Wednesday, August 29, 2007

हम हैं मालवा के "खवैय्ये"

Pohe-Jalebi, Dal Bafla and Rabdi of Malwa Region

पश्चिमी मध्यप्रदेश का एक बड़ा भूभाग है जिसे कहते हैं “मालवा” जिसमें मुख्यतः इन्दौर, उज्जैन, देवास, रतलाम और मन्दसौर जिले आते हैं। “पग-पग रोटी, डग-डग नीर” यह कहावत पहले मालवा के लिये कही जाती थी (कही तो अब भी जाती हैं, लेकिन अब डग-डग नीर यहाँ मौजूद नहीं है)। लेकिन मौजूद है यहाँ की “खवैय्येगिरी” की परम्परा। दूध, सोयाबीन और हरी सब्जियों की बहुतायत वाला यह इलाका विभिन्न बेहतरीन व्यंजनों के लिये जाना जाता है। सुबह होती है नाश्ते हेतु पोहे-जलेबी से। कई लोगों को, जिन्होंने यह “कॉम्बिनेशन” नहीं खाया है वह आश्चर्य करेंगे, लेकिन भाप पर पके हुए (जी हाँ, भट्टी पर तपेले में गर्म पानी रखकर उसपर पोहे की कढाई रखी जाती है, और बिना तेल के सीधे हल्दी-मसाला-खड़े धने-अनारदाना- सेंव-प्याज मिलाकर दूर से ही लोगों की लार टपकाने हेतु सजाकर रख दिया जाता है) गरमागरम पोहे का स्वाद वही जान सकता है, जिसने खाया हो। साथ में होती हैं गरम और कड़क जलेबियाँ। एक कौर पोहे का जिसमें एक छोटा सा टुकड़ा जलेबी का, म्म्म्म्म्म मजा आ जाता है, कई बार गप्पें मारते हुए, या “जलेबी बच गई है इसलिये” एक की जगह पोहे की दो प्लेट हो जाती हैं। इतना भारी नाश्ता करने के बाद भोजन दो-तीन बजे के बाद ही होता है। भोजन के लिये हाजिर होते हैं “दाल-बाफ़ले”। दाल-बाफ़ले मालवा का शाही भोजन माना जाता है, जब कोई विशेष आयोजन (मुंडन, सूरज-पूजा, जन्मदिन पार्टी आदि) होता है तब मेजबान दाल-बाफ़ले का कार्यक्रम रखते हैं। संक्षेप में, “बाफ़ला” कहते हैं आटे के एक बड़े, घी में पके हुए गोले को, जिसे दाल में चूरा-चूरा करके खाया जाता है।

बाफ़ला बनाने के लिये रोटी के आटे से थोड़ा मोटा (दरदरा) आटा गूँथा जाता है, फ़िर उसमें नमक, हल्दी आदि मिलाकर उसके गोले बना लिये जाते हैं (आकार में टेनिस गेंद से थोड़े बड़े)। इन आटे के गोलों को कंडे के ढेर में दबा कर उन कंडों को सुलगा दिया जाता है, कंडों की धीमी-धीमी आँच से ये गोले भीतर तक पूरी तरह पक जाते हैं। फ़िर इन्हें बाहर निकालकर उस पर लगी राख आदि को कपड़े से साफ़ करके, शुद्ध घी से भरी हुई एक बड़ी परात में उन्हें हल्का सा “चीरा” लगाकर डुबाया जाता है, इससे गरम-गरम बाफ़ले अन्दर तक घी से पूरी तरह नहा जाते हैं। दाल तो जैसी आपकी मर्जी हो बना दी जाती है (आमतौर पर खट्टी-मीठी), लेकिन इन दोनो के साथ रवे-मावे के लड्डू भी होते हैं, जिसमें सूखा मेवा और मिश्री डाली जाती है, हरी मिर्ची की तीखी चटनी और गोभी या आलू की सब्जी, अब हुई पूरी “डिश” तैयार। पूरी थाली (एक बाफ़ला, दाल, एक लड्डू, चटनी और थोडी सी सब्जी) परोसने के बाद यदि कोई एक और पूरा बाफ़ला लेता है, तो मानना पड़ेगा कि उसकी खुराक बेहतरीन है। लेकिन इसकी नौबत कम ही आती है। इस शानदार और शाही भोजन के बाद शाम चार बजे से पाँच बजे तक एक नींद जरूरी हो जाती है। यह भोजन “एलीट” वर्ग के लिये नहीं है, और उन लोगों के लिये भी नहीं जो आजकल “घी” के नाम से ही चकरा जाते हैं। यह खाना खालिस देसी लोगों के लिये है (ना तो छुरी काँटे से खाया जा सकता है ना चम्मच से, सिर्फ़ भगवान के दिये हाथों से ही), पाचक भी तभी है जब आलथी-पालथी मार कर, पंगत में बैठकर, हाथ पर लगे शुद्ध घी को स्वाद लेकर खाया जाये।

इस असाधारण खाने के बाद शाम को भोजन करने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं बनती है, इसलिये आठ-नौ बजे पैदल घूमने निकल जाईये, लम्बी-लम्बी गप्पें हाँकते जाईये, कोई बन्दिश नहीं है, उज्जैन में हों तो महाकाल का दर्शन करते हुए, इन्दौर में हों तो होलकरों के राजवाड़े आदि को देखते हुए, वापस मुख्य बाजार में आइये, जहाँ जवान होती हुई रात के दस बजे के लगभग “लच्छेदार रबड़ी” आपका इन्तजार कर रही है। ऐसी रबड़ी और कहीं नहीं खाई होगी आपने। “रबड़ी”, दूध से बना हुआ ही एक प्रकार है। एक बड़े कढ़ाव में शाम से ही दूध उबलने के लिये छोड़ दिया जाता है, आते-जाते एक हलवाई उस दूध पर एक के बाद एक आती जा रही मलाई की परतों को एक बारीक लोहे की सलाई से कढ़ाव के चारों तरफ़ इकठ्ठा करता जाता है, इससे धीरे-धीरे दूध अटते-अटते कम होता जाता है और तब तक कढ़ाव के चारों तरफ़ किनारों पर मलाई की एक मोटी परत जम चुकी होती है। बस, अन्त में थोड़े से बचे हुए दूध में (जो कि लगभग गुलाबी रंग का हो जाता है) में इस मलाई को काट-काट कर डाल दिया जाता है और उसमें थोड़ी सी शक्कर मिला दी जाती है, हो गई तैयार “रबड़ी”, बस बगल में ओटले पर बैठ जाइये (ना, ना पैंट की चिंता ना करें, ओटले पर बैठकर ही रबड़ी खाने का असली मजा आयेगा), दोने में सौ ग्राम रबड़ी मंगवाईये और (थोड़े ज्यादा हिम्मत वाले हों, तो) उंगली से धीरे-धीरे चाटकर खायें, ऐसा मजा ना मिला होगा, ना दोबारा कहीं मिलेगा। मालवा में आकर यदि आपने दाल-बाफ़ले और रबड़ी नहीं खाई तो यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कोई आगरा जाकर ताजमहल ना देखे।

इन सब व्यंजनों के अलावा उज्जैन की एक खासियत और है, वह है भगवान शिव का प्रसाद यानी बूटी, या विजया, सीधी-सीधी भाषा में कहूँ तो “भाँग” (कृपया नाक-भौंह ना सिकोड़ें, क्योंकि जिसने यह “प्रसाद” चखा ही ना हो उसे कोई हक नहीं है इसकी बुराई करने का)। दिनचर्या के दो खास समय जिनका उल्लेख उपर करना रह गया वे हैं नाश्ते के बाद सुबह नौ बजे और दाल-बाफ़ले खाने के बाद शाम को, जी हाँ यही समय है “विजया” लेने का, और आपको कुछ भी नहीं करना है, मुख्य बाजार में कई भाँग-घोटे की दुकानें मिल जायेंगी, सिर्फ़ और सिर्फ़ दो रुपये की गोली घुटवा लीजिये, भोले बाबा का नाम लीजिये और गटक जाइये, बस आधे घंटे के भीतर ही आप “स्वर्गवासी” होंगे... बिलकुल... भाई जब आपको अपने आसपास मेनका, रंभा, उर्वशी नजर आने लगें तो आप “स्वर्गवासी” ही हुए ना! और सिर्फ़ दो रुपये इसलिये कहा कि एक तो सस्ता, सुन्दर और “टिकाऊ” सौदा, और साथ ही यह मात्रा इतनी होती है कि ना तो नाली में गिरने का खतरा होता है, ना ही बीबी को पता चलने का, यानी मौज ही मौज। एक बात और, कि शिवबूटी का सेवन करने पर आपकी भूख खुल जाएगी, तब या तो हँसते-हँसते आप आधा बाफ़ला ज्यादा खा जायेंगे, या फ़िर सौ ग्राम रबड़ी का एक दोना और पेट में खिसका देंगे.... राम कसम हम मालवा वाले तो खाने में ही लुट गये हैं... तो आप किस बात का इन्तजार कर रहे हैं हुजूर... चले आईये म्हारे मालवा मां...

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Monday, August 27, 2007

सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं? (भाग-४)

Know Sonia Gandhi (Part-4)

गतांक (सोनिया...भाग-३) से आगे जारी...

राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़ होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया । लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19 नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं (वे खुद को ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक “आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई समय-सीमा तय नहीं है।

जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं (आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद, ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की नागरिकता ले ली।

भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी, नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे? एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक किया जाता था, एयर इंडिया और अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ, पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें, सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम – एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम – गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़” है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ है? एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी बैंक के खाते से हुआ था। इस सबकी शिकायत जब मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले। इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा। सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया, जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो” किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी, 14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का “प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी “समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।

इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती। उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया। इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है? और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये? ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट, माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है, लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है, और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली की स्टाइल है।

[आशा है कि मेरे कई “मित्रों” (?) को कई जवाब मिल गये होंगे, जो मैंने पिछली दोनो पोस्टों में जानबूझकर नहीं उठाये थे, यह भी आभास हुआ होगा कि कांग्रेस सांसद “सुब्बा” कैसे भारतीय नागरिक ना होते हुए भी सांसद बन गया (क्योंकि उसकी महारानी खुद कानून का सम्मान नहीं करती), क्यों बार-बार क्वात्रोच्ची सीबीआई के फ़ौलादी (!) हाथों से फ़िसल जाता है, क्यों कांग्रेस और भाजपा एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं? क्यों हमारी सीबीआई इतनी लुंज-पुंज है? आदि-आदि... मेरा सिर्फ़ यही आग्रह है कि किसी को भी तड़ से “सांप्रदायिक या फ़ासिस्ट” घोषित करने से पहले जरा ठंडे दिमाग से सोच लें, तथ्यों पर गौर करें, कई बार हमें जो दिखाई देता है सत्य उससे कहीं अधिक भयानक होता है, और सत्ता के शीर्ष शिखरों पर तो इतनी सड़ांध और षडयंत्र हैं कि हम जैसे आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकते, बल्कि यह कहना गैरवाजिब नहीं होगा कि सत्ता और धन की चोटी पर बैठे व्यक्ति के नीचे न जाने कितनी आहें होती हैं, कितने नरमुंड होते हैं, कितनी चालबाजियाँ होती हैं.... राजनीति शायद इसी का नाम है...]

Sunday, August 26, 2007

आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं (भाग-३)

Do You Know Sonia Gandhi? (Part-3)
(इस भाग में – सोनिया गाँधी का जन्म, उनका पारिवारिक इतिहास, उनके सम्बन्ध, उनके झूठ, उनके द्वारा कानून से खिलवाड़ आदि शामिल हैं)
सोनिया गाँधी से सम्बन्धित पिछले दोनों अनुवादों में हमने सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ जाना (क्या वाकई?) लेकिन जितना जाना उतने ही प्रश्न दिमागों में उठते गये। उन दोनो पोस्टों पर मुझे ब्लॉग पर और व्यक्तिगत रूप से कई अच्छे-बुरे मेल प्राप्त हुए, जिसका जिक्र मैंने तीसरी पोस्ट “सोनिया गाँधी की पोस्ट पर उठते सवाल-जवाब” में किया था। और जैसा कि मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ, कि मेरी सोनिया गाँधी से कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है और ना ही मुझे इस बात का कोई मुगालता है कि मैं कोई बहुत बड़ा “शोधक” हूँ, फ़िर भी सोनिया भक्तों (इसे कॉंग्रेस भक्तों भी पढ़ा जा सकता है) ने ईमेल-हमले लगातार जारी रखे। मैं उनसे सिर्फ़ एक-दो सवाल पूछना चाहता था (लेकिन Anonymous मेल होने के कारण पूछ ना सका), कि इतना हल्ला मचाने वाले ये लोग जानते हैं कि सोनिया गाँधी का जन्म कहाँ हुआ? उनकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ और कितनी हुई? उनकी पृष्ठभूमि क्या है? वे किस परिवार से हैं? इसलिये डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित इस लेख का अनुवाद “सोनिया गाँधी, भाग-३” के रूप में पेश करना मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ (क्योंकि कई लोगों ने मुझे ईमेल से जवाब देने का मौका नहीं दिया)। बहरहाल, पेश है डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित एक विस्तृत लेख का हिन्दी अनुवाद, जिसमें इनमें से कई प्रश्नों के जवाब मिलते हैं (और आज तक न तो सोनिया गाँधी द्वारा अथवा कॉंग्रेस भक्तों द्वारा डॉ. स्वामी पर कोई “मानहानि” (!) का मुकदमा दायर किया गया है)

“मेरा (मतलब डॉ.स्वामी का) सोनिया गाँधी का विरोध सिर्फ़ इसी बात को लेकर नहीं है कि उनका जन्म इटली में हुआ है, क्योंकि यह कोई मुद्दा नहीं है, बल्कि इटली सहित किसी और देश में विदेशी मूल की बात का फ़ैसला वहाँ के न्यायालयों ने किया हुआ है, कि सर्वोच्च और महत्वपूर्ण पदों पर विदेशी मूल का व्यक्ति नहीं पदासीन हो सकता, लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है। 17 मई 2004 को 12.45 पर राष्ट्रपति ने मुझे मिलने का समय दिया था, उसी समय मैंने उनसे कहा था कि यदि सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दूँगा, और “रजिस्ट्रेशन” द्वारा नागरिकता हासिल किये जाने के कारण उसे रद्द किया भी जा सकता है।

भारतीय नागरिकों को सोनिया की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी हासिल करना बेहद मुश्किल बात है, क्योंकि इटली के जन्म के कारण और वहाँ की भाषाई समस्याओं के कारण किसी पत्रकार के लिये भी यह मुश्किल ही है (भारत में पैदा हुए नेताओं की पृष्ठभूमि के बारे में हम कितना जानते हैं?) लेकिन नागरिकों को जानने का अधिकार तो है ही। सोनिया के बारे में तमाम जानकारी उन्हीं के द्वारा अथवा काँग्रेस के विभिन्न मुखपत्रों में जारी की हुई सामग्री पर आधारित है, जिसमें तीन झूठ साफ़ तौर पर पकड़ में आते हैं।

पहला झूठ – सोनिया गाँधी का असली नाम “सोनिया” नहीं बल्कि “ऎंटोनिया” है, यह बात इटली के राजदूत ने 27 अप्रैल 1983 को लिखे पत्र में स्वीकार की है, यह पत्र गृह मंत्रालय नें अपनी मर्जी से कभी सार्वजनिक नहीं किया। “एंटॊनिया” नाम सोनिया गाँधी के जन्म प्रमाणपत्र में अंकित है। सोनिया गाँधी को “सोनिया” नाम उनके पिता स्व.स्टेफ़ानो माईनो ने दिया था। स्टीफ़ानो माइनो द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त रूस में युद्ध बन्दी थे। स्टीफ़ानो ने एक कार्यकर्ता के तौर पर “नाजी” सेना में काम किया था, जैसा कि कई इटालियन फ़ासिस्टों ने किया था। “सोनिया” एक रूसी नाम है न कि इटालियन। रूस में बिताये जेल के लम्हों में सोनिया के पिता धीरे-धीरे रूस समर्थक बन गये थे, खासकर तब जबकि उन समेत इटली के सभी “फ़ासिस्टों” की सम्पत्ति अमेरिकी सेनाओं द्वारा नष्ट या जब्त कर ली गई थी।

दूसरा झूठ – उनका जन्म इटली के लूसियाना में हुआ, ना कि जैसा उन्होंने संसद में दिये अपने शपथ पत्र में उल्लेख किया है कि “उनका जन्म ओरबेस्सानो में हुआ”। शायद वे अपना जन्म स्थान “लूसियाना” छुपाना चाहती हैं, क्योंकि इससे उनके पिता के नाजियों और मुसोलिनी से सम्बन्ध उजागर होते हैं, जबकि उनका परिवार लगातार नाजियों और फ़ासिस्टों के सम्पर्क में रहा, युद्ध समाप्ति के पश्चात भी। लूसियाना नाजियों के नेटवर्क का मुख्य केन्द्र था और यह इटली-स्विस सीमा पर स्थित है। इस झूठ का कोई औचित्य नजर नहीं आता और ना ही आज तक उनकी तरफ़ से इसका कोई स्पष्टीकरण दिया गया है।

तीसरा झूठ – सोनिया गाँधी का आधिकारिक शिक्षण हाई स्कूल से अधिक नहीं हुआ है। लेकिन उन्होंने रायबरेली के 2004 लोकसभा चुनाव में एक शपथ पत्र में कहा है कि उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया हुआ है। यही झूठ बात उन्होंने सन 1999 में लोकसभा में अपने परिचय पत्र में कही थी, जो कि लोकसभा द्वारा “हू इज़ हू” के नाम से प्रकाशित की जाती है। बाद में जब मैंने लोकसभा के स्पीकर को लिखित शिकायत की, कि यह घोर अनैतिकता भरा कदम है, तब उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा “टाईपिंग” की गलती की वजह से हुआ (ऐसा “टायपिंग मिस्टेक” तो गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड़्स में शामिल होने लायक है)। सच्चाई तो यह है कि सोनिया ने कॉलेज का मुँह तक नहीं देखा है। वे जिआवेनो स्थित एक कैथोलिक स्कूल जिसका नाम “मारिया ऑसिलियाट्रिस” में पढने जाती थीं (यह स्कूल उनके तथाकथित जन्म स्थान ओरबेस्सानो से 15 किमी दूर स्थित है)। गरीबी के कारण बहुत सी इटालियन लड़कियाँ उन दिनों ऐसी मिशनरी में पढने जाया करती थीं, और उनमें से बहुतों को अमेरिका में सफ़ाई कर्मचारी, वेटर आदि के कामों की नौकरी मिल जाती थी। उन दिनों माइनो परिवार बहुत गरीब हो गया था। सोनिया के पिता एक मेसन और माँ एक खेतिहर मजदूर के रूप में काम करती थीं (अब इस परिवार की सम्पत्ति करोड़ों की हो गई है!)। फ़िर सोनिया इंग्लैंड स्थित केम्ब्रिज कस्बे के “लेन्नॉक्स स्कूल” में अंग्रेजी पढने गईं, ताकि उन्हें थोड़ा सम्मानजनक काम मिल जाये। यह है उनका कुल “शिक्षण”, लेकिन भारतीय समाज को बेवकूफ़ बनाने के लिये उन्होंने संसद में झूठा बयान दिया (जो कि नैतिकता का उल्लंघन भी है) और चुनाव में झूठा शपथ पत्र भी, जो कि भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराध भी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार प्रत्याशी को उसकी सम्पत्ति और शिक्षा के बारे में सही-सही जानकारी देना आवश्यक है। इन तीन झूठों से साबित होता है कि सोनिया गाँधी कुछ “छिपाना” चाहती हैं, या उनका कोई छुपा हुआ कार्यक्रम है जो किसी और मकसद से है, जाहिर है कि उनके बारे में और जानकारी जुटाना आवश्यक है।

कुमारी सोनिया गाँधी अच्छी अंग्रेजी से अवगत होने के लिये केम्ब्रिज कस्बे के वार्सिटी रेस्टोरेंट में काम करने लगीं, वहीं उनकी मुलाकात 1965 में राजीव गाँधी से पहली बार हुई। राजीव उस यूनिवर्सिटी में छात्र थे और पढ़ाई मे कुछ खास नहीं थे, इसलिये राजीव 1966 में लन्दन चले गये जहाँ उन्होंने इम्पीरियल इंजीनियरिंग कॉलेज में थोड़ी शिक्षा ग्रहण की। सोनिया भी लन्दन चली गईं जहाँ उन्हें एक पाकिस्तानी सलमान थसीर के यहाँ नौकरी मिल गई। सलमान थसीर साहब का अधिकतर बिजनेस दुबई से संचालित होता था, लेकिन वे अधिकतर समय लन्दन में ही डटे रहते थे। इस नौकरी में सोनिया गाँधी ने अच्छा पैसा कमाया, कम से कम इतना तो कमाया ही कि वे राजीव गाँधी की आर्थिक मदद कर सकें, जिनके “खर्चे” बढते ही जा रहे थे (इन्दिरा गाँधी भी उनके उन खर्चों से काफ़ी नाराज थीं और ऐसा उन्होंने खुद मुझे बताया था जब मेरी मुलाकात ब्रांडेस विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में उनसे हुई थी और उस वक्त मैं हार्वर्ड में वाणिज्य का प्रोफ़ेसर लगा ही था)। संजय गाँधी को लिखे राजीव गाँधी के पत्रों से यह स्पष्ट था कि राजीव, सोनिया के आर्थिक कर्जे में फ़ँसे हुए थे और राजीव ने संजय से मदद की गुहार की थी, क्योंकि संजय उनके कर्जों को निपटाने में सक्षम(?) थे। उस दौरान राजीव अकेले सोनिया गाँधी के मित्र नहीं थे, माधवराव सिंधिया और एक जर्मन स्टीगलर उनके अंतरंग मित्रों में से एक थे। माधवराव से उनकी दोस्ती राजीव से शादी के बाद भी जारी रही।

बहुत कम लोगों को यह पता है कि 1982 में एक रात को दो बजे माधवराव की कार का एक्सीडेंट आईआईटी दिल्ली के गेट के सामने हुआ था, और उस समय कार में दूसरी सवारी थीं सोनिया गाँधी। दोनों को बहुत चोटें आई थीं, आईआईटी के एक छात्र ने उनकी मदद की, कार से बाहर निकाला, एक ऑटो रिक्शा में सोनिया को इंदिरा गाँधी के यहाँ भेजा गया, क्योंकि अस्पताल ले जाने पर कई तरह से प्रश्न हो सकते थे, जबकि माधवराव सिन्धिया अपनी टूटी टाँग लिये बाद में अकेले अस्पताल गये। जब परिदृश्य से सोनिया पूरी तरह गायब हो गईं तब दिल्ली पुलिस ने अपनी भूमिका शुरु की। बाद के वर्षों में माधवराव सिंधिया सोनिया के आलोचक बन गये थे और मित्रों के बीच उनके बारे में “कई बातें” करने लगे थे। यह बड़े आश्चर्य और शर्म की बात है कि 2001 में माधवराव की मृत्यु और उनके विमान दुर्घटना की कोई गहन जाँच नहीं हुई, जबकि उसी विमान से मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी जाने वाले थे और उन्हें आखिरी समय पर सिंधिया के साथ न जाने की सलाह दी गई थी।

राजीव गाँधी और सोनिया का विवाह ओर्बेस्सानो में एक चर्च में हुआ था, हालांकि यह उनका व्यक्तिगत लेकिन विवादास्पद मामला है और जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन जनता का जिस बात से सरोकार है वह है इन्दिरा गाँधी द्वारा उनका वैदिक रीति से पुनः विवाह करवाना, ताकि भारत की भोली जनता को बहलाया जा सके, और यह सब हुआ था एक सोवियत प्रेमी अधिकारी टी.एन.कौल की सलाह पर, जिन्होंने यह कहकर इन्दिरा गाँधी को इस बात के लिये मनाया कि “सोवियत संघ के साथ रिश्तों को मजबूत करने के लिये यह जरूरी है”, अब प्रश्न उठता है कि कौल को ऐसा कहने के लिये किसने उकसाया?

जब भारतीय प्रधानमंत्री का बेटा लन्दन में एक लड़की से प्रेम करने में लगा हो, तो भला रूसी खुफ़िया एजेंसी “केजीबी” भला चुप कैसे रह सकती थी, जबकि भारत-सोवियत रिश्ते बहुत मधुर हों, और सोनिया उस स्टीफ़ानो की पुत्री हों जो कि सोवियत भक्त बन चुका हो। इसलिये सोनिया का राजीव से विवाह भारत-सोवियत सम्बन्धों और केजीबी के हित में ही था। राजीव से शादी के बाद माइनो परिवार के सोवियत संघ से सम्बन्ध और भी मजबूत हुए और कई सौदों में उन्हें दलाली की रकम अदा की गई । डॉ.येवेग्निया अल्बाट्स (पीएच.डी. हार्वर्ड) एक ख्यात रूसी लेखिका और पत्रकार हैं, वे बोरिस येल्तसिन द्वारा सन 1991 में गठित एक आयोग की सदस्या थीं, ने अपनी पुस्तक “द स्टेट विदिन अ स्टेट : द केजीबी इन सोवियत यूनियन” में कई दस्तावेजों का उल्लेख किया है, और इन दस्तावेजों को भारत सरकार जब चाहे एक आवेदन देकर देख सकती है। रूसी सरकार ने सन 1992 में डॉ. अल्बाट्स के इन रहस्योद्घाटनों को स्वीकार किया, जो कि “हिन्दू” में 1992 में प्रकाशित हो चुका है । उस प्रवक्ता ने यह भी कहा कि “सोवियत आदर्शों और सिद्धांतों को बढावा देने के लिये” इस प्रकार का पैसा माइनो और कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनावों के दौरान दिया जाता रहा है । 1991 में रूस के विघटन के पश्चात जब रूस आर्थिक भंवर में फ़ँस गया तब सोनिया गाँधी का पैसे का यह स्रोत सूख गया और सोनिया ने रूस से मुँह मोड़ना शुरु कर दिया। मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही रूस के वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन (जो कि घुटे हुए केजीबी जासूस रह चुके हैं) ने तत्काल दिल्ली में राजदूत के तौर पर अपना एक खास आदमी नियुक्त किया जो सोनिया के इतिहास और उनके परिवार के रूसी सम्बन्धों के बारे में सब कुछ जानता था। अब फ़िलहाल जो सरकार है वह सोनिया ही चला रही हैं यह बात जब भारत में ही सब जानते हैं तो विदेशी जासूस कोई मूर्ख तो नहीं हैं, इसलिये उस राजदूत के जरिये भारत-रूस सम्बन्ध अब एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। हम भारतवासी रूस से प्रगाढ़ मैत्री चाहते हैं, रूस ने जब-तब हमारी मदद भी की है, लेकिन क्या सिर्फ़ इसीलिये हमें उन लोगों को स्वीकार कर लेना चाहिये जो रूसी खुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे हों? अमेरिका में भी किसी अधिकारी को इसराइल के लिये जासूसी करते हुए बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भले ही अमेरिका के इसराइल से कितने ही मधुर सम्बन्ध हों। सम्बन्ध अपनी जगह हैं और राष्ट्रहित अलग बात है। दिसम्बर 2001 में मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करके सभी दस्तावेज प्रस्तुत कर, केजीबी और सोनिया के सम्बन्धों की सीबीआई द्वारा जाँच की माँग की थी, जिसे वाजपेयी सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया। इससे पहले तत्कालीन राज्य मंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया ने 3 मार्च 2001 को इस केस की सीबीआई जाँच के आदेश दे दिये थे, लेकिन कांग्रेसियों द्वारा इस मुद्दे पर संसद में हल्ला-गुल्ला करने और कार्रवाई ठप करने के कारण वाजपेयी ने वसुन्धरा का वह आदेश खारिज कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2002 में सीबीआई को रूसी सम्बन्धों के बारे में जाँच करने के आदेश दिये। सीबीआई ने दो वर्ष तक “जाँच” (?) करने के बाद “बिना एफ़आईआर दर्ज किये” कोर्ट को यह बताया कि सोनिया और रूसियों में कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन सीबीआई को FIR दर्ज करने से किसने रोका, वाजपेयी सरकार ने, क्यों? यह आज तक रहस्य ही है। इस केस की अगली सुनवाई होने वाली है, लेकिन अब सोनिया “निर्देशक” की भूमिका में आ चुकी हैं और सीबीआई से किसी स्वतन्त्र कार्य की उम्मीद करना बेकार है।
............ जारी ..... है (भाग-४ शीघ्र ही), जिसमें हम पायेंगे कई अनसुलझे और बेचैन करने वाले प्रश्न.... तब तक प्रिय आलोचकों, "मेरा मेल बॉक्स खुला है खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिये..."



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Tuesday, August 21, 2007

नोकिया वालों लगे रहो....

जब से नोकिया वालों ने “ईमानदारी” दिखाई है और फ़ोकट में बैटरी बदलने की बात कर दी है, मेरे कस्बे में मानो उफ़ान ही आ गया है। जमाने के साथ चलते हुए हमारे कस्बे में भी अब हजारों-हजार मोबाइल और मोबाइलधारी पैदा हो गये हैं, जाहिर है कि उसमें “नोकिया” वालों की संख्या ही सबसे ज्यादा है। अब भले ही नोकिया वाले गला फ़ाड़-फ़ाड़कर चिल्लाते रहे हों कि “सिर्फ़ नवम्बर 2005 से दिसम्बर 2006 के बीच बनी कुछ बैटरियाँ, और वो भी मात्सुशिता कम्पनी की, ही खराब हैं, लेकिन यहाँ पर भाई लोगों को हरेक फ़ोन में खराबी दिखाई देने लगी है, लेकिन अपने तो मजे ही मजे हैं, आप सोचेंगे कि क्या बात कर रहा है यार, यहाँ जान पर आ बनी है, पता नहीं कब मोबाइल कान के पास ही फ़ट जाये और दिमाग की पाव-भाजी बन जाये या पैंट की जेब में रखे-रखे फ़ूट जाये और जनसंख्या बढाने का साधन ही समाप्त हो जाये और ये साला मजे की बात कर रहा है, तो भाईयों मैं समझाता हूँ कि बात क्या है, दरअसल अपन भी एक छोटा सा इंटरनेट पार्लर चलाते हैं, तो पिछले दस दिनों में ही बैटरी का नम्बर चेक करने के बहाने अपन ने पाँच-सात सौ रुपये कूट लिये। हर ऐरा-गैरा चला आ रहा है, भाई साहब जरा चेक तो करना कहीं मेरा मोबाइल फ़टने वाला तो नहीं है....लाओ पाँच रुपये अभी चेक कर देता हूँ (अभी तक मैंने चेक की हुई डेढ सौ बैटरियों में से सिर्फ़ एक ने ही खराब वाला “स्टेटस” दिखाया है नेट पर)। सबसे ज्यादा मजे तो आ रहे हैं देसी लोगों के “कमेंट्स” सुनने में, जरा मुलाहिजा फ़रमाईये – “ये सब नोकिया वालों की चाल है, अपनी मार्केटिंग करने की” (मुझे पता ही नहीं था कि नोकिया की भारत में बिक्री कम हो गई), “जापान की बैटरियाँ खराब बता रहे हैं ये लोग चाइना की घटिया बैटरियाँ लगवाना चाहते होंगे” (जॉर्ज फ़र्नांडीस के मुरीद होंगे), एक पहलवान तो दो महीने पहले खरीदे हुए मोबाईल की बैटरी भी बदलवा लाये। तो नोकिया के ऑफ़िस में माराकूटी हो ही रही है, बहती गंगा में हमने भी हाथ धो लिये, ठीक वैसे ही जैसे “ताज” के समय धोये थे, हमारे पार्लर से ठेले वाले, पान वाले, पंचर वाले, चाय पहुँचाने वाले, सभी ने “ताज” को वोट किया था (मतलब हमारे द्वारा करवाया था), तो भैया नोकिया हो या ताज वाले हों, ऐसे ही लगे रहो, हर दो महीने में कुछ नया लेकर आओ, ताकि हम गरीबों की दाल-रोटी भी चलती रहे। जय नोकिया...
विशेष नोट : तमाम मित्रों की पहले “हिकारत” भरी और अब “रश्क और तारीफ़” भरी निगाहों के बावजूद मैंने अभी तक मोबाइल नाम की बीमारी को बुलावा नहीं दिया है


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Thursday, August 16, 2007

गर्भावस्था के दो सुन्दर, सपनीले, मधुर गीत....

हिन्दी फ़िल्मों ने हमें कई-कई अविस्मरणीय गीत दिये हैं। फ़िल्म संगीतप्रेमी सोते-जागते, उठते-बैठते इन गीतों को गुनगुनाते रहते हैं। हमारे महान गीतकारों और फ़िल्मकारों ने जीवन के हरेक मौके, अवसर और उत्सव के लिये गीत लिखे हैं और खूब लिखे हैं। जन्म, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रेम, विवाह, बिदाई, बच्चे, बुढापा, मौत... सभी-सभी के लिये गीत हमें मिल जायेंगे। जो दो गीत मैंने आज चुने हैं, वे जीवन के एक विशेष कालखंड अर्थात गर्भावस्था और मातृत्व प्राप्त करने के बीच का स्वप्निल समय। जैसे मातृत्व स्त्रियों के लिये जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है, ठीक वैसे ही पुरुषों के लिये पितृत्व भी एक गौरवशाली क्षण होता है। हालांकि माँ बनने के दौरान और प्रसूति के बाद स्त्री का योगदान तो अतुलनीय होता ही है, लेकिन इस भागमभाग में लोग “बाप” को भूल जाते हैं, दवाईयों के लिये भागदौड़ करता, रक्त की बोतलों की जुगाड़ में लगा बदहवास सा, बेचैनी से अस्पताल के बरामदे में टहलता बाप लोग अक्सर नजर-अंदाज कर जाते हैं, और वह भी “मर्द” होने के नाते अपनी व्यथा किसी से कहता नहीं। बहरहाल... प्रस्तुत दोनों गीत गर्भावस्था के उस सपनीले दौर के हैं, जब पति-पत्नी सपने देखने में मगन होते हैं, और यह दौर लगभग हरेक के जीवन में आता है, जब वह अपने होने वाले बच्चे के लिये न जाने क्या-क्या सोचा करता है। यह गीत खास इसीलिये हैं कि इनमें माता-पिता दोनों की भावनाओं को बराबरी से व्यक्त किया गया है। पहला गीत है फ़िल्म “मन-मन्दिर” का, जो सन १९७१ में आई थी, लिखा है राजेन्द्र कृष्ण ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने, गीत गाया है मुकेश और लता मंगेशकर ने.... गीत के बोल हैं “ऐ मेरी आँखों के पहले सपने...”, गीत क्या है, चार पंक्तियों की मधुर कविता है, ध्यान से सुनें तो दो लाईन लता के लिये और दो लाईन मुकेश के लिये, बस... इतने में ही लक्ष्मी-प्यारे ने पूरा गीत बाँध दिया है-

लता - ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे...
(१) एक-एक पल गिनूँ, उस घड़ी के लिये
जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये (२)
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने....

इस अंतरे के बाद मुकेश कमान संभाल लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई दौड़ के दौरान अपने 'पार्टनर' को हौले से “बेटन” थमाता है...

ऐ मेरी आँखों के पहले सपने...
(२) मैं अभी से तेरी सुन रहा हूँ सदा,
दूर जैसे कहीं साज हो बज रहा (२)
फ़िर दोनों गाते हैं
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे...

एक विशिष्ट भावना में छोड़ जाता है यह मधुर गीत आपको..... इसे सुनने के लिये आप नीचे दिये विजेट में “प्ले” पर चटकायें...


AYE MERI AANKHON K...



दूसरा गीत भी कालजयी है, लिखा है कवि नीरज ने, धुन बनाई है सचिन देव बर्मन ने, गाया है किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने, फ़िल्म है तेरे-मेरे सपने और बोल हैं, “जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी...”। पूरा गीत पति-पत्नी के आपसी सामंजस्य, उनके सपनों, आने वाले बच्चे के बारे में उनकी कल्पनाओं में डूबा हुआ है। इस गीत में सचिन दा और नीरज ने मिलकर अनोखा संसार रचा है। इस गीत के बोल इस प्रकार हैं -

जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी
खुशियों की कलियाँ, झूमेंगी, झूलेंगी, फ़ूलेंगी
जीवन की बगिया....
वो मेरा होगा, वो सपना तेरा होगा
मिलजुल के माँगा, वो तेरा-मेरा होगा
जब-जब वो मुस्कुरायेगा, अपना सवेरा होगा
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा....
जीवन की बगिया...
हम और बँधेंगे, हम तुम कुछ और बँधेंगे
होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे
बाँधेगा धागा कच्चा, हम तुम तब और बँधेंगे
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा....
जीवन की बगिया...
मेरा राजदुलारा, वो जीवन प्राण हमारा
फ़ूलेगा एक फ़ूल, खिलेगा प्यार हमारा
दिन का वो सूरज होगा, रातों का चाँद सितारा...
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा....
जीवन की बगिया...

जैसे पहले गीत में एक पंक्ति “एक-एक पल गिनूँ उस घड़ी के लिये, जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये” है वैसे ही इस गीत में “हम और बँधेंगे, हम-तुम कुछ और बँधेंगे, बाँधेगा धागा कच्चा... होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे..” ये पंक्तियाँ कितने गूढ़ार्थ लिये हुए है, क्या खूब शब्द हैं। यही है हमारे पुराने फ़िल्मी गीतों का जादू... एक बार दिल लगाकर ध्यान से सुन लिया तो फ़िर व्यक्ति दूसरी दुनिया में खो जाता है। इस गीत को नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी सुन सकते हैं, और यदि तेजगति इंटरनेट के मालिक हैं तो “यू-ट्यूब” पर इसका बेहतरीन वीडियो भी देख सकते हैं, जिसमें देव आनन्द और मुमताज एक शोख लेकिन परिपक्व अन्दाज में दिखाई देंगे। आनन्द लीजिये, मुझे उम्मीद है कि हमारे कुँवारे पाठक भी इसका भरपूर रसास्वादन करेंगे, क्योंकि कल नहीं तो परसों उन्हें भी इस क्षण से गुज़रना ही होगा। यही तो जीवन है....


Jeevan Ki Bagia Ma...




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Communists and Iodine Salt in India वामपंथियों ने "आयोडीनयुक्त नमक" नहीं खाया है...

हमारे "मर्द" प्रधानमन्त्री ने एक बार फ़िर वामपंथियों को जोर का "चमाट" लगाया है। परमाणु मुद्दे पर जिस तरह इस्तीफ़े की धमकी देकर वामों को पटखनी दी है, वह लाजवाब है। ऐसा लगता है कि वामपंथियों ने "आयोडीन युक्त नमक" (Iodine Salt) का सेवन ठीक से नहीं किया है। क्योंकि जब-तब उन्हें जोर से बोलते वक्त "गले का घेंघा" हो जाता है, उनसे कोई कदम भी उठाते नहीं बनता क्योंकि आयोडीन की कमी से "हाथीपाँव" की शिकायत भी है। इधर हाल ये है कि वामपंथी हैं सत्ता में (केरल और बंगाल के लिये माल बटोरने में लगे हैं), लेकिन विपक्षी भी दिखना चाहते हैं, सरकार का विरोध भी करना चाहते हैं, समर्थन भी जारी रखना चाहते हैं, गेहूँ और दाल के भाव बढते रहें कोई बात नहीं, लेकिन अमेरिका के नाम पर नौटंकी जरूर करेंगे, साधारण नमक डेढ रुपये किलो था लेकिन अब आयोडीन युक्त नमक आठ रुपये किलो, बेचारा गरीब खा रहा है, लेकिन ये ढोंगी परमाणु, ईराक और गुजरात पर हल्ला जरूर मचायेंगे। तीसरे मोर्चे की तरफ़ हाथ बढाते भी डर लगता है, कहीं "एड्स" ना हो जाये, जबकि ऐसा कुछ है नहीं, क्योंकि तीसरा मोर्चा एड्स से नहीं बल्कि "कुपोषण" से ग्रस्त है, क्योंकि जब-जब तीसरे मोर्चे (Third Front Government) की सरकार बनी, ठीक से कुछ "खाने" से पहले ही सरकार गिर गई, तो भला कुपोषण नहीं होगा क्या? भाजपा का हाल उलटा हुआ था, वे सत्ता में मुख्य पार्टी थे तब चन्द्रबाबू और ममता आँखे दिखाते रहते थे, भाजपा वालों ने भी "पोलियो" (Polio Drops in India) का टीका नहीं लगवाया था, इसीलिये उन्हें ठीक से तनकर खडे़ होने में समस्या होती थी। यदि वक्त रहते आरएसएस का दिया हुआ ORS का घोल भी पी लिया होता तो कम से कम बंगारू और जूदेव टाईप के "दस्त" तो नहीं लगते और हाजमा ठीक रहता। ऐसी कोई पार्टी इस देश में नहीं बची जो बीमारी से ग्रस्त ना हो। अब मुझसे कॉंग्रेस के बारे में न पूछियेगा, वरना मुझे "गुप्त रोग" के बारे में विस्तार से बताना पडे़गा।

Wednesday, August 15, 2007

"सठियाई" हुई स्वतन्त्रता पर एक शोकांतिका

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स्वतंत्रता की साठवीं वर्षगाँठ के पवित्र अवसर पर देश के अन्दरूनी हालातों के बारे में बेहद चिन्ता होना स्वाभाविक है। भले ही हम भारतवर्ष के भविष्य की कितनी भी रोमांटिक कल्पना करें, हकीकत यही है कि देश इस समय एक दिशाहीन स्थिति से गुज़र रहा है। सेंसेक्स का पन्द्रह हजारी होना, या विकास दर ६-८ प्रतिशत होना, या आईटी क्षेत्र में भारत का परचम विश्व में लहराना भले ही कुछ खास रहा हो, आम आदमी को इससे कोई लेना-देना नहीं है और इनसे देश के अस्सी प्रतिशत लोगों का भला होने वाला भी नहीं है। दो जून की रोटी की जुगाड़ करने में गरीब, निम्न-मध्यम वर्ग इतना पिसा जा रहा है कि उसे "शाइनिंग इंडिया" कभी दिखाई नहीं देगा, क्योंकि वह "शाइन" कर रहा है सिर्फ़ पाँच-आठ प्रतिशत लोगों के लिये। लेकिन सबसे बड़ी, और रोजमर्रा के जीवन में हमारा सामना जिस समस्या से हो रहा है वह है भ्रष्टाचार, और आश्चर्य इस बात का है कि भ्रष्टाचार को हमने जीवन शैली मान लिया है, और यही बहुत खतरनाक बात है। धीरे-धीरे इस बात पर आम सहमति बनती जा रही है कि भ्रष्टाचार तो होगा ही, कोई इस बात पर विचार करने को तैयार ही नहीं है कि कम से कम वह स्वयं तो रिश्वत ना ले... लेकिन प्रायवेट क्षेत्र में अनाप-शनाप बढती तनख्वाहें और सरकारी क्षेत्र में पैसे और रुतबे की भूख और लालच ने इस समस्या को सर्वव्यापी कर दिया है। हमारा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग इस मुगालते में है कि देश मे साक्षरता बढने पर भ्रष्टाचार में कमी आयेगी, और एक है हमारा "तटस्थ" वर्ग (जो सबसे बड़ा है) वह तो... क्या होगा इस बारे में बोलकर? हमें क्या करना है? कुछ नहीं होना-जाना है? जैसे नकारात्मक विचारों वाले सवालों में मगन है। गरीबों को मारने वाली महंगाई बढने की एक वजह भ्रष्टाचार भी है। इस देश में कितने प्रतिशत लोग इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेजों की केपिटेशन फ़ीस भरने के काबिल हैं? कितने प्रतिशत लोग अपोलो या किसी अन्य संगठित "कम्पनीनुमा" अस्पताल में इलाज करवाने की हैसियत रखते हैं? जब भी कोई ईमानदार अधिकारी इस नेता-उद्योगपति-अपराधी के चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश करता है, उसका हश्र मंजूनाथ की तरह होता है। भ्रष्टाचार पर एक विशेष प्रकार की उदासीनता और नकारात्मकता बनी हुई है, जबकि ये सभी के जीवन को प्रभावित कर रहा है। "किरण बेदी पर लिखी हुई मेरी पोस्ट" के जवाब में कई मेल प्राप्त हुए थे, उसमें से एक मित्र ने महाराष्ट्र कैडर के एक बेहद ईमानदार आईपीएस अधिकारी वाय.पी.सिंह की पुस्तक "कार्नेज बाय एन्जेल्स" के बारे में बताया। वाय.पी.सिंह एक ईमानदार आईपीएस अधिकारी हैं ('थे' लिखना उचित नहीं है) उन्होंने सन १९८५ में पुलिस सेवा आरम्भ की और लगभग बीस वर्ष की सेवा के बाद २००५ में त्यागपत्र दे दिया। रिटायर्ड डीजीपी श्री एस.एस.पुरी ने वायपी सिंह के त्यागपत्र को देश और महाराष्ट्र की पुलिस के लिये बेहद दुःखद दिन बताया। पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने जो अपमान, तनाव और दबाव भुगता वह उन्होंने अपनी पहली पुस्तक "कार्नेज बाय एंजेल्स" में व्यक्त किया। ईमानदार होने के कारण लगातार उन पर मानसिक हमले होते रहे। सेवानिवृत्ति के पश्चात वे पुरी साहब के साथ मिलकर गरीबों को कानूनी सहायता प्रदान करते हैं। अपने इस्तीफ़े में उन्होंने लिखा है, उन्हीं के शब्दों में - "देश के सबसे उम्दा पुलिस अफ़सरों में से एक होने के बावजूद लगातार मेरा अनादर किया जा रहा है, मुझे नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है, मैं नौकरी तो कर रहा हूँ, लेकिन एक जिंदा लाश की तरह"। अपने उजले कार्यकाल में वे "यूटीआई यूएस-६४ घोटाले" और "पन्ना-मुक्ता तेल क्षेत्र घोटाले" आदि की जाँच में शामिल रहे, दिनांक १३-१४ दिसम्बर २००४ को रेडिफ़.कॉम के पत्रकार सलिल कुमार और विजय सिंह ने उनसे एक इंटरव्यू लिया, जिसमें उन्होंने पुलिस में फ़ैले भ्रष्टाचार, अनैतिकता और नेताओं की सांठगांठ के बारे में बताया। हिन्दी के पाठकों के लिये पेश है उसी इंटरव्यू का हिन्दी अनुवाद, क्योंकि अंग्रेजी में ऐसी पुस्तकें छपती तो हैं, लेकिन एक विशिष्ट वर्ग उन्हें पढता है और फ़िर वे लायब्रेरियों की शोभा बन कर रह जाती हैं, उन पुस्तकों के बारे में व्यापक प्रचार नहीं हो पाता और वे आम हिन्दी पाठक से दूर ही रह जाती हैं। इस पुस्तक के कुछ अध्याय अथवा अंश उपलब्ध होने पर उसका अनुवाद भी पेश करने की कोशिश करूँगा -

प्रश्न : आप अपने काम के दौरान लम्बे समय तक विभागीय समस्याओं से घिरे रहे, आपके इस्तीफ़े की मुख्य वजह क्या है?
उत्तर : यह निर्णय अचानक नहीं, बल्कि कई वर्षों के सोच-विचार के पश्चात लिया गया है।
प्रश्न : लेकिन मुख्यतः आपको किस बात ने उकसाया?
उत्तर : यह एक संयुक्त प्रभाव रहा, सन १९९६ में जब मैं सीबीआई में था तो मुझे अपने मूल कैडर अर्थात महाराष्ट्र लौटने के आदेश हुए। उस समय मैं कुछ बड़े घोटालों को लगभग उजागर करने की स्थिति में आ गया था, जिसमें यूटीआई का घोटाला प्रमुख था। अन्ततः जब सन २००१ में यूएस-६४ घोटाला जनता के सामने आया तब उससे दो करोड़ लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए, जिसमें कि अधिकतर निम्न-मध्यम वर्ग के लोग थे, जिन्होंने अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई इसमें खो दी। सीबीआई में जब कोई अधिकारी उत्तम और असाधारण काम करता है तो उसे प्रताड़ित किया जाता है, और भ्रष्ट अधिकारी मेडल और प्रमोशन पाते हैं। मैं जानता था कि मैं पुलिस में ज्यादा दिन तक नहीं रह पाऊँगा, और वही हुआ। सबसे आसान रास्ता था कि मैं भ्रष्टों के साथ हाथ मिला लूँ और जिन्दगी के मजे लूँ, लेकिन मैंने वह रास्ता नहीं अपनाया, उसके बजाय मैंने कानून की पढाई की और डिग्री हासिल की।
प्रश्न : यूटीआई घोटाले के लिये आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
उत्तर : इस घोटाले के लिये पूरा संगठन ही जिम्मेदार है, ये कोई एक दिन में होने वाला नहीं था, यह लगभग दस वर्षों के कुप्रबन्धन का नतीजा था, सन १९९५ में कुप्रबन्धन अपने सर्वोच्च स्तर पर था।
प्रश्न : अर्थात एस.ए.दवे जब इसके अध्यक्ष थे, तब?
उत्तर: हाँ, उन्हीं के कार्यकाल में, यूटीआई ने कई फ़र्जी निवेश किये, नियमों और कानून को ताक पर रख कर कई मनमाने निर्णय लिये।
प्रश्न : क्या आप थोड़ा स्पष्ट बतायेंगे?
उत्तर : यूटीआई खुले तौर पर उन शेयरों में निवेश कर रही थी जिन्हें "सेबी" ने प्रतिबन्धित कर दिया था, यह कहकर कि यूटीआई सेबी के नियमों से बँधी हुई नहीं है। यूटीआई ने "लॉक-इन शेयरों" और ऐसे ही डिबेन्चरों में भी निवेश किया। यदि सन १९९१ में ही इस बारे में सवाल उठाये जाते और सही काम किया गया होता तो यूएस-६४ घोटाला होता ही नहीं।
प्रश्न : क्या राजनेताओं ने इस देश को नीचा दिखाया है ? क्या नेता इस घोटाले में शामिल हैं?
उत्तर : बिना किसी राजनैतिक समर्थन के इतना बड़ा घोटाला होना सम्भव ही नहीं है। जब आप इसमें जाँच-दर-जाँच आगे बढते जाते हैं, तभी आपको नेताओं के किसी घोटाले में शामिल होने के बारे में पता चलता जाता है, लेकिन जनता के सामने सच्चाई कभी नहीं आने दी जाती।
प्रश्न : "पन्ना-मुक्ता तेलक्षेत्र" केस आपके सबसे विवादास्पद केसेस में रहा है। क्या आप इसके बारे में हमें कुछ बता सकते हैं?
उत्तर : ओएनजीसी ने इस बड़े तेलक्षेत्र की खोज की थी। जब सरकार द्वारा उसे प्रायवेट कम्पनियों के साथ साझा करने को कहा गया था, तब ओएनजीसी में काफ़ी चीखपुकार मची थी। ओएनजीसी के बडे़ अधिकारी इससे बहुत नाखुश थे, क्योंकि इस क्षेत्र में विपुल सम्भावनायें थीं। उनका तर्क था कि यदि सरकार को निजी कम्पनियों को देना ही है तो बिना खोजा हुआ या नई खोज के लिये तेलक्षेत्र देना चाहिये।
प्रश्न : सरकार को इसमें कितना नुकसान हुआ?
उत्तर : अभी तक इसका सही-सही आकलन नहीं हो पाया है, लेकिन लगभग पूरा का पूरा तेलक्षेत्र मुफ़्त में ही दे दिया गया। क्योंकि ओएनजीसी कि इसमें सिर्फ़ चालीस प्रतिशत हिस्सेदारी रखी गई जबकि रिलायंस और एनरॉन को बाकी का हिस्सा दे दिया गया।
(अब समझ में आया कि मैनेजमेंट गुरु जो "धीरुभाईज्म" सिखा रहे हैं, वह क्या है?)
प्रश्न : इस तेलक्षेत्र से कितना तेल उत्पादन होता है?
उत्तर : लगभग चालीस से पचास लाख टन सालाना। यह बहुमूल्य तेलक्षेत्र सरकार ने लगभग मुफ़्त में निजी कम्पनियों को दे दिया, जबकि ओएनजीसी ने सारी मेहनत की थी। इस "डीलिंग" की जाँच और पूछताछ के समय सीबीआई मुझसे बहुत नाराज थी। उन्होंने केस को उलझाने की कोशिश की, सीबीआई अधिकारियों ने मेरे फ़ोन काट दिये, मेरी कार और सहायक छीन ली गई, मेरा मकान खाली करवा लिया गया। जब उच्चतम न्यायालय ने इस पर नाराजगी जताई तब यह सिलसिला थमा। जब मुझे सीबीआई से निकाल दिया गया उस वक्त मैंने केन्द्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में शिकायत की थी, लेकिन उन अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
प्रश्न : आपको कभी भी कोई जाँच पूरी नहीं करने दी गई।?
उत्तर : किसी भी मामले की सही जाँच तभी हो सकती है, जब शुरु से अन्त तक एक ही अधिकारी उस पर काम करे। अचानक, बीच में से ही आप को ट्रांसफ़र कर दिया जाता है, फ़िर एक भ्रष्ट अधिकारी आकर सारे मामले को रफ़ा-दफ़ा कर देता है या उसे और उलझा देता है। यह बहुत आम हो गया सा खेल है।
प्रश्न : आपने ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और ओरियन्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स के विलय का भी विरोध किया था? क्यों?
उत्तर : उस विलय ने जमकर्ताओं का संरक्षण तो किया था, लेकिन शेयरधारकों को बहुत चोट पहुँचाई थी, और इस मामले में कुछ नियमों का उल्लंघन भी किया गया था, जिसके लिय आज तक किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया।
प्रश्न : कौन था जिम्मेदार?
उत्तर : निश्चित रूप से रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया। जबकि रिजर्व बैंक को यह मालूम था कि जीटीबी की अन्दरूनी हालत बहुत खराब है, फ़िर भी उसने एक प्रेस वार्ता में कहा कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है, बैंक की स्थिति सही है, क्या यह आम जनता के साथ धोखाधड़ी नहीं है?
प्रश्न : चलिये वापस पुलिस में फ़ैले भ्रष्टाचार की तरफ़ आते हैं, क्या वाकई में आईपीएस अधिकारी एक हवलदार से भी अधिक भ्रष्ट हैं?
उत्तर : सामान्य मान्यता है कि भ्रष्टाचार का सम्बन्ध तनख्वाह से है, लेकिन ऐसा नहीं है। पुलिस के उच्चाधिकारी एक हवलदार से छः गुना अधिक वेतन पाते हैं (हवलदार का वेतन है ५०००/- और अधिकारी का ३०,०००/-), इसके अतिरिक्त अधिकारी को मकान, ड्रायवर सहित कार, फ़ोन, नौकर मिलता है, फ़िर भी वे भ्रष्ट हैं, वे जितना अधिक पैसा कमाते जाते हैं, उतने ही अधिक लालची होते जाते हैं। प्रतिमाह तीस हजार वेतन पाने वाला अधिकारी करोड़पति बनना चाहता है, इसलिये वह रिश्वत लेता है। फ़िर वह तीन करोड़ बनाने की सोचने लगता है, फ़िर पाँच करोड़, यह कभी खत्म नहीं होता। इसलिये वेतन और भ्रष्टाचार का कोई सम्बन्ध नहीं है। भ्रष्टाचार दरअसल एक मानसिक स्थिति है, इसे आप लालच से जोड़कर देख सकते हैं। मैंने कई हवलदार ऐसे भी देखे हैं, जो उनके वरिष्ठ अधिकारियों से कहीं अधिक ईमानदार हैं (हाल ही में एक रिक्शाचालक नें सवारी के छूटे हुए दस लाख रुपये खुद होकर थाने में जमा कराये) । इसी के साथ भ्रष्टाचार को भी आप कई श्रेणियों में बाँट सकते हैं, कुछ अधिकारी कट्टर तौर पर ईमानदार होते हैं, वे दूसरों को भी रिश्वत नहीं लेने देते, ऐसे लोग कम ही हैं। कुछ ऐसे हैं जो खुद पैसा नहीं लेते, लेकिन दूसरे लेने वाले को रोकते नहीं है, हालांकि वे ईमानदार हैं, लेकिन मैं उन्हें "रीढविहीन"मानता हूँ। ऐसे लोग लगभग मृतप्राय होते हैं। पुलिस फ़ोर्स में भ्रष्टाचार संस्थागत बीमारी बन गया है। उन्हीं अफ़सरों को मुख्य पोस्टिंग दी जाती है जो भ्रष्ट हैं, फ़िर यह उनकी आदत बन जाती है, आसानी से मिलने वाली रिश्वत के अलावा भी वे और दाँव लगाने और पैसा कमाने की जुगत में लगे रहते हैं।
प्रश्न : एक आईपीएस के लिये कमाई की कितनी सम्भावना होती है?
उत्तर : यदि कोई अफ़सर मुम्बई में पदस्थ है तो वह आसानी से पच्चीस से तीस लाख रुपये प्रतिमाह तो सिर्फ़ लेडीज बार से ही कमा लेता है।
प्रश्न : एक महीने में?
उत्तर : जी हाँ, कुछ लेडीज बार पाँच लाख रुपये महीना देते हैं और कुछ छोटे बार एक लाख रुपये प्रतिमाह।
प्रश्न : क्या सभी लेडीज बार रिश्वत देते हैं?
उत्तर : उसके बिना वे धंधा कर ही नहीं सकते।
प्रश्न : क्या सभी उच्चाधिकारी भ्रष्ट हैं?
उत्तर : नहीं, सभी नहीं, लेकिन जो रिश्वत नहीं मांगते वे इस बुराई को दूर करने के लिये कुछ करते भी नहीं, इसलिये एक तरह से वे बेकार हैं। भ्रष्टाचार का दूसरा मुख्य कारण है पैसा देकर पोस्टिंग खरीदना, फ़िर आप निर्भय हो जाते हैं, क्योंकि आप के सिर पर उस नेता का हाथ होता है, जिसने आपसे पैसा लिया है। उस पैसे को वसूल करने के लिये व्यक्ति और जमकर भ्रष्टाचार करता है, क्योंकि उसे रोकने वाला कोई होता ही नहीं।
प्रश्न : आपने अपनी पुस्तक में आईपीएस पोस्टिंग के लिये लॉबिंग के बारे में बताया है, क्या आप इसे विस्तार से बता सकते हैं?
उत्तर : आईपीएस की पोस्टिंग बिकती हैं, उसके लिये आपको किसी दलाल या नेता का करीबी होना होता है।
प्रश्न : ये दलाल कौन लोग होते हैं?
उत्तर : कोई भी हो सकता है, साधारणतः ये वे लोग होते हैं जिनके नेताओं से सम्पर्क होते हैं, बडे़ व्यापारी, कुछ वरिष्ठ नौकरशाह आदि। यदि किसी को कोई खास जगह की पोस्टिंग चाहिये होती है तो वह इनसे सम्पर्क करता है, ये लोग नेताओं के द्वारा उसका काम करवा देते हैं।
प्रश्न : क्या तेलगी घोटाले के बाद इसमें कोई कमी आई है?
उत्तर : कुछ खास नहीं, सौ भ्रष्ट अधिकारियों में से एक-दो को पकड़ा भी जायें तो कोई अन्तर नहीं आता। बल्कि दूसरे अधिक सतर्क हो जाते हैं, और सब कुछ पहले की तरह ही चलता रहता है।
प्रश्न : क्या आप कहना चाहते हैं कि पूरी मुम्बई में एक भी अधिकारी ईमानदार नहीं है?
उत्तर : यदि होगा तो वह भी मेरे जैसी स्थिति में ही होगा।
प्रश्न : आपने पुस्तक में लिखा है कि एक नया अफ़सर अपने कांस्टेबल से ही भ्रष्टाचार सीखता है, क्या यह सच है?
उत्तर : ये बातें सिखाई नहीं जातीं, सिस्टम में से अपने-आप आ जाती हैं। कई नागरिक आपसे मिलेंगे और कहेंगे, "अरे साहब हम तो पुलिस वालों के मित्र हैं", फ़िर धीरे-धीरे वे ही आपको विभिन्न "आईडिया" देने लग जाते हैं। भ्रष्ट अफ़सर अपना एक दलाल तैयार कर लेते हैं, जो कि अमूमन सब-इंस्पेक्टर स्तर का होता है, फ़िर एक-दो महीने में नया अफ़सर सब कुछ सीख जाता है। यह सीखने के लिये किसी विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं होती। प्रत्येक राज्य में उच्च स्तर के गिने-चुने अधिकारी ही होते हैं, एक अधिकारी एक जिले में जब "गुल" खिला चुका होता है और उसका तबादला दूसरे जिले में होता है तो तब तक दलालों और उच्चाधिकारियों के पास उसका पूरा चिठ्ठा मौजूद होता है, और वह खुद भी यही चाहता है।
प्रश्न : भ्रष्टाचार का संस्थानीकरण कैसे होता है, और रिश्वत की रकम कैसे तय की जाती है?
उत्तर : यह कमाई की सम्भावना पर निर्भर होता है। कस्टम विभाग का एक उदाहरण लें, मान लीजिये कि कोई फ़ोन सौ रुपये का है, उस पर कस्टम ड्यूटी साठ प्रतिशत के हिसाब से साठ रुपये होती है। एक भ्रष्ट कस्टम अफ़सर उस फ़ोन की कीमत दस रुपये बताता है, तो कस्टम ड्यूटी मात्र छः रुपये रह जाती है और सरकार को छप्पन रुपये का नुकसान होता है। इसमें से बीस प्रतिशत, मतलब ग्यारह रुपये उस कस्टम अफ़सर की रिशवत होती है। इस प्रकार रिश्वत का आकलन होता है।
प्रश्न : किन पोस्टिंग को वरीयता दी जाती है?
उत्तर : सबसे अधिक कस्टम्स विभाग में, हालांकि उदारीकरण के बाद इसमें थोडी़ कमी आई है, और दूसरे नम्बर पर है आयकर विभाग। एक बेईमान आयकर अधिकारी अपनी पैंतीस वर्ष की सेवा में सरकार का लगभग एक हजार करोड़ का नुकसान करता है। यह पैसा सरकार आधारभूत ढाँचे, अस्पताल, स्कूल, पेंशन आदि में खर्च करती।
प्रश्न : फ़िर सीबीआई और एंटी-करप्शन ब्यूरो आदि इसे क्यों रोक नहीं पाते?
उत्तर : सारा पैसा भ्रष्ट अधिकारी अकेले नहीं रखता, वह पूरा ऊपर तक बँटता हुआ जाता है। यदि कोई बीच में इसे रोकने की कोशिश करता है तो उसे प्रताडि़त किया जाता है, और मनुष्य है तो कभी-ना-कभी गलती तो करेगा ही, बस फ़िर सब मिलकर उसे ही फ़ाँस लेते हैं।
प्रश्न : आप पुलिस फ़ोर्स की बहुत ही धूमिल छवि पेश कर रहे हैं।
उत्तर : मैं सच्ची छवि पेश कर रहा हूँ, यह कोई रहस्य नहीं है, सभी लोग इसे जानते हैं। आपके चारों तरफ़ अचानक अवैध इमारतें और झुग्गी-झोंपडियाँ खड़ी हो जाती हैं, क्या आप समझते हैं कि कोई इसके बारे में नहीं जानता? माटुंगा (मुम्बई का एक उपनगर) में डाकतार विभाग और कस्टम विभाग की कालोनियाँ पास-पास ही हैं, जरा वहाँ जाकर देखिये, तीसरी श्रेणी के अधिकारियों की कालोनियाँ हैं वे। कस्टम विभाग की कालोनी में आपको कारें, कारें और सिर्फ़ कारें ही मिलेंगी, जबकि डाकतार कालोनी में शायद ही एकाध कार हो, और दोनों केन्द्रीय विभागों के उन अधिकारियों के वेतन और तमाम स्केल्स बराबर हैं।
प्रश्न : आपकी पुस्तक में "रघु" जो एक सब-इंस्पेक्टर है, उसे कोल्हापुर में एक एसपी दो घंटे तक कमरे के बाहर खड़ा रखता है, फ़िर वह एसपी उसे ठीक से सेल्यूट ना करने के लिये बुरी तरह डाँटता है, क्या यह एक वास्तविक घटना है?
उत्तर : हाँ, साधारणतया यही होता है, इसके पीछे की चाल यह है कि जूनियर को अपमानित करो, उसे उसकी औकात दिखाओ, एक तरह से उसकी रैगिंग लो, एक बार जब वह झुक जायेगा तो फ़िर वह आपके लिये काम करने लगेगा और आप उसे आसानी से "मैनेज" कर लेंगे।
प्रश्न : आपके प्रमोशन के बारे में?
उत्तर : मेरी बैच में ८२ अफ़सर थे, मुझे छोड़कर लगभग सभी या तो "डिप्टी-कमिश्नर" हैं या "ज्वाईंट कमिश्नर", जबकि मैं अभी भी पुलिस रैंक का डिप्टी कमिश्नर हूँ।
प्रश्न : क्या आपके बच्चे आईपीएस में आयेंगे?
उत्तर : उन्हें आईपीएस का आकर्षण तो है, लेकिन वे समझते नहीं है, उनके लिये आकर्षण है, पुलिस की वर्दी, बैज, जीप, बंगला। मेरी बेटी आईपीएस में आना चाहती है, लेकिन अभी वह बहुत छोटी है इसलिये कुछ समझती नहीं, हाँ बेटा जरूर दसवीं में है और वह मेरी पीड़ा को समझ सकता है।

(वायपी सिंह की दूसरी पुस्तक "वल्चर्स इन लव" कहानी है एक आईएएस महिला राजस्व अधिकारी की, जिसमें प्रशासनिक स्तर पर फ़ैली यौनिकता और सड़ाँध के बारे में बताया गया है। संक्षेप में इसकी कहानी यह है कि एक महिला राजस्व अधिकारी की शादी एक कस्टम अधिकारी से होती है, दोनों मिलकर अथाह सम्पत्ति एकत्रित करते हैं, फ़िर सीबीआई का छापा पड़ता है, लेकिन छापा मारने वाला सीबीआई पुलिस अधिकारी उस महिला राजस्व अधिकारी का पूर्व प्रेमी निकलता है, फ़िर शुरु होता है पैसे, सेक्स और सत्ता का नंगा खेल। भले ही सिंह साहब ने पुस्तक के शुरु में लिखा हो कि "यह एक काल्पनिक कथा है" लेकिन पुस्तक की रिलीज के वक्त कई कस्टम्स अधिकारियों के ड्रायवर वह पुस्तक खरीदने के लिये खडे़ थे। "कार्नेज बाय एंजेल्स" पर भी छगन भुजबल बहुत भड़के थे, पता नहीं क्यों?)


मुझे अहसास है कि यह सब पढ़कर कई लोग सन्न रह गये होंगे, लेकिन यही सच्चाई है। आजादी के इस पर्व पर सभी लोग मीठी-मीठी और रूमानी बातें ही करेंगे, तो मैंने सोचा कि मैं ही बुरा बनूँ और एक सामाजिक कैंसर जिसे सब जानते हैं, लेकिन उसे ढँके रहते है, को मैं उघाड़ने की कोशिश करूँ। किसी कवि की चार पंक्तियाँ कहीं पढीं थीं, उसे उद्धृत कर रहा हूँ -
एक बार जो आउते बापू
नेक बात समझाउते बापू
सत्य-अहिंसा कहतई भर में
बीसन लप्पर पाऊते बापू

मतलब यह कि यदि गाँधी दोबारा आ जाते हमें नेक बातें समझाते रहते। लेकिन सत्य-अहिंसा की बात कहते ही उनमें बीसियों चाँटे पड़ जाते। लेकिन यह दौर ही पाखंड का है, फ़र्जी गाँधीगिरी चलाई जा रही है, ट्रैफ़िक पुलिस वाला चुन-चुनकर महिलाओं को ही फ़ूल दे रहा है, जबकि दो कौड़ी की औकात वाले विधायक का बेटा उसके सामने से बिना नम्बर की गाड़ी तीन लोगों को बिठाकर ले जाता है। हम यह
मानने को तैयार ही नहीं हैं कि हम स्वयं पाखंडी हैं।
दो-दो लड़कियों की भ्रूण हत्या करवाने वाला नवरात्रि में "कन्या भोज" आयोजित कर रहा है, घर-घर में "जोर से कहो कंडोम" के जयकारे लग रहे हैं, शहीद की विधवा पेंशन पाने तक के लिये दर-दर की ठोकरें खा रही है, देश की चालीस प्रतिशत आबादी आधे पेट सोती है, पैसे वाला जमीने खरीद कर शॉपिंग मॉल और टाउनशिप बनवा रहा है और उसी जमीन का मालिक किसान या तो आत्महत्या कर रहा है, या बाँधों में डूबती जा रही अपनी जमीन को बेबस देख रहा है... क्या-क्या और कितना कहा जाये... क्या सचमुच हमें आजादी का जश्न मनाने का हक है?

(सिर्फ़ इंटरव्यू वाला हिस्सा ही अनुवाद है, बाकी के विचारों की जिम्मेदारी मेरी है)
इतना बड़ा ब्लॉग एक बार में लिखने के लिये माफ़ करें, आशा है कि मित्रों ने इसे पूरा पढा होगा, लेकिन यदि इसे दो भागों में पेश करता तो इसका प्रभाव समाप्त हो जाता।

Saturday, August 11, 2007

"बडा़" आदमी दिखना है ? तीन नुस्खे नोट करें...

जब भी सामने वाले सिन्हा जी सुबह घूमने निकलते तो आने-जाने वाले लोग उन्हें "विश" करते थे, मैं भी उन्हीं के साथ घूमने निकलता था, मुझे कोई विश तो क्या "हुश" भी नहीं करता था। ये सिलसिला काफ़ी समय चला तो मैं अवसाद में घिर गया, मुझे लगने लगा कि मैं बेहद दीन-हीन हूँ। आखिर में मैंने हिम्मत बटोरी और सोचा कि आखिर क्या कारण है कि सिन्हा से बडे़ ओहदे पर होने के बावजूद शिक्षाकर्मी तो क्या सफ़ाईकर्मी भी मुझे सलाम नहीं करते और वो सिन्हा एक मामूली सा "बाबुडा़" है, फ़िर भी! इस मामले में "रिसर्च" करना ही होगा... चारों तरफ़ नजर दौडा़ई तब जाकर कहीं ज्ञानचक्षु खुले। बडा़ आदमी दिखने के तीन राज़ समझ में आये, जिस किसी को भी मोहल्ले और आसपास में बडा़ आदमी बनना हो नोट कर लें । सबसे पहला राज़ यह था कि सिन्हा "चड्डी" पहनने लगा था.. ना, ना, ऐसी बात नहीं थी कि पहले नहीं पहनता था, अवश्य पहनता होगा, लेकिन अब वह थोडी़ बडी़ "चड्डी" पहनने लगा था जिसे लोग "बरमूडा" कहा करते हैं। सुबह घूमते वक्त जब वह अपनी बालों भरी टाँगों का खुला प्रदर्शन करता शान से चलता था, तो लोगबाग खुद-ब-खुद रास्ता छोड़ देते थे। बरमूडा में उसे देखकर यह भ्रम दूर हो जाता था कि जंगली भालू बरमूडा में कैसा दिखता होगा? अमीरी और गरीबी दोनो ही कपड़े उतारती है और फ़ाड़ती है, यह सत्य भी उजागर हो गया (भई, हमारी काम वाली बाई भी चिथडे़ पहनती है और मल्लिका भी)। ऑफ़िस का चपरासी भी रात-दिन चड्डी में ही घूमता था, क्योंकि उसके पास एक ही पैंट थी। पहला सबक हमने याद कर लिया कि "बडे़" आदमी बनना है, कुछ इज्जत कमाना है, तो घुटने तक आने वाला रंग-बिरंगा चड्डा पहनो (रंग-बिरंगा इसलिये, कि "खाकी" चड्डे के नाम से कुछ लोग वैसे ही बिदकते हैं, जैसे लाल रंग को देखकर सांड), उसमें नाडा़-वाडा़ लटकता हो या दो-चार पट्टियाँ इधर-उधर झूलती हुई हों तो सोने पर सुहागा। दूसरा राज़ था एक अदद कुत्ता, जी हाँ... जैसे ही आपने कुत्ता पाला, तड़ से आपकी इज्जत बढी़ ही समझो! शर्त सिर्फ़ इतनी सी है कि कुत्त्ता या तो एकदम छोटा सा, मरियल और चर्बी से ज्यादा बालों के वजन वाला हो, या फ़िर एकदम नंगा (पूँछ कटा हुआ)... बीच वाली कोई "रेंज" नहीं चलेगी। क्योंकि यदि आपने "बुलडॉग" पाल लिया तो रोज उसे मटन और दूध देने की औकात भी तो बनानी पडे़गी। कल ही बाजार से एक-दो "बरमूडा" और एक कुत्ता लाना ही पडे़गा, फ़िर उस कुत्ते की चेन पकड़ कर जब मैं सुबह उसे हगाता हुआ चलूँगा तो क्या नजारा होगा, आगे-आगे कुत्ता और पीछे-पीछे मैं...। ना तो युधिष्ठिर ना वह कुत्ता सशरीर स्वर्ग में जाते वक्त इतने खुश हुए होंगे... यह सोच-सोचकर ही मन पुलकित हो रहा है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण गुर यह सीखा कि आपके घर पर जो भी आये उसे दरवाजे पर टँगा हुआ छोड़कर आप आराम से नहाने-धोने को चले जायें (या कम से कम "साहब बाथरूम में हैं" यह तो बाहर कहलवा ही दें)। भारत के जितने बडे़ आदमी होते हैं वे कम से कम दिन में चार बार तो बाथरूम में होते ही हैं और वह भी कम-से-कम एक घंटे के लिये। कई बार विचार आया कि सचिवालयों में एक सार्वजनिक बाथरूम बना दिया जाये जिससे वहीं पर साहब लोग अपना काम निपटा लेंगे, सरकार की काम की गति बढेगी। बहरहाल... जब आपके घर के बाहर के मच्छर उसके खून का पूरा नमूना ले लें, आपका नया-नवेला टॉमी भी उसका परिचय प्राप्त कर ले, सामने वाला व्यक्ति लगभग जाने को उद्यत हो, तभी दरवाजे पर आप प्रकट हों... ये नहीं कि दरवाजे की घंटी बजी और पजामे का लटकता नाडा़ लिये आप ही दरवाजा खोलने चल पडे़। नौकर, बाई, चौकीदार.. कोई नहीं हो तो बच्चे से ही कहलवा दें कि "साहब आ रहे हैं", वरना लोग आपको फ़ालतू समझेंगे। ये तीन दाँव तो आज से ही आजमाता हूँ, फ़िर देखता हूँ लोग कैसे मुझे सलाम नहीं करते?

Friday, August 10, 2007

सोनिया गाँधी वाले चिठ्ठे पर उठते सवाल-जवाब

आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं (भाग-१ और भाग-२) की पोस्टिंग के पश्चात मानो मेरे मेल बॉक्स में बाढ़ आ गई है। कुछ मित्रों ने सामने आकर टिप्पणियाँ की हैं, लेकिन अधिकतर मेल जो प्राप्त हुए हैं वे Anonymous या फ़र्जी ई-मेल पतों से भेजे गये हैं। समझ में नहीं आता कि आखिर सामने आकर, अपनी पहचान बताकर, गालियाँ देने में क्या हर्ज है? हो सकता है कि किसी को कांग्रेस और सोनिया गाँधी से सहानुभूति हो, हो सकता है कि कुछ लोग मुझे भाजपाई समझ रहे हों, लेकिन मैं यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि काँग्रेस से तो कभी मेरी सहानुभूति रही ही नहीं, न कभी हो सकती है, क्योंकि देश की अधिकतर समस्याओं के लिये यही पार्टी या इसकी नीतियाँ ही जिम्मेदार रही हैं। भाजपा से सहानुभूति तो नहीं लेकिन एक उम्मीद अवश्य थी, जो कि कंधार के शर्मनाक घटनाक्रम के बाद समाप्त हो गई, और अब भाजपा और कुछ नहीं "काँग्रेस-२" रह गई है । लेकिन मुझे आश्चर्य इस बात का हुआ कि जबकि मैंने पहले ही यह घोषित कर दिया था कि यह मात्र अनुवाद है, फ़िर लोग इतना क्यों नाराज हो गये ? क्या अंग्रेजी में लिखे हुए किसी लेख का अनुवाद करना कोई गलत काम है? यदि इंटरनेट पर इतना ही तथाकथित "कचरा"(?) भरा पडा़ है, तो फ़िर उसके अनुवाद मात्र से इतना भड़कना क्यों? यदि मैं किसी लेख में अपने विचार रखूँ और कोई तथ्य पेश किये बिना हाँकने लगूँ, तब तो वाद-विवाद की गुंजाइश बनती है, लेकिन यदि कोई एस.गुरुमूर्ति, डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी, नेहरू के सचिव मथाई, आदि की लिखी बातों को मात्र बकवास कहकर खारिज कर दे या उन्हें सांप्रदायिक कह भी दे, तो मेरा क्या बिगड़ता है? ये और बात है कि "रंगीले रसिया नेहरू" की सडांध जब माऊंटबेटन की बेटी (गोरी चमडी़ वाली) ही उजागर करती है, तभी यहाँ के लोगों को कुछ विश्वास होता है, लेकिन यदि कोई भारतीय कुछ कहे तो या तो वह सांप्रदायिक है या फ़िर बकवास कर रहा होता है। रही बात तथ्यों की, तो मैं कोई खोजवेत्ता नहीं हूँ या मेरे पास इतने संसाधन नहीं हैं कि मैं सच-झूठ का पता कर सकूँ, इसलिये अंग्रेजी में लिखे-छपे को मैं अनुवाद करके हिन्दी पाठकों को परोस भर रहा हूँ, और इससे मेरी अनुवाद-क्षमता भी कचरा सिद्ध नहीं हो जाती। हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि भारतीय मानस एक स्त्री और वो भी विधवा, के खिलाफ़ किसी भी बात को सिरे से खारिज कर देगा, चाहे वह अटलबिहारी वाजपेयी को "झूठा" कहे, या कि रहस्यमयी तरीके से "कुर्सी के त्याग और बलिदान" की बातें करने लगे, और सारी शक्तियाँ अपने पास ही केन्द्रित रखे। तो भाईयों, एक अनुवाद मात्र पर इतना चिढने की आवश्यकता नहीं है, कोई बात हो तो नीरज जी,या बैरागी जी जैसे तर्कों के साथ सामने आकर कहो, मुझे भी अच्छा लगेगा। और छुपकर गालियाँ ही देना हो तो उन्हें दो जिन्होंने यह सब लिखा है, उन लोगों के ई-मेल पते जरूर आपको ढूँढने पडेंगे (यदि मेरे पास होते तो तत्काल उपलब्ध करवाता)। मैं जब स्वयं का लिखा हुआ उपलब्ध करवाता हूँ तो छाती ठोंक कर कहता हूँ कि हाँ ये मेरा है, लेकिन इस मामले में मेरी भूमिका मात्र एक वेटर की है, जो खानसामा है वह पहले ही खाना बना चुका है । जब मैं कुछ पकाऊँगा, तो नमक-मिर्ची-तेल सभी की जिम्मेदारी मेरी होगी। जब तीसरा भाग पेश करूँ तो कृपया शुभचिंतक (!) इस बात का ध्यान रखें, फ़िर भी कोई शिकायत हो तो चिठ्ठे पर जाकर टिप्पणी करें (कम से कम मेरे चिठ्ठे पर टिप्पणियाँ तो बढेंगी), वरना मुझे लगेगा कि अपने चिठ्ठे पर ई-मेल पता देकर मैंने गलती तो नहीं कर दी?

Thursday, August 9, 2007

सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं? (भाग-२)

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सोनिया गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनने के योग्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का "धर्मनिरपेक्षता", या "हिन्दू राष्ट्रवाद" या "भारत की बहुलवादी संस्कृति" से कोई लेना-देना नहीं है। इसका पूरी तरह से नाता इस बात से है कि उनका जन्म इटली में हुआ, लेकिन यही एक बात नहीं है, सबसे पहली बात तो यह कि देश के सबसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन कराने के लिये कैसे उन पर भरोसा किया जाये। सन १९९८ में एक रैली में उन्होंने कहा था कि "अपनी आखिरी साँस तक मैं भारतीय हूँ", बहुत ही उच्च विचार है, लेकिन तथ्यों के आधार पर यह बेहद खोखला ठहरता है। अब चूँकि वे देश के एक खास परिवार से हैं और प्रधानमंत्री पद के लिये बेहद आतुर हैं (जी हाँ) तब वे एक सामाजिक व्यक्तित्व बन जाती हैं और उनके बारे में जानने का हक सभी को है (१४ मई २००४ तक वे प्रधानमंत्री बनने के लिये जी-तोड़ कोशिश करती रहीं, यहाँ तक कि एक बार तो पूर्ण समर्थन ना होने के बावजूद वे दावा पेश करने चल पडी़ थीं, लेकिन १४ मई २००४ को राष्ट्रपति कलाम साहब द्वारा कुछ "असुविधाजनक" प्रश्न पूछ लिये जाने के बाद यकायक १७ मई आते-आते उनमे वैराग्य भावना जागृत हो गई और वे खामख्वाह "त्याग" और "बलिदान" (?) की प्रतिमूर्ति बना दी गईं - कलाम साहब को दूसरा कार्यकाल न मिलने के पीछे यह एक बडी़ वजह है, ठीक वैसे ही जैसे सोनिया ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति इसलिये नहीं बनवाया, क्योंकि इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव के प्रधानमंत्री बनने का उन्होंने विरोध किया था... और अब एक तरफ़ कठपुतली प्रधानमंत्री और जी-हुजूर राष्ट्रपति दूसरी तरफ़ होने के बाद अगले चुनावों के पश्चात सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता है?)बहरहाल... सोनिया गाँधी उर्फ़ माइनो भले ही आखिरी साँस तक भारतीय होने का दावा करती रहें, भारत की भोली-भाली (?) जनता को इन्दिरा स्टाइल में,सिर पर पल्ला ओढ़ कर "नामास्खार" आदि दो चार हिन्दी शब्द बोल लें, लेकिन यह सच्चाई है कि सन १९८४ तक उन्होंने इटली की नागरिकता और पासपोर्ट नहीं छोडा़ था (शायद कभी जरूरत पड़ जाये) । राजीव और सोनिया का विवाह हुआ था सन १९६८ में,भारत के नागरिकता कानूनों के मुताबिक (जो कानून भाजपा या कम्युनिस्टों ने नहीं बल्कि कांग्रेसियों ने ही सन १९५० में बनाये) सोनिया को पाँच वर्ष के भीतर भारत की नागरिकता ग्रहण कर लेना चाहिये था अर्थात सन १९७४ तक, लेकिन यह काम उन्होंने किया दस साल बाद...यह कोई नजरअंदाज कर दिये जाने वाली बात नहीं है। इन पन्द्रह वर्षों में दो मौके ऐसे आये जब सोनिया अपने आप को भारतीय(!)साबित कर सकती थीं। पहला मौका आया था सन १९७१ में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ (बांग्लादेश को तभी मुक्त करवाया गया था), उस वक्त आपातकालीन आदेशों के तहत इंडियन एयरलाइंस के सभी पायलटों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं थीं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सेना को किसी भी तरह की रसद आदि पहुँचाई जा सके । सिर्फ़ एक पायलट को इससे छूट दी गई थी, जी हाँ राजीव गाँधी, जो उस वक्त भी एक पूर्णकालिक पायलट थे । जब सारे भारतीय पायलट अपनी मातृभूमि की सेवा में लगे थे तब सोनिया अपने पति और दोनों बच्चों के साथ इटली की सुरम्य वादियों में थीं, वे वहाँ से तभी लौटीं, जब जनरल नियाजी ने समर्पण के कागजों पर दस्तखत कर दिये। दूसरा मौका आया सन १९७७ में जब यह खबर आई कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं हैं और शायद जनता पार्टी सरकार उनको गिरफ़्तार करे और उन्हें परेशान करे। "माईनो" मैडम ने तत्काल अपना सामान बाँधा और अपने दोनों बच्चों सहित दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित इटालियन दूतावास में जा छिपीं। इंदिरा गाँधी, संजय गाँधी और एक और बहू मेनका के संयुक्त प्रयासों और मान-मनौव्वल के बाद वे घर वापस लौटीं। १९८४ में भी भारतीय नागरिकता ग्रहण करना उनकी मजबूरी इसलिये थी कि राजीव गाँधी के लिये यह बडी़ शर्म और असुविधा की स्थिति होती कि एक भारतीय प्रधानमंत्री की पत्नी इटली की नागरिक है ? भारत की नागरिकता लेने की दिनांक भारतीय जनता से बडी़ ही सफ़ाई से छिपाई गई। भारत का कानून अमेरिका, जर्मनी, फ़िनलैंड, थाईलैंड या सिंगापुर आदि देशों जैसा नहीं है जिसमें वहाँ पैदा हुआ व्यक्ति ही उच्च पदों पर बैठ सकता है। भारत के संविधान में यह प्रावधान इसलिये नहीं है कि इसे बनाने वाले "धर्मनिरपेक्ष नेताओं" ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आजादी के साठ वर्ष के भीतर ही कोई विदेशी मूल का व्यक्ति प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन जायेगा। लेकिन कलाम साहब ने आसानी से धोखा नहीं खाया और उनसे सवाल कर लिये (प्रतिभा ताई कितने सवाल कर पाती हैं यह देखना बाकी है)। संविधान के मुताबिक सोनिया प्रधानमंत्री पद की दावेदार बन सकती हैं, जैसे कि मैं या कोई और। लेकिन भारत के नागरिकता कानून के मुताबिक व्यक्ति तीन तरीकों से भारत का नागरिक हो सकता है, पहला जन्म से, दूसरा रजिस्ट्रेशन से, और तीसरा प्राकृतिक कारणों (भारतीय से विवाह के बाद पाँच वर्ष तक लगातार भारत में रहने पर) । इस प्रकार मैं और सोनिया गाँधी,दोनों भारतीय नागरिक हैं, लेकिन मैं जन्म से भारत का नागरिक हूँ और मुझसे यह कोई नहीं छीन सकता, जबकि सोनिया के मामले में उनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है। वे भले ही लाख दावा करें कि वे भारतीय बहू हैं, लेकिन उनका नागरिकता रजिस्ट्रेशन भारत के नागरिकता कानून की धारा १० के तहत तीन उपधाराओं के कारण रद्द किया जा सकता है (अ) उन्होंने नागरिकता का रजिस्ट्रेशन धोखाधडी़ या कोई तथ्य छुपाकर हासिल किया हो, (ब) वह नागरिक भारत के संविधान के प्रति बेईमान हो, या (स) रजिस्टर्ड नागरिक युद्धकाल के दौरान दुश्मन देश के साथ किसी भी प्रकार के सम्पर्क में रहा हो । (इन मुद्दों पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी काफ़ी काम कर चुके हैं और अपनी पुस्तक में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है, जो आप पायेंगे इन अनुवादों के "तीसरे भाग" में)। राष्ट्रपति कलाम साहब के दिमाग में एक और बात निश्चित ही चल रही होगी, वह यह कि इटली के कानूनों के मुताबिक वहाँ का कोई भी नागरिक दोहरी नागरिकता रख सकता है, भारत के कानून में ऐसा नहीं है, और अब तक यह बात सार्वजनिक नहीं हुई है कि सोनिया ने अपना इटली वाला पासपोर्ट और नागरिकता कब छोडी़ ? ऐसे में वह भारत की प्रधानमंत्री बनने के साथ-साथ इटली की भी प्रधानमंत्री बनने की दावेदार हो सकती हैं। अन्त में एक और मुद्दा, अमेरिका के संविधान के अनुसार सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले व्यक्ति को अंग्रेजी आना चाहिये, अमेरिका के प्रति वफ़ादार हो तथा अमेरिकी संविधान और शासन व्यवस्था का जानकार हो। भारत का संविधान भी लगभग मिलता-जुलता ही है, लेकिन सोनिया किसी भी भारतीय भाषा में निपुण नहीं हैं (अंग्रेजी में भी), उनकी भारत के प्रति वफ़ादारी भी मात्र बाईस-तेईस साल पुरानी ही है, और उन्हें भारतीय संविधान और इतिहास की कितनी जानकारी है यह तो सभी जानते हैं। जब कोई नया प्रधानमंत्री बनता है तो भारत सरकार का पत्र सूचना ब्यूरो (पीआईबी) उनका बायो-डाटा और अन्य जानकारियाँ एक पैम्फ़लेट में जारी करता है। आज तक उस पैम्फ़लेट को किसी ने भी ध्यान से नहीं पढा़, क्योंकि जो भी प्रधानमंत्री बना उसके बारे में जनता, प्रेस और यहाँ तक कि छुटभैये नेता तक नख-शिख जानते हैं। यदि (भगवान न करे) सोनिया प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुईं तो पीआईबी के उस विस्तृत पैम्फ़लेट को पढ़ना बेहद दिलचस्प होगा। आखिर भारतीयों को यह जानना ही होगा कि सोनिया का जन्म दरअसल कहाँ हुआ? उनके माता-पिता का नाम क्या है और उनका इतिहास क्या है? वे किस स्कूल में पढीं? किस भाषा में वे अपने को सहज पाती हैं? उनका मनपसन्द खाना कौन सा है? हिन्दी फ़िल्मों का कौन सा गायक उन्हें अच्छा लगता है? किस भारतीय कवि की कवितायें उन्हें लुभाती हैं? क्या भारत के प्रधानमंत्री के बारे में इतना भी नहीं जानना चाहिये!

(प्रस्तुत लेख सुश्री कंचन गुप्ता द्वारा दिनांक २३ अप्रैल १९९९ को रेडिफ़.कॉम पर लिखा गया है, बेहद मामूली फ़ेरबदल और कुछ भाषाई जरूरतों के मुताबिक इसे मैंने संकलित, संपादित और अनुवादित किया है। डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखे गये कुछ लेखों का संकलन पूर्ण होते ही अनुवादों की इस कडी़ का तीसरा भाग पेश किया जायेगा।) मित्रों जनजागरण का यह महाअभियान जारी रहे, अंग्रेजी में लिखा हुआ अधिकतर आम लोगों ने नहीं पढा़ होगा इसलिये सभी का यह कर्तव्य बनता है कि महाजाल पर स्थित यह सामग्री हिन्दी पाठकों को भी सुलभ हो, इसलिये इस लेख की लिंक को अपने इष्टमित्रों तक अवश्य पहुँचायें, क्योंकि हो सकता है कि कल को हम एक विदेशी द्वारा शासित होने को अभिशप्त हो जायें !

Tuesday, August 7, 2007

सोनिया गाँधी को आप कितना जानते हैं ? (भाग-१)

जब इंटरनेट और ब्लॉग की दुनिया में आया तो सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ पढने को मिला । पहले तो मैंने भी इस पर विश्वास नहीं किया और इसे मात्र बकवास सोच कर खारिज कर दिया, लेकिन एक-दो नहीं कई साईटों पर कई लेखकों ने सोनिया के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है जो कि अभी तक प्रिंट मीडिया में नहीं आया है (और भारत में इंटरनेट कितने और किस प्रकार के लोग उपयोग करते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है) । यह तमाम सामग्री हिन्दी में और विशेषकर "यूनिकोड" में भी पाठकों को सुलभ होनी चाहिये, यही सोचकर मैंने "नेहरू-गाँधी राजवंश" नामक पोस्ट लिखी थी जिस पर मुझे मिलीजुली प्रतिक्रिया मिली, कुछ ने इसकी तारीफ़ की, कुछ तटस्थ बने रहे और कुछ ने व्यक्तिगत मेल भेजकर गालियाँ भी दीं (मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्नाः) । यह तो स्वाभाविक ही था, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि कुछ विद्वानों ने मेरे लिखने को ही चुनौती दे डाली और अंग्रेजी से हिन्दी या मराठी से हिन्दी के अनुवाद को एक गैर-लेखकीय कर्म और "नॉन-क्रियेटिव" करार दिया । बहरहाल, कम से कम मैं तो अनुवाद को रचनात्मक कार्य मानता हूँ, और देश की एक प्रमुख हस्ती के बारे में लिखे हुए का हिन्दी पाठकों के लिये अनुवाद पेश करना एक कर्तव्य मानता हूँ (कम से कम मैं इतना तो ईमानदार हूँ ही, कि जहाँ से अनुवाद करूँ उसका उल्लेख, नाम उपलब्ध हो तो नाम और लिंक उपलब्ध हो तो लिंक देता हूँ) ।
पेश है "आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं" की पहली कडी़, अंग्रेजी में इसके मूल लेखक हैं एस.गुरुमूर्ति और यह लेख दिनांक १७ अप्रैल २००४ को "द न्यू इंडियन एक्सप्रेस" में - अनमास्किंग सोनिया गाँधी- शीर्षक से प्रकाशित हुआ था ।
"अब भूमिका बाँधने की आवश्यकता नहीं है और समय भी नहीं है, हमें सीधे मुख्य मुद्दे पर आ जाना चाहिये । भारत की खुफ़िया एजेंसी "रॉ", जिसका गठन सन १९६८ में हुआ, ने विभिन्न देशों की गुप्तचर एजेंसियों जैसे अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी, इसराईल की मोस्साद और फ़्रांस तथा जर्मनी में अपने पेशेगत संपर्क बढाये और एक नेटवर्क खडा़ किया । इन खुफ़िया एजेंसियों के अपने-अपने सूत्र थे और वे आतंकवाद, घुसपैठ और चीन के खतरे के बारे में सूचनायें आदान-प्रदान करने में सक्षम थीं । लेकिन "रॉ" ने इटली की खुफ़िया एजेंसियों से इस प्रकार का कोई सहयोग या गठजोड़ नहीं किया था, क्योंकि "रॉ" के वरिष्ठ जासूसों का मानना था कि इटालियन खुफ़िया एजेंसियाँ भरोसे के काबिल नहीं हैं और उनकी सूचनायें देने की क्षमता पर भी उन्हें संदेह था ।
सक्रिय राजनीति में राजीव गाँधी का प्रवेश हुआ १९८० में संजय की मौत के बाद । "रॉ" की नियमित "ब्रीफ़िंग" में राजीव गाँधी भी भाग लेने लगे थे ("ब्रीफ़िंग" कहते हैं उस संक्षिप्त बैठक को जिसमें रॉ या सीबीआई या पुलिस या कोई और सरकारी संस्था प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री को अपनी रिपोर्ट देती है), जबकि राजीव गाँधी सरकार में किसी पद पर नहीं थे, तब वे सिर्फ़ काँग्रेस महासचिव थे । राजीव गाँधी चाहते थे कि अरुण नेहरू और अरुण सिंह भी रॉ की इन बैठकों में शामिल हों । रॉ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात का विरोध किया था चूँकि राजीव गाँधी किसी अधिकृत पद पर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गाँधी ने रॉ से उन्हें इसकी अनुमति देने को कह दिया था, फ़िर भी रॉ ने इंदिरा जी को स्पष्ट कर दिया था कि इन लोगों के नाम इस ब्रीफ़िंग के रिकॉर्ड में नहीं आएंगे । उन बैठकों के दौरान राजीव गाँधी सतत रॉ पर दबाव डालते रहते कि वे इटालियन खुफ़िया एजेंसियों से भी गठजोड़ करें, राजीव गाँधी ऐसा क्यों चाहते थे ? या क्या वे इतने अनुभवी थे कि उन्हें इटालियन एजेंसियों के महत्व का पता भी चल गया था ? ऐसा कुछ नहीं था, इसके पीछे एकमात्र कारण थी सोनिया गाँधी । राजीव गाँधी ने सोनिया से सन १९६८ में विवाह किया था, और हालांकि रॉ मानती थी कि इटली की एजेंसी से गठजोड़ सिवाय पैसे और समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है, राजीव लगातार दबाव बनाये रहे । अन्ततः दस वर्षों से भी अधिक समय के पश्चात रॉ ने इटली की खुफ़िया संस्था से गठजोड़ कर लिया । क्या आप जानते हैं कि रॉ और इटली के जासूसों की पहली आधिकारिक मीटिंग की व्यवस्था किसने की ? जी हाँ, सोनिया गाँधी ने । सीधी सी बात यह है कि वह इटली के जासूसों के निरन्तर सम्पर्क में थीं । एक मासूम गृहिणी, जो राजनैतिक और प्रशासनिक मामलों से अलिप्त हो और उसके इटालियन खुफ़िया एजेन्सियों के गहरे सम्बन्ध हों यह सोचने वाली बात है, वह भी तब जबकि उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं ली थी (वह उन्होंने बहुत बाद में ली) । प्रधानमंत्री के घर में रहते हुए, जबकि राजीव खुद सरकार में नहीं थे । हो सकता है कि रॉ इसी कारण से इटली की खुफ़िया एजेंसी से गठजोड़ करने मे कतरा रहा हो, क्योंकि ऐसे किसी भी सहयोग के बाद उन जासूसों की पहुँच सिर्फ़ रॉ तक न रहकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक हो सकती थी ।
जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब सुरक्षा अधिकारियों ने इंदिरा गाँधी को बुलेटप्रूफ़ कार में चलने की सलाह दी, इंदिरा गाँधी ने अम्बेसेडर कारों को बुलेटप्रूफ़ बनवाने के लिये कहा, उस वक्त भारत में बुलेटप्रूफ़ कारें नहीं बनती थीं इसलिये एक जर्मन कम्पनी को कारों को बुलेटप्रूफ़ बनाने का ठेका दिया गया । जानना चाहते हैं उस ठेके का बिचौलिया कौन था, वाल्टर विंसी, सोनिया गाँधी की बहन अनुष्का का पति ! रॉ को हमेशा यह शक था कि उसे इसमें कमीशन मिला था, लेकिन कमीशन से भी गंभीर बात यह थी कि इतना महत्वपूर्ण सुरक्षा सम्बन्धी कार्य उसके मार्फ़त दिया गया । इटली का प्रभाव सोनिया दिल्ली तक लाने में कामयाब रही थीं, जबकि इंदिरा गाँधी जीवित थीं । दो साल बाद १९८६ में ये वही वाल्टर विंसी महाशय थे जिन्हें एसपीजी को इटालियन सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रशिक्षण दिये जाने का ठेका मिला, और आश्चर्य की बात यह कि इस सौदे के लिये उन्होंने नगद भुगतान की मांग की और वह सरकारी तौर पर किया भी गया । यह नगद भुगतान पहले एक रॉ अधिकारी के हाथों जिनेवा (स्विटजरलैण्ड) पहुँचाया गया लेकिन वाल्टर विंसी ने जिनेवा में पैसा लेने से मना कर दिया और रॉ के अधिकारी से कहा कि वह ये पैसा मिलान (इटली) में चाहता है, विंसी ने उस अधिकारी को कहा कि वह स्विस और इटली के कस्टम से उन्हें आराम से निकलवा देगा और यह "कैश" चेक नहीं किया जायेगा । रॉ के उस अधिकारी ने उसकी बात नहीं मानी और अंततः वह भुगतान इटली में भारतीय दूतावास के जरिये किया गया । इस नगद भुगतान के बारे में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख ने अपनी हालिया किताब में उल्लेख किया है, हालांकि वह तथाकथित ट्रेनिंग घोर असफ़ल रही और सारा पैसा लगभग व्यर्थ चला गया । इटली के जो सुरक्षा अधिकारी भारतीय एसपीजी कमांडो को प्रशिक्षण देने आये थे उनका रवैया जवानों के प्रति बेहद रूखा था, एक जवान को तो उस दौरान थप्पड़ भी मारा गया । रॉ अधिकारियों ने यह बात राजीव गाँधी को बताई और कहा कि इस व्यवहार से सुरक्षा बलों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और उनकी खुद की सुरक्षा व्यवस्था भी ऐसे में खतरे में पड़ सकती है, घबराये हुए राजीव ने तत्काल वह ट्रेनिंग रुकवा दी,लेकिन वह ट्रेनिंग का ठेका लेने वाले विंसी को तब तक भुगतान किया जा चुका था ।
राजीव गाँधी की हत्या के बाद तो सोनिया गाँधी पूरी तरह से इटालियन और पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों पर भरोसा करने लगीं, खासकर उस वक्त जब राहुल और प्रियंका यूरोप घूमने जाते थे । सन १९८५ में जब राजीव सपरिवार फ़्रांस गये थे तब रॉ का एक अधिकारी जो फ़्रेंच बोलना जानता था, उनके साथ भेजा गया था, ताकि फ़्रेंच सुरक्षा अधिकारियों से तालमेल बनाया जा सके । लियोन (फ़्रांस) में उस वक्त एसपीजी अधिकारियों में हड़कम्प मच गया जब पता चला कि राहुल और प्रियंका गुम हो गये हैं । भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को विंसी ने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है, दोनों बच्चे जोस वाल्डेमारो के साथ हैं जो कि सोनिया की एक और बहन नादिया के पति हैं । विंसी ने उन्हें यह भी कहा कि वे वाल्डेमारो के साथ स्पेन चले जायेंगे जहाँ स्पेनिश अधिकारी उनकी सुरक्षा संभाल लेंगे । भारतीय सुरक्षा अधिकारी यह जानकर अचंभित रह गये कि न केवल स्पेनिश बल्कि इटालियन सुरक्षा अधिकारी उनके स्पेन जाने के कार्यक्रम के बारे में जानते थे । जाहिर है कि एक तो सोनिया गाँधी तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के अहसानों के तले दबना नहीं चाहती थीं, और वे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर विश्वास नहीं करती थीं । इसका एक और सबूत इससे भी मिलता है कि एक बार सन १९८६ में जिनेवा स्थित रॉ के अधिकारी को वहाँ के पुलिस कमिश्नर जैक कुन्जी़ ने बताया कि जिनेवा से दो वीआईपी बच्चे इटली सुरक्षित पहुँच चुके हैं, खिसियाये हुए रॉ अधिकारी को तो इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं था । जिनेवा का पुलिस कमिश्नर उस रॉ अधिकारी का मित्र था, लेकिन यह अलग से बताने की जरूरत नहीं थी कि वे वीआईपी बच्चे कौन थे । वे कार से वाल्टर विंसी के साथ जिनेवा आये थे और स्विस पुलिस तथा इटालियन अधिकारी निरन्तर सम्पर्क में थे जबकि रॉ अधिकारी को सिरे से कोई सूचना ही नहीं थी, है ना हास्यास्पद लेकिन चिंताजनक... उस स्विस पुलिस कमिश्नर ने ताना मारते हुए कहा कि "तुम्हारे प्रधानमंत्री की पत्नी तुम पर विश्वास नहीं करती और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिये इटालियन एजेंसी से सहयोग करती है" । बुरी तरह से अपमानित रॉ के अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ । अंतरराष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों के गुट में तेजी से यह बात फ़ैल गई थी कि सोनिया गाँधी भारतीय अधिकारियों, भारतीय सुरक्षा और भारतीय दूतावासों पर बिलकुल भरोसा नहीं करती हैं, और यह निश्चित ही भारत की छवि खराब करने वाली बात थी । राजीव की हत्या के बाद तो उनके विदेश प्रवास के बारे में विदेशी सुरक्षा एजेंसियाँ, एसपीजी से अधिक सूचनायें पा जाती थी और भारतीय पुलिस और रॉ उनका मुँह देखते रहते थे । (ओट्टावियो क्वात्रोची के बार-बार मक्खन की तरह हाथ से फ़िसल जाने का कारण समझ में आया ?) उनके निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज सीधे पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे, रॉ अधिकारियों ने इसकी शिकायत नरसिम्हा राव से की थी, लेकिन जैसी की उनकी आदत (?) थी वे मौन साध कर बैठ गये ।
संक्षेप में तात्पर्य यह कि, जब एक गृहिणी होते हुए भी वे गंभीर सुरक्षा मामलों में अपने परिवार वालों को ठेका दिलवा सकती हैं, राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के जीवित रहते रॉ को इटालियन जासूसों से सहयोग करने को कह सकती हैं, सत्ता में ना रहते हुए भी भारतीय सुरक्षा अधिकारियों पर अविश्वास दिखा सकती हैं, तो अब जबकि सारी सत्ता और ताकत उनके हाथों मे है, वे क्या-क्या कर सकती हैं, बल्कि क्या नहीं कर सकती । हालांकि "मैं भारत की बहू हूँ" और "मेरे खून की अंतिम बूँद भी भारत के काम आयेगी" आदि वे यदा-कदा बोलती रहती हैं, लेकिन यह असली सोनिया नहीं है । समूचा पश्चिमी जगत, जो कि जरूरी नहीं कि भारत का मित्र ही हो, उनके बारे में सब कुछ जानता है, लेकिन हम भारतीय लोग सोनिया के बारे में कितना जानते हैं ? (भारत भूमि पर जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे कितने ही वर्ष विदेश में रह ले, स्थाई तौर पर बस जाये लेकिन उसका दिल हमेशा भारत के लिये धड़कता है, और इटली में जन्म लेने वाले व्यक्ति का....)
(यदि आपको यह अनुवाद पसन्द आया हो तो कृपया अपने मित्रों को भी इस पोस्ट की लिंक प्रेषित करें, ताकि जनता को जागरूक बनाने का यह प्रयास जारी रहे)... समय मिलते ही इसकी अगली कडी़ शीघ्र ही पेश की जायेगी.... आमीन
नोट : सिर्फ़ कोष्ठक में लिखे दो-चार वाक्य मेरे हैं, बाकी का लेख अनुवाद मात्र है ।
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Monday, August 6, 2007

संजू बाबा (?) को छूट या माफ़ी मिलना चाहिये ?

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संजय दत्त को मिली सजा के विरोध में जिस तरह का बेतुका, तर्कहीन और भौंडा प्रदर्शन जारी है, उसे देखते हुए एक कानूनपसन्द व्यक्ति का चिंतित होना स्वाभाविक है । इस मुहिम को जिस तरह मीडिया हवा दे रहा है वह और भी खतरनाक है, क्योंकि मीडिया की सामाजिक जिम्मेदारी नेताओं से कहीं अधिक है, संजू बाबा ये कर रहे हैं, संजू बाबा ने वह किया, अब उन्होंने मुँह धोया, तब उन्होंने क्या खाया...इस सबसे आम जनता का क्या लेना-देना है ? संजय दत्त को सजा देने के विरोधियों के मुख्य तर्क इस प्रकार हैं -
(१) वे एक संभ्रान्त और राष्ट्रवादी परिवार से हैं ।
(२) उनका अब तक का चाल-चलन अच्छा रहा है ।
(३) वे एक "सेलेब्रिटी" हैं और उन पर इंडस्ट्री का करोडों रुपया लगा हुआ है ।
(४) उन्हें एक गलती की सजा चौदह वर्ष बाद मिल रही है, आदि...आदि...
ये सारे तर्क मात्र भावनाओं में बहकर दिये जा रहे हैं, इनका वास्तविकता और तर्कपूर्ण दिमाग से नाता नहीं है । अब इन तमाम तर्कों के जवाब -
(१) क्या एक संभ्रांत और राष्ट्रवादी परिवार के सदस्य को सिर्फ़ इसी आधार पर माफ़ी दे दी जानी चाहिये ? कल्पना करें कि यदि कल को महात्मा गाँधी के प्रपौत्र तुषार गाँधी के हाथों कोई अपराध हो जाये तो क्या उन्हें सिर्फ़ इस आधार पर माफ़ किया जा सकता है ?
(२) उनका अब तक का चाल-चलन अच्छा रहा है, इसका अर्थ यह होगा कि सलमान ने एक बार लोगों को कुचलने के बाद आज तक गाडी़ की स्पीड चालीस से ज्यादा नहीं की, इसलिये उन्हें माफ़ कर देना चाहिये ? इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि एक बार बलात्कार करने के बाद मैंने हर लड़की को माँ-बहन की नजर से देखा है, इसलिये मुझे माफ़ कर देना चाहिये । जिस वक्त की यह घटना है उस वक्त संजू बाबा (?) मात्र तैंतीस वर्ष के थे, अब यदि तैंतीस वर्ष के पूर्ण वयस्क व्यक्ति को यह नहीं मालूम कि एके ५६ रायफ़ल क्या होती है, उसके निहितार्थ क्या हैं, या अबू सलेम कोई समाजसेवी नहीं है, तो फ़िर उसकी अक्ल पर तरस खाने के अलावा और क्या किया जा सकता है ।
(३) यदि वे एक सेलेब्रिटी हैं तो इससे कानून तो नहीं बदल जाता ? वे सेलेब्रिटी बने हैं यह कांड कर चुकने के बाद, इसलिये यह तर्क तो वैसे ही बेमानी हो जाता है, रही बात उन पर करोडों रुपये लगे और फ़ँसे होने की, तो यह पैसा किनका है, बिल्डर-माफ़िया से साँठगाँठ रखने वाले चन्द धनी-मानी निर्माताओं का जिन्हें लाखों-करोडों में खेलने की आदत है... और करोडों रुपया तो उनका भी फ़ँसा था जो मुम्बई बमकांड में मारे गये या शेयर बाजार से सम्बन्ध ना होते हुए भी जीवन भर के लिये हाथ-पैर गँवा बैठे ।
(४) उनकी गलती की सजा यदि चौदह वर्ष बाद मिल रही है तो इसमें हमारी न्याय प्रणाली और पुलिस की जाँच की खामी है, फ़िर भी उन्हें यह राहत मिल चुकी है कि मात्र डेढ़ साल के बाद जज ने उन्हें जमानत दे दी और तो और वे टाडा के आरोपों से भी मुक्त कर दिये गये, क्या तब उनके समर्थकों को न्यायालय का यह मानवीय चेहरा दिखाई नहीं दिया ? इस जमानत की अवधि में उन्होंने करोडों रुपये कमाये, विदेश यात्रायें की, तमाम लव-अफ़ेयर किये तो फ़िर अब जबकि फ़ैसला आ गया है तो फ़िर यह हायतौबा क्यों ?
दरअसल यह एक मनोवृत्ति है, बल्कि मनोविकार कहना उचित होगा, कि चूँकि मैं सेलेब्रिटी (?) हूँ, मैं एक बडे़ और प्रसिद्ध बाप की औलाद हूँ, मेरे पास अकूत दौलत है, मेरा समाज और नेताओं में रसूख है, इसलिये मैं कुछ भी करूँ मुझे छूट मिलना चाहिये, इस मनोवृत्ति को कुचलने का वक्त आ गया है । यदि संजय दत्त को किसी भी प्रकार की छूट या माफ़ी मिलती है तो गलत संदेश जायेगा । समाज में एक विशेष स्थान रखने वाले व्यक्ति की आदर्श पेश करने की जिम्मेदारी तो और ज्यादा होती है, इससे पीछे हटना कैसा ? जब संजय दत्त से कई गुना अमीर और प्रसिद्ध पेरिस हिल्टन को सजा दी जा सकती है तो फ़िर संजय दत्त अपवाद क्यों होना चाहिये ?

Saturday, August 4, 2007

"सैंडी" का फ़्रेण्डशिप बैंड

उस दिन शाम को "सैंडी" बहुत दुःखी दिख रहा था, ना.. ना.. "सैंडी" कोई अमेरिकन नहीं है बल्कि कल तक नाक पोंछने वाला हमारा सन्दीप ही है । मेरे पूछते ही मानो उसका दुःख फ़ूट पडा़, बोला - भाई साहब, सारे शहर में ढूँढ कर आ रहा हूँ, "फ़्रेंडशिप बैंड" कहीं नहीं मिल रहा है । यदि मैं पूछता कि यह फ़्रेंडशिप बैंड क्या है, तो निश्चित ही वह मुझे ऐसे देखता जैसे वह अपने पिता को देखता है जब वह सुबह उसे जल्दी उठाने की कोशिश करते हैं, प्रत्यक्ष में मैने सहानुभूति जताते हुए कहा - हाँ भाई ये छोटे नगर में रहने का एक घाटा तो यही है, यहाँ के दुकानदारों को जब मालूम है कि आजकल कोई ना कोई "डे" गाहे-बगाहे होने लगा है तो उन्हें इस प्रकार के आईटम थोक में रखना चाहिये ताकि मासूम बच्चों (?) को इधर-उधर ज्यादा भटकना नहीं पडे़गा । संदीप बोला - हाँ भाई साहब, देखिये ना दो दिन बीत गये फ़्रेंडशिप डे को, लेकिन मैंने अभी तक अपने फ़्रेंड को फ़्रेंडशिप बैंड नहीं बाँधा, उसे कितना बुरा लग रहा होगा...। मैने कहा - लेकिन वह तो वर्षों से तुम्हारा दोस्त है, फ़िर उसे यह बैंड-वैंड बाँधने की क्या जरूरत है ? यदि तुमने उसे फ़्रेंडशिप बैंड नहीं बाँधा तो क्या वह दोस्ती तोड़ देगा ? या मित्रता कोई आवारा गाय-ढोर है, जो कि बैंड से ही बँधती है और नहीं बाँधा तो उसके इधर-उधर चरने चले जाने की संभावना होती है । अब देखो ना मायावती ने भी तो भाजपा के लालजी भय्या को फ़्रेंडशिप बैंड बाँधा था, एक बार जयललिता और ममता दीदी भी बाँध चुकी हैं, देखा नहीं क्या हुआ... फ़्रेंडशिप तो रही नहीं, "बैंड" अलग से बज गया, इसलिये कहाँ इन चक्करों में पडे़ हो... (मन में कहा - वैसे भी पिछले दो दिनों में अपने बाप का सौ-दो सौ रुपया एसएमएस में बरबाद कर ही चुके हो) । सैंडी बोला - अरे आप समझते नहीं है, अब वह जमाना नहीं रहा, वक्त के साथ बदलना सीखिये भाई साहब... पता है मेरे बाकी दोस्त कितना मजाक उडा़ रहे होंगे कि मैं एक फ़्रेंडशिप बैंड तक नहीं ला सका (फ़िर से मेरा नालायक मन सैंडी से बोला - जा पेप्सी में डूब मर) । फ़िर मैने सोचा कि अब इसका दुःख बढाना ठीक नहीं, उसे एक आईडिया दिया...ऐसा करो सैंडी... तुमने बचपन में स्कूल में बहुत सारा "क्राफ़्ट" किया है, एक राखी खरीदो, उसके ऊपर लगा हुआ फ़ुन्दा-वुन्दा जो भी हो उसे नोच फ़ेंको, उस पट्टी को बीच में से काटकर कोकाकोला के एक ढक्कन को चपटा करके उसमें पिरो दो, उस पर एक तरफ़ माइकल जैक्सन और मैडोना का और दूसरी तरफ़ संजू बाबा और मल्लिका के स्टीकर लगा दो, हो गया तुम्हारा आधुनिक फ़्रेंडशिप बैंड तैयार ! आइडिया सुनकर सैंडी वैसा ही खुश हुआ जैसे एक सांसद वाली पार्टी मन्त्री पद पाकर होती है... मेरा मन भी प्रफ़ुल्लित (?) था कि चलो मैने एक नौजवान को शर्मिन्दा (!) होने से बचा लिया ।

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Friday, August 3, 2007

किशोर कुमार के जन्मदिन पर दो गीत

किशोर दा का जन्मदिन ४ अगस्त को है, मुहम्मद रफ़ी की पुण्यतिथि के चार दिनों बाद ही किशोर कुमार की जयन्ती आती है । इन दो महान गायकों के बारे में तिथियों का ऐसा दुःखद योग अधिक विदारक इसलिये भी है कि यह पूरा सप्ताह इन दोनों गायकों के बारे में विचार करते ही बीतता है । उनके व्यक्तित्व, उनके कृतित्व, उनकी कलाकारी सभी के बारे में कई मीठी यादें मन को झकझोरती रहती हैं । किशोर दा के बारे में तो यह और भी शिद्दत से होता है क्योंकि उनके अभिनय और निर्देशन से सजी कई फ़िल्मों की रीलें मन पर छपी हुई हैं, चाहे "भाई-भाई" में अशोक कुमार से टक्कर हो, "हाफ़ टिकट" में हाफ़ पैंट पहने मधुबाला से इश्कियाना हो, "प्यार किये जा" के नकली दाढी़ वाले बूढे हों या फ़िर "पडो़सन" के मस्तमौला गुरु हों... उन जैसा विविधता लिये हुए कलाकार इस इंडस्ट्री में शायद ही कोई हुआ हो । क्या नहीं किया उन्होंने - निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, संपादक, गायक, संगीतकार... है और कोई ऐसा "ऑलराऊंडर" ! उनके जन्मदिवस पर दो विविधतापूर्ण गीत पेश करता हूँ, जिससे उनकी "रेंज" और गाते समय विभिन्न "मूड्स" पर उनकी पकड़ प्रदर्शित हो सके । इनमे से पहला गीत है दर्द भरा और दूसरा गीत है मस्ती भरा । अक्सर किशोर कुमार को उनकी "यूडलिंग" के बारे में जाना जाता है, कहा जाता है कि किशोर खिलन्दड़, मस्ती भरे और उछलकूद वाले गाने अधिक सहजता से गाते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि किशोर कुमार ने दर्द भरे गीत भी उतनी ही "उर्जा" से गाये हैं जितने कि यूडलिंग वाले गीत । किशोर कुमार के पास मन्ना डे जैसा शास्त्रीय "बेस" नहीं था, लेकिन गीत में ढलने का उनका अन्दाज उन्हें औरों से अलग और ऊँचा बनाता था (लगभग यही बात शाहरुख खान के बारे में भी कही जाती है कि शाहरुख के पास आमिर की तरह अभिनय की विशाल रेंज नहीं है, लेकिन अपनी ऊर्जा और अंग-प्रत्यंग को अभिनय में शामिल करके उसकी कमी वे पूरी कर लेते हैं... किशोर दा की नकल करने वाले और उन्हें अपना "आदर्श" मानने वाले कुमार सानू, बाबुल सुप्रियो आदि उनके बाँये पैर की छोटी उँगली के नाखून बराबर भी नहीं हैं) । बहरहाल, किशोर कुमार गाते वक्त अपने समूचे मजाकिया व्यक्तित्व को गीत में झोंक देते थे, और दर्द भरे गीत गाते समय संगीतकार के हवाले हो जाते थे । पहला गीत है फ़िल्म "शर्मीली" का "कैसे कहें हम,प्यार ने हमको क्या-क्या खेल दिखाये...", लिखा है नीरज ने, धुन बनाई है एस.डी.बर्मन दा ने । इस गीत में एक फ़ौजी के साथ हुए शादी के धोखे के दुःख को किशोर कुमार ने बेहतरीन तरीके से पेश किया है, उन्होंने शशिकपूर को अपने ऊपर कभी भी हावी नहीं होने दिया, जबकि इसी फ़िल्म में उन्होंने "खिलते हैं गुल यहाँ.." और "ओ मेरी, ओ मेरी शर्मीली.." जैसे रोमांटिक गाने गाये हैं । जब मैं किशोर दा के दर्द भरे नगमें चुनता हूँ तो यह गीत सबसे ऊपर होता है, इसके बाद आते हैं, "चिंगारी कोई भड़के...(अमरप्रेम)", "आये तुम याद मुझे.. (मिली)", "मंजिलें अपनी जगह हैं... (शराबी)" आदि... इसे "यहाँ क्लिक करके" भी सुना जा सकता है और नीचे दिये विजेट में प्ले करके सुना जा सकता है...

SHARMILEE - Kaise ...


अगला गीत मैंने चुना है फ़िल्म "आँसू और मुस्कान" से, जिसकी धुन बनाई है एक और हँसोड़ जोडी़ कल्याणजी-आनन्दजी ने... गीत के बोल हैं "गुणी जनों, भक्त जनों, हरि नाम से नाता जोडो़..." इस गीत में किशोर कुमार अपने चिर-परिचित अन्दाज में मस्ती और बमचिक-बमचिक करते पाये जाते हैं...इस गीत के वक्त किशोर कुमार इन्कम टैक्स के झमेलों में उलझे हुए थे और उन्होंने ही जिद करके "पीछे पड़ गया इन्कम टैक्सम.." वाली पंक्ति जुड़वाई थी । मैंने "पडोसन" का "एक चतुर नार..." इसलिये नहीं चुना क्योंकि वह तो कालजयी है ही, और लगातार रेडियो / टीवी पर बजता रहता है । यदि आप तेज गति ब्रॉडबैंड के मालिक हैं तो "यहाँ क्लिक करके" यू-ट्यूब पर इस गीत का वीडियो भी देख सकते हैं, जिसमें साक्षात किशोर कुमार आपको लोटपोट कर देंगे...यदि नहीं, तो फ़िर नीचे दिये गये विजेट पर इसे प्ले करके सुन तो सकते ही हैं...

Aansoo Aur Muskan ...


इस महान गायक... नहीं.. नहीं.. "हरफ़नमौला" को जन्मदिन की बधाई और हार्दिक श्रद्धांजलि...

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Thursday, August 2, 2007

झाबुआ का "कड़कनाथ" मुर्गा


"कड़कनाथ मुर्गा"...नाम भले ही अजीब सा हो, लेकिन मध्यप्रदेश के झाबुआ और धार जिले में पाई जाने वाली मुर्गे की यह प्रजाति यहाँ के आदिवासियों और जनजातियों में बहुत लोकप्रिय है । इसका नाम "कड़कनाथ" कैसे पडा़, यह तो शोध का विषय है, लेकिन यह मुर्गा ऊँचा पूरा, काले रंग, काले पंखों और काली टांगों वाला होता है । झाबुआ जिला कोई पर्यटन के लिये विख्यात नहीं है, लेकिन जो भी बाहरी लोग और सरकारी अफ़सर यहाँ आते हैं, उनके लिये "कड़कनाथ" एक आकर्षण जरूर होता है । इसे झाबुआ का "गर्व" और "काला सोना" भी कहा जाता है । जनजातीय लोगों में इस मुर्गे को ज्यादातर "बलि" के लिये पाला जाता है, दीपावली के बाद, त्योहार आदि पर देवी को बलि चढाने के लिये इसका उपयोग किया जाता है । इसकी खासियत यह है कि इसका खून और माँस काले रंग का होता है । लेकिन यह मुर्गा दरअसल अपने स्वाद और औषधीय गुणों के लिये अधिक मशहूर है । खतरे की बात यह है कि इस प्रजाति के मुर्गों की संख्या सन २००१ में अस्सी हजार थी जो अब घटकर सन २००५ में मात्र बीस हजार रह गई है । सरकार भी यह मानती है कि यह प्रजाति खतरे में है और इसे विलुप्त होने से बचाने के उपाय तत्काल किया जाना जरूरी है, ताकि इस बेजोड़ मुर्गे को बचाया जा सके । कड़कनाथ भारत का एकमात्र काले माँस वाला चिकन है । झाबुआ में इसका प्रचलित नाम है "कालामासी" । आदिवासियों, भील, भिलालों में इसके लोकप्रिय होने का मुख्य कारण है इसका स्थानीय परिस्थितियों से घुल-मिल जाना, उसकी "मीट" क्वालिटी और वजन । शोध के अनुसार इसके मीट में सफ़ेद चिकन के मुकाबले "कोलेस्ट्रॊल" का स्तर कम होता है, "अमीनो एसिड" का स्तर ज्यादा होता है । यह कामोत्तेजक होता है और औषधि के रूप में "नर्वस डिसऑर्डर" को ठीक करने में काम आता है । कड़कनाथ के रक्त में कई बीमारियों को ठीक करने के गुण पाये गये हैं, लेकिन आमतौर पर यह पुरुष हारमोन को बढावा देने वाला और उत्तेजक माना जाता है । इस प्रजाति के घटने का एक कारण यह भी है कि आदिवासी लोग इसे व्यावसायिक तौर पर नहीं पालते, बल्कि अपने स्वतः के उपयोग हेतु पाँच से तीस की संख्या के बीच घर के पिछवाडे़ में पाल लेते हैं । सरकारी तौर पर इसके पोल्ट्री फ़ॉर्म तैयार करने के लिये कोई विशेष सुविधा नहीं दी जा रही है, इसलिये इनके संरक्षण की समस्या आ रही है । जरा इसके गुणों पर नजर डालें...प्रोटीन और लौह तत्व की मात्रा - 25.7%, मुर्गे का बीस हफ़्ते की उम्र में वजन - 920 ग्राम, मुर्गे की "सेक्सुअल मेच्युरिटी" - 180 दिन की उम्र में मुर्गी का वार्षिक अंडा उत्पादन - 105 से 110 (मतलब हर तीन दिन में एक अंडा) । इतनी गुणवान नस्ल तेजी से कम होती जा रही है, इसके लिये आदिवासियों और जनजातीय लोगों में जागृति लाने के साथ-साथ सरकार को भी इनके पालन पर ऋण ब्याज दर में छूट आदि योजनायें चलाना चाहिये.. तभी यह उम्दा मुर्गा बच सकेगा ।
नोट : आज से लगभग अठारह वर्ष पूर्व जब कुछ मित्रों के साथ हम लोग अपनी-अपनी स्कूटरों से इन्दौर से मांडव गये थे, तब रास्ते में तेज बारिश के बीच एक ढाबे पर इस मुर्गे का स्वाद लिया था, वह बारिश का सुहावना मौसम और कड़कनाथ आज तक याद है । फ़िर वह मौका दोबारा कभी नहीं आया ।

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Wednesday, August 1, 2007

शिल्पा को "गुणवत्ता" पुरस्कार

शिल्पा शेट्टी को "राष्ट्रीय गुणवत्ता पुरस्कार" मिल गया, चलो अच्छा हुआ वरना हम जैसे अज्ञानियों को पता कैसे चलता कि "गुणवत्ता" क्या होती है और किस चीज से खाई जाती है... लेकिन हमारी सरकार, संस्थायें और कुछ अधिकारियों ने हमें बता दिया कि गुणवत्ता "किस" से खाई जाती है । मैं तो सोच रहा था कि यह गुणवत्ता पुरस्कार रिचर्ड गेरे को मिलेगा कि उन्होंने कैसे शिल्पा को झुकाया, कैसे मोडा़ और फ़िर तडा़तड़ गुणवत्ता भरे चुम्बन गालों पर जडे़ । लेकिन सरकार तो कुछ और ही सोचे बैठी थी, सरकार एक तो कम सोचती है लेकिन जब सोचती है तो उम्दा ही सोचती है, इसलिये उसने शिल्पा को यह पुरस्कार देने का फ़ैसला किया । क्योंकि यदि रिचर्ड को देते तो सिर्फ़ किस के बल पर देना पड़ता, लेकिन अब शिल्पा को दिया है तो वह उसके बिग ब्रदर में बहाये गये आँसुओं, उसके बदले अंग्रेजों से झटकी गई मोटी रकम, फ़िर अधेडा़वस्था में भी विज्ञापन हथिया लेने और ब्रिटेन में एक अदद डॉक्टरेट हासिल करने के संयुक्त प्रयासों (?) के लिये दिया गया है । दरअसल सरकार ने बिग ब्रदर के बाद उसके लिये आईएसआई मार्क देना सोचा था, लेकिन अफ़सरों ने देर कर दी और रिचर्ड छिछोरा सरेआम वस्त्रहरण कर ले गया, फ़िर सरकार ने सोचा कि अब देर करना उचित नहीं है सो तड़ से पुरस्कार की घोषणा कर दी और देश की उभरती हुई कन्याओं को सन्देश दिया कि "किस" करना हो तो ऐसा गुणवत्तापूर्ण करो, अपने एक-एक आँसू की पूरी कीमत वसूलो । पहले सरकार यह पुरस्कार मल्लिका शेरावत को देने वाली थी, लेकिन फ़िर उसे लगा कि यह तो पुरस्कार का अपमान हो जायेगा, क्योंकि मल्लिका तो आईएसओ 14001 से कम के लायक नहीं है । तो भाईयों और (एक को छोड़कर) बहनों, अब कोई बहस नहीं होगी, सरकार ने गुणवत्ता के "मानक" तय कर दिये हैं, यदि कोई इस बात का विरोध करेगा तो उसे "महिला सशक्तीकरण" का विरोधी माना जायेगा ।
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