही स्थान, एक ही समय, एक ही परिवार, एक ही पृष्ठभूमि में जन्म लेने वाले दो जुड़वाँ बच्चों के कर्म, आचरण, शिक्षा, विवाह, बच्चों का जन्म और मृत्यु आदि में अन्तर क्यों आना चाहिये? (“भाग्य में लिखा है” नामक जवाब छोड़कर)

फ़लज्योतिष या भविष्यवक्ताओं को असुविधा में डालने के लिये कई ऐसे विषय हैं, जिन पर ज्योतिषी सीधे तौर कुछ भी बोलने से बचते रहते हैं, इसीलिये कई लोग अब यह मानने लगे हैं कि ज्योतिष या भविष्यकथन आदि के जो दावे किये जाते हैं वह दरअसल Law of Probability (संभाव्यता के सिद्धांत) पर आधारित होते हैं। यदि मेरे पास दस व्यक्ति प्रश्न पूछते हैं कि गुरुजी मेरी भैंस खो गई है, कहाँ मिलेगी? और मैं उन दसों व्यक्तियों को कहूँ कि जाओ बच्चा, तुम्हारी भैंस पूर्व दिशा में मिलेगी... तो इस बात की संभावना 40% से भी अधिक है कि सच में भैंस पूर्व दिशा में ही मिले, अर्थात मेरे चार भगत तो पक्के बन गये, बाकी के छः लोग भी अपने मन को किसी कारण से समझा लेंगे, लेकिन “बाबा” को दोष कतई नहीं देंगे। यदि भविष्यकथन इतना ही सही होता तो तमाम ज्योतिषी शेयर मार्केट में पैसा लगाकर रातोंरात अरबपति हो जाते, लेकिन ऐसा है नहीं, वरना मुकेश अम्बानी की जन्मपत्रिका देखकर कोई महान ज्योतिषी आसानी से बता सकता है कि “रिलायंस पेट्रोलियम” का शेयर अगले तीन साल में कितना “रिटर्न” देगा, ऐसा दावा अभी तक किसी ज्योतिषी से सुनने में तो नहीं आया है।

ज्योतिष के मूल सिद्धांत अर्थात “जन्म समय” जिस पर सारा ज्योतिष टिका हुआ है, जब वही विवादों के घेरे में हो तब सही भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है। जन्म समय किसे माना जाये? जब गर्भ में पहली बार कोई जीव जन्म लेता है तब (यह तो खुद माँ-बाप भी नहीं बता सकते)...यदि यह समय जीवात्मा के जीवन का नहीं माना जाता तो फ़िर कम से कम गर्भधारण का आठवाँ महीना तो माना ही जाना चाहिये, क्योंकि तब तक बच्चे की सुनने-समझने की शक्ति विकसित हो चुकी होती है (वरना अभिमन्यु के चक्रव्यूह भेद वाली “थ्योरी” धराशायी हो जायेगी)... या उस समय को माना जाये जब वह गर्भाशय से बाहर आता है तब... या फ़िर उस समय को जब उसकी नाल काटी जाती है और पहली बार उसके मुँह से आवाज निकलती है तब... ज्योतिषियों में इस पर मतभेद हैं, तो पहले यह बात तो स्पष्ट हो, फ़िर बाकी की बातें... क्योंकि इन सभी समय में कहीं नौ माह का, कहीं दो चार मिनट का तो कहीं-कहीं दस पन्द्रह मिनट का अन्तर भी आना स्वाभाविक है। जब हमारे ज्योतिषी बन्धु इस बात पर जोर देते हैं कि हर पन्द्रह मिनट में ग्रहों की स्थिति बदल जाती है, तब इतने बड़े अन्तर से तो कुछ का कुछ हो सकता है। और इस बात की भी क्या गारंटी है कि नर्स ने प्रसूतिगृह से बाहर आकर जो समय बताया वही सही हो, उसमें भी हेर-फ़ेर हो ही सकता है... फ़िर कैसे सही भविष्य देखा जायेगा?

अब बात आती है चुनौतियों की, डॉ.अब्राहम कोवूर (भारत में जन्मे और फ़िलहाल श्रीलंका में स्थाई निवासरत) नामक एक वैज्ञानिक ने वर्षों पहले भारत में चल रहे अंधविश्वासों और “बाबागिरी” के चमत्कारों(?) को लेकर कुछ चुनौतियाँ दी थीं, जैसे बन्द कमरे में कथित चमत्कार दिखाना, कम से कम कपड़ों में चमत्कार दिखाना, अंगूठी, भभूत जैसी छोटी चीजों की बजाय हवा में से कद्दू, गन्ना जैसी वस्तुयें प्रकट करना आदि शामिल थीं (इन चुनौतियों को स्वीकार करने और करके दिखाने पर इनाम राशि उस वक्त एक लाख रखी थी, जो अब बढ़कर पाँच लाख कर दी गई है)। आज तक इन चुनौतियों को किसी ने स्वीकार नहीं किया है। १ से ३ दिसम्बर १९८५ को तीसरे अखिल भारतीय ज्योतिष सम्मेलन में इन्हीं डॉ.कोवूर ने ज्योतिषियों को भी निम्नलिखित चुनौतियाँ दी थीं-

(१) ज्योतिषियों को दस अचूक जन्मसमय की कुंडलियाँ दी जायेंगी और साथ ही दस हाथों के निशान कागज पर दिये जायेंगे, उन्हें सिर्फ़ यह बताना होगा कि सम्बन्धित व्यक्ति जीवित है या मृत? तथा स्त्री है या पुरुष?

(२) इसी प्रकार दूसरे दस कुंडलियों और अंगूठे के निशान के समूह के आधार पर सम्बन्धित व्यक्ति के शिक्षण, विवाह, दुर्घटनायें, नौकरी/व्यवसाय और मृत्यु की बाबत भविष्यवाणियाँ करना हैं, यदि अस्सी प्रतिशत भी सही निकल जायें तो हम (अर्थात महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति) इसे विज्ञान मान लेंगे।

(३) ऊपर दी गई पद्धति के अनुसार विख्यात ज्योतिषियों (जिनका चयन भी ज्योतिषियों की महासमिति ही करे) को अलग-अलग कमरों में बैठाकर भविष्यकथन करवाया जायेगा। इससे यह सिद्ध होगा कि भारत के नामचीन ज्योतिषियों द्वारा एक जैसी कुंडलियों और समय के आधार पर किया गया कथन सत्य से कितना दूर होगा और उन्हीं महानुभावों के आपस में एक-दूसरे के विरोधी कथन आने पर समाज के सामने असलियत आ सकेगी।

लेकिन इस चुनौती को स्वीकार करने के लिये आज तक कोई तैयार नहीं हुआ है...फ़िर वे इसे विज्ञान कैसे कह सकते हैं? अभी तो मेरे पास कई प्रश्न हैं, फ़िलहाल लेख के शुरुआत में दिये हुए तीन प्रश्नों का उत्तर जान लूँ, और इन चुनौतियों के बारे में महान लोगों के विचार देखूँ, फ़िर आगे और सवाल होंगे... ज्योतिषीगण कृपया इनके जवाब दें, चाहे तो अपने ब्लॉग पर ही दें, या मुझे व्यक्तिगत मेल करें...
(सन्दर्भ : महाराष्ट्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति एवं प्रकाश घाटपांडे, पुणे)

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Friday, October 26, 2007

१०,००० हिट्स और मेरी ब्लॉग यात्रा

10000 hits and Blogging

अमूमन मैं अपने ब्लॉग का “स्टैट काऊँटर” नहीं देखता (ब्लॉग पर काफ़ी नीचे लगा हुआ है, और उस पर मेरी निगाह नहीं पड़ती), लेकिन कल जब अचानक उस पर मेरी नजर पड़ी तो मैं चौंक गया क्योंकि वह दस हजार का आँकड़ा पार कर गया था। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। फ़िर मैंने हिसाब लगाना शुरु किया, कि २६ जनवरी २००७ को ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखने के बाद अभी तो मात्र नौ महीने ही हुए हैं और हिट्स का आँकड़ा दस हजार पार कर गया, मतलब लगभग औसतन एक हजार से अधिक पाठक प्रत्येक माह में। यानी लगभग ३५ पाठक रोजाना (मन में सोच रहा हूँ कि “not bad”)। मुझे इस प्रगति से सन्तुष्ट होना चाहिये, क्योंकि २३ पाठक तो मेरे “सब्स्क्राईबर” हैं (यह तो तकनीकी लोग ही बतायेंगे कि सबस्क्राईब करने वाले की हिट्स भी इसमें शामिल होती हैं या नहीं, क्योंकि आमतौर पर सब्स्क्राइब करने वाला दोबारा ब्लॉग पर हिट नहीं करता)

मैं “नेटवर्किंग” के मामले में बहुत कमजोर हूँ। जिस तन्मयता और लगन से “उड़न तश्तरी” टिप्पणियाँ करते हैं, वैसी यदि मैं करता तो न जाने यह आँकड़ा कहाँ का कहाँ होता (कई वरिष्ठ ब्लॉगरों की यह सलाह है कि यदि हिट्स की संख्या बढ़ानी हो तो दूसरों के चिठ्ठों पर जा-जाकर टिप्पणियाँ करो)। लेकिन मैं इस मामले में बहुत नालायक हूँ, ब्लॉग पढ़ तो लेता हूँ, लेकिन “बहुत अच्छा”, “अच्छा लिखा है”, “मजा आ गया” जैसी औपचारिक टिप्पणियाँ मुझसे होती ही नहीं, जब तक लिखने वाले ने ऐसा कुछ ना लिखा हो जिससे कोई नई बात सूझे, या कोई विवाद की स्थिति हो तब तक मैं टिप्पणी कर ही नहीं पाता (इसे मेरा स्वभाव कहा जा सकता है), ना ही मैंने कोई “ब्लॉग-रोल” बनाया हुआ है, ना ही मैंने अपने चिठ्ठे पर “मेरे पसन्दीदा” नामक लिस्ट लगाई हुई है (इसका समय ही नहीं मिल पाता)। अपने छोटे से काम-धन्धे में से बड़ी मुश्किल से समय चुराकर ब्लॉग लिखना पड़ता है (घर पर कम्प्यूटर नहीं है), अब ब्लॉग लिखूँ, उस ब्लॉग पर रिसर्च करूँ, फ़िर उसे तरतीबवार जमाऊँ और पोस्ट करूँ, तो फ़िर दूसरे ब्लॉग पर टिप्पणी करने का समय ही नहीं मिल पाता (आशा है मित्रगण मुझे माफ़ करेंगे)।

लेकिन इन नौ-दस माह के ब्लॉग प्रवास के दौरान “उड़न-तश्तरी”, “ई-पंडित”, “सागर भाई”, "पंगेबाज" आदि का नियमित स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहा, वरना मैं तो अखबारों में ही लिखने में मस्त था। ब्लॉगिंग नाम की “खुजली” जब से लगी है, न दिन को चैन है ना रातों को आराम.... जब कोई विषय दिमाग में घूमता है, तब से लेकर उस पर शोध, अध्ययन और उसके पोस्ट होने तक की “प्रसव-पीड़ा” का बयान करना मुश्किल है। इस कालखंड में “सोनिया गाँधी” वाली सीरिज पर खूब गालियाँ भी खाई, वहीं “उच्चारण और वर्णमाला” सीरिज के लिये काफ़ी तारीफ़ भी पाई। अब ज्योतिषियों के पीछे पड़ा हूँ...क्या करूँ.... आदत से मजबूर हूँ, छोटे-छोटे ब्लॉग लिख ही नहीं पाता (जब तक बाल की खाल ना निकाल लूँ आराम नहीं आता), इसलिये सीरिज में लिखना पड़ता है (कई मित्रों को बुरा लग सकता है, लेकिन यहाँ मैं यह उल्लेख करना उचित समझता हूँ कि मराठी ब्लॉग विश्व के मुकाबले हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में बड़े-बड़े लेख पढने का मिजाज़ अभी पाठकों में नहीं आया है, कम से कम मुझे तो ऐसा प्रतीत हुआ है).... साथ ही हिन्दी ब्लॉगिंग में हिट्स और टिप्पणियाँ उन्हें अधिक मिलते हैं, जिनके चिठ्ठे पर कोई विवादित, सांप्रदायिक या महिलाओं से सम्बन्धित बात हो, जबकि तथ्यपरक, खोजपरक और स्वस्थ बहस को जन्म देने वाले ब्लॉग की संख्या काफ़ी कम है। बहरहाल.... ब्लॉग के सेंसेक्स के दस हजार छूने पर सभी मित्रों, पाठकों, समर्थकों और विरोधियों का आभार... ऐसे ही प्रेम बनाये रखें... मैं उम्दा लिखने की भरसक कोशिश जारी रखूँगा ही...फ़िलहाल मैं २३ सब्स्क्राइबर और रोज की औसतन ३०-३५ हिट्स से सन्तुष्ट हूँ.... देखते हैं कि आगे-आगे क्या होता है...

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ज्योतिष और दशा पद्धति की विसंगतियाँ (२)

Contradictions in Astrological Methods
“ज्योतिष विज्ञान नहीं, कोरी कल्पना और अनुमान है” लेख में हमने देखा कि किस तरह से विज्ञान के मूल सिद्धांत पर भी ज्योतिष टिकता नहीं है और खामोश बना रहता है, अब उन “कथित” असरकारी तरंगों को देखें -

सबसे पहले याद करें ज्योतिष के मूल सिद्धांत को कि “ग्रह अपना प्रभाव धरती पर डालते हैं”, चलो मान लिया कि दूर आकाश से किसी प्रकार की किरणें मनुष्य के जन्म-स्थान तक पहुँच भी गईं, लेकिन यह समझ में नहीं आता कि वे किरणें धरती के दूसरे हिस्से में जन्म लेने वाले बच्चे तक कैसे पहुँच जाती हैं? (सभी जानते हैं कि धरती गोल है, इसलिये कोई भी ग्रह धरती के उसके सामने वाले हिस्से को ही प्रभावित कर सकता है, जैसे कि चन्द्र या सूर्यग्रहण कहीं-कहीं ही दिखाई देता है)। लेकिन ज्योतिष विज्ञान(?) के अनुसार ग्रहों और नक्षत्रों का असर धरती के उस दूसरे हिस्से पर भी होता है, जो उसके सामने नहीं है। शायद वे यह कहना चाहते हैं कि धरती तो चपटी है थाली की तरह, जिसमें सारी किरणें या जो भी कुछ है, सभी स्थानों पर जन्म लेने वालों पर समान प्रभाव डालेंगे।

(१) इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें – यह किरणें अधिकतर प्रकाश किरणों के रूप में होती हैं, और स्वाभाविक है कि ये किरणें धरती से अंधेरे वाले हिस्से में नहीं पहुँच सकतीं। न ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें धरती को भेदकर दूसरी तरफ़ पहुँच सकती हैं, मतलब ज्योतिष के लिये इन किरणों का कोई मतलब नहीं है।

(२) गुरुत्वाकर्षण – विज्ञान के अनुसार दो पिंडों के बीच की दूरी पर यह बल निर्भर होता है, लेकिन ज्योतिष विज्ञान को गुरुत्वाकर्षण से भी कोई लेना-देना नहीं होता। प्रत्येक ग्रह और धरती की दूरी समयानुसार थोड़ी-बहुत घटती-बढती रहती है, सो उसका असर भी कम-ज्यादा होना चाहिये, लेकिन ज्योतिष इस बात को नहीं मानता।

(३) चुम्बकीय किरणें – इनका प्रभाव एक बहुत ही सीमित हिस्से तक होता है, ये अधिक दूरी तक प्रवास नहीं कर सकतीं। करोड़ों मील दूर किसी ग्रह से चुम्बकीय किरणें यहाँ तक पहुँचना नितांत असम्भव है। इसी प्रकार वैदिक ज्योतिष के “खास” कमाई वाले ग्रह राहु-केतु की उपस्थिति के बारे में अभी तक तो विज्ञान को नहीं पता, कि वे धरती के किस कोण पर, कितनी दूरी पर स्थित हैं, राहु और केतु की तारामंडल में निश्चित स्थिति क्या है? न ही ज्योतिष विज्ञान ने किसी तरह से हमें यह बताने की जहमत उठाई है। क्या राहु-केतु कोई चुम्बकीय प्रभाव डाल सकते हैं? पता नहीं..। मतलब चुम्बकीय प्रभाव वाली “थ्योरी” भी नहीं लागू हो रही... तात्पर्य यह है कि यदि हम मान भी लें कि ग्रहों या नक्षत्रों का कोई प्रभाव होता भी है, तो कृपया बताया जाये कि वह पृथ्वी तक पहुँचता किस प्रणाली से है? स्वाभाविकतः एक सवाल मन में उठता है कि कहीं ये किरणें ग्रहों की बजाय ज्योतिषियों के दिमाग की तरंगें तो नहीं?

इस मोड़ पर आकर तमाम ज्योतिषी दैवी शक्ति, पुराण, पवित्रता, आदि की दुहाई देने लग जाते हैं। वे कुतर्क देने लग जाते हैं कि “ज्योतिष” कोई ऐसा-वैसा या ऐरा-गैरा विषय नहीं है, यह विषय विज्ञान के आगे की चीज है, जहाँ भौतिक विज्ञान समाप्त होता है, वहाँ से ज्योतिष आरम्भ होता है...आदि-आदि, और तारों-ग्रहों-नक्षत्रों का प्रभाव धरती के प्राणियों पर अवश्य पड़ता है। यह प्रभाव रहस्यमयी तरीके से यहाँ तक पहुँचता है। ऊपर दिये गये तर्कों को काटने के लिये कुछ प्रसिद्ध ज्योतिषियों ने इस प्रभाव को दैवीय और गुप्त रूप से उत्पन्न भी बताया है। वे सीधे कह देते हैं कि ग्रहों की स्थितियों के अनुसार पड़ने वाले प्रभावों को वैज्ञानिक तरीके से साबित नहीं किया जा सकता।

इन तर्कों के आधार पर ज्योतिषियों का दोमुँहापन साफ़-साफ़ उजागर हो जाता है, जब हम कहते हैं कि ज्योतिष शास्त्र दैवीय शक्तियों, चमत्कार आदि की बातें करता रहता है तो वे कहते हैं कि नहीं यह एक विज्ञान है, और जब विज्ञान सम्बन्धी उनके तर्क नहीं चलते तो वे गुप्त, रहस्यमयी, पाप-पुण्य, भाग्य आदि की बातें करके कहते हैं कि इसे विज्ञान द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता, अब इसे क्या कहा जाये?

वैदिक ज्योतिष में “दशा-पद्धति” की विसंगतियाँ और उठते प्रश्न –
“ज्योतिष” विज्ञान का मूल सिद्धान्त है “जैसा ऊपर, वैसा ही नीचे” अर्थात जैसा अन्तरिक्ष या सुदूर ब्रह्माण्ड में घटित होगा उसका असर धरती पर पड़ेगा। अर्थात ऐसी उनकी मान्यता होती है, और उसी के अनुसार वे भविष्य में आने वाली घटनाओं की गणना करके “ग्राहक” को बताते हैं। हमें देखना होगा कि जिस “ऊपर” नाम की चीज या “ब्रह्माण्ड” की बातें ये करते हैं और उसी के आधार पर राशियों और जन्म-कुण्डली का निर्धारण करते हैं, दर-असल वहाँ वैज्ञानिक समय पद्धति से क्या-क्या घट रहा है, जिसके आधार पर यहाँ “नीचे” मनुष्यों के भविष्य, भाग्य(?) और दुर्भाग्य(?) का निर्धारण वे सतत्‌ करते रहते हैं। ज्योतिष के मूल सिद्धान्त “दशा-पद्धति” में साफ़-साफ़ असंगत नजर आते हैं। “दशा-पद्धति” सिर्फ़ “मानो या ना मानो” के सिद्धान्त पर काम करती है, इसका ग्रहों या तारों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता, न ही राशियों और जन्म-नक्षत्रों से। अद्‌भुत तरीके से यह “गणनायें” की जाती हैं और इसमें सिर्फ़ ग्रह का नाम देना ही पर्याप्त होता है, राशि का नाम जरूरी नहीं है। “दशा-पद्धति” ऐसी अनोखी पद्धति है जिसमें तारों और ग्रहों की कोई आवश्यकता नहीं है, सिर्फ़ उनका नाम लेना काफ़ी है।

दशा-पद्धति के आधारभूत तत्व-
इस पद्धति में ग्रह का नाम होता है, एक “प्रॉक्सी” के तौर पर, यह नाम ही उस ग्रह की तमाम “पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी” लेकर चलता है, इसलिये ध्यान दें कि “ग्रह” मतलब सिर्फ़ एक नाम है, असली ग्रह नहीं। यह पद्धति मानकर चलती है हरेक ग्रह का अपना-अपना पूर्वनिर्धारित “स्वभाव” और “प्रभाव” होता है और ये ग्रह उसी के अनुसार मनुष्य पर कुछ वर्षों तक अपना असर डालते हैं, जिसे वे “दशा-काल” कहते हैं। ग्रहों के नाम और स्थान मनमाने तरीके से संयोजित किये हुए प्रतीत होते हैं, क्योंकि ये ग्रह उसी निर्धारित क्रम पर चलते हैं। वे एक के बाद एक आते हैं और मनुष्य के जीवन पर अपने निर्धारित वर्षों तक प्रभाव डालते हैं, फ़िर अगला ग्रह दूसरे ग्रह से “चार्ज” ग्रहण करता है और यह प्रक्रिया चलती रहती है। १२० वर्षों की दशा को “विंशोत्तरी” कहा जाता है जिसमें ग्रहों का क्रम इस प्रकार है – केतु (एक काल्पनिक ग्रह), शुक्र (Venus), सूर्य (Sun), चन्द्र (Moon), मंगल (Mars), राहु (काल्पनिक), गुरु (Jupiter), शनि (Saturn) और बुध (Merquery). इन ग्रहों का दशा-काल (प्रभाव समय) इस प्रकार मान लिया गया है – 7, 20, 6, 10, 7, 18, 16, 19, और 17 कुल मिलाकर 120 वर्ष। जबकि 108 वर्षों के दशा-काल, जिसे “अष्टोत्तरी” कहा जाता है, इसमें ‘केतु’ को निकाल दिया गया है। इस काल में शुक्र से मंगल तक तो क्रम वही है, लेकिन बाकी के चार ग्रहों को उलटे क्रम में लगा दिया जाता है, पता नहीं क्यों (जाहिर है कि ज्योतिष के विद्वान मेरे जैसे अज्ञानी और अधर्मी को इस बात का भी जवाब देंगे)। निश्चित तौर पर इन सबका कोई ठोस कारण नहीं नजर आता। जब राहु और केतु दोनों काल्पनिक ग्रह हैं फ़िर राहु का दशा काल 18 वर्ष और केतु का 7 वर्ष क्यों? दशा पद्धति का सम्बन्ध हमारे जीवन पर ऐसा माना गया है – बच्चे का जन्म नक्षत्र (Zodiac Birth) कुण्डली के आधार पर तय किया जाता है, इस जन्म-नक्षत्र का एक ‘स्वामी’ (Boss) या भगवान होता है। जब इसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है तब अगल ग्रह आकर उसका स्थान ले लेता है और यह क्रम सम्पूर्ण जीवन तक चलता रहता है।

कुछ ज्योतिषी और पुराने लोग तो यह दावे भी करते रहते हैं कि – “कुछ प्राचीन ऋषियों ने हजारों साल पहले ताड़पत्रों पर समूची मानव जाति का भविष्य लिख दिया था”, “उन ऋषियों ने तो सारे अनुमान और जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य का भूत-भविष्य पहले ही देख लिया था”, “उन ताड़पत्रों को सिर्फ़ विशेषज्ञ लोग ही पढ़ सकते हैं क्योंकि वे एक विशिष्ट भाषा में लिखे हुए हैं”, तात्पर्य यह कि सब कुछ रहस्यमयी, मनमाना, अगणितीय, अवैज्ञानिक है। यदि नहीं, तो महान लोग बताने का कष्ट करें कि- एक ही स्थान और एक ही समय पर, यहाँ तक कि लगभग एक ही पारिवारिक पृष्ठभूमि रखने वाले दो बच्चों (यहाँ तक कि जुड़वाँ बच्चों) के कर्म, उनके भविष्य, उनकी नौकरी/व्यवसाय, उनकी शादी, उनके बच्चे, उनकी मृत्यु के बीच समानता क्यों नहीं होती? क्यों सुनामी में मारे गये लाखों लोगों की कुण्डली एक जैसी नहीं थी?

जब विज्ञान कहता है कि H2 और O को मिलाकर पानी बनता है तो वह पानी साइबेरिया में भी बनता है और ऑस्ट्रेलिया में भी बनता है। विज्ञान कभी भी यह नहीं कहता कि अब हम यह टेलीफ़ोन चालू कर रहे हैं, यदि आपका “कर्म” अच्छा होगा तो यह चलेगा, नहीं तो नहीं चलेगा। विज्ञान ने यह भी कभी नहीं कहा कि हम यह मोटर चालू कर रहे हैं, यदि आपका “भाग्य” साथ देता रहा तो यह चलती रहेगी, हो सकता है कि न भी चले, यह भी हो सकता है कि आपके पूर्वजन्म के कारण यह मोटर जल जाये। लेकिन ज्योतिषियों के पास इस बाबत्‌ तमाम कुतर्क होते हैं, और भोला भगत इस बात पर विश्वास कर लेता है कि “पंडित” जी ने तो भविष्य एकदम सही बताया था, लेकिन क्या करें “भाग्य में यही लिखा था”, “जो होना है वह होकर ही रहता है”, “हो सकता है कि हमारे कर्मों में कोई खोट हो” आदि-आदि। मतलब ज्योतिषी महोदय माल अंटी करके भी साफ़ बरी।

हाल ही में तमिलनाडु में एक व्यक्ति ने कोर्ट में धोखाधड़ी का मुकदमा दायर किया था जिसमें ज्योतिषी महोदय एक मृत व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके उज्जवल भविष्य और चमकदार कैरियर की भविष्यवाणियाँ करते पकड़े गये थे। जब कुण्डली देखकर वे यह भी नहीं बता सकते कि मौत हो चुकी है तब वे विवाह, गृहप्रवेश, परीक्षा में पास/फ़ेल होने जैसी बातों के बारे में एकदम सही कैसे बता सकते हैं। एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल (जो कि ज्योतिष, ज्योतिषियों, पंडों और पुजारियों के लिये मशहूर है) के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी की लड़की ने घर से भागकर एक दूसरे धर्म के लड़के से शादी कर ली, ज्योतिषी महाशय को पता ही नहीं चल सका। दूसरे एक और महान ज्योतिषी ने अपनी लड़की की पचासों कुंडलियाँ मिलाकर, तमाम ठोक-बजाकर उसकी शादी की लेकिन “जमाईराजा” दारुकुट्टे और जुआरी निकले, उनकी लड़की को आत्महत्या करनी पड़ी, ऐसा क्यों? यदि वे पचास कुंडलियाँ देखकर भी अपने लिये एक सही दामाद नहीं ढूँढ सकते तो फ़िर उन्हें ज़माने को ‘ज्ञान’ बाँटने का क्या हक है? इसलिये इसे विज्ञान कहना तो कम से कम बन्द किया जाये, हाँ, यह जरूर कहा जा सकता है कि यह सिर्फ़ एक अनुमान है, जिसके सही या गलत होने की पूरी सम्भावना है, और यही तो हम कह रहे हैं... दिक्कत यह है कि “खगोल विज्ञान” का विस्तार करके स्वार्थी तत्वों ने उसे “ज्योतिष विज्ञान” बना दिया है।

दुनिया के बड़े-बड़े और विद्वान ज्योतिषी सेमिनार करें, गोष्ठियाँ करें, सभायें करें, कुछ उपकरणों की मदद लें और सभी मिलकर बतायें कि फ़लाँ लड़की की कुण्डली में भयानक सा “मंगल” बैठा हुआ है, अव्वल तो इसकी शादी होगी ही नहीं या यदि किसी ने इससे शादी की तो उसकी इतने-इतने समय में मृत्यु हो जायेगी, और वाकई में वैसा ही हो तब तो इसे विज्ञान माना जायेगा... और ऐसा एक कुंडली में नहीं बल्कि सर्वमान्य रूप से एक जैसी कुण्डलियों में होना चाहिये, यही तो विज्ञान का सिद्धान्त है कि जो एक जगह और एक व्यक्ति के लिये लागू है वही सभी के लिये लागू होगा। लेकिन नहीं, जहाँ आपने तर्क-वितर्क करने की कोशिश की, तत्काल आप अधर्मी, नालायक, बड़बोले आदि घोषित कर दिये जाते हैं, ताकि सच्चाई (जो अभी साबित होना बाकी है) सामने न आ सके, धन्धा-पानी बदस्तूर जारी रहे।

हाल ही में हरियाणा के रोहतक में एक डॉक्टर दंपति ने तथाकथित तन्त्र-मंत्र के चक्कर में अपने एक बेटे की बलि चढ़ा दी, यह निश्चित तौर पर झकझोरने वाली और समर्थ सोच रखने वाले लोगों के लिये वाकई चिन्ता की बात है। एक पढ़े-लिखे पति-पत्नी भी जब तंत्र-मंत्र के चक्कर में इस हद तक गिर जाते हैं तो बेचारे अनपढ़ और गाँव वाले लोगों को क्या दोष दिया जा सकता है? तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, ज्योतिष-कुण्डली, धर्म-कर्म, भाग्य, अंधविश्वास आदि से हमारा समाज इतना प्रभावित है कि उच्च और वैज्ञानिक शिक्षा भी उसे “बाबागिरी”, “कर्मकाण्ड” आदि कुचक्रों से बाहर नहीं निकाल पा रही है।

ज्योतिषी जरा नील आर्मस्ट्रॉंग की कुंडली देखकर बतायें कि उस पर चन्द्रमा का कितना असर हुआ? और सुनीता विलियम्स की कुंडली भी देखें कि लगभग दो सौ दिन पृथ्वी से दूर रहने से मंगल का कितना प्रभाव उस पर कम-ज्यादा हुआ, क्योंकि पृथ्वी के चक्कर लगाने के दौरान सुनीता की दूरी रोज-ब-रोज मंगल और चन्द्रमा से घटती-बढ़ती रही थी? फ़िर वैज्ञानिक आँकड़ों के साथ विश्व के सामने आयें और बतायें। वरना यूँ ही ज्योतिष को ‘विज्ञान’ कह देने भर से विज्ञान मान लेना भी एक अज्ञानता होगी।

अधर्मी, विधर्मी, नालायक, बड़बोला, अज्ञानी, बेवकूफ़ आदि शब्दों को अग्रिम में ग्रहण करते हुए वैज्ञानिक और गणितीय तर्कों के इन्तजार में हूँ..... ताकि उनका भी सकारात्मक जवाब दिया जा सके। अगले भाग में कुछ और तार्किक प्रश्न होंगे, जाहिर है कि मुझमें अक्ल की कमी है...

(लेख में सन्दर्भ – महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के साहित्य से)

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Thursday, October 25, 2007

“ज्योतिष” विज्ञान नहीं, कोरी कल्पना और अनुमान है

Astrology, Science, Fiction and Predictions

मेरे एक लेख “क्या आप भगवान को मानते हैं?” के जवाब में कुछ ज्योतिषी बन्धु बहुत लाल-पीले हुए थे और मुझे अधर्मी, अज्ञानी का खिताब दिया था। अक्सर अपने धन्धे की मार्केटिंग के लिये ज्योतिष को “विज्ञान” बताया जाता है, ताकि शिक्षित लोग भी उसके झाँसे में आ जायें इसी विषय को लेकर मैंने कुछे मुद्दे उठाने की कोशिश इस लेखमाला में की है, जिस पर विचार किया जाना, बहस-मुबाहिसा किया जाना, नये-नये तर्क दिया जाना आवश्यक है ताकि भ्रम छँटे और वास्तविक स्थिति लोगों के सामने आ सके।

यह बात तो सभी मानेंगे कि जब तक ज्योतिष और ग्रहों के तथाकथित असर जब तक साबित नहीं हो जाते, कम से कम तब तक तो ज्योतिष विद्या एक “अप्रायोगिक विश्वास” ही है, लेकिन सिर्फ़ यही आधार ज्योतिष को विज्ञान नहीं होना सिद्ध नहीं करता, कुछ और भी आधार हैं जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है ताकि साबित किया जा सके कि ज्योतिष विज्ञान नहीं है, बल्कि कोरे अनुमान, ऊटपटाँग कल्पनायें और खोखला अंधविश्वास है।

सिर्फ़ यह कह देने भर से कि रोजाना हजारों ज्योतिषियों के लाखों अनुमान गलत साबित होते हैं, इसलिये ज्योतिष विज्ञान नहीं है, भी काफ़ी नहीं होगा। ज्योतिष-भाग्य-पूर्वजन्म आदि को मानना न मानना हरेक का व्यक्तिगत मामला है, लेकिन जब ज्योतिष को “विज्ञान” बताया जाता है तब असली आपत्ति शुरु होती है। सबसे पहला प्रश्न तो उठता है- विज्ञान क्या है? ऑक्सफ़ोर्ड के एक शब्दकोष के अनुसार – “ज्ञान की एक शाखा, विशेषकर वह जो वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हो, एक संगठित संस्था द्वारा एकत्रित प्रयोग आधारित जानकारी पर आधारित सूचनाओं का भंडार”। विज्ञान की इस परिभाषा को यदि ‘ज्योतिष’ पर लागू किया जाये तो इनमें से कोई भी सिद्धांत ज्योतिर्विज्ञान पर लागू नहीं होता है, न तो वैज्ञानिक परिभाषायें ना ही भौतिक अवस्थायें, कैसे? आगे देखते हैं

“इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका” के अनुसार, “ग्रहों के काल्पनिक वृत्त (या निशान) अथवा कोई काल्पनिक गोलाकार (जैसे- राशियाँ आदि) किसी प्रकार की “शक्ति” से लैस होते हैं या उनके कोई विशेष प्रभाव होते हैं, यह सिद्धांत विज्ञान को मान्य नहीं हैं”। इसमें एक और बात भ्रम पैदा करने वाली यह है कि भारतीय ज्योतिषियों और पश्चिमी “एस्ट्रोलॉजी” के सिद्धांतकारों में भी इन “शक्तिशाली ग्रहों” के स्थान आदि पर भारी मतभेद हैं, इसी से ज्योतिष सम्बन्धी सारे अनुमान विसंगतिपूर्ण हो जाते हैं। ज्योतिष का मूल सिद्धांत यह है कि तमाम ग्रह या नक्षत्र अपने-अपने स्थान (घर) में स्थित होकर उसी के अनुसार व्यक्ति को फ़ल या कुफ़ल देते हैं, पूरी तरह से काल्पनिक और मात्र पूर्व अनुमानों पर आधारित होता है। ये कल्पनायें भी इस प्रकार हैं- “ग्रहों को अपना खुद का ज्ञान होता है”, “सारे ग्रह ज्योतिषियों की तरह जानकारी रखते हैं और जिस ‘घर’ में वे होते हैं उसी के अनुरूप वे सदा पवित्र या अपवित्र शक्तियाँ मानवों को देते चलते हैं”, जो कि ज्योतिषी तमाम गणनायें करके बताते हैं। इस प्रकार की अनोखी और अलौकिक कल्पनायें विज्ञान की कसौटी पर कहीं से कहीं तक खरी नहीं उतरतीं। इस तर्क का ज्योतिष विज्ञानी(?) कभी भी खंडन नहीं करते, इसलिये “ज्योतिष विज्ञान नहीं है, सिर्फ़ कल्पना है” इस बात को बल मिलता है।

क्या मनुष्य के जीवन को ग्रह प्रभावित करते हैं?
“स्वर्गीय” या ग्रहों के प्रभाव पृथ्वी पर दो तरह से असर डाल सकते हैं- पहला है प्राकृतिक या भौतिक और दूसरा है ज्योतिष के सिद्धांत के अनुसार।
(१) भौतिक रूप – सूर्य और चन्द्रमा मनुष्य जीवन को प्रभावित करते हैं, भौतिक स्वरूप में। मनुष्य जीवन ऊर्जा से चलता है, और सूर्य हमें अपनी भौतिक किरणों से हमें ऊर्जा और ऊष्मा प्रदान करता है। सूर्य के कारण ही भिन्न-भिन्न मौसम, वर्षा, ठंड आदि आते-जाते हैं। सूर्य और चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय बलों के कारण धरती पर समुद्र में ज्वार-भाटा आदि आते हैं, इससे सिद्ध होता है कि सूर्य और चन्द्रमा मानव जीवन पर अपना भौतिक असर डालते हैं। इन प्रभावों को हम तमाम वैज्ञानिक विधियों और उपकरणों से नाप सकते हैं, प्रभाव को कम-ज्यादा कर सकते हैं। लेकिन क्या बाकी के सारे ग्रह भी इसी प्रकार हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं? इसका उत्तर है कि- यदि मान लिया जाये कि उन सभी ग्रहों का कुछ असर होता भी है तो उनकी दूरी के कारण वह बेहद अप्रभावी और लगभग उपेक्षा करने योग्य होता होगा। क्योंकि आज तक किसी ज्योतिषी ने किसी उपकरण द्वारा यह नहीं बताया है कि किसी ग्रह विशेष की किरणों(?) से मनुष्य को कितना नुकसान हुआ है? एक खास बात ध्यान देने वाली यह है कि सूर्य और चन्द्रमा के जो भी प्रभाव मनुष्य पर पड़ते हैं, वे सार्वजनिक और समानुपात से सभी पर पड़ते हैं, ना कि ज्योतिष के सिद्धांत के अनुसार, जिसमें “मंगल” चुन-चुनकर लड़कियों या लड़कों को अपना निशाना बनाता है। सीधी बात है कि किसी ग्रह का असर सभी मनुष्यों पर समान रूप से पड़ना चाहिये, न कि व्यक्तिगत रूप से (यदि यह विज्ञान है, तो)।
(२) दूसरा रूप विशुद्ध ज्योतिष के अनुसार- कि प्रत्येक ग्रह मनुष्य जीवन पर प्रभाव डालता है। ये और बात है कि आज तक प्रायोगिक रूप से इस बात को किसी महान ज्योतिषी ने साबित नहीं किया है, न कोई वैज्ञानिक उपकरण से मापा गया है, ना ही किसी अन्य विधि से सर्वमान्य रूप से इसे सिद्ध किया गया है, बस मान्यता है कि ऐसा होता है, कैसे और क्यों होता है, इसके बारे में पूछना बेकार है और ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति विशेष पर ही क्यों पड़ता है, समूची धरती पर एक साथ नहीं? कार्ल ई.कोपेन्शर ने तथाकथित “मंगल प्रभाव” को सिरे से गलत साबित कर दिया है, साथ ही इस बात को भी गलत साबित कर दिया कि ग्रहों का प्रभाव अनुवांशिकी भी होता है (जैसी कि मान्यता है कि पिता और पुत्रों की कुंडलियों में काफ़ी समानतायें पाई जाती हैं)। इसलिये अब तक इस बारे में कोई पक्का सबूत पेश नहीं किया गया है कि ग्रहों और नक्षत्रों का प्रभाव होता है, या मनुष्य पर पड़ता है।

खगोल विज्ञान और ज्योतिष का घालमेल करना-
प्रत्येक ज्योतिषी और भारत में ज्योतिष को मानने वाले सदा जपते रहते हैं कि पृथ्वी और अन्य दूरस्थ ग्रहों का आपस में कुछ सम्बन्ध होता है। वे यह बात जन्म से ही मानकर चलते हैं और जमाने भर को घुट्टी में पिलाते रहते हैं, कि तारे और ग्रह कोई विशेष प्रकार की किरणें छोड़ते हैं जो धरती पर इन्सानों और यहाँ तक कि घटनाओं को भी प्रभावित करती है। तत्काल यह प्रश्न उठना चाहिये कि ये ज्योतिषीय प्रभाव या किरणें या असर (या जो भी कुछ है), वह पृथ्वी तक पहुँचता कैसे है? विज्ञान ने यह सिद्ध किया है कि किसी भी प्रकार के बल या तरंगों को दूर तक प्रवास करने और वहाँ कुछ असर डालने के लिये तीन प्रकार के बलों की आवश्यकता होगी ही –

(१) इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरण (Electromagnetic Radiation)
(२) गुरुत्वाकर्षण (Gravitational Attraction) या
(३) चुम्बकीय तरंगे (Magnetic Fields)

अब कम से कम विज्ञान तो इन तीन कारणों के अलावा और कोई कारण नहीं जानता, जिससे कि सुदूर स्थित कोई पिंड अपना प्रभाव धरती तक पहुँचा सके। अब कुछ क्षणों के लिये मान भी लिया जाये कि इनमें से किसी एक कारण से कोई ग्रह हमें प्रभावित करता है तो यह देखना होगा कि ज्योतिषीय सिद्धांत इनमें से किसमें “फ़िट” बैठता है। ... जारी रहेगा भाग-२ में भी....

अगले भाग में इन्हीं सिद्धांतों पर जरा विस्तार से चर्चा करूँगा और साथ ही कुछ और तर्क...

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Friday, October 19, 2007

एंड्र्य़ू सायमंड्स की धमकी के निहितार्थ...

Symmonds Australia Indian Cricket Team

क्रिकेट में “स्लेजिंग” का मतलब होता है कुछ बोलकर या हरकतों से विपक्षी खिलाड़ी को छेड़ना, जिससे कि वह गुस्से में आये, उसकी एकाग्रता भंग हो और वह गलती करे।

हाल की भारत-ऑस्ट्रेलिया सीरिज में खिलाड़ियों के बीच काफ़ी तूतू-मैंमैं हुई, जिसमें दर्शक भी शामिल हुए और मामले ने काफ़ी तूल पकड़ लिया, हालांकि ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों द्वारा यह करना एक आम बात है, लेकिन दरअसल वे क्रोधित (बल्कि भौंचक्के) इसलिये थे कि इस बार स्लेजिंग की शुरुआत की भारतीय युवा खिलाड़ियों ने। गोरी चमड़ी के देशों के खिलाड़ी (ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, द.अफ़्रीका और न्यूजीलैंड) स्लेजिंग के कार्य में माहिर माने जाते हैं (यह उनके संस्कारों मे ही है – कैसे भी हो...जीतो), लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह स्थिति धीरे-धीरे बदलती नजर आ रही है।

भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और वेस्टईण्डीज के खिलाड़ी अब ताने, गालीगलौज और छींटाकशी सुनते-सुनते तंग आ चुके थे। इन देशों की युवा ब्रिगेड ने अब “जैसे को तैसा” का जवाब देने की ठान ली है, और हो भी क्यों नहीं? अब इस खेल पर गोरे देशों का एकतरफ़ा कब्जा नहीं रहा है। काले-सांवले देश भी उन्हें जब-तब हराने लगे हैं, उनके गेंदबाजों को धोने लगे हैं, दर्शक संख्या इन काले देशों में ही ज्यादा होती है, विश्व क्रिकेट प्रशासन का सबसे अधिक पैसा यहीं से आता है, फ़िर यहाँ के खिलाड़ी गोरों की बातें क्योंकर सुनें? और कोई माने या माने सबसे बड़ा बदलाव आया है देश की आर्थिक स्थिति और नई सदी में भारत के युवाओं की सोच में। गाँधी जिस सदी में मरे थे अब वह बीत चुकी है। इक्कीसवीं सदी में जो युवा भारत की क्रिकेट टीम में आ रहे हैं, वे महानगरों के कम हैं, कस्बों और छोटे शहरों के ज्यादा हैं। भले ही आरम्भ में इन खिलाडियों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो, लेकिन अब भारत की तरक्की और बदली हुई परिस्थितियों में, वे कुछ भी चुपचाप सुन लेने वाले “मेमने” नहीं रहे, वे भी “मुँहजोरी” का जवाब “मुँहजोरी” से देना सीख गये हैं, और यह सही रवैया भी है। यह रवैया धीरे-धीरे हमें लगभग हरेक क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। जिस दिन युवाओं के यही विद्रोही तेवर भारत में फ़ैले भ्रष्टाचार के प्रति हो जायेंगे, उस दिन सही मायनों में बदलाव आयेगा।

बहरहाल, वे दिन अब लद गये जब भारत या पाकिस्तान या किसी अन्य देश के खिलाड़ी को कोई “गोरा” कुछ कहता था तो वे उसे हँसकर टाल देते थे, या “महान खेलभावना”(?) का परिचय देते हुए भूल जाते थे, लेकिन अब जमाना बदल गया है, हर कोई जीतना चाहता है, लाखों-करोड़ों रुपये दाँव पर लगे हुए हैं, खिलाड़ी के कैरियर का सवाल है, तनाव है, दबाव है, अब यह सब नहीं सहा जायेगा, यदि ताना मारा जाता है तो ताना मारा जायेगा, यदि गाली दी जाती है तो और बड़ी गाली दी जाती है। इसके पीछे गोरे देशों की मानसिकता “ठाकुरों-ब्राह्मणों” वाली सवर्ण मानसिकता है, कि- “ऐ साला, काला लोग, हम ही तुमको उठना-बैठना-खेलना सिखाया है और साला तुम हमारे सामने आँख उठाकर कैसे चलता है, कैसे हमें हरा सकता है... साले हम शासक लोग हैं और तुम गुलाम लोग हो, गालियाँ खाते रहना तुम्हारी नियति है”, इसी घटिया मानसिकता के चलते अधिकतर काले देशों के खिलाड़ियों के साथ अन्याय होता आया है। “चकर” होगा तो शोएब अख्तर या मुरलीधरन, ब्रेट ली नहीं.... “दूसरा” नामक गेंद यदि हरभजन या सकलैन फ़ेंकेगा तो “वह थ्रो करता है”, यदि सचिन, इंजमाम या रणतुंगा, क्रीज पर अधिक देर तक टिक गया तो गालीगलौज, छेड़छाड़ तो पक्की है ही ऊटपटांग अपीलों का दौर भी प्रारम्भ हो जायेगा।

लेकिन अब जबकि क्रिकेट के तथाकथित “दलित” तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें जब-तब हराने लगे हैं, रिकॉर्ड बुक में काले-सांवले लोगों के नाम ही ज्यादा आगे आने लगे हैं तो “गोरों” के पेट में दुखने लगा है और जिस चीज में वे अधिक माहिर हैं वे करने पर उतारू हो गये, लेकिन जब पासा पलटता दिखाई देने लगा, तब “उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे” की तर्ज पर पोंटिंग और सायमंड्स हल्ला मचाने लगे। उन्हें गुमान है “गोरी चमड़ी” का और “शासक वर्ग के होने” का, और इस गुमान को मुँहतोड़ जवाब देना जरूरी है। (भले ही “भारत का क्रिकेट खेल के उत्थान में कोई योगदान नहीं है, लेकिन इतने भी गये-गुजरे हम नहीं हैं कि कोई भी ऐरा-गैरा हमें गाली देता फ़िरे”)

अब यह तो सायमंड्स की धमकी से स्पष्ट हो गया है कि आने वाला ऑस्ट्रेलिया दौरा भारत के लिये खतरनाक रहेगा, लेकिन यदि सकारात्मक मानसिकता और “शठे शाठ्यम समाचरेत” का जज्बा दिल में रखते हुए, अग्नि परीक्षा पार करके वहाँ से लौटेंगे तब यह टीम एकदम बदली हुई टीम नजर आयेगी (यह आमतौर पर देखा जाता है कि किसी टीम के किसी खिलाड़ी को यदि कोई दूसरा गाली देता है तो टीम में एकजुटता बढ़ती है)।

सन्देश साफ़ है, “कौन बेवकूफ़ कहता है कि क्रिकेट एक जेंटलमैन गेम है”, मुगालता दूर कीजिये, क्रिकेट में भी छिछोरापन बढ़ता जा रहा है और, और बढ़ेगा, और हमारे युवा खिलाड़ी उसी भाषा में उसका जवाब भी देंगे।

“लेख के अगले भाग में क्रिकेट के इतिहास में घटित कुछ बेहद घटिया दर्जे की “स्लेजिंग” और पीड़ित खिलाड़ी द्वारा चुटीले और व्यंग्यात्मक अन्दाज में दिये गये जवाबी हमले, आदि के बारे में....”

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Sunday, October 14, 2007

राम-सेतु पर राम-हनुमान का रोचक संवाद

Ram Hanuman Dialogue on Ramsetu

भगवान महाप्रभु ने “राम-सेतु” का अवलोकन किया और भक्त हनुमान से कहा – हे पवनपुत्र, तुमने और तुम्हारी वानर सेना ने किस खूबसूरती और मजबूती से हजारों वर्ष पूर्व इस सेतु का निर्माण किया है, यह देखकर मैं बहुत खुश हूँ। मुझे तुम्हें शाबाशी देना चाहिये कि तमाम पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय दबावों के बावजूद यह पुल सुरक्षित रहा और इसने सुनामी को भी रोके रखा। हनुमान, वाकई यह तुम्हारा एक स्तुत्य कार्य है, खासकर तब जबकि हैदराबाद में “गैमन” जैसी विशालकाय कम्पनी का बनाया हुआ पुल उद्‌घाटन से पहले ही गिर गया है।

हनुमान ने कहा – प्रभु यह सब आपकी कृपा के कारण सम्भव हुआ था, हम तुच्छ वानर तो सिर्फ़ आपका नाम लिखे हुए पत्थर समुद्र में डालते गये, ना ही हमने टाटा का स्टील लिया था और न ही अम्बुजा और एसीसी का सीमेंट वापरा था, लेकिन प्रभु वह तो बहुत पुरानी बात है, इस वक्त यह मुद्दा क्यों?

बात ही कुछ ऐसी है भक्त, वहाँ नीचे पृथ्वी पर कुछ लोग तुम्हारा बनाया हुआ वह पुल तोड़ना चाहते हैं, ताकि उसके बीच में से एक नहर निकाली जा सके। उस ठेके में अरबों रुपये का धन लगा है, करोड़ों का फ़ायदा होने वाला है, यहाँ तक कि उस पुल को तोड़ने में ही “कुछ लोग” करोड़ों कमा जायेंगे, नहर तो बाद में बनेगी....

हनुमान ने भक्ति से सिर नवाकर पूछा – तो प्रभु क्यों ना हम पुनः धरा पर जायें और उन्हें समझाइश देने की कोशिश करें...
राम बोले – नहीं वत्स, अब समय बहुत बदल चुका है। यदि हम धरती पर चले भी गये तो सबसे पहले वे लोग तुमसे तुम्हारा आयु का प्रमाण माँगेंगे, या फ़िर स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र, जबकि हमारे पास तो जन्म प्रमाणपत्र भी नहीं है। हे अंजनीपुत्र, हम तो सदियों से पैदल ही चलते रहे हैं, कभी-कभार बैलगाड़ी में भी सफ़र किया है, सो हमारे पास ड्रायविंग लायसेंस भी नहीं है। जहाँ तक निवास का प्रमाणपत्र देने की बात है तो पहले हमने सोचा था कि “अयोध्या” का निवास प्रमाणपत्र दे देंगे, लेकिन वह पवित्र भूमि तो पिछले पचास साल से न्यायालय में अटकी पड़ी है। यदि मैं “अरुण गोविल” की तरह पारम्परिक धनुष-बाण लिये राम बन कर जाऊँ तो वे मुझे पहचानना तो दूर, कहीं मुझे किसी आदिवासी इलाके का समझकर नृत्य ना करवाने लगें या “भारत-भवन” भेज दें। ये भी हो सकता है कि अर्जुन सिंह मुझे आईआईटी में एक सीट दे दें। भगवान स्वयं थ्री-पीस सूट में जनता के पास जायें तो जनता में भारी भ्रम पैदा हो जायेगा....

हनुमान ने कहा- प्रभुवर मैं आपकी तरफ़ से जाता हूँ और लोगों को बताता हूँ कि यह पुल मैंने बनाया था।

ओह मेरे प्रिय हनुमान, राम बोले- इसका कोई फ़ायदा नहीं है, वे लोग तुमसे इस “प्रोजेक्ट” का “ले-आऊट प्लान”, प्रोजेक्ट रिपोर्ट, फ़ायनेन्शियल रिपोर्ट माँगेंगे। वे तुमसे यह भी पूछेंगे कि इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिये पैसा कहाँ से आया था और समूचा रामसेतु कुल कितने लाख डॉलर में बना था, और यदि तुमने यह सब बता भी दिया तो वे इसका पूर्णता प्रमाणपत्र (Completion Certificate) माँग लेंगे, तब तुम क्या करोगे पवनपुत्र। फ़िलहाल तो धरती पर जब तक डॉक्टर लिखकर ना दे दे व्यक्ति बीमार नहीं माना जाता, यहाँ तक कि पेंशनर को प्रत्येक महीने बैंक के अफ़सर के सामने गिड़गिड़ाते हुये अपने जीवित होने का प्रमाण देना पड़ता है। तुम्हारी राह आसान नहीं है, हनुमान!

हनुमान बोले- हे राम, मैं इन इतिहासकारों को समझ नहीं पाता। सदियों-वर्षों तक आपने कई महान भक्तों जैसे सूरदास, तुलसीदास, सन्त त्यागराज, जयदेव, भद्राचला रामदास और तुकाराम को दर्शन दिये हैं, लेकिन फ़िर भी वे आप पर अविश्वास दर्शा रहे हैं? आपके होने ना होने पर सवाल उठा रहे हैं? अब तो एक ही उपाय है प्रभु... कि धरती पर पुनः एक रामायण घटित की जाये और उसका एक पूरा “डॉक्यूमेंटेशन” तैयार किया जाये।

प्रभु मुस्कराये (ठीक वैसे ही जैसे रामानन्द सागर के रामायण में करते थे), बोले- हे पवनपुत्र, अब यह इतना आसान नहीं रहा, अब तो रावण भी करुणानिधि के सामने आने में शर्मा जायेगा। मैंने उसके मामा यानी “मारीच” से भी बात की थी लेकिन अब वह भी “सुनहरी मृग” बनने की “रिस्क” लेने को तैयार नहीं है, जब तक कि सलमान जमानत पर बाहर छुट्टा घूम रहा हो। यहाँ तक कि शूर्पणखा भी इतनी “ब्यूटी कांशस” हो गई है कि वह नाक कटवाने को राजी नहीं है, बालि और सुग्रीव भी एक बड़ी कम्पनी में पार्टनर हो गये हैं सो कम ही झगड़ते हैं, फ़िर कहीं मैंने शबरी से बेर खा लिये तो हो सकता है मायावती वोट बैंक खिसकता देखकर नाराज हो जायें... तात्पर्य यह कि, हे गदाधारी, वहाँ समस्याएं ही समस्याएं हैं... बेहतर है कि अगले “युग” का इन्तजार किया जाये...
(एक ई-मेल पर आधारित)


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Thursday, October 11, 2007

भाषा, उच्चारण और वर्णमाला (भाग-५)

Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

(भाग-१, भाग-२, भाग-३ और भाग-४ से आगे जारी...)

अब तक पिछले चार भागों में हम उच्चारण के मूलभूत सिद्धांत, विभिन्न उच्चारक, उनकी स्थितियाँ, व्यंजन और अनेक परिभाषाओं के बारे में जान चुके हैं। इस भाग में हम जानेंगे स्वरों के बारे में।

पहले भाग में मैंने स्वरों की जो सूची दी थी, उसमें अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ और लृ को स्थान दिया था। इस पर कुछ पाठकों ने शंका व्यक्त की थी कि ‘अं’ और ‘अः’ को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया है। इसका कारण समझने की कोशिश करें–

हमारी स्वर-व्यंजन और वाणी उच्चार शास्त्र में ‘स्वर’ की परिभाषा है ‘स्वयं राजते इति स्वराः’ अर्थात जिस वर्ण का स्वयं का (बिना किसी दूसरे वर्ण की मदद के) पूर्ण उच्चार होता है उसे ‘स्वर’ कहते हैं, या कहें कि ‘स्वयं प्रकाशमान’, जबकि व्यंजन में कोई ना कोई स्वर मिला हुआ होता है। यदि सिर्फ़ व्यंजन लिखना हो तो उसमें हलन्त लगाना आवश्यक है जैसे ‘क्‌’ जबकि ‘क’ में ‘अ’ का मिश्रण हो जाता है। स्कूल में हमें पढ़ाया जा चुका है कि “जब किसी वर्ण का उच्चार लम्बा खींचा जाता है और यदि उस वर्ण का उच्चार अन्त तक वैसा ही रहता है तो तय होता है कि वह स्वर है या व्यंजन। अर्थात ‘अ’ या ‘आ’ को लम्बा खींचें तो ‘अ~~~~~अ’ ही रहता है, जबकि ‘क’ को खींचने पर अन्त में ‘अ’ सुनाई देता है (हालांकि इस व्याख्या के अनुसार ‘ऐ’ और ‘औ’ भी फ़िट नहीं बैठते, क्योंकि ऐ के उच्चार में भी ‘अ-इ-इ-इ-इ’ और औ में ‘अ-उ-उ-उ-उ’ होता है, लेकिन इसका कोई स्पष्टीकरण मुझे नहीं मिल सका)।

तीसरी व्याख्या के अनुसार, जैसा कि हमने पहले व्यंजनों के समय देखा था कि व्यंजन का उच्चार करने के लिये वाणी तन्त्र के दो उच्चारकों का पास आना आवश्यक होता है, मतलब व्यंजनों के बोले जाते समय भीतर से आने वाली हवा को थोड़े से प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है, जबकि स्वरों के मामले में ऐसा नहीं होता, सिर्फ़ ‘उ’ के उच्चारण में होंठ थोड़े से गोल होकर पास आते हैं, लेकिन फ़िर भी ‘प’, ‘फ़’ जितने नहीं। इस व्यवस्था के अनुसार हमें निम्न बातें ध्यान में आती हैं-

(१) व्यंजनों के समय उच्चारक एकदम पास आते हैं, स्वरों के समय नहीं और अर्धस्वरों के समय उनके बीच की दूरी स्वरों से ज्यादा लेकिन व्यंजनों से कम होती है।
(२) ‘अं’ और ‘अः’ इन सारी परिभाषाओं में से किसी में भी सही नहीं बैठते। ‘अं’ मे अनुस्वार जबकि ‘अः’ में विसर्ग कि मिलावट आवश्यक ही है। इसलिये ‘अं’ और ‘अः’ को स्वर मानना उचित नहीं है।
(३) ऋ और लृ का का उच्चार आजकल हम लोग भ्रष्ट रूप में ‘रु’ और ‘ल्रु’ करने लगे हैं, लेकिन शास्त्रों में इनका उल्लेख स्वरों के रूप में ही है, इसका अर्थ यह हो सकता है कि ‘र’ बोलते समय हमारी जीभ जो ऊपर तालू को स्पर्श करती है, उसे बिना उपर स्पर्श किये ‘रु’ बोलकर देखें तो हमें पता चलता है कि ‘ऋ’ और ‘लृ’ का उच्चारण ग्रंथों में कुछ अलग तरह से किया जाता था।

इस प्रकार से स्वर हुए – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, ऋ और लृ।
व्यंजनों सम्बन्धी लेख में हमने स्पर्श, ईशत्स्पर्श और ईशद्विवृत्त नामक तीन प्रयत्नों के बारे में जाना था, अब स्वरों के बारे में विचार करते समय निम्न प्रयत्नों को देखेंगे-
१. विवृत्त – इसका अर्थ है उच्चारकों का एक दूसरे से बिलकुल स्पर्श ना होना। इसमें ‘अ’ छोड़कर सभी स्वर आते हैं।
२. संवृत्त – ‘अ’ स्वर बाकी स्वरों की तरह एकदम खुले गले से नहीं आता, हमारी जीभ का पिछला हिस्सा थोड़ा सा कंठ ढँक जाता है, इसीलिये इसे ‘संवृत्त’ कहते हैं।

स्वरों का एक और वर्गीकरण उनके बोले जाने के समय के अनुसार किया जा सकता है, जिसे र्‌हस्व, दीर्घ और प्लुत कहते हैं। र्‌ह्स्व स्वर के लिये एक मात्रा, दीर्घ स्वरों के लिये दो मात्रा और प्लुत स्वर के लिये तीन मात्रा का समय लगता है। ‘एक मात्रा’ का मतलब कितना समय? यह तय करने के लिये प्राचीन उच्चारविज्ञानियों ने पक्षियों की आवाज के मुताबिक समय तय किया है, यह क्रिया उच्चारण करके ही अनुभव की जा सकती है, र्‌ह्स्व और दीर्घ स्वरों का अन्तर तो स्पष्ट है ही, दीर्घ स्वर को और कुछ समय लम्बा खींचें तो वह प्लुत बन जाता है। इसका वर्गीकरण ऐसा किया जा सकता है–

(अ) र्हस्व – अ, इ, उ, ऋ, लृ
(ब) दीर्घ – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
(स) प्लुत – आ३, ई३, ऊ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३
इसमें ३ का चिन्ह ३ मात्रा या वह समय प्रदर्शित करता है। ‘ओम्‌’ को भी लिखते समय हम ‘ओ३म्‌’ ऐसा लिखते हैं, जिसमें ‘ओ’ प्लुत है, जिसे ३ मात्राओं तक खींचा जाना है।

इस प्रकार अब वर्णमाला के सभी वर्ण और उनकी परिभाषायें इस प्रकार समायोजित की जा सकती हैं-
स्वर-
१) संवृत्त, ऱ्हस्व-अ
२) विवृत्त, ह्रस्व - इ, उ, ऋ, ऌ
३) दीर्घ- आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ
४) प्लुत- आ३, ई३, ऊ३, ॠ३,ॡ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३
व्यंजन -
१) स्पृष्ट- क् से म्
२) ईषद्विवृत्त- श्, ष्, स्, ह्
३) ळ्
अर्धस्वर-
१) ईषत्स्पृष्ट-य्, र्, ल्, व्

अब कुछ बातें वर्णमाला के बाहर भी मौजूद कुछ उच्चारों के बारे में। आमतौर पर जो वर्णमाला हमारे सामने है वह संस्कृत और हिन्दी में पाई जाती है, लेकिन इनके अलावा भी कुछ उच्चार होते हैं और उनके लिये अक्षरचिन्ह भी अलग हैं। पाश्चात्य साहित्य के अनुसार इन्हें चार भागों में बाँटा जा सकता है-

Affricates - च़, ज़, झ़,
Flaps – ड़, ढ़,
महाप्राण – न्ह, म्ह, व्ह, ल्ह, ण्ह, र्ह्‌, और
पराश्रित- अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय
(१) Affricates - 'च्, ज्, झ्' हा गुट और 'च़, ज़, झ़' हा गुट के बीच का अन्तर बोलते समय स्पष्ट हो जाता है, उदाहरण – वजन और वज़न, खाक और ख़ाक, जंग और ज़ंग आदि,
(२) Flaps – इनका अन्तर समझने के लिये उच्चारण ही करके देखना पड़ेगा, उदाहरण के तौर पर – डमरू और गाड़ना, ढोंग और चढ़ाई। ड्‌, ढ्‌ और ड़ और ढ़ का उपयोग कैसे और कहाँ किया गया है इसका विचार करने पर पता चलता है कि ड्‌ और ढ्‌ अधिकतर शुरुआत में ही आते हैं जैसे, डमरू, डिगाना, डामर या ढोल, ढोकला, ढाल आदि, लेकिन जब यही वर्ण शब्द के अन्त में आता है तो वह Flap बन जाता है, जैसे – ताड़, झाड़, लाड़, या दाढ़, कढ़ी, बाढ़ आदि, लेकिन यदि ड्‌ और ढ्‌ के पहले कोई अनुनासिक आ जाता है तो फ़िर वह अपने मूल स्वरूप में ही रहता है, जैसे- सूंड, ठंडा, खंड, षंढ, पंढरपुर, आदि।
(३) महाप्राण – इन शब्दों का उपयोग अधिकतर संस्कृत या मराठी में होता है। महाप्राण मतलब हैं तो यह संयुक्ताक्षर लेकिन इन्हें एक ही वर्ण माना जाता है, जैसे- गुन्हा, कर्‍हाड (इसमें ‘र’ आधा है), व्हाट आदि।
(४) पराश्रित – पराश्रित का सीधा सा अर्थ है, “दूसरे का सहारा लेने वाले शब्द”, ऐसे शब्द जो अकेले आ ही नहीं सकते, इन्हें उच्चार करने के लिये दूसरे वर्ण का आधार चाहिये ही होगा। स्वर, व्यंजन और अर्धस्वर ‘स्वयंभू’ होते हैं, बाकी बचे वर्ण अनुस्वार, विसर्ग, उपध्मानीय और जिव्हामूलीय सभी पराश्रित होते हैं। जैसे कि विसर्ग हमेशा स्वरों के बाद ही लगता है, अन्त में आने वाला स्वर विसर्ग में समाहित हो जाता है और उसका उच्चारण ‘ह्‌’ हो जाता है, जैसे- देवः = देवह्‌, जनाः = जनाह्‌, कविः= कविहि या भानुः=भानुहु आदि, जबकि ‘ऐ’ और ‘औ’ के बाद आने वाले विसर्ग का उच्चार देवैः= देवैहि, गौः= गौहु (सन्दर्भ – सुगम संस्कृत व्याकरण)।

इस प्रकार हमने देखा कि वर्णमाला के बाहर भी विविध वर्ण हैं जिन्हें मैंने अपनी लेखमाला में स्थान देने की कोशिश की है, क्योंकि यह हमारे रोजमर्रा के उपयोग के वर्ण हैं खासकर उर्दू शब्दों में इनका समावेश आमतौर पर होता है जैसे- ख़ादिम, क़ज़ा, ग़ज़ल आदि। इसलिये इन्हें छोड़ने या भाषा में इनका योगदान निश्चित ही बहुत है।

धन्यवाद। इस लेखमाला को फ़िलहाल यहीं समाप्त करता हूँ, ताकि कुछ दूसरे विषयों पर भी ध्यान दे सकूँ। इस लेखमाला का अध्ययन, लेखन, अनुवाद और वाचन काफ़ी थकाने वाला रहा, साथ ही पाठकों की ठंडी प्रतिक्रिया ने भी मुझे इन लेखों को जल्दी समेटने के लिये प्रेरित किया, ताकि कहीं पाठक अधिक बोर न हो जायें (यदि फ़िर कभी समय मिला और रुचि हुई तो विभिन्न ‘व्यंजनों’ की अलग-अलग विस्तारित परिभाषायें, उनके गूढ़ार्थ और उपयोग के बारे में लिखूँगा, लेकिन अभी बस यहीं तक)।

बहरहाल, यह एक प्रयास था जिसके द्वारा हमारी महान भाषा की वर्णमाला और उच्चारण का वैज्ञानिक शोध और प्राचीन उच्चार परम्परा के बारे में जो कुछ भी मैं बटोर सका, वह अपने पाठकों तक पहुँचाऊँ, और जैसा कि मैने पहले भी कहा कि यदि इन लेखों को पढ़कर दो-चार लोगों की भी हिन्दी या लेखन या उच्चारण सुधर जाता है तो भी मैं अपने को सफ़ल मानूँगा...

कुछ सन्दर्भों के बारे में एक बार फ़िर से – मराठी “उपक्रम”, सुश्री राधिका (मुम्बई विश्वविद्यालय), An Introduction to Sanskrit Lingustics – Murti, सुगम संस्कृत व्याकरण- प्र.शं.जोशी, राजस्थान पत्रिका विशेषांक.... तथा कुछ ऐसे सन्दर्भ जिनके सिर्फ़ नाम और उल्लेख ही मिले, वे हैं – Sanskrit Phonetics – विधाता मिश्रा और Phonetics in Ancient India- W.S. All)..... समाप्त।

पढ़ने के लिये बहुत धन्यवाद....


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Tuesday, October 9, 2007

भाषा, उच्चारण और वर्णमाला (भाग-४)

Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

(भाग-१, भाग-२ और भाग-३ से आगे जारी...)

‘अ’ की तरह ‘ह’ को भी सभी वर्णों का प्रकाशक कहा जाता है। कोई भी वर्ण बिना विसर्ग और अकार के बिना उच्चारित नहीं हो सकता। अ ही नाभि की गहराई से उच्चरित होने पर विसर्ग बन जाता है। इस प्रकार अ स्वयं अपने में से अपना विरोधी स्वर उत्पन्न करता है। तात्पर्य यह कि अ से ह तक की वर्णमाला में विसर्ग और अकार किसी ना किसी रूप में मौजूद रहते हैं।

स्वरों के उच्चारण स्थल कुछ व्यंजनों के उच्चारण स्थानों के इतने निकट होते हैं कि इन स्वरों का उच्चारण उन स्थानों से होने का भान होता है, लेकिन होते अलग हैं, इन्हें उप-उच्चारण स्थान कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर ‘ई’ का उप-उच्चारण वहाँ है, जहाँ से ‘क’ का उच्चार होता है, जबकि जहाँ से ‘ख’ उच्चारित होता है उसके पास ही ‘उ’ का स्थान निहित है। इसी प्रकार ‘घ’ वाले स्थान के पास ‘ए’ और ‘ङ’ के पास ‘ओ’ का उप उच्चारण स्थान होता है। ऋ के लिये मूर्धा का अंतिम हिस्सा तथा लृ के लिये दन्तमूल उप-उच्चारण स्थान माने गये हैं। अनुस्वार तथा ङ, ञ, ण, न और म के लिये नाक का भीतरी हिस्सा उप-उच्चारण स्थान माना गया है और इसीलिये इन्हें ‘अनुनासिक’ कहा जाता है। इस तरह स्वर और व्यंजन अपने-अपने निर्धारित स्थान से प्रकट होते हैं।

अधिकांश व्यंजन अकार और विसर्ग के द्वन्द्व से बने हैं। अकार (अ) कंठमूल के ध्रुव बिन्दु पर और उसका विरोधी विसर्ग (ह) नाभि के ध्रुव पर बैठा है। मतलब नाभि से होने वाले वायु के फ़ैलाव से सभी व्यंजनों का प्रारम्भ होता है और कंठ में अकार के उच्चारण के साथ वर्णाकार लेकर उनका समापन हो जाता है। हर व्यंजन का पहला और तीसरा वर्ण केवल ‘अ’ के योग से बना है, जबकि दूसरा और चौथा वर्ण विसर्ग या हकार से बनता है। ‘क’ बनता है क+अ से जबकि ‘ख’ बनता है क्‌+ ह्‌ से, इसी प्रकार ग= ग+अ लेकिन घ=ग्‌+ह्‌ और प्रत्येक ग्रुप का अन्तिम अक्षर अनुनासिक। अब हम देखते हैं प्रत्येक वर्ग के पाँचवें वर्ण के बारे में – असल में ङ ही नहीं बल्कि ञ, ण, न, म को भी समझना जरूरी है। सभी व्यंजन कंठ से होंठ तक फ़ैले हुए ग्राफ़ पर बैठे हैं, लेकिन ये पाँचों अनुनासिक वर्ण ग्राफ़ से हटकर नाक में अनुस्वार के आधार पर स्थित हैं। ग्राफ़ से अलग होने के कारण ये ग्राफ़ के सभी वर्णों को नकारते हैं, इसलिये इन सभी का अर्थ ‘नकार’ यानी ‘नहीं’ को स्वाभाविक रूप से प्रकट करता है। यह सिद्धांत संवर्ग के पाँचों सदस्यों पर लागू होता है।

आमतौर पर सबने देखा होगा कि सर्दी-जुकाम के दौरान नाक बन्द होने पर हमारे उच्चारण में दोष पैदा हो जाता है, ‘अम्बे’ को ‘अब्बे’ या कभी ‘झण्डा’ को ‘झड्डा’ स्वर निकलता है (क्योंकि अनुनासिक बन्द हो जाता है) यही बात कोई दाँत टूट जाने अथवा चाय-दूध से जीभ जल जाने के बाद त, थ, द, ध के उच्चारण में विकार आ जाता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि शुद्ध उच्चारण के लिये वाणी तन्त्र के सभी अवयव ठीक-ठाक अवस्था में भी होना चाहिये।

अब और आगे चलें तो बचे हुए निम्नलिखित वर्ण इस प्रकार हैं -
य्- तालव्य
र्, ळ्- मूर्धन्य
ल्- दन्त्य
व्- दन्तोष्ठ्य
ह्- कण्ठ्य (संस्कृत के अनुसार)

अब तक हम काफ़ी परिभाषायें देख चुके हैं जैसे उच्चारक्रिया (Articulation), उच्चारक स्थान (Articulator), कण्ठ्य (Velar), तालव्य (Palatal), दन्त्य (Dental), ओष्ठ्य (Bilabial) आदि, यह सभी प्राचीन भारतीय उच्चार पद्धति के ही स्वरूप हैं, इससे हमें यह भी पता चलता है कि उस जमाने में भी उच्चारशास्त्र बेहद विकसित था और उसी के अनुरूप वर्णमाला की रचना की गई थी। पाटकों को याद होगा कि पिछले भाग में मैने व्यंजनों की एक तालिका समान बनाई थी, जिसमें तीन दल बनाये थे। तीन अलग गुट बनाने का कारण यह था कि इन तीनों गुटों के उच्चारण के वक्त तंत्र का प्रयत्न अलग-अलग होता है। पहला गुट था ‘क से म’ इन २५ वर्णों का, इन्के लिये वाणी तंत्र “स्पर्श” प्रयत्न का उपयोग करता है। मतलब दो उच्चारकों का आपस में पूर्ण स्पर्श होता है और वायु दोनों उच्चारकों द्वारा तैयार की गई दीवार के बीच होती है। दोनों उच्चारकों के दूर जाने पर हवा जोर से बाहर निकलती है, इन वर्णों को “स्पृष्ट” या Plosive कहते हैं।

दूसरा गुट था ‘य्‌, र्‌, ल्‌, व्‌’ का, इनके लिये जो विधि अपनाई जाती है उसे “ईषत्स्पर्श” कहते हैं, मतलब इनमें दो उच्चारक एक दूसरे को हल्का सा स्पर्श करते हैं, इसलिये हवा बीच में न दबकर स्पर्श होते हुए भी बाहर निकलती है। ऐसे वर्णों को ‘अन्तस्थ’ कहते हैं, अन्तस्थ यानी व्यंजन और स्वर के बीचोंबीच रहने वाले या कहें “अर्धस्वर”। हालांकि अंग्रेजी में य्‌ और व्‌ को ही Semivowels की संज्ञा दी गई है, और र्‌ तथा ल्‌ को Consonant माना गया है।

तीसरा गुट है श्‌, ष्‌, स्‌ और ह्‌ का। इन्हें ‘ईषद्विवृत्त” कहते हैं, मतलब इनमें दो उच्चारक एक दूसरे को स्पर्श नहीं करते हैं, लेकिन हवा निकलने के लिये थोड़ा सा ही स्थान बाकी रहता है, इसलिये हवा बगैर किसी speed breaker के लेकिन कम जगह होने से तेजी से बाहर निकलती है। इन वर्णों को ‘नेमस्पृष्ट’ या Fricatives कहते हैं।

एक और वर्ण होता है ‘ळ’। इस वर्ण के बारे में विद्वानों में थोड़ा भ्रम सा है, क्योंकि ‘ळ्‌’ वर्ण आभिजात्य संस्कृत में नहीं है, और संस्कृत की प्राचीन पुस्तकों में इसका उल्लेख नहीं मिलता। वर्णमाला में ३३ व्यंजन हैं ऐसा ही कहा जाता है, लेकिन मराठी में ळ्‌ मिलाकर ३४ व्यंजन माने जाते हैं। वैदिक संस्कृत में ळ्‌ पाया जाता है लेकिन लगभग ड्‌ के रूप में, अर्थात दो स्वरों के बीच में ड्‌ का उच्चार आया तभी ळ्‌ होता है, अन्यथा ळ्‌ का अस्तित्व थोड़ा धूमिल सा है। संस्कृत से अधिक सम्बन्ध ना होने से इसे वर्णमाला में अंतिम स्थान दिया गया है और विद्वानों ने इसके बारे में अधिक विचार शायद नहीं किया है (यदि किसी पाठक को इस वर्ण ‘ळ्‌’ के बारे में अधिक जानकारी या साहित्य मिले तो वह अवश्य उल्लेख करें)। इस प्रकार हमने देखा कि तीनों दलों या टीमों में वर्णों के स्थान कहाँ-कहाँ और कैसे निहित हैं, प्रयास यह था कि इनके बीच का जो फ़र्क है वह स्पष्ट उभरकर सामने आये।

अब आगे हम देखेंगे कि स्पृष्ट वर्णों की रचना जैसी की गई है, वैसी ही क्यों की गई है, उसका वैज्ञानिक आधार क्या है? पाठकगण कृपया एक बार फ़िर से दोहरा लें इसलिये निम्नांकित तालिका दे रहा हूँ -
क् ख् ग् घ् ङ् - कण्ठ्य
च् छ् ज् झ् ञ् - तालव्य
ट् ठ् ड् ढ् ण् - मूर्धन्य
त् थ् द् ध् न् - दन्त्य
प् फ् ब् भ् म् - ओष्ठ्य

हम शुरुआत करते हैं तालिका के पाँचवे कॉलम से, जिसमें हैं ङ्‌, ञ्‌, ण्‌, न्‌ और म्‌। प्रश्न उठता है कि लगभग एक जैसे पाँच-पाँच अनुनासिक वर्णों की क्या जरूरत है? दरअसल इनमें हवा मुँह के द्वारा न जाकर नाक के द्वारा बाहर निकलती है। बचपन में व्याकरण सीखते समय का मूल सिद्धांत भी यही है कि अनुस्वार के बाद जो अगला व्यंजन आता है उसी वर्ग का अनुनासिक शब्द में उपयोग किया जाना चाहिये, जैसे ‘अंक’ में अनुस्वार के सामने चूँकि ‘क’ आया है, इसलिये इसे “अङ्‍क्‌’ लिखना चाहिये। इसी प्रकार काञ्चन, कण्टक, अन्त, अम्बर के मामले में होगा। इसका कारण यह है कि शब्द उच्चारण करते समय अनुस्वार के बाद कौन सा व्यंजन आने वाला है यह हमें ज्ञात होता है, इसलिये जीभ उसी दिशा में वाणी तन्त्र में टकराती है और उतनी मात्रा में हवा नाक के द्वारा छोड़ी जाती है। इसीलिये जैसा कि मैंने पहले कहा, जुकाम हो जाने पर हम अनुनासिक शब्दों का उच्चार ठीक से नहीं कर पाते।

अब बात चौथे और तीसरे कॉलम की (ग, घ, ज, झ, ड, ढ आदि) – इन वर्णों का उच्चार करते समय स्वरयंत्र के बीच से हवा थोड़ी रुकावट के साथ आती है, इसलिये हल्का सा कम्पन होता है और इसीलिये इन्हें ‘घोष’ या ‘मृदु’ व्यंजन (Voiced) कहा जाता है। फ़िर बारी आती है दूसरे और पहले कॉलम की – इनमें स्वरयंत्र की हलचल ज्यादा नहीं होती, इसलिये हवा बगैर किसी रुकावट के निकलती है और किसी प्रकार का कम्पन आदि नहीं होता, इसलिये इन व्यंजनों को ‘अघोष’ अथवा ‘कठोर’ (Unvoiced) कहा जाता है। ‘क्‌’ के उच्चारण के समय थोड़ी अधिक हवा मुँह से बाहर निकालें तो ‘ख्‌’ तैयार होता है। कम हवा का उपयोग करेंगे तो ‘क्‌’ का उच्चार होगा। कम हवा के उपयोग वाले व्यंजनों को ‘अल्पप्राण’ और ज्यादा हवा के उपयोग वाले व्यंजनों को ‘महाप्राण’ कहा जाता है।

‘श्‌’ और ‘ष्‌’ के उच्चारण के दौरान हमें इनके बीच का अन्तर साफ़ पता चल जाता है। हालांकि इनके उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी तो नहीं मिल पाई, लेकिन फ़िर भी कुछ प्राप्त करने की कोशिश की है, उसके अनुसार मुझे ऐसा लगता है कि ऋ, र, ट, ठ, ड, ढ और ण के पहले ‘ष’ का उपयोग होता है, क्योंकि ये वर्ण ‘ष्‌’ के मूर्धन्य “बन्धु” कहे जाते हैं। जैसे – ‘शटकोण’ गलत है, और “षटकोण” सही वैसे ही ‘ज्योतिश’ गलत है, ‘ज्योतिष’ सही। ‘ष’ से शुरु होने वाले शब्द बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन षट्‌कोण, षड्‌यंत्र, षण्मुखानन्द (यहाँ अनुस्वार आने से ‘ण’ आधा हो गया है), षोडशी (शोडशी नहीं)। लगभग यही नियम तब भी लागू होता है जब ‘ष’ बीच में आता है, जैसे- आकृष्ट, निकृष्ट, राष्ट्र, देहयष्टि, चेष्टा, कोष्ठक, अंत्येष्टि, घनिष्ठ, बलिष्ठ, श्रेष्ठ, कुष्ठ, आषाढ़, निषेध, पार्षद, अभिषेक, प्रदूषण, सामिष/निरामिष, भाषा, मनीषा, पोषण, शोषण, आदि, इनमें से किसी में भी ‘श’ का उपयोग नहीं होता है, प्रत्येक जगह ‘ष्‌’ ही उपयोग किया गया है। कई जगह ‘ष्‌’ को ‘क’ वर्ग के साथ भी रखा गया है, जैसे- आविष्कार, पुष्कर, चतुष्कोण आदि, और कहीं पुष्य, ऋष्यमूक आदि, लेकिन जैसा कि मैने पहले ही कहा कि इसका कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधार और परिभाषा मुझे ढूँढने के बावजूद नहीं मिल सका, यदि किसी पाठक को जानकारी हो तो स-सन्दर्भ भेजें।

अभी तक पाठक यह तो जान ही गये होंगे कि व्यंजनों की उच्चारक्रिया जितनी आसान लगती है, हकीकत में वह कई प्रयत्नों और वाणी तंत्रों का मिश्रण होती है। हमें पता भी नहीं चलता और हमारा अद्‌भुत वाणी तंत्र कई प्रकार की क्रिया करके शब्दों का उच्चार कर देता है।

अब स्वरों के बारे में कुछ विस्तार से अगले अंक में.....

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Saturday, October 6, 2007

कुमारस्वामी ने भाजपा को दिया चाँटा

Kumaraswami, BJP, Karnatak, Power sharing

जो काम मायावती एक जमाने में करते-करते रह गईं थी, वह बाप-बेटे की जुगलबन्दी और काँग्रेस की पिछवाड़े से की गई “उँगली” ने कर दिखाया। कर्नाटक में सत्ता की बन्दरबाँट में जब माल देने की बारी आई तो बिल्ली सारा माल अकेले हजम करने की जिद कर बैठी, और “बन्दर” देखते ही रह गये। इसे कहते हैं “चोरों को पड़ गये मोर”...। इन भाजपा वालों के साथ कम से कम एक बार यह चोट होना जरूरी था, सत्ता के लिये “यहाँ-वहाँ-जहाँ-तहाँ, मत पूछो कहाँ-कहाँ” मुँह मारते भाजपाईयों को यह चमाट कुछ ज्यादा ही जोरदार लगा है (जोर का झटका धीरे से)। आश्चर्य सिर्फ़ इस बात का है कि जनता को ठगने वाले दो चोर आपस में ही एक दूसरे को ठग लिये और जनता को मजा आ गया। इसे कहते हैं “बिन पैसे का तमाशा”, क्या-क्या नहीं किया भाजपा ने इनके लिये, लग्जरी बस से गुजरात और मध्यप्रदेश घुमाने ले गये, पहले सत्ता भी दी, मुख्यमंत्री पद भी नहीं माँगा, इतने सारे “त्याग” के बदले मिला क्या... ठेंगा...। कम से कम अब तो भाजपा वालों को अकल आ जानी चाहिये कि “धर्मनिरपेक्ष दल” (हा हा हा हा) अपने बाप के भी सगे नहीं है, तो इनके क्या होंगे। मजे की बात तो यह है कि तमाम विचार मंथन, शिविर और जाने क्या-क्या आयोजित करने वाले इनके आका इन्हें समझाते क्यों नहीं कि भाजपा को अकेले ही चलना चाहिये, जब तक पूर्ण सत्ता ना मिले (चाहे वह पचास साल बाद मिले)। भानुमति का जो पिटारा वाजपेयी जी किसी तरह पाँच साल चला ले गये, उस वक्त ने ही इनकी खटिया खड़ी की है। कल्पना करें कि भाजपा कह देती कि जब तक हमारे तीन मुद्दे – राम मन्दिर, धारा ३७० और समान नागरिकता कानून नहीं माने जायेंगे, हमे किसी से गठबन्धन नहीं करना, सब जाओ भाड़ में। उस वक्त ये सारे चूहे जैसे दल कहाँ जाते, निश्चित रूप से कांग्रेस की गोद में तो नहीं, क्योंकि अपने-अपने राज्यों में तो ये कांग्रेस के खिलाफ़ ही जीत कर आये थे, लेकिन भाजपा वालों को अपने मुद्दे या अपनी पहचान या सौदेबाजी करने से ज्यादा सत्ता की मलाई चाटने की जल्दी थी और ताबड़तोड़ “एनडीए” नाम का जमूरा खड़ा किया (ठीक वैसा ही जैसा की अभी “यूपीए” नाम का है), अंततः हुआ क्या, कन्धार का दाग सदा के लिये माथे पर लग गया, नायडू साहब, जयललिता और ममता केन्द्र को चूस कर अपने-अपने रास्ते निकल लिये, ये “राम के बन्दर” बैठे रह गये हाथ में फ़टा हुआ भगवा लिये। अब भी वक्त हाथ से नहीं निकला है, मोदी को आगे करो, हिन्दुत्व की राजनीति खुलकर करो, कम से कम इतनी सीटें लाओ (और मिल भी जायेंगी) कि मजबूत सौदेबाजी की स्थिति में आ जाओ, फ़िर अपना मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनवाओ.... राम मन्दिर पर जोरदार काम करो, सरकार गिर जाती है तो गिर जाने दो, अगली बार, उसकी अगली बार, नहीं तो और अगली बार... कभी न कभी ये “धर्मनिरपेक्ष”(?) दल भाजपा को उनकी शर्तों पर समर्थन जरूर देंगे, लेकिन उसके लिये सत्ता का त्याग करना पड़ेगा, जो कि भाजपा के लिये एक मुश्किल भरा काम है... आगे “राम” जाने....


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Friday, October 5, 2007

भाषा, उच्चारण और वर्णमाला (भाग-३)

Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

(भाग-२ से जारी...)

कभी-कभी आश्चर्य होता है, अपने मुँह से हम इतने सारे शब्द, इतनी ध्वनियाँ कैसे निकालते हैं, यही तो हमारे वाणी तंत्र की विशेषता है। मानव का वाणी तंत्र नाभि से होंठ तक होता है, यह ध्वनि का एक अद्‌भुत उपकरण है। मनुष्य का वाणी तंत्र सर्वाधिक विकसित होता है। अन्य प्राणियों, पशु-पक्षियों में यह तंत्र इतना विकसित नहीं होता, इसीलिये उनकी ध्वनियाँ बहुत सीमित होती हैं। चिड़िया सिर्फ़ चीं-चीं करती सुनाई देती है, शेर-गाय-बकरी आदि की ध्वनियाँ भी सीमित हैं। लेकिन मनुष्य में हर वर्ण का एक अलग स्थान से उच्चारण होता है। इस तंत्र के ज्यादा से ज्यादा इतने हिस्से तय किये गये हैं कि प्रत्येक वर्ण के लिये एक-एक स्थान निर्धारित है।

हम कोई उच्चारण करते हैं, तो असल में क्या होता है? जब मन में बोलने की इच्छा होती है, तब मन शरीर की अग्नि में नाभि स्थान पर आघात करता है। अग्नि की प्रवृत्ति ऊपर उठना है, वह हृदय स्थान पर वायु को प्रेरित करती है। हमारे नाभि से फ़ेफ़ड़ों के द्वारा हवा ऊपर आती है, वह हवा फ़िर गले, तालू, जीभ और दाँतों के रास्ते मुँह या नाक से बाहर आकर एक स्वर उत्पन्न करती है, जिसे हम उच्चार कहते हैं। यही वायु कण्ठ स्थान में अक्षर के रूप में प्रकट होता है। इस तरह नाभि से उठने वाली ध्वनि प्राण के सहारे ऊपर उठती है और वाणी तंत्र के जिस हिस्से में टकराती है उसी पर वर्ण की पहचान टिकी हुई है। इस प्रक्रिया में इन सभी अंगों और अवयवों का विभिन्न तरह और तरीकों से खुलना-बन्द होना होता है, और एक उच्चारण तैयार होता है, यह ठीक कुम्हार द्वारा कच्ची मिट्टी के घड़े को आकार देने के समान होता है, कहाँ पर, कितना और कैसा दबाना है जिससे कि पतले गले वाली सुराही बने या मोटे पेट वाला घड़ा बने यह कुम्हार के हाथों का दबाव तय करता है, उसी प्रकार उच्चार क्रिया में दाँत, होंठ या जीभ के अलग-अलग सम्बन्ध होने पर विभिन्न उच्चार उत्पन्न होते हैं। इसे समझने के लिये चित्र देखें –



नाभि से उठने वाली ध्वनि विसर्ग के रूप में उठती है, वह कण्ठ मूल में आकर जब “अकार” से मिलती है तब वर्ण के रूप में प्रकट होती है। विसर्ग ही ध्वनि को कण्ठ तक लाता है और लौट जाता है। विसर्ग ही “ह” के रूप में प्रकट होता है। ‘अ’ और ‘ह’ एक दूसरे के विपरीत अर्थ दर्शाते हैं, इसीलिये ये दोनो विरोधाभासी अक्षर हैं। कृष्ण ने भी गीता में कहा है “अक्षराणाम्‌अकारोस्मि” अर्थात अक्षरों में मैं अकार हूँ। इसका अर्थ यही है कि ‘अ’कार के बिना शब्द सृष्टि आगे नहीं बढ़ सकती। हर अक्षर का निर्माण में अकार के मिलने से ही होता है, इसीलिये व्यंजनों को योनि रूप और स्वर को बीज रूप कहा गया है। दोनो के मिलने से ही शब्द की सृष्टि होती है।

अक्षरों में ‘अकार’ ही एक ऐसा वर्ण है, जिसका उच्चारण कंठमूल से होता है। ‘अ’ के उच्चारण में कंठ, जीभ, होंठ अथवा मुँह की कोई भूमिका नहीं होती, यानी मुँह के किसी हिस्से को न तो सिकोड़ना होता है, न फ़ैलाना होता है। ‘अ’ के उच्चारण के समय मुँह एक जैसा गोलाकार खुला रहता है। ‘अ’ के अलावा शेष सभी वर्णों के उच्चारण में कंठ, जीभ, होंठ और मुँह का संकुचन या विस्तार होता ही है। भाषा वैज्ञानिक महेन्द्रपाल सिंह ने वर्णों की उच्चारण प्रक्रिया की वैज्ञानिक विवेचना बहुत ही रोचक रूप में की है। इसे वर्णोच्चारण विज्ञान कहते हैं। उन्होंने वाणी तंत्र की पूरी प्रक्रिया बताई है। नाभि से लेकर होंठ तक वाणी तंत्र का विस्तार है। कंठमूल से थोड़ा नीचे ‘इ’ का स्थान है, इ के स्थान से थोड़ा नीचे ‘उ’ का उच्चारण स्थान है। उ के स्थान से थोड़ा नीचे ऋ और ॠ से थोड़ा नीचे ‘ए’ का उच्चारण होता है। ‘ए’ से जुड़ा हुआ ही ‘ऐ’ का स्थान है, इन दोनों में बहुत हल्का सा फ़र्क है। ‘ए’ के स्थान के नीचे ‘ओ’, ‘औ’ का उच्चारण किया जाता है। ‘औ’ के स्थान के पीछे से नाभि के निकट से अनुस्वार तथा नाभि के केन्द्र से विसर्ग का उच्चारण किया जाता है।

प्रस्तुत चित्र में हमें स्पष्ट तौर पर ध्वनि यंत्र (Vocal Tract) के सभी अवयव दिखाई देते हैं। कोई जरूरी नहीं कि बोलते समय इन सभी अवयवों का उपयोग हो ही, लेकिन जीभ का पिछला हिस्सा (Velum), तालू (Palate), नाक के छेद (Nasal Cavity), होंठ (Lips), दाँत (Teeth), जीभ का अगला भाग (Tip of the tongue), जीभ का मुख्य भाग (Body of the tongue), जीभ का निचला हिस्सा (Root of the tongue) इनका विभिन्न तरीकों से प्रयोग होता है। जीभ के निचले हिस्से का सबसे पीछे का भाग जिसे Uvula कहा जाता है (चित्र में नहीं है), वह भाग उर्दू के कुछ शब्दों जैसे – क़, ख़, ग़ आदि के लिये उपयोग होता है (जंग और ज़ंग बोल कर इसे समझा जा सकता है)। सुविधा के लिये इन तमाम अंगों और अवयवों को एक ही शब्द “उच्चारक” के रूप में हम लेते हैं। इनमें से दो के आपस में मिलने पर कैसे व्यंजन तय होते हैं उसी प्रकार उन्हें नाम दिये गये हैं- जैसे
१. कण्ठ्‌य – जीभ के निचले और पिछले हिस्से के संयोग से निर्माण होने वाले – क्‌, ख्‌, ग्‌, घ्‌, ङ्‌
२. तालव्य – तालू और जीभ के आपस में स्पर्श होने से निर्माण होने वाले – च्‌, छ्‌, ज्‌, झ्‌, ञ्‌, श्‌
३. मूर्धन्य – इसमें भी तालू और जीभ के स्पर्श होने से ही शब्द का निर्माण होता है लेकिन यह स्पर्श भिन्न तरीके से होता है, तालव्य में जीभ सीधी रहती है, जबकि मूर्धन्य में जीभ थोड़ी अंदर की दिशा में मुड़ जाती है, जैसे – ट्‌, ठ्‌, ड्‌, ढ्‌, ण्‌, ष्‌
४. दन्त्य – दाँतों और जीभ का स्पर्श होने से निर्माण होने वाले – त्‌, थ्‌, द्‌, ध्‌, न्‌, स्‌
५. ओष्ठ्‌य – दोनों होंठों के साथ आकर स्पर्श से निर्माण होने वाले – प्‌, फ़्‌, ब्‌, भ्‌, म्‌

भाषा में वर्णों का निर्धारण वैज्ञानिक तरीके से हुआ है, इसे समझने के लिये गणितीय संवर्ग के सिद्धांत और “द्वंद्वात्मक तर्क” की प्रक्रिया को समझना होगा। सबसे पहले एक विचार वाद के रूप में मन में आता है। यह विचार अपने अन्दर से एक विरोधी विचार को पैदा करता है, जिसे हम प्रतिवाद कहते हैं। वाद और प्रतिवाद एक-दूसरे के विरोधी होते हैं। वाद-प्रतिवाद के समन्वय से बनी हुई स्थिति को ‘संवाद’ कहते हैं। इसी संवाद-प्रतिवाद के सिलसिले को द्वंद्वात्मक तर्क का सिद्धांत कहा जाता है। इसी तर्क के आधार पर हमारी भाषा में व्यंजन वर्णों की रचना हुई है। व्यंजनों के स्पष्ट उच्चारण के लिये मुख, कंठ और होंठ तक फ़ैले उच्चारण स्थानों के पहले पाँच भाग किये गये हैं, फ़िर इन पाँच बड़े भागों में से प्रत्येक बड़े भाग के पाँच छोटे-छोटे हिस्से किये गये हैं। इस तरह व्यंजनों के पाँच वर्ग और प्रत्येक वर्ग के पाँच उप-उच्चारण स्थान माने गये हैं। पाँच से अधिक हिस्से करने पर वर्णसंकर दोष पैदा हो जाता, और ध्वनियाँ स्पष्ट उच्चारित नहीं होतीं।

जैसा कि पहले हम देख चुके हैं व्यंजनों के पाँच वर्ग होते हैं –
क वर्ग – क, ख, ग, घ, ङ
च वर्ग – च, छ, ज, झ, ञ
ट वर्ग – ट, ठ, ड, ढ, ण
त वर्ग – त, थ, द, ध, न
प वर्ग – प, फ़, ब, भ, म

बोले और लिखे जाने के क्रम में सबसे अन्त में ‘प’ वर्ग का स्थान है। दरअसल हमारा वाणी तंत्र एक ग्राफ़ की तरह से बनाया गया है। इसके अन्तिम छोर से यानी होंठ के नीचे के छोर से ‘प’ का उच्चारण होता है। ऊपरी होंठ के पाँच भाग करने पर निचले सिरे से ऊपरी सिरे तक बढने पर ‘प, फ़, ब, भ, म’ का उच्चार होता है। इससे कुछ पीछे हटने पर ऊपर दन्त स्थान का निचला छोर आता है। इस दन्त स्थान के भी पाँच विभाग किये गये हैं, नीचे से ऊपर की ओर जीभ के प्रत्येक हिस्से से टकराने पर त, थ, द, ध, न बोले जाते हैं। दन्त मूल से थोड़ा सा ऊपर मूर्धा के अन्तिम अथवा अगले हिस्से पर जीभ के लगने से ‘ट’ की ध्वनि निकलती है, ट के स्थान से थोड़ा सा पीछे हटने पर मूर्धा के चार स्थानों पर जीभ टकराती है, तो क्रमशः ठ, ड, ढ, ण का उच्चारण होता है। ‘ण’ का उच्चारण मूर्धा के सबसे ऊपरी हिस्से में होता है, ये मूर्धा का मूल भाग माना गया है। मूर्धा के बाद तालू का प्रारंभ होता है, तालू के अग्र भाग से जीभ के स्पर्श करने से ‘च’ का उच्चारण होता है। च के स्थान के पीछे तालू के भी चार हिस्से किये गये हैं जिस पर जीभ स्पर्श करने से छ, ज, झ, ञ का उच्चारण होता है। तालू के पीछे से कंठ की सीमा प्रारम्भ होती है। ञ के पिछले स्थान से कंठ के चार स्थानों पर ख, ग, घ और ङ उत्पन्न होते हैं। जिन लोगों को पहले यह दन्त्य, कण्ठ्य या तालव्य की अवधारणा मालूम नहीं थी, उन्हें अब यह पता चल गया होगा कि इन व्यंजनों को इस प्रकार ही क्यों तालिका में रखा गया है।

लेकिन फ़िर भी एक प्रश्न उठता है कि जब “स्‌”, ‘श्‌’ और ‘ष्‌’ जैसे शब्द इन्हीं व्यंजनों की श्रृंखला में आते हैं, तो फ़िर उन्हें इन पहले २५ व्यंजनों से अलग क्यों रखा गया है? ‘श्‌’ और ‘ष्‌’ में क्या अन्तर है, हालांकि इसका उत्तर पाठकों को स्वयं इन व्यंजनों के उच्चार करके देखने से स्पष्ट तौर पर समझ में आ जायेगा, फ़िर भी आने वाले लेखों में इसका विस्तार करने की कोशिश की जायेगी।

अगले भाग में हम देखेंगे व्यंजनों के बारे में और गहराई से विवेचन..... तब तक सुधी पाठक कृपया इनका गंभीरता से अध्ययन करके मेरी गलतियों से अवगत कराते रहें, ताकि उस पर चर्चा-प्रतिचर्चा का द्वार खुले।

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Wednesday, October 3, 2007

भाषा, उच्चारण और वर्णमाला (भाग-२)

Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

(भाग-१ से जारी...)
हमारी सृष्टि अक्षर से उत्पन्न होती है, इनका क्षरण नहीं होता इसलिये ये अक्षर कहलाते हैं। हमारी भाषा भी अक्षरों पर आधारित होती है, इन अक्षरों का भी क्षरण नहीं होता। अक्षर में स्वर और व्यंजन दोनों आते हैं, इन्हें वर्ण भी कहा जाता है। ये सारे वर्ण ध्वनि पर आधारित हैं, ध्वनि ही नाद है, और यह नाद सम्पूर्ण आकाश में व्याप्त रहता है - सूक्ष्म रूप में। इसीलिये आज वैज्ञानिक, कृष्ण द्वारा कही गई गीता को अंतरिक्ष से प्राप्त करने के प्रयास में जुटे हैं।

वर्णमाला के भी कुछ निश्चित सिद्धान्त हैं। वर्णमाला अ से ह तक होती है। पाँच-पाँच वर्णों की एक-एक पंक्ति की भी निश्चित भूमिका है, निश्चित स्थान है, निर्धारित पाँचों अक्षरों के निर्माण का भी एक क्रम है, वर्णमाला क्रम ऐसे ही नहीं बना दिया गया है, और इसीलिये प्रत्येक वर्ण का अपना-अपना अर्थ और स्थान होता है।

ऋग्वेद के अनुसार “स्वर्यन्त शब्द्यन्त अति स्वराः” अर्थात अन्य वर्ण की सहायता के बिना उच्चारित होने वाले वर्ण ‘स्वर’ कहलाते हैं। जबकि अर्थों को प्रकट करने वाले, व्यंजना करने वाले और स्वरों को मिलाकर उच्चारित होने वाले वर्णों को व्यंजन कहा जाता है। इस विस्तृत लेख की पृष्ठभूमि बताना अत्यंत आवश्यक था, जिससे कि पाठकों को इस विषय के बारे में थोड़ा विचार करने और एक भिन्न दृष्टिकोण रखने में मदद मिले, साथ ही भाषा विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले अन्य हिन्दी, संस्कृत के लेखक इसमें मदद कर सकें, क्योंकि मैं कोई भाषा विज्ञानी नहीं हूँ, सिर्फ़ अध्ययन की रुचि के कारण तथा हिन्दी पाठक समुदाय को इसका लाभ मिले इसलिये यह लेखमाला प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मूलतः देखा जाये तो स्वर १२ ही हैं अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, ॠ। इसमें के आठ अक्षरों (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ) को समानाक्षर और बाकी चार (ए, ऐ, ओ, औ) को सन्ध्याक्षर कहा जाता है। समानाक्षर मूल प्रवृत्ति के होते हैं, जबकि सन्ध्याक्षर स्वरों के योग से बने हैं, जैसे अ+इ=ए, अ+उ=ओ। हमारी वर्णमाला आमतौर पर हमें पूरी तरह याद होती ही है, कुछ लोगों को “दन्त्य”, “तालव्य” आदि शब्दों के अर्थ भी पता होंगे, लेकिन इस वर्णमाला की रचना ऐसी ही क्यों की गई? या इसके पीछे कोई तर्कसंगत कारण है? त्‌ थ्‌ द्‌ ध्‌ न्‌ ये सभी दन्त्य उच्चार हैं, यह तो पता है, लेकिन इसे इसी क्रम से क्यों लिया गया? थ्‌, त्‌, ध्‌, द्‌, न्‌ अथवा थ्‌, ध्‌, न्‌, त्‌, द्‌ इस क्रम से क्यों नहीं लिया गया? ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है। ऋ और लृ को स्वर क्यों माना जाता है? श्‌ और ष्‌ में क्या फ़र्क है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास इस लेखमाला में किया गया है।

इस लेखमाला को पढते समय जब कभी मैं थ्‌, द्‌ अथवा “आ” आदि अक्षर लिखूँ तो पाठक उसे मात्र एक अक्षर के तौर पर ना देखें। हमारे मुँह से बाहर निकलने वाले उच्चार कैसे हो रहे हैं, यह दृष्टिकोण होना चाहिये। व्यंजन लिखते समय अक्षरों को हलन्त के साथ ही लिखा गया है, जिससे कि व्यंजन की शुद्धता बरकरार रहे, उसमें स्वर की मिलावट नहीं हो, जैसे कि ‘ण’ उच्चार में “ण्‌” और “अ” का मिश्रण है, एक व्यंजन है, दूसरा स्वर है। यह मिलावट रोकने और भ्रम से बचने के लिये व्यंजनों को हलन्त के साथ लिखा गया है। इसे और स्पष्ट तौर पर समझने के लिये हम साइंस के विद्यार्थियों की तरह परमाणु-अणु का सिद्धांत वापरेंगे – “ण्‌” एक परमाणु और “अ” दूसरा परमाणु है, जिससे मिलकर “ण” अणु बनता है, जैसे कि ‘क्ष’ नामक अणु ‘क्‌’, ‘ष्‌’ और ‘अ’ इन परमाणुओं से बना है, लेकिन वर्णमाला में अन्य स्वर-व्यंजनों के साथ-साथ ‘क्ष’ और ‘ज्ञ’ को भी रखा जाता है।

लेखमाला के अगले भाग (भाग-३) में हम देखेंगे कि उच्चार करने वाले हमारे शरीर के विभिन्न अवयवों (Vocal tract) के बारे में, तब तक यहाँ मैं वर्णमाला प्रस्तुत करता हूँ, ताकि यदि किसी को मालूम ना हो तो एक बार इन अक्षरों पर नज़रे-इनायत करे, मनन करे, कंठस्थ करे, जिससे कि वह इस लेखमाला का और अधिक आनन्द उठा सके –

स्वर - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, ॠ, लृ
व्यंजन वर्ग –
क वर्ग - क्‌, ख्‌, ग्‌, घ्‌, ङ्‌
च वर्ग - च्‌, छ्‌, ज्‌, झ्‌, ञ्‌
ट वर्ग - ट्‌, ठ्‌, ड्‌, ढ्‌, ण्‌
त वर्ग - त्‌, थ्‌, द्‌, ध्‌, न्‌
प वर्ग - प्‌, फ़्‌, ब्‌, भ्‌, म्‌

य्‌, र्‌, ल्‌, व्‌
स्‌, श्‌, ष्‌, ह्‌, ळ्‌
(विद्वान पाठक जरूर सोच रहे होंगे कि इसमें ‘अं’ और ‘अः’ का तथा ‘क्ष’ ‘त्र’, ‘ज्ञ’ का समावेश क्यों नहीं है? इसका जवाब आगे की सम्पूर्ण लेखमाला पढकर मिल जायेगा)।

अगले भाग में हम देखेंगे स्वर और व्यंजन का उच्चार, उच्चारित होने वाले शब्दों के लिये शरीर के ध्वनि तंत्र का अध्ययन, कण्ठ्य, तालव्य, दन्त्य उच्चार आदि के बारे में जानकारी....

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Tuesday, October 2, 2007

भाषा, उच्चारण और वर्णमाला (भाग-१)

Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

अक्सर हमारे मन में सवाल उठते हैं कि आखिर “भाषा” का उद्‌भव कैसे हुआ? वर्णमाला कैसे बनी?, उच्चार क्रिया क्या है? क, ख, ग, घ के बाद ङ ही क्यों आता है, ण क्यों नहीं आता?

किसी भी भाषा का विकास एक सतत प्रक्रिया है, मानव जीवन के हजारों वर्षों के इतिहास में कई बोलियाँ आईं-गईं, कई लिपियाँ बनीं-मिटीं, कई भाषाओं का उत्थान-पतन हुआ, कुछ लुप्त हो गईं या होने की कगार पर हैं। इस सारी प्रक्रिया में हमारे पूर्वजों, उनके पूर्वजों, साधु-महात्माओं, विद्वानों आदि सभी नें भाषा और उच्चारण क्रिया में कुछ ना कुछ शोध करके उसे आगे, और आगे बढाने का महती कार्य किया है।

उच्चार क्रिया और वर्णमाला के अध्ययन हेतु विभिन्न साईटों के भ्रमण के दौरान, और मराठी ब्लॉग जगत तथा विभिन्न फ़ोरमों से जुड़े होने के कारण विचार आया कि इस रोचक सामग्री को एकत्रित किया जाये। इस लेखमाला में, मुम्बई विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान में अध्ययनरत एक छात्रा सुश्री राधिका द्वारा एक मराठी साईट "उपक्रम" पर लिखे गये विभिन्न लेख यह, यह और यह, तथा यहाँ हैं, इसके साथ ही “राजस्थान पत्रिका” के विशेष अंक के कुछ हिस्सों को भी इसमें यूनिकोडित करके समाहित करने का प्रयास किया गया है। कुछ और “फ़ोनेटिक उच्चार” सम्बन्धी अंग्रेजी साईटों के कुछ हिस्से का अनुवाद भी है। हिन्दी के पाठकों को भी इसका पूरा रसास्वादन मिलना चाहिये, इसलिये इन विस्तृत लेखों और विभिन्न जगह पर बिखरी सामग्री का अनुवाद करने की कोशिश कर रहा हूँ, विषय भी अत्यंत रोचक है। विद्वानों द्वारा प्रस्तुत जानकारी भी गहराई लिये हुए और विषद्‌ अध्ययन से भरपूर है। इस लेखमाला का संकलन, संपादन और अनुवाद करना एक मुश्किल और मेहनत भरा काम रहा। प्रस्तुत है इस लेखमाला का पहला भाग, जिसमें वर्णमाला, भाषा, उच्चारण आदि के बारे में प्रारम्भिक लेकिन वैज्ञानिक जानकारी दी गई है।

बहुत वर्षों पहले किसी ने मुझसे पूछा था कि “भाषा सीखते समय संस्कृत का क्या फ़ायदा होता है?” मैंने भी एक सर्वसाधारण सा जवाब दिया कि “संस्कृत में सभी प्रकार के उच्चार होने के कारण व्यक्ति की जीभ वह चाहे जैसे घुमा-फ़िरा सकता है, इसलिये अन्य भाषाओं के कैसे भी उच्चार करना उसके लिये आसान होता है”, मजे की बात यह कि यह जवाब सामने वाले व्यक्ति को उचित भी लगा और वह संतुष्ट हो गया, लेकिन जब असल में भाषाशास्त्र का अध्ययन प्रारम्भ किया तब पता चला कि मुझे कितनी बड़ी गलतफ़हमी थी। हम सभी को यह गलतफ़हमी आमतौर पर होती है कि “हम अक्षरों को ही उच्चार समझते हैं”। जैसे कि हमें अंग्रेजी सिखाते समय बताया जाता है कि इसमें पाँच स्वर हैं – a, e, i, o, u, लेकिन ये तो सिर्फ़ अक्षर हैं, उच्चार पद्धति से देखा जाये तो अंग्रेजी में ५-१० नहीं बल्कि २० स्वर हैं। इसका मतलब यह कि हम जो अक्षर लिखते हैं और उनका उच्चारण, इसमें काफ़ी अन्तर होता है।

इस प्रकार यह गलतफ़हमी हमें दूर कर लेनी चाहिये कि संस्कृत भाषा में सभी उच्चार हैं, किसी भी भाषा में दुनिया के सभी उच्चार नहीं होते हैं, न ही हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अंग्रेजी में “भ” नहीं है और संस्कृत में “ऍ” नहीं है, और ऐसे भी कई उच्चार हैं जो इन दोनों भाषाओं में नहीं हैं। संक्षेप में कहा जाये तो अन्य भाषाओं की तरह ही संस्कृत भी मानव निर्मित ही है और उसकी भी कुछ सीमायें हैं। हर शिक्षित व्यक्ति के लिये यह ज्ञान भी शिक्षा जैसा ही महत्वपूर्ण है, यानी मातृभाषा का ज्ञान, हिन्दी वर्णमाला का ज्ञान। इस लेखमाला में वर्णमाला के स्वर-व्यंजन, उनके निर्माण के नियम, शब्दों की रचना के सूत्र, ध्वनि विज्ञान की भारतीय अवधारणा आदि से लेकर शब्द ब्रह्म तक की विवेचना होगी। यही सब तो है जिन पर हमारा जीवनक्रम आधारित है। इसी लेखमाला से हमारी भाषा की वैज्ञानिकता भी सिद्ध होगी। पाठकों के लिये हिन्दी एक रुचिकर भाषा बन जायेगी। मुझे खुशी होगी यदि इन लेखों से एक प्रतिशत पाठक भी भाषा शक्ति का अनुभव कर सकें, अपने उच्चारण और लेखन में शुद्धता ला सकें, तब भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा भी हो सकेगी।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि भाषा में भी अनेक प्रकार की मजेदार बातें हैं, और उन्हें पहचान कर प्राचीन काल के अध्ययनकर्ताओं ने उसका एक स्वतंत्र तर्कसंगत शास्त्र या विज्ञान बनाया, जिसे उच्चारशास्त्र (Phonetic Science) या भाषा विज्ञान कहते हैं। संस्कृत भाषा को समझने की पहली पायदान के रूप में हैं इस भाषा के विभिन्न उच्चारण और वे जिसके द्वारा एक माला में गुँथे हुए हैं, वह होती है वर्णमाला। अभी स्थिति यह हो रही है कि न तो हम हिन्दी पूरी तरह से सीख पा रहे हैं, ना ही अंग्रेजी। व्यक्ति यह मानने को तैयार नहीं है कि भाषा हमारे व्यक्तित्व का दर्पण होती है। क्या गलत भाषा अथवा शब्दों का प्रयोग करना हमें शोभा देता है? पर्सनालिटी डेवलपमेंट और तथाकथित मैनेजमेंट गुरु सबसे पहले बताते हैं कि सामने वाले पर प्रभाव का सबसे पहला सूत्र है भाषा, चाहे वह हिन्दी हो या अंग्रेजी। जब व्यक्ति भाषा को सही रूप में प्रयोग करता है, सही शब्दों का चुनाव करता है, तब सुनने-पढ़ने वाले पर विशेष प्रभाव पड़ता है। यह इस बात का सूचक भी है कि आप सामने वाले का कितना सम्मान करते हैं। गलत भाषा का अर्थ या तो लापरवाही होता है, या जानबूझकर सामने वाले का अपमान करना होता है, और दोनों ही बातें उचित नहीं हैं।

इसका मतलब है हमें शब्दों के साथ-साथ अर्थों की भी जानकारी होना चाहिये। अर्थ के कारण ही ज्ञान पकड़ में आता है। इसी प्रकार शब्द को समझने के लिये अक्षर या वर्ण को समझने की जरूरत है। आज अनेक शब्दों का गलत प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है, प्रयोग भी इतना कि कई जगह पर गलती भी रूढ़ि बन चुकी है। जैसे एक शब्द है अस्मिता, इसका अर्थ है हठ करना, हम कहने लगे हैं कि यह देश की अस्मिता का प्रश्न है। इस रूप में अस्मिता का अर्थ इज्जत हो गया है, जो कि गलत ही है, लेकिन अब यही प्रचलन में है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है, इसके माध्यम से हम अपने मन की बात करते हैं या लिखकर भेजते हैं। भाषा सही होगी, शब्दों का चुनाव सही होगा तभी हमारी बात दूसरे व्यक्ति को सही-सही समझ में आयेगी। खान-पान और पहनावे के साथ-साथ हम भाषा का स्वरूप भी बदलते रहते हैं, यह और बात है कि आगे चलकर हमें इसे पुनः सही और शुद्ध करना ही पड़ता है, फ़िर शुरु से ही सही भाषा का उपयोग क्यों ना किया जाये? आज भाषा, रुढ़ि में बँधकर वास्तविक अर्थों से दूर होती जा रही है। अर्थ का अनर्थ हो रहा है। शब्द अपने मूल स्वरूप से अलग दिखाई देने लगा है, क्योंकि उसपर कई आवरण चढ़ गये हैं। (भाग-२ में जारी......)

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